30 September, 2014

अभिशप्त हृदया


पूर्ण अंधकार का एक क्षण. सूरज की आखिरी किरण के जाने के बहुत देर बाद और चन्द्रमा के अनुपस्थित होने का कोई दिन. अंगदेश की नगरवधू का प्रांगन. चौखट के पास संध्या बाती करती हुयी तिलोत्तमा. अन्धकार में कोमलता से प्रज्वलित होती उसकी कमनीय आँखें. याचक की मुद्रा में बैठी अंगदेश की महारानी मणिकर्णिका.
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"तिलोत्तमा...क्या तुम्हें ज्ञात है कि तुम्हारे सौंदर्य से मोहित होकर आर्य अपने राजधर्म की उपेक्षा कर रहे हैं. निकट के राज्यों से उपद्रव की घटनाएं सामने आ रही हैं...और अगर ऐसा ही चलता रहा तो राज्य का सर्वनाश निश्चित है. क्या प्रजा के प्रति तुम्हारी कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है? तुम नगरवधू हो..." 

"क्षमा करें महारानी, नगरवधू होने के कारण मेरा अधिकार है कि मैं अपना प्रेमी चुन सकूं...इस आचरण से राज्य का कोई विनाश होता मुझे नहीं दिखता." 

"नहीं दिखता क्यूंकि वासना में तुम्हारी आँखें बंद हो गयी हैं तिलोत्तमा...और तुम्हारे साथ आर्य की भी...क्या इस शरीर से ऊपर तुम्हें कुछ नहीं दिखता?" 

"महारानी, आपसे एक ही विनती है, इस शरीर की कीमत को कम मत आंकिये...इसके कण कण में चरम बिंदु तक पहुँचने और पहुंचाने की क्षमता है...इस शरीर की लोच के लिए बचपन से मैंने कई कठिन आसनों को साधा है...गले की मिठास के लिए गुरुओं से दीक्षा ली है...ये अंगदेश की नगरवधू का शरीर है...बदन की लोच ही नहीं, वाणी की मिठास भी कठिन साधना का परिणाम है" 

"इस राज्य को तुम्हारी आवश्यकता नहीं है...मैं तुम्हें आदेश देती हूँ कि तुम इसी पहर राज्य की सीमा से बाहर निकल जाओ. अगर तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया तो तुम्हें काल कोठरी में डाल दिया जाएगा" 

"क्षमा महारानी, मगर मैं आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकती. मैंने राज्य के उत्सर्ग के लिए वचन दिया था कि जब तक मेरे शरीर से सुख का एक कतरा निचोड़ लेने लायक प्राण बाकी हैं, मैं इस भूमि को नहीं त्यागूंगी. आप जिसे अनावश्यकता कहती हैं, वो ही मेरे जीवन का उद्देश्य है. इस सुख को चरम सुख कहते हैं क्यूंकि इस सुख के सामने बाकी सारे सुख छोटे हैं...मेरे लिए ये सबसे बड़ा यज्ञ है जिसमें स्वयं की आहुति देनी होती है...पूर्णाहुति. 

"क्यूँ...आज तक इस शरीर को खो कर क्या पाया है तुमने?"
 
"महारानी...इस शरीर के बदले मैंने वो पाया है जो सिन्दूर की गहरी रेखा में भी नहीं बंध सका...आपकी हर बेड़ी से मुक्त...और मेरी हर इच्छा का बंदी...महारानी...मैंने इस शरीर को खो कर वो पाया है जो अतुल्य और अमूल्य है...वो निधि आपकी ही थी...आपने आत्मा का समर्पण किया मगर शरीर का नहीं...मैंने इस शरीर के मोल में सिर्फ एक ही चीज़ पायी है...
ह्रदय...सम्राट का ह्रदय."

"मैं तुमसे यहाँ सम्राट के ह्रदय की याचना करने नहीं आई हूँ. मुझे उनका शरीर चाहिए. राज्य के सिंहासन पर उनकी उपस्थिति चाहिए. भले ही वो रात्रि के सारे पहर तुम्हारे प्रांगन का रसस्वादन करते रहें मगर दिन के तीन प्रहर वे प्रजा के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें, तुमसे इतनी ही प्रार्थना करनी है मुझे." 

"इसका मोल आप क्या दे सकती हैं महारानी?" 

"ओह, तुम इतनी क्षुद्रहृदय होगी मुझे आशंका नहीं थी...बोलो...कितनी स्वर्ण मुद्राएं चाहिए तुम्हें?" 

"आप फिर से मेरा मोल कम आंक रही हैं महारानी...पुरुष समर्पण नहीं जानता...उसके समर्पण में भी अहंकार होता है...मुझे एक स्त्री का समर्पण चाहिए...शरीर के बदले शरीर" 

"अर्थात?" 

"जितनी देर महाराज राज्य के कार्य में उपस्थित रहेंगे, आप मेरे प्रांगन में रहेंगी...मुझे आपका शरीर चाहिए. आपका पूर्ण समर्पण चाहिए. कहिये. दे सकेंगी?"
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और इस तरह महारानी ने अपना शरीर देकर राज्य के उत्सर्ग के लिए महाराज का ह्रदय मोल लिया. किसी भी शिलालेख में उनके इस त्याग का उल्लेख नहीं मिलता मगर आज भी अंगदेश की स्त्रियाँ सुहाग के लोकगीतों में उनके त्याग के चर्चे करती हैं. दुल्हन के श्रृंगार में गालियाँ पढ़ती हैं कि कोई तिलोत्तमा उनके पुरुष के जीवन में कभी प्रवेश न करे.

9 comments:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 01 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. Aacharya Chatursen se Vaishali ki Nagarvadhu ke baare mein padha tha...Angdesh ki Nagarvadhu ke baare mein pehli baar suna hai...ispar koi kitaab ho to suggest karein...aapki lekhan shaili aur Chatursenji ki mein jyada fark nahi lag raha ...kaafi saargarbhit samwad pesh kiya hai aapne..

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    1. ये काल्पनिक कथा है। अंगदेश में कोई राजवधू हो ऐसा मुझे ज्ञात नहीं।

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  3. एक नया अनुभव मिला - आभार !

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  4. ohh ...kya khoob likha hai..
    bilkul adbhut khoobsurati liye hye aalekh apka

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  5. वाह बहुत खूब--- कुछ नया सा

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