28 April, 2024

ढीठ याद के कच्चे क़िस्से

मुहब्बत की स्पॉटलाइट जब आप पर गिरती है तो आप दर्शक दीर्घा से निकल कर मुख्य किरदार हो जाते हैं। आपका सब कुछ हाइलाइट होता है। आँखों में रौशनी होती है, बाल चमकते रहते हैं और अक्सर ज़िंदगी का डायरेक्टर इतनी प्यारी हवायें चलवाता है कि आपका दुपट्टा या कि मान लीजिए, आँचल…एकदम हवा में हौले हौले उड़ता है। उसकी मर्ज़ी हो तो आपको आसमान में उड़ा सकता है, पाताल में गिरा सकता है। आप सम्मोहित हो कर हर वो चीज़ करते जाएँगे जो आपको लगता है कि डायरेक्टर के हिसाब से कहानी का हिस्सा है। रोना, हँसना, दीवानवार दौड़ना…सफ़र करना। कपड़े बदलना। किरदार बदलना। 

फिर एक रोज़ स्पॉटलाइट ऑफ होगी। आप जानेंगे कि सब कुछ सिर्फ़ एक नाटक था। और अब बाक़ी दर्शकों की तरह आपको भी लौट कर घर जाना है। आपकी कुछ ज़मीनी सच्चाइयाँ हैं, जो घर पर आपका इंतज़ार कर रही हैं। 

पर उस एक रोज़ के उस छोटे से रोल के बाद आप कभी ठीक-ठीक दर्शक नहीं रह पाते। आपके अंदर एक स्टॉपवॉच चालू हो जाती है जो घड़ी घड़ी गिनती रहती है कि आपकी अति-साधारण ज़िंदगी का इतना हिस्सा बीता। आप ध्यान से उन वायलिन की धुनों को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो वसंत की चाप में सुनी जा सकती हैं बस। सिर्फ़ एक किरदार निभाने के बाद आप अक्सर लौटना चाहते हैं। आप फूलों को गौर से देखते हैं। वसंत अपनी धमक में जिन पीले फूलों को यूँ ही आपके ऊपर गिरा देता है, आप उनकी पंखुड़ियों को उठा कर घर ले आते हैं और लगातार पलाश के फूलों के बारे में सोचते हैं। टेम्पल ट्री को देखते हुए यह भी कि बचपन से जितने मंदिर देखे उनमें कनेल रहा, उढ़ूल रहा, आक भी रहा…लेकिन उन्हें मंदिर के फूल क्यों नहीं कहते लोग?

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There is a myth that we can be selectively vulnerable.

लेकिन ऐसा होता नहीं है। दिल के दरवाज़े खोलते हैं तो आशिक़ों ही नहीं, दुश्मनों की भी पूरी फ़ौज भीतर घुस आती है। अब आप इतने क्रूर तो हैं नहीं कि दुश्मनों को भूखा मार दें…तो आपको सबके लिए रसद जुटानी पड़ती है। इतनी भसड़ में आप भूल जाते हैं कि दिल का दरवाज़ा आख़िर को खोला किस लिये था।
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जब अपने भीतर इतना अंधेरा हो कि हम कुछ भी देख न सकें तो हम भरी-भरी आँखों से बाहर की दुनिया को देखते हैं। वसंत में सारे फूल एक साथ नहीं खिलते। ट्रम्पेट ट्री के गुलाबी फूलों का मौसम ख़त्म होते होते अमलतास लहकने शुरू हो जाते हैं…अमलतास के गिरे हुए फूलों को चुन कर बुकमार्क बनाने चलो तो वायलेट फूलों का पेड़ ऐसा झमक के दिखता है कि हम उसका नाम गूगल सर्च करना ही भूल जाते हैं। किसी चीज़ का नाम जानना उसे अपने थोड़ा क़रीब करना है। जिस शहर का मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता, उसके एक बैगनी फूलों वाले पेड़ का मैं नाम पूछना भी नहीं चाहती। ये भी तो नहीं होता कि पेड़ को भूल जाऊँ आराम से…वो जो दोस्त नहीं था उस समय तक और जिसके साथ इस पहचाने सड़क में रास्ते भूलती जाती थी…उसे दिखाया था यह बैगनी फूलों से पूरा लदा हुआ पेड़। जाने उसे याद होगा या नहीं। मैं उसे बता दूँ कि मैं इस पेड़ को जब भी देखती हूँ तुम्हारी बेतरह याद आती है?

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ज़िंदगी में ख़ालीपन नहीं होता तो याद इतनी ढिठाई से आ कर नहीं रहती।

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थ्री-बॉडी प्रॉब्लम देखी। उसमें आख़िर में एक किरदार कहता है, विल के दिमाग़ में असल में क्या चल रहा है, यह सिर्फ़ विल जानता है, और कोई नहीं।
मेरे दिमाग़ में क्या चलता रहता है?

काग़ज़ की नाव पर बैठ विल अपनी हथेली खोलता है, बारिश गिर रही है उसकी हथेली पर। यह सपना है। क्योंकि उसके दिमाग़ को शरीर से निकाल कर क्रायो-फ्रीज़ करके कई सौ प्रकाश वर्ष दूर भेजा जा रहा है। सीरीज़ ख़त्म हो गई है। अगला सीजन पता नहीं कब आएगा। लेकिन मैं भी विल की तरह लूप में उसी बारिश वाली शाम धुंध में हूँ। हथेली पर पानी की बूँदें हैं। साथ में कौन है, मालूम नहीं। वह कितनी उदासी से कहता है, ‘किसी ने मुझे प्यार नहीं किया।’

मैं तो यह भी नहीं कह सकती।

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सिवाय इसके, कि मेरा दिल बेतरह टूटा हुआ है, मैं अपने बारे में कोई बात यक़ीन से नहीं कह सकती। मुझे इस टूटे हुए दिल के इर्द गिर्द सिर्फ़ शब्दों का जिरहबख्तर बनाना आता है। सो बना रही हूँ। कि ज़िंदगी सीज़फ़ायर नहीं करती। दुख कई रूपों में आता है। छर्रों से लेकर मिसाइलों तक। हर ओर बारूद की गंध है।

मेरी साँस अटकती है।

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मुझे लद्दाख की वो सड़क ध्यान रहती है, जो किसी और के जिये हुए की है शायद। ख़ाली सड़क पर चलती बाइक। दोनों हाथ छोड़ कर आसमान देखना। तनहा होना। लेकिन उदास नहीं होना।

इतना ही चाहिए। सिर्फ़ इतना। 



17 April, 2024

मेरा दिल जलता हुआ सूरज है। बदन के समंदर में बुझता हुआ।

बदन में पिघले हुए शब्द बहते रहते हैं। धीपते रहते हैं उँगलियों के पोर। सिगरेट हाथ में लेती हूँ तो लाइटर की ज़रूरत नहीं होती।  दिल कमबख़्त, सोया हुआ ज्वालामुखी है, सिर्फ़ सपनों में फटता है। कहीं सूनामी आते हैं तो कहीं भूचाल। कभी रातों-रात पहाड़ उठ खड़े होते हैं कभी ऊँची इमारतें नेस्तनाबूद हो जाती हैं। सपनों का भूगोल बदलता रहता है। तुम बिसरते हो। कुछ भी रुकता कहाँ है। 


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उसके इर्द-गिर्द गुनहगार तितलियाँ उड़ती रहती थीं। उनमें से एक भी अगर हथेली पर बैठ गई तो किसी का खून करने की इच्छा भीतर घुमड़ने लगती थी। 


पिछले कुछ सालों में जो बहुत सारा ग़ुस्सा बदन में जमा हो था और घड़ी घड़ी फट पड़ता था, क्या वो सिर्फ़ तेज़ी से बहता खून था? हाई-ब्लड प्रेशर इक छोटी सी गोली से कंट्रोल हो गयाउसके साथ ही दुनिया के प्रति हम थोड़े से कोमल हो गये। ग़ुस्सा थोड़ा सा कम हो गया। 


क्या मुहब्बत भी इसी तरह वाक़ई बदन का कोई केमिकल लोचा है? किसी दवाई से इसी तरह बदन में बेहिसाब दौड़ती मुहब्बत को थोड़ा रेस्ट मिल जाएगा? वो किसी बस-स्टॉप पर रुक जायेगी? तुम्हारा इंतज़ार करेगी



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सब ओर गुनाहों की ख़ुशबू है। बदन में, आत्मा में। छुअन में। लिबास में। स्याही में। 

मेरी ओर लपटें लपकती हैं, आँखों को लहकाती हुई। दिख नहीं रहा ठीक से। वो क्या है जो ठीक से नहीं जल रहा कि यहाँ इतना धुआँ है। क्या आँख से उठता है आँसू का बादल


मेरा दिल जलता हुआ सूरज है। बदन के समंदर में बुझता हुआ। 


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ख़ुशी की हर चीज़ से गुनाहों की गंध आती है। 

गिल्ट। हमारे जीवन का केंद्रीय और स्थायी भाव है इन दिनों। 


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कौन मेरे जलते हुए दिल पर आँसू छिड़क रहा है


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मुझे पता है कि तुम आग के बने हो और मेरी दुनिया काग़ज़ की है। फिर भी, तुम्हें छू कर अपनी उँगलियाँ जलाना चाहती हूँ। 

क्या हम छुअन के प्रति सबसे ज़्यादा निर्दयी इसलिए होते हैं क्योंकि यह सबसे ईमानदार इंद्रिय है? बातों से झूठ बोलना आसान है, आँखों से झूठ बोलना फिर भी थोड़ा मुश्किल, लेकिन किया जा सकता है, गंध तो अनुभव के हिसाब से अच्छी-बुरी होती है और बदलती रहती है, स्वाद भीलेकिन स्पर्शबिलकुल झूठ नहीं होता इसमें। हम ख़ुद को स्पर्श के प्रति फुसला नहीं सकते। 

हमारा बदन एक बाग होता है, किसी को छूने भर से हमारे भीतर के सारे पौधे मर जाते हैं। 


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ख़ुशबू is the most subjective sense of all. हमें सिखाया जाता है कि ये खुश-बू है, ये बद-बू हैनॉन-वेजीटेरियन जिस ख़ुशबू से दीवाने हो जाएँगे कि लार टपकने लगी, वेजीटेरिएंस माँस या मछली की उस गंध को बर्दाश्त नहीं कर सकते। मितली आती है, मन घूमता है। 


किसी का लगाया हुआ इत्र आपको सिरदर्द दे सकता हैकिसी के दो दिन से नहीं नहाए बदन से आते फ़ीरोमोन्स आपकी सोचने-समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता को कुंद कर सकते हैं। मुझे रात-रानी की गंध एकदम बर्दाश्त नहीं होती। लिली की तेज़ गंध भी कई लोगों को पसंद नहीं होती। रजनीगंधा और गुलाबों की ख़ुशबू से शादियों का सजा हुआ कमरा और कार की याद रहती है। 


लिखते हुए मुझे सिगरेट की गंध चाहिए होती है। एक समय शौक़ से चाहिये होती थी, अब ज़रूरत है। 


मैं तुमसे हमेशा पब्लिक में मिली। तुम्हें गले लगाते हुए एक मिनट आँख बंद करके वहाँ रुक नहीं सकते थे। मैं तुम्हारी ख़ुशबू से अनजान रही। ख़ुशबू को पहचानने के लिए आँख बंद करनी ज़रूरी है। वरना देखा हुआ उस ख़ुशबू की आइडेंटिटी को भीतर थिर होने नहीं देता। मैंने तुम्हारी जैकेट उतरवा के उसे सूँघा 


एक दिन इस दुनिया में हम दोनों नहीं होंगे। लेकिन मेरी कहानियाँ होंगी। तुम्हारी भी। इन आधे अधूरे क़िस्सों में तुम पूरे पूरे महसूस होगेअपनी ख़ुशबू, अपनी दमक मेंउस लम्हे में ठहरे हुए जब घास के लॉन पर तुम्हें पहली बार दूर से देखा था। धूप की ख़ुशबू लपेटे हुए। 


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एक समय में अफ़सोस के पास एक छोटी सी मेज़ की दराज थी जिसमें मैंने चिट्ठियाँ रखी थीं, अधूरी। उन में तुम्हारा नाम नहीं था। उनके आख़िर में, हस्ताक्षर से पहले, ‘प्यारनहीं लिखा था। अब अफ़सोस की पूरी पूरी सल्तनत है। उसमें कई शहर हैं। समंदर हैं जो मुझे देखने थे तुम्हारे साथ। मौसम हैं जो तुमसे दूर के शहर में मेरे मन पर खुलते हैं। इतनी छोटी ज़िंदगी में जिया हुआ कितना कम है और मुहब्बत कितनी ज़्यादा। हिसाब कितना ग़लत है ना, सोचो तो!


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शब्दों का कोई मोल नहीं होता। जान के सिवा। 

किसी समय जब ज़िंदगी इतनी मुश्किल लगी थी कि उससे आसान किसी ऊँची इमारत से कूदना या फंदे में झूल जाना था उस समय कविता की किसी पंक्ति को पढ़ के, किसी किताब को सीने से लगा कर लगा था कि हमारा दुख जीने वाले लोग थे दुनिया में और उन्होंने इस लम्हे से गुज़र कर आगे भी जिया हैहम भी कर सकते हैं ऐसा। 


लिखना सिर्फ़ ये दिलासा है कि हम अकेले नहीं हैं। हम लिखते हैं लेखकों/कवियों का हमें जिलाये रखने का जो क़र्ज़ है, उसको थोड़ा-बहुत उतारने के ख़ातिर। 

और अपनी कहानियाँ जो सुनाने का मन करता है, सो है ही। 

इतने दिन में यही लगता है कि ब्लॉग हमारा घर है। लौट के हमें यहीं आना था। 

सो, हम गए हैं। 

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