30 October, 2017

कुछ बेशक़ीमत कमीने कि जिन्हें म्यूज़ीयम में रखना चाहिए

बहुत अदा से वो कहा करता था, 'नवाजिश, करम, शुक्रिया, मेहरबानी'। ज़रूरी नहीं है कि आपने कोई बहुत अच्छी चीज़ की हो...हो सकता है उसका ही कोई शेर पसंद आ गया और अपने हिसाब से कच्चे पक्के शब्दों में आपने तारीफ़ करने की कोशिश की हो...लेकिन उसका शुक्रगुज़ार होने का अन्दाज़ एक बेहद ख़ूबसूरत और रेयर रूमानियत से भरता था ज़िंदगी को। जैसे हम भूल गए हों शुक्रगुज़ार होना।

उसकी रौबदार आवाज़ की दुलार भारी डांट में 'बे' इतना अपना लगता था कि ग़लतियाँ करने का मन करता था। उसके साथ चलते हुए लगता था कोई ग़म छू नहीं सकता है। कितना सुरक्षित महसूस होता था। किसी ख़तरनाक शहर में उसके इर्द होने से सुकून हुआ करता था कितना। उसके साथ चलते हुए साड़ी के रंग और खिलते थे। गीत के सुर भी मीठे होते थे ज़्यादा। और सिगरेट, जनाब सिगरेट हुआ करती थी ऐसी कि जैसे दोस्ती का मतलब सिर्फ़ सिगरेट शेयर करके पीना है। 'बे, तू गीली कर देती है, अपनी ख़ुद की जला ले, मैं ना दे रहा'। कौन और लड़ सकता था मुझसे उसके सिवा।

था। कितना दुखता है ना किसी वाक्य के अंत में जब आता है। किसी रिश्ते के अंत में आता है तो भी तो।

कुछ लोग अचानक से बिछड़ गए। मुझे तेज़ चलने की आदत है। इतनी छोटी सी पाँच फुट दो इंच की लड़की की रफ़्तार इतनी तेज़ चलती होगी कोई उम्मीद नहीं करता। या कि लोगों को आहिस्ता चलने की आदत है। मुझे जाने कहाँ पहुँचना होता है। हमेशा एक हड़बड़ी रहती है पाँवों में।

कुछ लोग किस तरह रह जाते हैं अपने जाने के बाद भी। कि हम उन्हें ही नहीं, ख़ुद को भी मिस करते हैं, जो हम उनके साथ हुआ करते थे। जैसे कि अब कहाँ किसी को 'जान' कहते हैं। या कि कहेंगे ही कभी। मैं कौन हुआ करती थी कि दोस्तों को 'जान' कह कर मिलवाया करती थी। कि कैसे जान बसती थी कुछ लोगों में। अब जो वे नहीं हैं ज़िंदगी में...मेरी रूह के हिस्से छूटे हुए जाने कौन शहरों में भटक रहे हैं।

मुझे याद है आज भी वो सर्दियों का मौसम। हम कितने साल बाद मिल रहे थे। शायद पाँच साल बाद। उसे देखा तो दौड़ कर गयी उसकी तरफ़ और उसने बस ऐसे ही सिर्फ़ 'hug' नहीं किया, नीचे झुका और बाँहों में भींच कर ज़मीन से ऊपर उठा लिया। मेरे पैर हवा में झूल रहे थे। हँसते हँसते आँख भर आयी। 'पागल ही है तू। उतार नीचे। भारी हो गयी हूँ मैं।' हम हँसते ऐसे थे जैसे बचपन से भाग के आए हों। या कि लड़कपन से। कि जब दिल टूटने पर डर नहीं लगता था। उसे मिलवाया कुछ यूँ ही, 'हमारी जान से मिलिए'। दस साल यूँ ही नहीं हो जाते किसी दोस्ती को। कुछ तो पागलपन होता है दो लोगों में। उसमें भी मेरे जैसे किसी से। मेडल देने का मन करता है उसको।

कल रात उसने एक बच्चे की तस्वीर भेजी whatsapp पर। इस मेसेज के साथ कि तेरी बहुत याद आ रही है। बच्चे की तस्वीर में कुछ था जो अजीब तरह से ख़ुद की ओर खींच रहा था। मैं सोचती रही कि किसकी तस्वीर है, कि उसके बेटे को मैं अच्छे से पहचानती हूँ...फिर उसे भी इतने अच्छे से जानती तो हूँ कि उसके बचपन की किसी तस्वीर में पहचान लूँ। रात को सोचती रही कि किसकी तस्वीर होगी। रैंडम किसी बच्चे की फ़ोटो भेज दी क्या उसने।

सुबह पूछा उससे। किसकी फ़ोटो है। उसने बताया मेरे एक्स के बेटे की। मेरा मन ऐसे उमड़ा...दुलार...कि शब्द नहीं बचे। सोचती रही कि औरत का मन कितना प्यार बचाए रखे रखता है अपने पास। और कि दोस्त कैसे तो हैं मेरी ज़िंदगी में। कहाँ से कौन सा सुख लिए आते हैं मेरे लिए। सबसे चुरा के। मैं देर तक उस बच्चे की तस्वीर को देखती रही। उसकी आँखों में अपने पुराने प्यार को तलाशती रही, उसके चेहरे के कट में। उसकी मुस्कान को ही। फिर दो और क़रीबी दोस्तों को भेजी फ़ोटो। कि देखो। कौन सा प्यार कहाँ ख़त्म होता है।

कितने साल हुए। पुराना प्यार पुराना ही पड़ता है। ख़त्म नहीं होता कभी।
जिनसे भी कभी प्यार किया है। सबके नाम।
प्यार। बहुत सा।

***
कल बहुत दिन बाद एक पुराने दोस्त से बात हुयी। बहुत दिन बाद। और बहुत पुराना दोस्त भी। कहा उससे। कि देखो, तुम्हारे बिना जीने की आदत भी पड़ ही गयी। एक वक़्त ऐसा था कि एक भी दिन नहीं होता था कि उससे बात ना होती हो। हमारा वक़्त बंधा हुआ था। आठ बजे के आसपास उसका ऑफ़िस ख़त्म, मेरा ऑफ़िस ख़त्म और बातें शुरू। दिन में क्या लिखे पढ़े, कौन कैसा लिख-पढ़ रहा है से लेकर घर, गाँव, खेत पछार। सब कुछ ही चला आता था हमारी बातों में।

सालों साल हमने घंटों बातें की हैं। और समय भी वही। बाद में कभी कभी दिन में भी फ़ोन कर लिए और एक आध घंटा बात कर ली हो तो कर ली हो, लेकिन वक़्त ऐसा बंधा हुआ था शाम का कि घड़ी मिला ली जा सकती थी उससे। आठ बजे और फ़ोन रिंग।

मेरे दोस्त बहुत कम रहे हैं, लेकिन जो नियमित रहे हैं, उन्हें मालूम है कि वैसे तो मैं हर जगह देरी से जाऊँगी लेकिन अगर कोई रूटीन बंध रहा है तो उसमें एक मिनट भी देर कभी नहीं होगी।

कल अच्छा लगा उससे बात कर के। उसकी हँसी अब भी वैसी ही है। मन को बुहार के साफ़ कर देने वाली। शादी के बारे में बातें करते हुए उसे चीज़ें समझायीं। कि होते होते बनता है सम्बंध। आपसी समझ विकसित होने में वक़्त लगता है। हम दोनों हँसने लगे, कि हम कितने ना समझदार हो गए हैं वक़्त बीतते।

उम्र के इस पड़ाव पर हम नए दोस्त नहीं बनाते। पुराने हैं उन्हें ही सकेर के रखते हैं अपने इर्द गिर्द। चिट्ठियों में। फ़ोन कॉल्ज़ में। whatsapp मेसेज में। प्रेम की अपनी जगह है ज़िंदगी में, लेकिन ये उम्र प्रेम से ज़्यादा, दोस्ती का है। इस उम्र में ऐसे लोग जो आपको समझें। आपके पागलपन को समझें। जो आपके साथ कई साल से रहते आए हैं और ज़िंदगी के हर पहलू से जुड़े हुए हैं, ज़रूरी होते हैं। कि हम एक बेतरह तन्हा होते वक़्त में जी रहे हैं। सतही रिश्तों के भी। ऐसे में जो आपके अपने हैं। जो पुराने यार हैं, दोस्त हैं...उन्हें थोड़ा पास रखिए अपने। उनके पास उदासियों को धमका के भगा देने का हुनर होता है। आपको हमेशा हँसा देने का भी। वे आपका सेन्स औफ़ ह्यूमर समझते हैं। ये लोग बेशक़ीमत होते हैं।

मैं अपनेआप को ख़ुशक़िस्मत समझती हूँ कि मेरे पास कुछ ऐसे लोग हैं। कुछ ऐसे दोस्त हैं। मैंने ज़िंदगी में बहुत रिश्तों में ग़लती की है, लेकिन ये एक रिश्ता बहुत मुहब्बत से निभाया है। आज फ़्रेंडशिप डे नहीं है। लेकिन आज मेरा दिल भरा भरा है। कि मुझ जैसे टूटे-फूटे इंसान का दोस्त होना मुश्किल है। बहुत ही वायलेंट उदासी, सूयसाइडल शामें और एकदम से रिपीट मोड वाले सुख में जीती हूँ मैं। ऐसे में मेरे जैसा बुरा होना, मुझे judge नहीं करना। पर समझना या कि प्यार करना ही। आसान नहीं है। उन आफ़तों के लिए कि जो मेरी ज़िंदगी की राहतें हैं।

तुम जानते हो कि तुम बेशक़ीमत हो।
लव यू कमीनों। मेरी ज़िंदगी में रौनक़ बने रहना। यूँ ही।

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