03 February, 2018

सुनो, तुम अपना दिल सम्हाल के रखना।

नहीं। मेरे पास कोई ज़रूरी बात नहीं है, जो तुमसे की जाए। 
ये वैसे दिन नहीं हैं जब 'दिल्ली का मौसम कैसा है?' सबसे ज़रूरी सवाल हुआ करता था। जब दिल्ली में बारिश होती थी और तुमने फ़ोन नहीं किया होता तो ये बेवफ़ाई के नम्बर वाली लिस्ट में तुम्हारा किसी ग़ैर लड़की से बात करने के ऊपर आता था। 
हमारे बीच दिल्ली हमेशा किसी ज़रूरी बात की तरह रही। बेहद ज़रूरी टॉपिक की तरह। कि तुम्हारे मन का मौसम होता था दिल्ली। नीले आसमान और धूप या दुखती तकलीफ़देह गर्मियाँ या कि कोहरा कि जिसमें नहीं दिखता था कि किससे है तुम्हें सबसे ज़्यादा प्यार। 
अब कहते हैं लोग मुझे, दिल्ली अब वो दिल्ली नहीं रही। तुम्हें दस साल हुए उस शहर को छोड़े हुए। अब भी तुम्हें उसके मौसम से क्या ही फ़र्क़ पड़ता है। 
उस लड़के को छोड़े हुए भी तो बारह साल हुए। तुम उसके बालों की सफ़ेदी देखना चाहती हो? उसकी आँखों के इर्द गिर्द पड़े रिंकल? या होठों के आसपास पड़ी मुस्कान से पड़ी हुयी रेखाएँ? तुम क्यूँ देखना चाहती हो कि जो रेखा तुम्हारे और उसके हाथों में ठीक एक सी थी, वो इतने सालों में बदली या नहीं। तुम उसे देखना क्यूँ चाहती हो? जिस लड़के को तुमने ही छोड़ा था, उसके गले लग कर उसी से बिछड़ने के दुःख में क्यूँ रोना चाहती हो। उसके ना होने के दुःख का ग्लेशियर अपने दिल में जमाए हुए तुम जियो, यही सज़ा तय की थी ना तुम दोनों ने? उसकी आँखों में मुहब्बत होगी अब भी जिसे वो नफ़रत का नाम देता है। उसकी आवाज़ से तुम्हारे दिल की धड़कन क्यूँ रूकती है? इतना प्यार करना ही था उससे तो उसे छोड़ा ही क्यूँ था? उसके पास रह कर उससे दूर हो जाने का डर था तुम्हें?
दुखता हुआ शहर दिल्ली। सीने में पिघलता। जमता। दूर होता जाता। बहुत बहुत दूर। पूछता। 'ताउम्र करोगी प्यार मुझसे?'
***
हम जिनसे प्यार करते हैं, वो इसलिए नहीं करते हैं कि उनसे बेहतर कोई और नहीं था। प्यार में कोई आरोहण नहीं होता कि उस सबसे ऊँची सीढ़ी पर जो मिलेगा हम उससे सबसे ज़्यादा प्यार करेंगे। या उससे ही प्यार करेंगे। 
हमें जो लेखक पसंद होते हैं, वे इसलिए नहीं होते कि वे दुनिया के सबसे अच्छे लेखक होते हैं। उनका लिखा पुरस्कृत होता है या बहुत लोगों को पसंद होता है। हमें कोई लेखक इसलिए पसंद आता है कि कहीं न कहीं वो हमारी कहानी कहता है। हमारे प्रेम की, हमारे बिछोह की। अक्सर वो कहानी जो हम जीना चाहते थे लेकिन जी ना सके। हो सकता है हम उनके बाद कई और लेखकों को पढ़ें और कई और शहरों के प्रेम में पड़ें। लेकिन अगर हमने एक बार किसी के लिखे से बहुत गहरा प्रेम किया है तो हम उस लेखक के प्रेम से कभी नहीं उबर सकते। हम उस तक लौट लौट कर जाते हैं। कई कई साल बाद तक भी। 
आज मैंने कुछ वे ब्लॉग पोस्ट पढ़े जो २०१० में लिखे गए थे। ये ऐसे क़िस्से हैं जिनकी पंक्तियाँ मुझे हमेशा याद रही हैं। ख़ास तौर से दुःख में या सफ़र में। उन लेखों में दुःख है, अवसाद है, मृत्यु है और इन सब के साथ एक लेखक है जिसका उन दिनों मुझे नाम, चेहरा, उम्र कुछ मालूम नहीं था। ये शब्दों के साथ का विशुद्ध प्रेम था। मैं उन पोस्ट्स तक लौटती हूँ और पाती हूँ कि अच्छी विस्की की तरह, इसका नशा सालों बाद और परिष्कृत ही हुआ है। 
मैंने इस बीच दुनिया भर के कई बड़े लेखकों को पढ़ा है। कविताएँ। कहानियाँ। लेख। आत्मकथा। कई सारे शहर घूम आयी। लेकिन उन शब्दों की काट अब भी वैसी ही तीखी है। वे शब्द वैसे ही हौंट करते हैं। वैसे ही ख़याल में तिरते रहते हैं जैसे उतने साल पहले होते थे। 
प्यारे लेखक। तुम्हारा बहुत शुक्रिया। मेरी ज़िंदगी को तुम्हारे ख़ूबसूरत और उदास शब्द सँवारते रहते हैं। तुम बने रहो। दुआ में। अगली बार मैं किसी शहर जाऊँगी विदेश के, तो फिर से पूछूँगी तुमसे, 'क्या मैं आपको चिट्ठियाँ लिख सकती हूँ?'। इस बार मना मत करना। तुम्हारे बहुत से फ़ैन्स होंगे। हो सकता है कोई मुझसे ज़्यादा भी तुमसे प्यार करे। लेकिन मेरे जैसा प्यार तो कोई नहीं करेगा। और ना मेरे जैसी चिट्ठियाँ लिखेगा। तुमसे जाने कब मिल पाएँगे। मेरा इतना सा अधिकार रहने दो तुमपर, किसी दूर देश से चिट्ठियाँ लिखने का। मुझे इसके सिवा कुछ नहीं चाहिए तुमसे। लेकिन मेरे जीने के लिए इतना सा रहने दो। 
तुम्हारी,
(जिसे तुमने एक बार यूँ ही बात बात में पागल कह दिया था)
ज़िंदगी रही तो फिर मिलेंगे।
***
कुछ शौक़ आपको जिलाए रखते हैं। 
मुझे सिगरेट की आदत कभी नहीं रही। लेकिन शौक़ रहा। दोस्तों के साथ कभी एक आध कश मार लिया। लिखते हुए मूड किया तो सिगरेट के खोपचे से दो सिगरेट ख़रीद ली और फूँक डाली। किसी दिन मूड बौराया तो बीड़ी का बंडल उठा लाए और देर रात ओल्ड मौंक पीते रहे और बीड़ी फूँकते रहे। किसी कसैलेपन को मिठास में बदलने की क़वायद करते रहे। 
जब तक किताब नहीं छपी थी अपनी, ज़िंदगी में सिर्फ़ ढाई कप चाय पी थी। पहली बार कॉलेज से एजूकेशनल ट्रिप पर कोलकाता गयी थी...वहाँ टाटा के ऑफ़िस में उन्होंने कुछ समझाते हुए सारी लड़कियों के लिए चाय भिजवायी थी। आधी कप वो, कि ना कहने में ख़राब लगा और पीने में और भी ख़राब। दूसरा कप इक बार दिल्ली में एक दोस्त ने ज़िद करके बनायी, जाड़े के दिन हैं, खाँसी बुखार हो रखा है, मेरे हाथ की चाय पी, जानती हूँ तू चाय नहीं पीती है, मर नहीं जाएगी एक कप पी लेने से। तीसरा कप बार एक एक्स बॉयफ़्रेंड ने प्यार से पूछा, मैं चाय बहुत अच्छी बनाता हूँ, तू पिएगी? तो उसको मना नहीं किया गया। दिल्ली गयी किताब आने के बाद और वहाँ दोस्तों को चाय सिगरेट की आदत। मैं ना चाय पीती थी, ना सिगरेट। फिर प्रगति मैदान में लगे नेसकैफ़े के स्टॉल्ज़ से इलायची वाली चाय पी...इक तो किताबों और हिंदी का नशा और उसपर दोस्त। अच्छी लगी। 
अपने सबसे फ़ेवरिट लेखक के साथ एक सिगरेट पीने की इच्छा थी। उनसे गुज़ारिश की, आपके साथ एक सिगरेट पीने का मन है। उस एक गुज़ारिश के लिए आज भी ख़ुद को माफ़ नहीं कर पाती हूँ। कि मुझे मालूम नहीं था उन्होंने कई साल से सिगरेट नहीं पी है। मैं कभी ऐसी चीज़ नहीं माँगती। वाक़ई कभी नहीं। इसके अगले दो साल मेरे लिए दिल्ली बुक फ़ेयर यानी ख़ुशी, चाय और सिगरेट हुआ करती थी। लोग मेरी तस्वीरें देख कर कहते, आप बैंगलोर में इतनी ख़ुश कभी नहीं होतीं। 
बैंगलोर आके फिर चाय पीना बंद। सिगरेट बहुत रेयर। पिछले साल कभी कभी चाय पीनी शुरू की। घर पर। अपने हाथ की चाय। फिर पता चला, पहली बार कि मैं वाक़ई बहुत अच्छी चाय बनाती हूँ और लोग जो कहते हैं तारीफ़ में, सच कहते हैं। मगर सिगरेट की तलब एकदम ख़त्म। 
हुआ कुछ यूँ भी कि पिछले साल जिन दोस्तों से मिली, वे सिगरेट नहीं पीते थे। उनके साथ रहते हुए, बहुत सालों बाद ऐसा लगा कि सिगरेट ज़रूरी नहीं है दो लोगों के बीच। कि इसके बिना भी होती हैं बातें। हँसते हैं हम। गुनगुनाते हैं। कि मेरे जैसे और भी लोग हैं दुनिया में जो कॉफ़ी के लिए कभी मना नहीं करेंगे लेकिन चाय देख कर रोनी शक्ल बनाएँगे। कि ज़हर नहीं, लेकिन नामुराद तो है ही चाय।
सिगरेट का कश लिए कितने दिन हुए, अब याद नहीं। शौक़ से विस्की पिए कितने दिन हुए, वो भी याद नहीं। ओल्ड मौंक तो पिछले साल की ही बात लगती है। दिल्ली के कोहरे में मिला के पी थी। 
तो मेरा मोह टूट रहा है...अब इसके बाद जाने क्या ही तोड़ने को जी चाहेगा। सुनो, तुम अपना दिल सम्हाल के रखना।
प्यार। बहुत।
***
छाया गांगुली गा रही हैं...'फ़र्ज़ करो, हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो, दीवाने हों'

'हम' दोनों, क्या हो सकते हैं...फ़र्ज़ करो...दीवाने ही होंगे। 

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