11 December, 2012

सीले बदन पर, कोई दाग पड़ा है


दिन के फरेब में रात का नशा है/ जब भी छुआ है ज़ख्म सा लगा है
सीले बदन पर कोई दाग पड़ा है/बारिशें हैं...सब धुआं धुआं है 

आँखों में कोई कल रात छुपा था, आज सुबह रकीब की लाश मिली है...कसक कोई पानी में घुली है कि दुपट्टे को निचोड़ा है तो कितना सारा दुःख गीले छत पे बहा है...थप्पड़ खाया है चेहरे पर तो होठों से खून बहा है कि तुम्हारा नाम अब भी आदतों में रहा है...कहाँ है कोई...शहर में दिल्ली का कोहरा बुला दे...कहाँ है इश्क कि जीने का अंदाज़ भूलता जाता है...

कब की बात है जानां? आसमान आधा बंटा है...तेरे शहर में बारिश और यहाँ दरिया जला है...तू गुमशुदा कि जहां गुमशुदा है...तेरे दिल तक पहुंचे वो रास्ता कहाँ है? मैं क्यूँ उदास बैठी हूँ रात के तीसरे पहर कि अचानक से बहुत सी भीड़ आ गयी है मेरी तन्हाइयों में. किसने तोड़ दी है फिरोजी रंग की दवात? डॉक्टर ने चेक करके कहा है कि मेरे खून का रंग हरा है...किसी बियाबान में रोप दो ना अमलतास के पौधे...ढूंढ दो मेरी पसंद की कलम. मेरी जान...मैं भूल गयी हूँ अपनी पसंद के गाने...मुझे बता दो तुम्हारे गम में सुकून पहुंचे वो गीत कौन सा है?

सब उतना ही पुराना है तू जितना नया है...इश्क के क्लास में ब्लैकबोर्ड सा टंगा है...सफ़ेद चौक में टीचर की उँगलियों का नशा है, सिगरेट के छल्ले बनाना सीख रहा है...मेरी कहानियों का वो शख्स कितना गुमशुदा है...पेड़ है इमली का...हैरतजदा है. तुम झूठ बोलते हो...वहां झूला पड़ा है...मेले में चलो न, तारामाछी लगा है. कितनी बात करते हो...चुप रहना मना है.

शहर से भागते पुल के ऊपर एक शहर नया बसा है...कैसी रौशनी है...कितना तमाशा है...वहां भी कोई मिलने आएगा ऐसा धोखा हुआ है...जिंदगी फानी रे बाबू...दरिया है मगर सूखा हुआ है. मैं ठहरी हुयी हूँ तू ठहरा हुआ है...कितना दूर है कोई...किसी प्लेटफोर्म पर कोई जिंदगी से बिछड़ा है...सारा किस्सा कहा हुआ है, सारा कहना सुना हुआ है...गाँव चले आता है बस में चढ़ कर, शहर के बाहर लिखवा दो, शहर में रहना मना है. तुम्हारे बाग़ में बहार नहीं आई...अँधेरा कितना घना है...कितनी बर्फ पड़ी, कितना शोर बरसा...किसने भींचा बांहों में...कौन जाग जाने को कहता है...किसी पागल दिशा से आया पगला विरहा गाता है.

कितना लिखना, कितना बाकी बचा है?
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कि उसकी उँगलियों से स्याही और सिगरेट की गंध आती थी. उसके लिए सिगरेट कलम थी...सोच धुआं. बारिश का शोर टीन के टप्पर पर जिस रफ़्तार से बजता था उसी रफ़्तार से उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर भागती थीं. उसके शहर में आई बारिशें भी पलाश के पेड़ों पर लगी आग को बुझा नहीं पाती थीं. भीगे अंगारे सड़क किनारे बहती नदियों में जान देने को बरसते रहते थे मगर धरती का ताप कम नहीं होता था.

तेज़ बरसातों में सिगरेट जलाने का हुनर कई दिनों में आया था उसे. लिखते हुए अक्सर अपनी उँगलियों में जाने किसकी गंध तलाशती रहती थी. उसकी कहानियां बरसाती नदियों जैसी प्यासी हुआ करती थीं.
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कुछ भी ऐब्स्त्रैक्ट नहीं होता...जंगल में खोयी हुयी पगडण्डी भी किसी गाँव को पहुंचा ही देती है...मन के रास्ते किसी उलझे वाक्य से गुज़र कर जाते होंगे शायद...ये शायद क्या होता है?

06 December, 2012

बातें, सब बातें झूठी हैं

गाँव से बहुत दूर एक पुराने किले में एक दुष्ट जादूगरनी रहती थी जो कि छोटे बच्चों को पकड़ कर खा जाती थी...लेकिन आप जानते हो कि ये कहानी झूठी है कि गाँव के छोर पर एक गरीब की झोंपड़ी थी जिसमें एक सुनहले बालों वाली राजकुमारी रहती थी...उसके बाल खुलते थे तो सूरज की किरनें धान के खेतों पर गिरतीं थीं और गाँव वालों की खेती निर्बाध रूप से चलती थी.

वो जो दुष्ट जादूगरनी थी उसे काला जादू आता था...वो बच्चों को बहाने से बुला लेती थी और फिर उनका दिल निकाल कर उसकी कलेजी तल के खाती थी. उसे खरगोश जैसे मासूम बच्चे बहुत पसंद थे. गाँव के सारे बच्चों की माएं उन्हें उस जादूगरनी के बारे में बता के रखती थी और उनकी रक्षा के लिए काला तावीज बांधती थी. बच्चे लेकिन बहुत शैतान होते थे...वे भरी दुपहरिया पीपल के कोटर में अपना अपना तावीज रख आते थे और किले में उचक कर देखते थे. बच्चों को पूरा यकीन था कि शादी के बाद जिन लड़कियों की विदाई होती है वे कहीं नहीं जातीं, यही दुष्ट जादूगरनी उन्हें पकड़ के खा जाती है. 

मगर आप जानते हो कि दुष्ट जादूगरनी असल में किस्सा है...माएं अपने बेटों को उस राजकुमारी से बचाना चाहती थीं जिसका दिल एक राजकुमार ने तोड़ दिया था और उसके उदास आंसुओं की नदी से गाँव के सारे खेत सींचे जाते थे. गाँव के लड़के बहुत सीधे और भोले थे, उन्हें जादूगरनी से भी उतना ही खतरा था जितना कि राजकुमारी से. अगर उसने हँसना सीख लिया तो गाँव के सारे खेत सूख जायेंगे और सभी लोग भूखे मर जायेंगे.  जैसे किसी आशिक को अपने महबूब के वादों पर ऐतबार नहीं होता वैसे ही गाँव की माँओं को बारिश के आने पर भरोसा नहीं था. वे रातों को पीर की मजार पर राजकुमारी के आंसुओं की नदी बहती रखने की मन्नत बाँधने जातीं थी...आते और जाते हुए वे अपने बिछड़े हुए मायके के गीत गाया करतीं...ये गीत राजकुमारी तक हवा में उड़ कर पहुँच जाते...अगली भोर नदी में बाढ़ आ जाती और धान के खेत घुटने भर पानी में डूब जाते...अब धान के बिचड़ों को उखाड़ कर उनकी बुवाई शुरू हो जाती. 

छोटे बच्चों को मालूम नहीं होता कि माएं जो तावीज बांधती हैं उनमें उनकी सच्ची दुआएं शामिल होती हैं...जब वे तावीज को कोटर में रखते तो वे कुछ भी महसूस नहीं कर पाते...अगर वैसे में जादूगरनी उन्हें मार कर उनका दिल निकालती तो उन्हें दर्द नहीं होता...ये एक बहुत पुराने पीर का आशीर्वाद था. लेकिन वहां कोई जादूगरनी थी नहीं...जैसा कि समझदार लोग जानते हैं. बिना तावीज के उन्हें कुछ महसूस नहीं होता. वे देख नहीं पाते कि कहीं कोई जादूगरनी नहीं है...वे देख नहीं पाते कि राजकुमारी का दिल किस कदर टुकड़ों में है. उनमें से कोई राजकुमारी को अपने साथ खेलने के लिए भी नहीं बुलाता. वे बस दूर से देखते थे...उसके हवा में सूखते सतरंगी दुपट्टे को छू आने का साहस करते लेकिन पास नहीं जाते.

उस गाँव की लड़कियों की घर से बाहर निकलने की मनाही हो जाती...शादी के बाद और गौणा के पहले जो लड़कियां गाँव में रहतीं उन्हें दिखता था कि कहीं कोई जादूगरनी नहीं है. वे जब सावन में झूले की पींगें बढ़ातीं तो अक्सर रोते रोते उनकी हिचकियाँ बंध जातीं...वे फिर राजकुमारी के लिए दुआएं गातीं...गोरी..ओ री...कहाँ तेरा राजकुमार...गोरी रो री...चल नदिया के पार...बस कर दे बरसात ओ सावन कितना रोवे नैना...खोल दे रास्ता मन भागे हैं कहीं न पाए चैना...और भी कुछ ऐसा ही जिसका न ओर था न छोर था. कच्ची उमर की लड़कियां थीं, उसके दर्द में रोतीं थीं...जैसे जैसे उनके बाल पकते, कलेजा भी पत्थर होते जाता...फिर उन्हें न राजकुमारी की चिंता होती न उसके टूटे दिल की...वे अपने बेटों को दुष्ट जादूगरनी के किस्से सुनाने लगतीं, उनके गले में काला तावीज बाँधने लगतीं.

हर दुष्ट जादूगरनी की कहानी के पीछे ऐसी कोई कहानी होती है जो कोई नहीं सुनाता...भटकते भूतों का दर्द कौन सुनता है बैठ कर...जिसे मर कर भी चैन नहीं उससे ज्यादा उदास और कौन होगा...एक उदासी का फूल होता है...सदाबहार...जिस मन के बाग में वो खिलता है वहाँ सालों भर बरसातें होती हैं. किसी शहर में सालों भर बरसातें होती हों तो वहां खोजना...उदासी का फूल...उसका रंग सलेटी होता है, बहे हुए काजल जैसी रेखाएं होती हैं...उसे तोड़ते हुए ख्याल रखना...उसकी खुशबू उँगलियों में हमेशा के लिए रह जाती है. 

30 November, 2012

धानी ओ धानी, तेरी चूनर का रंग कौन?

बचपन में पढ़ी हुयी बात थी 'तिरिया चरित्तर'...नारी के मन की बात ब्रम्हा भी नहीं जानते...वो बहुत छोटी थी...उसे लगता था कोई नारी नाम की औरत होती होगी...कोई तिरिया नाम की चिड़िया होती होगी...जैसे नीलकंठ होता है...एक पक्षी जिसे साल के किसी समय देखना शुभ माना जाता है. गाँव में  बहुत दूर दूर तक फैले खेत थे. साल में कई बार गाँव जाने पर भी गाँव के बच्चों के साथ किसी खेल में उसका मन नहीं लगता था. तिलसकरात के समय उसे नीलकंठ हमेशा दिखता. गाँव के शिवाले से जाते बिजली के तार पर बैठा हुआ. बचपन की ये बात उसे सबसे साफ़ और अपने पूरे रंगों में याद है.

हरे खेतों के बीच से खम्बों की एक सीधी कतार दिखती थी. पुरानी लकड़ी के बने हुए खम्भे...उनसे कैसी तो दोस्ती लगती थी. दिन अमरुद के पेड़ पर कटता था...कच्चे अमरुद कुतरते हुए भी उसे ध्यान रहता कि कुछ हिस्सा भी बर्बाद न हो...पेड़ के नीचे फिंके हुए अमरुद देख कर उसे बहुत रुलाई आती कि साल में गिनती के अमरुद लगते थे उस पेड़ पर. 

शाम को लालटेन की रौशनी में उसके साथ के सारे भाई बहन चिल्ला चिल्ला के पहाड़े पढ़ते...उसे बहुत हंसी आती. उसका पढ़ने में कुछ ख़ास दिल नहीं लगता. क्लास में पढ़ती थी और फिर एक्जाम के पहले पढ़ लेती...इतने में उसके नंबर सबसे अच्छे आते थे. उसे किताबों में सर घुसाने से अच्छा भंसा में बैठना लगता था. वहां लालटेन नहीं होती थी...ढिबरी होती थी, जिसमें घूंघट काढ़े चाची शाम का खाना बना रही होती. वो पीढ़ी पर बैठ कर आगे पीछे झूलती रहती...सोचती रहती कि चाची को लालटेन की जरूरत है और बच्चों को सो जाने की. कच्ची मिटटी के बने चूल्हे में कभी कभी चाची उसके लिए आलू डाल देती. उसे भुने आलू बहुत पसंद थे. बचपन से बड़ी हो गयी लेकिन उसे कभी समझ नहीं आया कि चाची से क्या बात करे. कैसे कहे कि ढिबरी की रौशनी में घूंघट काढ़े चाची का चेहरा कितना सुन्दर लगता है. 

कोलेज जाने के बाद गाँव आई तो पहली बार चाची के चेहरे की झुर्रियों पर ध्यान गया...चाची फिर भी उसे खाने का कुछ छूने नहीं देती थी...कि कभी कभार तो गाँव आती हो...हम लोग शबासिन से खाना नहीं बनवाते हैं. घर में सब लोग उसके साथ अलग बर्ताव करते...वो सबकी बहुत दुलारी थी...लेकिन कभी कभी इसके कारण उसे सबसे अलग भी महसूस होता था. इस बार गाँव आई तो चाची को दूसरी नज़र से देख रही थी...उनका दिन भर चुप चुप रहना...मुस्कुराते हुए सबके लिए खाना बनाना...कुएं से पानी भरना...अचरज लगता था. उसका चाची की कहानियां सुनने का मन करता था. कभी तो चाची बिना घूंघट के रहती होंगी...स्कूल जाती होंगी...बाकी लड़कियों के साथ हंसती बोलती होंगी. पहली बार उसका ध्यान गया कि उसको चाची का नाम भी नहीं पता है. उसका दिल किया कि पूछे...फिर लगा कि चाची को उनका नाम याद भी होगा?
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बरसते नवम्बर का मौसम है...कमरे में लगे कोयले के तंदूर पर लड़की ने कुछ साबुत आलू रखे हैं...टेबल पर विस्की का ग्लास रखा है...बर्फ लगभग पिघल गयी है. आरामकुर्सी पर बैठे हुए उसने पाँव बालकनी की रेलिंग पर टिका दिए हैं. घर में शोपें का नोक्टर्न ७ बज रहा है. बारिश की गंध, आलू के छिलकों का हल्का जला हुआ टेक्सचर संगीत में घुल गया है उसे थोड़ा नशा हो रखा है...उसे जिंदगी के सारे नवम्बर याद आ रहे हैं...सिलसिला बहुत साल पुराना है. 

याद के पहले नवम्बर वो सोलह साल की थी...उसकी दीदी को देखने लोग आये हुए थे...चाची के पकोड़ों के साथ चटनी बनाने के लिए पुदीने के पत्ते लाने को कहा था...वो ख़ुशी में दौड़ी जा रही थी कि अचानक किसी से टकरा गयी...बाल्टी और रस्सी के गिरने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि शायद पूरे गाँव ने सुन ली थी...और फिर काँधे पर भिगोये निचोड़े गए कपड़े भी तो गिर गए थे. नवम्बर की धूप बहुत नर्म थी...वो कुएं पर बाल्टी बाल्टी पानी भर कर देता जा रहा था और वो कपड़े झपला रही थी...नाम क्या था लड़के का...याद नहीं...हाँ उस धूप में उसका कुएं की मुंडेर पर खड़े होकर पानी खींचने का सीक्वेंस बंद आँखों से देख सकती थी...उसका रंग सांवला था पर कैसे सोने जैसा दमकता था...एक पल तो वो अपलक ताकती ही रह गयी थी...इतना सुन्दर भी कोई होता है!

याद के दूसरे नवम्बर वो एक चौड़ी सड़क पार करने के लिए खड़ी थी...इतनी गाड़ियाँ थीं और वो ख्याल में ऐसी खोयी कि जाने कितनी देर हो गयी थी...तभी अचानक से किसी ने उसकी कलाई पकड़ी थी और एक झटके में अपने साथ दौड़ाते हुए सड़क के दूसरी ओर ले आया था. 'वहां खड़े खड़े तुम्हारी उम्र एक साल तो बढ़ ही गयी होगी, कौन से गाँव से आई हो?' और वो एक अनजान लड़के को अपने गाँव का नाम अपने नाम के पहले बता चुकी थी. वो साथ चलते तो रास्ते बिछते जाते, दोनों बहुत तेज़ चला करते थे. उन्हें समय को पीछे छोड़ देने की जल्दी थी. रिश्तों के सारे हाइवे उन्होंने गिन लिए. फिर एक दिन अचानक ही उनकी दिशायें एक दूसरे से उलट हो गयीं. कोई सड़क क्या दिल पर ख़त्म होती है?

याद के तीसरे नवम्बर उसका जन्मदिन था. वो अपने लिए एक प्लैटिनम अंगूठी खरीद रही थी. हमेशा से अकेले शोपिंग करने की आदत के कारण उसका बड़बड़ाना जारी था...'तो मैडम, आज आपका बर्थडे है?' उसकी आँखों का रंग ऐसा क्यूँ है...ये सोचते हुए लड़की ने जब हाँ कहा था तो उसे कहाँ मालूम था कि नवम्बर फिर उसे अपने आगोश में लेने को बेसब्र है...उसने बिल देने ही नहीं दिया...वो एक ज्वेलरी डिजाइनर था और ये शॉप उसने बेहद शौक से ख़ास कद्रदानों के लिए खोली थी. अंगूठी तो मैं तुम्हें दूंगा, लेकिन ये वाली नहीं...और फिर उसकी अपनी जिद से वो लड़की की जिंदगी बनता गया था. लड़की भूल गयी कि साल में कितने नवम्बर आते हैं...लेकिन जिंदगी नहीं भूली कि लड़की की जिंदगी में कितने नवम्बर गिन के रखे हैं. वे बेहद समझदार लोग थे...बहुत प्यार से अलग हुए...लड़की आज भी उस अंगूठी को गले की चेन में पहनती है. 

फिर लड़की ने साल से नवम्बर का पन्ना फाड़ के फ़ेंक दिया...हर साल एक नवम्बर का पन्ना उसकी बालकनी से नीचे घूमता हुआ निकल जाता...हर पन्ना एक चीड़ का पेड़ बन जाता और उसके घर साल भर बरसातें होतीं. कुदरत ने सारे पन्नों का हिसाब लगा रखा था. उसकी जिंदगी में एक ऐसा साल आया जिसका हर महीना नवम्बर था...बारह सालों के बारह नवम्बर बरस रहे थे. इश्क के कितने रंग...कितनी खुशबुयें और कितना दर्द. लेकिन लड़की जानती थी कि उसका और नवम्बर का रिश्ता पुराना है...इसलिए दस नवम्बर बीतने के बाद जब ग्यारवाँ आया तो उसे लगा कि शायद वो इस नवम्बर को जज़्ब कर ले तो अगले महीने दिसंबर आ जाएगा. आज नवम्बर की तीस तारीख है. 

उसने डायरी लिखी...३० नवम्बर, २०१२...साल का लेखा जोखा...मौसमों के किस्से...बचपन की कहानियां...भाई की चिट्ठियां...पापा के भेजे चेक जो उसने कभी कैश नहीं कराये...पी गयी विस्कियों की किस्में...बांयें कंधे पर उकेरे गए टैटू वाली कविता...नीली चीनीमिट्टी के देश से आया कोई पोस्टकार्ड...सूखे फूल...चोकलेट के रैपर. 

इस सबके आखिर में उसने लिखना चाहा अपना नाम...
लेकिन उसका नाम क्या था?
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लव पैरालल्स ऑन ए ट्रैम्पोलीन

कल की शूट पर एक ट्रैम्पोलीन का इन्तेजाम था...एक वृताकार स्टील का फ्रेम होता है जिसपर एक बेहद हाई-टेंशन झेल सकने वाला ख़ास तरह का कपड़ा बंधा होता है. दोपहर को ट्रैम्पोलीन सेट अप हुआ...अब लोगों को बताना था की भैय्या आपको इस चीज़ पर कूदना है...और हम चूँकि ऐसा कोई काम लोगों को करने नहीं बोलते जो हमने खुद पहले कभी नहीं किया हो तो तुर्रम खान बनके पहले खुद चढ़ लिए ट्रैम्पोलीन  पर. इंस्टिंक्ट है कि जब पैर जमीन से हटते हैं तो इंसान को डर लगता है...चाहे हवा में उड़ना हो चाहे पानी में तैरना हो. ट्रैम्पोलीन जम्प करने का तरीका ये है कि दोनों पंजों को एक साथ रखें और बीच में जम्प करें...छोटे छोटे जम्प लेने से, जैसा कि वेव में होता है या झूले की पींगों में...एम्पलीट्यूड बढ़ता जाता है.

तो कूदना तो बहुत आसान था...फिर डायरेक्टर ने कहा...हाँ अब...लुक एट द कैमरा...एंड स्माइल...तो एक तो पहली बार जम्प करते हुए दिशा पता नहीं चलती है...आसमान में ऊपर जा तो रहे हैं मगर किधर...उसपर नीचे गिरेंगे किधर वो पता नहीं है...उसके ऊपर लुक एट द कैमरा...बाबा रे! और उसपर स्माइल...हे भगवान! मुस्कुराना कभी इतना मुश्किल नहीं लगा था. पहली बार थोड़ा समझ में आया कि जब हम किसी चीज़ पर ध्यान केन्द्रित कर रहे होते हैं तो चेहरे पर एकाग्रता का भाव होता है...उसमें मुस्कुराना एक काम होता है...पार्ट ऑफ़ दा प्रोसेस. नारद जी कैसे एक लोटा दूध त्रिलोक में लेकर घूमते हुए नारायण नारायण जपना भूल गए थे...बेचारे नारद जी  का सारा ध्यान दूध को गिरने से बचाने में लगा था.

खैर...पहली बार के हिसाब से बहुत ही लाजवाब काम किये हम. दूसरी बार जब ट्रैम्पोलीन सेट हुआ तो हम तैयार होकर एकदम ड्यूड बन गए थे. हमारे साथ एक बन्दा था जो हवा में कूदते हुए पलटी मार सकता था...हमने ऐसी कलाबाजी पहले तो नहीं देखी थी. जब वो नीचे उतरा तो पहला वाक्य यही आया...यु डोंट हैव फीयर इन योर हार्ट...तुम्हारे दिल में डर नहीं है. (अनुवाद अपने खुद के लिए चिपकाया है :O वो क्या है कि कुछ वाक्य अंग्रेजी में ज्यादा अच्छे लगते हैं...और बोला भी अंग्रेजी में ही था...तो इमानदारी बरतते हुए). ट्रैम्पोलीन पर कूदना अच्छा ख़ासा थका देने वाला अनुभव होता है...सांसें तेज़ चलने लगती हैं...पसीने छूट जाते हैं.

सही तरीके से जम्प करने के लिए कुछ छोटे छोटे जम्प लेने चाहिए फिर धीरे धीरे जैसे झूले की पींगें बढ़ती हैं वैसे ही जब हवा में कुछ ज्यादा ऊंचे जा रहे हैं तब आप अपने पोज मार सकते हैं...जैसे कि हवा में दोनों पैर पूरे ऊपर मोड़ना या फिर हाथों से भरतनाट्यम की मुद्रा बनाना इत्यादि...ये सब करते हुए जरूरी है कि आप कैमरा की ओर देखें और मुस्कुराएं जरूर...तब जाके एक अच्छा शॉट आता है. कल बड़ी अच्छी धूप थी बैंगलोर में और जमीन तपी हुयी थी...उसपर कुछ देर नंगे पाँव खड़े रहे...दौड़ते भागते रहे.
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नवम्बर सनलाईट. तुम. उफ़.
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मुझे सफ़र करते हुए और काम करते हुए बहुत भूख लगती है...तो मैं खाने पीने का पूरा इंतज़ाम करके चलती हूँ...चोकलेट...बिस्किट...जूस...कुछ स्नैक्स...और जाने कैसे मैंने कभी लोगों को खाने के बारे में थोड़ा सा ध्यान रखते या प्लानिंग करते नहीं देखा है. खैर...सबको मेरी तरह भूख लगती भी नहीं होगी. तो कल भी मैंने राशन पानी का इन्तेजाम कर रखा था...लेकिन मुझे ठीक मालूम नहीं था कि क्रू में लोग कितने होंगे...तो तीन बजते मेरा राशन ख़तम और मेरी भूख शुरू. तो फिर लगभग पांच बजे कैंटीन जा के कुछ कूकीज ले कर आई...किसी ने बताया था कि बिस्किट वो होते हैं जो मशीन से बनते हैं और कुकी वो होती है जो हाथ से बनती है...खैर...मुझे बहुत से लोग बहुत सा भाषण देते हैं. तो कल फिर बेचारे भूखे प्यासे लोग काफी खुश हुए...जोर्ज ने बोला...अब से पूजा को हर शूट पर ले जायेंगे (actually he said...now onwards Puja is a part of every shoot) जब आपको भूख लगी होती है तो आप अच्छी तरह से परफोर्म नहीं कर पाते हैं क्यूंकि दिमाग का एक हिस्सा हमेशा ये सोचता रहता है 'भूख लगी है'. वैसे तो ऐसे भी लोग होते हैं जो खाना पीना छोड़ कर काम करते हैं. पर मैं वैसी हूँ नहीं. मैं वैसे काम करने के पहले इन्तेजाम करके चलती हूँ.
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तुम मेरी याद  में उग आते हो.
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ट्रैम्पोलीन जम्प...प्यार के जैसे...हवा में उड़ रहे होते हैं...ऊपर जाते हुए मालूम नहीं होता कितना ऊपर जायेंगे...नीचे आते हुए मालूम नहीं होता कैसे गिरेंगे...मुंह के बल...एकदम फ़्लैट...पीठ के बल...या फिर पैरों पर तमीज से लैंड करेंगे. जरूरी ये सब होता भी नहीं है न...जरूरी होता है कि जब हम हवा में हो...उस फ्रैक्शन ऑफ़ सेकण्ड में...एक अच्छा पोज होल्ड कर सकें...जब हम प्यार में हों...उस लम्हे भर...जी सकें...मुस्कुरा सकें...बिना ये सोचे हुए कि आगे क्या होने वाला है. जरूरी है कि थोड़े बहादुर हों...कुछ गलतियाँ कर सकें...गिरने के डर से ऊपर उठ सकें...बिना ये सोचे हुए कि आसपास के लोग देख कर हंस रहे हैं...हम पर हंस रहे हैं...बेखबर दोनों हाथों को पूरा फैलाए हुए आसमान को बांहों में भर सकें...तो क्या हुआ अगर हम नीचे एकदम फ़्लैट-आउट होते हैं. प्यार हमें थोड़ा बेवक़ूफ़ होने की इजाजत देता है...कभी कभी मुझे लगता है कि हमें प्यार होता ही इसलिए है कि हम डर से निकल सकें...उसके सामने कुछ भी कह सकें...बिना ये सोचे हुए कि वो मुझे एकदम ही पागल समझेगा...इत्यादि.
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तुम मुझे बहुत रुलाते हो
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प्यार ये तो नहीं होता कि सिर्फ उस लम्हे आपसे प्यार होगा...प्यार तब भी होगा जब आप गिरेंगे...चोट आई होगी...तब उठाने समझाने प्यार ही तो आता है. प्यार ये कि कह सकें...जो दिल करे...कर सकें दुनिया भर का झगड़ा...हो सकें वो जो होने में डरते हैं. प्यार में डर नहीं होता. बेवकूफी में भी डर नहीं होता. तो अगर A=B and B=C, तो A=C तो माने...प्यार यानी बेवकूफी?

ये हर इक्वेशन में प्यार कमबख्त कहाँ से एंट्री मार जाता है...सोच रही हूँ प्यार वाले पैराग्रफ्स को डिलीट मार दें...लेकिन फिर जाने दो...इतना एडिटिंग करने का सरदर्द कौन ले. दो दिन से इनफाईनाईट काम है...दिन भर दौड़...भाग...उसपर ये सैटरडे वर्किंग. उफ़...वर्ल्ड इज नोट फेयर. हम सोच रहे हैं...कि इतना सोचना कोई अच्छी बात नहीं है...अपनी फिल्म लिखते हैं...सारे टाइम दिमाग में कोई और फिल्म चलती रही...कुछ लोग, थोड़ी लाइटिंग...थोड़ा म्यूजिक... ओ तेरे की! ये तो पैरलल सिनेमा हो गया!!

दो दिन में इतने लोगों से मिली कि सर घूम रहा है...कितने लोगों से बात की...कितनों को मस्का लगाया कितनों को बुद्धू बनाया...बहला के फुसला के पुचकार के रिकोर्डिंग के लिए तैयार किया...गज़ब किया! अपनी पीठ ठोके दे रहे हैं. मैं कहाँ डेस्क जॉब में फंसी हूँ...मुझे ऐसे ही काम में मज़ा आता है...किसी रिकोर्डिंग स्टूडियो में होना चाहिए. रुको...एक आध फिल्म बनाते हैं फिर...जैसे कल जोर्ज नेहा के बारे में बोला...कि अब वो किसी भी रिकोर्डिंग स्टूडियो में जाने के लिए रेडी है. वापसी की लॉन्ग ड्राइव थी...अकेले...पसंदीदा म्यूजिक के साथ...बहुत सारा कुछ सोचने का वक़्त मिल गया.
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मैं ये सब क्यूँ लिख रही हूँ...रिकोर्ड के लिए...कल को खुद ही सेंटी होकर सोचते हैं कि खाली डार्क लिखते हैं...तो आज थोड़ी धूप सही. सुबह हुयी...सात-साढ़े सात टाईप...धूप में खड़े हैं...चेहरा गर्म हो रहा है. सोच रहे हैं. जिंदगी बड़ी खूबसूरत है. 

29 November, 2012

जिसके खो जाने का डर तारी है...

मुझे नहीं मालूम कि ख़ास मेरे बॉस ने मुझे रिकोर्डिंग स्टूडियो क्यूँ जाने को कहा था...शाम के कुछ पहले का वक़्त था...स्टूडियो में एक बेहद अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर आये हुए थे. उन्होंने बड़े लोगों के साथ रिकोर्डिंग की थी...कुछ उसने कहा कि चली जाओ, थोड़ा तुम भी गा देना...एक और आवाज़ जुड़ जायेगी...बस मस्ती करो थोड़ा ज्यादा सीरियसली मत लो.

ऑफिस से स्टूडियो बहुत पास नहीं था पर बैंगलोर में मुझे ऑटो वाले कहीं ले नहीं जाते हैं...पैदल चली ऑफिस से. रास्ते का थोड़ा बहुत आईडिया था...और मैं कभी रास्ते नहीं भटकती...सो मैं रास्ता भटक गयी. नेहा से पूछा कि उसे खाने को कुछ चाहिए तो उसने कहा कुछ भी लेते आना...उसके लिए एक डेरी मिल्क उठायी और अपने लिए पानी. जाते हुए गाने सुन रही थी...एक दोस्त को फोन भी किया था कि उसका बर्थडे था. बहुत दिनों बाद शाम देखने को मिली थी...ढलती हुयी शाम.

रिकोर्डिंग स्टूडियो बेसमेंट में है...स्टूडियो का पहला दरवाज़ा खोलते ही लगा जैसे समय में बहुत पीछे चली गयी हूँ...दोनों दरवाज़ों के बीच एक वैक्यूम ज़ोन होता है...ताकि कमरा पूरी तरह साउंड प्रूफ हो...ये बीच का हिस्सा...जैसे वर्तमान है...अन्दर का दरवाज़ा अतीत में खुलता था और बाहर का दरवाज़ा भविष्य में. पहली बार आकाशवाणी पटना के स्टूडियो गयी थी तो एक ख़ास गंध साथ में लिपटी चली आई थी...इस गंध में इको नहीं होता था...कभी कभी मुझे लगता है कि गंध के साथ शब्द का ख़ासा रिश्ता होता है...स्टूडियो की गंध में कोई आवाज़ नहीं होती...इको नहीं होता. दीवारें जो अक्यूट एंगल पर मिलती हैं...वाकई क्यूट होती हैं. स्टूडियो की मोटी दीवारें...उनपर लगे गत्ते के हिस्से...कार्डबोर्ड...भारी परदे. वहां ठहरी हुयी गंध आती है...जैसे जब से रेडियो स्टेशन बना था तब से कही गयी हर आवाज़ वहीँ ठहरी हुयी है.

स्टूडियो में मेरे पहुँचते रिकोर्डिंग लगभग ख़त्म हो गयी थी...ऑडियो की मिक्सिंग होने में वक़्त लगता तो सिर्फ क्लीन करने के बाद बेस ट्रैक के लिए रुकना था. कितने दिन बाद कोंसोल देखा था...नोट्रे डैम का रवि-भारती याद आया...आईआईएमसी का 'अपना रेडियो' भी.

कुछ देर रुकने के बाद लगा कि बहुत देरी होगी...फिर सुबह की शूट भी थी आठ बजे से...तो घर के लिए निकल पड़ी. मेरी थिंग्स टू डू की लिस्ट में एक चीज़ थी फ़्लाइओवेर पर पैदल चलना. यूँ तो सड़क पर किनारे चलना चाहिए...लेकिन डोमलूर फ़्लाइओवेर के बीचोबीच मीडियन है. जैसा कि आमतौर पर होता है...आम तौर पर करने वाला कोई काम हम करते नहीं है. तो मीडियन पर चल रहे थे. गाने सुनते हुए...रात शुरू हो चुकी थी...दोनों तरफ से तेजी से भागती हुयी गाड़ियाँ...पूरी रौशनी आँखों पर पड़ती हुयी...और फिर बीच फ़्लाइओवेर पर फिर से सब पौज...सब ठहरा हुआ...नीचे गाड़ियाँ भागती हुयीं...ऊपर शहर दौड़ता हुआ...होर्डिंग पर मुस्कुराते लोग...भागते लोग...और ठहरी हुयी बस मैं या फिर आसमान में अटका हुआ चाँद. याद आती है शायद IQ84 में पढ़ी हुयी कोई लाइन...It's just a paper moon. फ्लाईओवर बहुत से लोग क्रोस करते होंगे...मगर सिर्फ फ्लेवर क्रोस करने पर इतना खुश हो जाना...कभी कभी सोचती हूँ कि छोटी छोटी चीज़ों पर खुश हो जाना कितना जरूरी है जिंदगी में कि बात चाहे सिर्फ पहली बार फ़्लाइओवेर क्रोस करने की ही क्यूँ न हो.

शूट पर इतने लोगों से बात की, इतने लोगों को देखा...इतने लोगों को रिकोर्ड किया कि शाम होते होते मिक्स सा कोई कोलाज बन गया...बेहद व्यस्त दिन रहा...भागना, दौड़ना, लोगों को शूट के लिए तैयार करना...शुरुआत कुछ ऐसे करना कि बस कैमरा के सामने खड़े होकर मुस्कुराना है और वहां से शुरू करके आम लोगों से गाने गवाना, डांस के स्टेप्स करना और कैमरे की ओर देख कर मुस्कुराना...ये सब एक साथ करवा लेना...डाइरेक्टर...कैमरामैन...नेहा पहली बार डाइरेक्ट कर रही थी...और मैं पहली बार देख रही थी. वैसे तो शूट पहले किया है पर इतने चेहरों में कोई एक चेहरा अलग सा दिखा. सोच रही थी कि ऐसा क्यूँ होता है कि कोई शख्स बड़ा जाना-पहचाना सा लगता है.

रात को सपना देखा कि कोई है...ठीक ठीक याद नहीं...पर कोई दोस्त है...बहुत करीबी...मुझसे मिलने आया है...मैं उसे अपने हेडफोन्स देती हूँ कि देखो मैं कितना अच्छा गाना सुन रही हूँ...पर वो कहता है कि उसके साथ बस कुछ देर चुप -चाप बैठूं...मैं चौथे महले की सीढ़ियों पर बैठी हूँ उसके साथ...कितनी देर, बिना कुछ कहे. फिर अगला दिन होता है और मुझे पता चलता है कि उसे फांसी हुयी है. इतने में नींद खुलती है...कितना भी याद करती हूँ याद नहीं आता कि सपने में कौन था...घबराहट लगती है...लोगों को खो देने का डर. कारण खोजती हूँ तो पाती हूँ कि कल अचानक से शूट के दौरान ही एक कलीग के घर से फोन आया था कि उसकी दादी को हार्ट अटैक आया है और वो घबरा के हॉस्पिटल भागी थी. हॉस्पिटल की इमरजेंसी और ऐसी चीज़ें दिमाग में रह गयी होंगी शायद.
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उसके खो जाने का डर तारी है...और मालूम भी नहीं है कि वो है कौन जो खो गया है.
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25 November, 2012

अहा जिंदगी!

कल सुबह सुबह अहा! जिंदगी वार्षिक विशेषांक की कॉपी मिली...साथ में चेक...सबसे पहले पापा को फोन किया...बहुत देर बताती रही मैगजीन कैसी है...मेरा छपा हुआ कैसा है...मैं जब हाइपर स्थिति में होती हूँ तो सामने वाले के पास हूँ-हाँ करने के सिवा कोई चारा भी नहीं होता.

कुणाल को बिना चाय के उठा कर हल्ला करना शुरू...मेरी मैगजीन आ गयी...मेरी मैगजीन आ गयी.

फिर भाई को, आकाश को, घर पर, बरुन मामा...सबको फोन किया...स्मृति को मेसेज किया, अंशु को मेल करके कॉपी भेजी और ऐसे कई खुराफाती काम किये जो लगभग महीनों से नहीं किये थे.

फिर साकिब की शादी की शोपिंग करनी थी...तो तैयार होकर निकल गए...एक शेरवानी पसंद आई है अभी...फोरम में जा के एक और पेन ख़रीदे...लामी का...इस बार ट्रांसपेरेंट वाला. पहले के दो पेन खो गए हैं :( हरे और व्हाईट वाले :( कुणाल बोला की पढ़ाई लिखाई का पैसा को पढ़ाई लिखाई के चीज़ में लगाना चाहिए. हमको तो कोई भी कारण चाहिए होता है कि पेन खरीदना जस्टिफाय कर सकें बस. लेट नाईट पिक्चर देखे...घर आ के सो गए.
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फिर आज की सुबह हुयी...मैगजीन के कुछ अच्छे फोटो खींचने को कैमरा बाहर निकाला, बेचारा कितने दिन से इग्नोर मोड में पड़ा था. दालचीनी वाली कॉफ़ी बनायीं. फेवरिट मग में डाली और कैमरा रेडी. सुबह के वक्त खिड़की से बड़ी अच्छी धूप आती है और इसमें फोटो खींचना बहुत पसंद है मुझे. तो ये रहे मैगजीन के दो फोटो. अब बाकी की कहानी शुरुआत से. :)
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सितम्बर के पहले हफ्ते में पारुल जी का फोन आया था कि तुम्हारी क्राकोव डायरीज अहा! जिंदगी में छपवाने के लिए भेज दो. बहुत अच्छी लिखी हैं. ब्लॉग लिखते हुए बहुत साल हुए तब से पारुल का चाँद पुखराज का हमेशा मेरी रीडिंग लिस्ट में रहा है...उनका फोन आया ये भी बहुत अच्छा लगा. तो सबसे पहले तो पारुल जी का ढेर सारा शुक्रिया.

कहीं लिखा हुआ कुछ छपवाने को लेकर अधिकतर विरक्त भाव रहता है...मेरे लिए इतना काफी है कि ब्लॉग पर लिख लिए...पर यहाँ बात अहा! जिंदगी की थी. ये मैगजीन मेरे पापा को बहुत पसंद है...कई बार उनसे इसका जिक्र सुना था...तो लगा की अहा! जिंदगी में छपेगा तो पापा को कितना अच्छा लगेगा. इसलिए बात स्पेशल थी.

ये था पहला फैक्टर...इसके बावजूद क्राकोव डायरीज का आखिरी पार्ट लिख नहीं पायी थी उस समय तक क्यूंकि इस डायरी के एक एक पन्ने को लिखने के लिए गहरे अवसाद से गुजरना होता था...उन लम्हों को फिर से जीना होता था. एक दिन बहुत कोशिश करके आखिरी पार्ट लिखा 'ये खिड़की जिस आसमान में खुलती है, वहां कोई खुदा रहता है'. फिर अगला काम था जो मुझसे सबसे ज्यादा नापसंद था...लिखे हुए को रिव्यू करना. ब्लॉग पर लिखने में कई बार गलतियाँ रह जाती हैं...क्यूंकि ये कलम से लिखने जैसा नहीं है. पब्लिश किये पन्ने पर गलतियाँ मुझे बर्दाश्त नहीं होतीं...और मैं किसी सब-एडिटर पर खुद से ज्यादा विश्वास कर नहीं सकती कि वो पूरे लेख को ठीक से पढ़ेगा. कुल मिला कर २६ पन्ने हुए थे और साढ़े दस हज़ार शब्द. इनको प्रूफचेकर की निगाह से पढ़ना पड़ा. फोन के कोई दो हफ्ते बाद मैंने आर्टिकल भेज दी.

नवम्बर में अहा! जिंदगी के संपादक आलोक जी का मेल आया कि आपका लेख अहा! जिंदगी के वार्षिक विशेषांक में छपा है. यहाँ से एक दूसरी ट्रेजर हंट शुरू हुयी...मैग्जिन खोजने की...पापा ने पटना में पेपर वाले को बोल रखा था उसके अलावा बुक स्टाल पर भी कई बार देखा लेकिन मैक्जिन सोल्ड आउट थी. फिर जिमी देवघर गया हुआ था वहां उसको खोजने पर एक प्रति मिली. भाई ने खुश होकर फोन किया...कि वो भी रेगुलर रीडर है मैगजीन का...कि बहुत अच्छा छपा है...पता है पूरा आठ पन्ने में छपा है. हम हियाँ परेशान कि बाबू रे! लगता है जितना भेजे थे लिख के सब छाप दिया है. पता नहीं कैसा है...कहाँ एडिट हुआ है रामजाने. ऊ अपने फेसबुक पर शेयर किया...हम फूल के कुप्पा. खाली उसका ऊ पोस्ट देखने के लिए एक रात फेसबुक एक्टिवेट किये और फटाफट हुलक आये.

फिर दिल्ली से बरुन मामा का फोन आया कि मैगजीन हाथ आ गयी है लेकिन इसमें तुम्हारा छपा नहीं है. हम नौटंकीबाज...बोलते हैं मामाजी ठीक से देखिये...मेरा नाम पूजा उपाध्याय है :) :) इसी नाम से मिलेगा. फिर मस्त कोम्प्लिमेंट मिला मामाजी से...कि तुमको बुरा लगेगा लेकिन फ्रैंकली स्पीकिंग हमको नहीं लगा था कि इतना कवरेज मिलेगा...बताइये...अपने घर में कितना अंडर एस्टीमेट किया जाता है हमको...कोई इज्ज़ते नहीं है हमारे लिखने का. खैर सेंटी होना बंद किये. मामाजी भी पढ़ के बोले कि बहुत अच्छा लिखी हो.

इस दौरान यहाँ बैंगलोर में कुणाल की मम्मी, नानाजी, नानी और गोलू आये हुए थे...कुणाल की मम्मी छठ करती हैं तो सबको दीवाली की बाद वापस जाना पड़ा...यहाँ से कलकत्ता फ्लाईट और फिर ट्रेन से देवघर. इस बीच हमारे होनहार देवर ने मैगजीन ढूंढ निकाली और फोन किया कि भाभी मैगजीन मिल रहा है...हम बोले दो ठो कॉपी उठा लो...एक ठो हम अपने पापा को भेज देंगे. फिर ट्रेन का सफ़र था देवघर का चार घंटे का तो बीच में नानाजी भी देख लिए मैगजीन...जैसा कि हमारे बिहार में होता है...नाम छपा हुआ देख कर सब लोग बहुत खुद हो जाते हैं...हियाँ तो फोटो भी छपा था उसपर आठ पन्ने का आर्टिकल...नानाजी खुश कि पतोहू खानदान का नाम रोशन की :) :) उनका कितना अरमान रहा कि अखबार में किसी का नाम आये तो फाइनली ई महान काम हम पूरा किये. :) :) (इमैजिनरी फोटू में हम माथा तक घूंघट काढ़े लजाये हुए मुस्कुरा रहे हैं)

ये सब ड्रामा पिछले एक महीने से चल रहा था जबकि हम खुद देखे ही नहीं थे कि भैय्या मैगजीन है कैसी और कैसा छपा है...कि हम तो कभी पढ़े थे नहीं ई वाला मैगजीन. घर पर फोन करके हल्ला किये कि रे हमरे मैक्जीन का पतंग और हवाईजहाज बनाओगे कि भेज्बो करोगे...तो पता चला कि काजू भैय्या का बर्तुहार आ गया था तो हमारा मैगजीन भेजने का काम अभी लेट हो गया...उसपर गाँव से स्पेशल खोया का पेड़ा आ रहा है उसके बिना नहीं आएगा...तिस पर छठ का परसाद...ठेकुआ भी कुरियर होगा. एक मैक्जिन के पीछे कितना उपन्यास लिखने लायक कहानी बन रहा था इधर.

दरबान को रोज एक बार सुबह और एक बार शाम में पूछ लेते कि हमारा कोई कुरियर आया है...खाली एक परसों नहीं पूछे रात को कि बेचारे हम थक कर आये थे ऑफिस से तो भोरे भोर एकदम चकाचक हो गयी. मैगजीन देख कर एकदम मिजाज लहलहा गया जब ई सोचे कि घर में जितना लोग देखा होगा कितना खुश हुआ होगा. मेरा क्या हम तो ब्लॉग छाप के खुश हैं...इतने में मेरा खाना-पानी-दाना चल जाता है. सबसे अच्छा कोम्प्लिमेंट कुणाल से मिला...कि ये है पोलैंड...हमको तो लगता है हम पोलैंड गए ही नहीं...सब तुम ही घूम के आई हो...जो कि गलत है भी नहीं वो तो ऑफिस में काम करता था...घुमक्कड़ी तो हम करते रहते थे...पर दुनिया का कोम्प्लिमेंट एक तरफ...पतिदेव का एक तरफ...काहे कि वो मेरा सबसे बड़ा क्रिटिक है. उसको कुछ पसंद आ गया तो सच में अच्छा लिखे होंगे.

अब आप कहियेगा कि हम इतना कहानी ऊ भी सन्डे को काहे सुना रहे हैं...क्राकोव डायरी ई ब्लॉग पढ़ने वाले सब लोग तो इधर पढ़िए चुके हैं...लेकिन बात यहाँ छपने का नहीं था ना...उसके पीछे कितना ड्रामा था, इमोशन था, ट्रेजेडी था...तो अच्छा ख़ासा मसाला था. बहरहाल...किसी को लिखा हुआ छपा में पढ़ने का मन करे तो अहा! जिंदगी के वार्षिक विशेषांक में छपा है...देखिये कोई अखबार वाले के यहाँ अब भी शायद मिल जाए...और लेट इन्फोर्मेशन के लिए गरियाने का मन है तो एक गिलास ठंढा पानी पी लीजिये...बहुत अच्छा महसूस करेंगे ;) ;)

आज के लिए इतना ही...हम चले खाना बनाने...अभी अभी कुक का फोन आया है कि वो आज सुबह नहीं आएगी...यही है जिंदगी कभी ख़ुशी कभी कम...कभी विस्की कभी रम...पतिदेव खुश होंगे कि पूड़ी सब्जी खाने को मिलेगा...हम परेशान कि बनाना तो हमको पड़ेगा. फिर भी...सुबह सुबह मूड मस्त...अहा जिंदगी!

फुटनोट: क्राकोव डायरीज 

23 November, 2012

बुझा दो सांस जिंदगी कि बहुत धुआं हैं शामों में...

लकड़ियाँ हैं...आम सी लकड़ियाँ...नन्हे से बिरवे में उगीं, जवानी के दिनों में आसमान का सीना चूमा...हवाओं से यारी की...एक एक कोशिका में जीवन था. सेल्फ डिपेंडेंट...खुद के लिए खाना बनाने में सक्षम एक विशाल पेड़ बना था उनसे...गहरे जमीन में जाती जड़ें पानी का कतरा खोजती थीं...हर शाख तक पहुंचाती थीं. जैसे जैसे पेड़ की उम्र होती थी, इंसानी झुर्रियों जैसी परत दर परत उसका बाहरी हिस्सा बनते जाता था और नाखूनों जैसा मृत हो जाता था.

लकड़ियाँ ही थीं जब तक कि उन्हें काट कर खम्बे में परिवर्तित कर दिया गया...उनका नसीब कुछ भी हो सकता था...कुछ लकड़ियाँ लोगों की चौखटों में लगी...कुछ छकड़ों में...कुछ मंदिर, गिरजाघरों में...और कुछ बदनसीब लकड़ियाँ ऐसी भी होती थीं जिनसे फांसी का तख्ता बनाया जाता था. जिंदगी और मौत के बीच को महसूसने वाली लकड़ियाँ...कलेजा काठ का होता था उनका...पर कई बार होता था कि तख्ते में कच्ची लकड़ियाँ   इस्तेमाल हो जाती थीं. इन लकड़ियों में चंद आखिरी सांसें रह जाती थीं. सहमी हुयीं. कई बार ऐसा भी होता था की बागियों को जिन्दा पेड़ों पर फांसी दे दी जाती थी...उन पेड़ों के पत्ते सहम जाते थे...कोटरों में रहने वाले पक्षी दूसरी जगह बसेरा ढूंढ लेते थे.
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मैं अब लिख नहीं सकती. मैं अब लिखना नहीं चाहती. सोचती रहती हूँ कि इन दोनों वाक्यों में से कौन सा सही है. मैं पढ़ नहीं सकती. कितनी तरह की किताबें पढ़ने की कोशिश की पर पूरी नहीं कर पायी. फिल्में भी नहीं देख पाती हूँ. गाने भी नहीं सुन पाती हूँ. बैंगलोर का मौसम अजीब हो रखा है...नवम्बर में बारिश...
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कुछ तो खींचे जिंदगी की ओर...ऐसे में क्या मिलूं किसी से और क्या बातें करूं...हमेशा की आदत...खुश रहती हूँ तो लोगों से मिलती हूँ...उदास रहती हूँ तो बंद कमरा. मगर अब ऐसा क्यूँ लगता है कि दीवारों को भी मेरी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है.

अजीब अजीब ख्याल आते हैं. किस किस उम्र में जा के लौट आती हूँ...किसी से प्यार करो तो सवाल ये नहीं होता है कि वो भी आपसे प्यार करता है या नहीं...सवाल सिर्फ एक होता है...उसकी दुनिया में आप हो भी या नहीं. सिर्फ इतना...डू यु इवन एक्जिस्ट...इन द सेम वर्ल्ड...या फिर आपकी एकदम अलग अलग दुनिया है. दिन भर में उसे कभी फुर्सत भी मिलती है आपके बारे में सोचने की. व्यस्त होने के कैसे पैरामीटर हैं.
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इसे जीना नहीं कहते हैं...जिंदगी जब तक एक ड्रग की तरह धमनियों में उत्तेजना पैदा नहीं करे जिंदगी नहीं होती...बहुत ख़ुशी और बहुत गम के बीच का सी-सॉ झूलते हुए बीच की स्थिति में जीना कभी आया ही नहीं. अभी सब ठहरा हुआ है. कहीं कुछ आगे नहीं बढ़ता...कहीं कुछ भूलता नहीं...कहीं कुछ याद नहीं आता...कहीं बारिश नहीं रूकती...कहीं नदी बाँध तोड़ कर नहीं बहती...कहीं मैं कह नहीं पाती हूँ तुमसे ही कि प्यार है कितना...कहीं से खुद को खोज कर ला नहीं सकती हूँ. नफरतों के ऐसे कांटे उग आये हैं कि लहूलुहान हुए बैठे हैं.

खुद से नफरत करने की भी एक हद होती है...कमसे कम इतनी तो होनी ही चाहिए कि उफनती गंगा में कूद कर जान दे सकें...इतनी होनी चाहिए कि ब्लेड से धमनियां काटते हुए सोचना न पड़े...इतनी होनी चाहिए कि तेज़ रफ़्तार आती हुयी किसी बस के आगे खुद को फ़ेंक सकें...इतनी होनी चाहिए कि किसी डॉक्टर को सही सही सिम्पटम्स बता सकें कि नींद नहीं आती...नींद की गोलियों को पानी में घोल कर पी जाने जितनी नफरत तो होनी ही चाहिए खुद से...इससे कम नफरत की भी तो क्या की...विरक्त भाव से जीना भी कोई जीना है.

आखिर कब तक काले साए मेरा पीछा करेंगे...हर रोज़ देखती हूँ, हर मोड़ पर चेहरा...हर खिड़की में आँखें...रिव्यू मिरर में कोई इंतज़ार करता हुआ. इतनी बार धोखा तो नहीं हो सकता ना...कोरी पड़ी कोपियों में कितनी चिट्ठियां लिख के फाड़ डाले कोई...कितना आग लगा दें कि काफी हो. क्यूँ न मर ही जाए एक बार इंसान कि रोज़ रोज़ का टंटा ख़त्म हो.

या खुदा! कहाँ रखी है क़यामत...आँखों से लहू बरसता है...अब तो भेज जलजले कि इस कमबख्त जिंदगी से पीछा छूटे...नहीं चाहिए मुझे गुनाहों की माफ़ी...नहीं चाहिए उम्रकैद...कहीं कोई सुनवाई घर है तेरे यहाँ तो भेज मौत के फ़रिश्ते को...कि चाहे फ़ेंक दे मुझे दोज़ख में...कहीं...खुदा...कितनी उम्र बची है मेरी?

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