22 November, 2016

मेरी रॉयल एनफ़ील्ड - आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे

मुझे बाइक्स का शौक़ तो बचपन से ही रहा लेकिन रॉयल एनफ़ील्ड का शौक़ कब से आया ये ठीक ठीक याद नहीं है। जैसा कि किसी के भी साथ हो सकता है, राजदूत चलाने के बाद पहली बार जब हीरो होंडा स्पलेंडर चलायी थी तो लगा था इससे अच्छी कोई बाइक हो ही नहीं सकती है। ऐकसिलेरेटर लेते साथ जो बाइक उड़ती थी कि बस! १२वीं तक मुझे हीरो होंडा सीबीजी बहुत अच्छी लगती थी। जान पहचान में उस समय हम सारे बच्चे अपने अपने पापा की गाड़ियों पर हाथ साफ़ कर रहे थे। कुछ के पास स्कूटर हुआ करता था तो कुछ के पास हीरो होंडा स्पलेंडर। जान पहचान में किसी के पास बुलेट हो, ऐसा था ही नहीं। उन दिनों पटना या देवघर में बुलेट बहुत कम चलती भी थी। आर्मी वालों के पास भले कभी कभार दिख जाती थी। हमें समझ नहीं आता कि किस पर मर मिटें। वर्दी पर। वर्दी वाले पर। या कि उसकी बुलेट पर। ख़ैर!
२००४ में कॉलेज के फ़ाइनल ईयर में इंटर्नशिप करने दिल्ली आयी। मेरे बॉस, अनुपम के पास उन दिनों अवेंजर हुआ करती थी। जाड़े का मौसम था। वो काली लेदर जैकेट पहने गली के मोड़ से जब एंट्री मारा करता था तो मैं अक्सर बालकनी में कॉफ़ी पी रही होती थी। क्रूज बाइक जैसा कुछ होता है, पहली बार पता चला था। मैं घर से ऑफ़िस बस से आती जाती थी। टीम में साथ में मार्केटिंग में एक लड़का था, नितिन, उसके पास बुलेट थी। मेरी जान पहचान में पहली बार कोई था जिसके पास अपनी बुलेट थी। नितिन ने एक दिन कहा कि वो घर छोड़ देगा मुझे। हमारे घर सरोजिनी नगर में सिर्फ़ एक ब्लॉक छोड़ के हुआ करते थे। पहली बार बुलेट पे बैठी तो शायद वहीं प्यार हो गया था। बुलेट से। इस बात का बहुत अफ़सोस हुआ था कि हाइट इतनी कम है मेरी कि चलाने का सोच भी नहीं सकती।

IIMC के ग्रुप में भी कहीं कोई बुलेट वुलेट नहीं चलाता था। लेकिन उन दिनों ब्रैंड्ज़ के बारे में बहुत पढ़ चुके थे। कुछ चीज़ों की ब्रांडिंग ख़ास तौर से ध्यान रही। पर्फ़्यूम्ज़ की। दारू की। और मोटरसाइकल्ज़ की। हार्ले डेविडसन और एनफ़ील्ड ख़ास तौर से ध्यान में आयीं। इनके बारे में ख़ूब पढ़ा। इनके पुराने एड्ज़ देखे। पर अब बुलेट चलाने जैसा सपना देखना बंद कर दिया था। हमने जब नौकरी पकड़ी तो दोस्तों में सबसे पहले V ने एनफ़ील्ड ख़रीदी। उन दिनों थंडरबर्ड का ज़ोर शोर से प्रचार हो रहा था। उसकी लाल रंग की एनफ़ील्ड और उसके घुमक्कड़ी के किससे साथ में सुनने मिलते थे।
 इन दिनों ऑफ़िस के आगे का हाल 

शादी के बाद बैंगलोर आ गयी। कुणाल या उसके दोस्तों की सर्किल में कोई भी बाइकर टाइप नहीं था। कुछ साल बाद कुणाल की टीम में आया साक़िब खान। एनफ़ील्ड के बारे में क्रेज़ी। उन दिनों बैंगलोर में एनफ़ील्ड पर छः महीने की वेटिंग थी। साक़िब ने एनफ़ील्ड बुक क्या की, जैसे अपने ही घर आ रही हो बाइक। साक़िब को हम दोनों बहुत मानते भी थे। घर में किसी फ़ैमिली मेंबर की तरह रहा था हमारे साथ। साक़िब की थंडरबर्ड की डिलिवरी लेने वो, कुंदन और मैं गए थे। कुणाल ने अपनी कम्पनी शुरू की तो टीम में साथ में रमन आया। पिछले साल रमन ने भी डेज़र्ट स्टॉर्म ख़रीदी। टीम में योगी के पास भी पहले से एनफ़ील्ड थी। ऑफ़िस में सब लोग बाइक बाइक की गप्पें मारते थे अब। कुणाल भी कभी कभार चला लेता था। इन्हीं दिनों उसके दोस्त से बात हुयी जो बाइक्स मॉडिफ़ाई करता है और कुणाल ने मेरे लिए रॉयल एनफ़ील्ड स्क्वाड्रन ब्लू ख़रीद दी।

मेरी हाइट पाँच फ़ीट २ इंच है और एनफ़ील्ड की सीट हाइट ८०० सेंटिमेटर है। बाइक ख़रीदने के पहले कुणाल से उससे डिटेल में बात की कि कितना ख़र्चा आता है, क्या प्रॉसेस है वग़ैरह। तो बात ये हुयी थी कि एनफ़ील्ड के क्लासिक मॉडल में सीट के नीचे स्प्रिंग लगी होती हैं। स्प्रिंग निकाल के फ़ोम सीट लगा दी जाएगी तो हाइट कम हो जाएगी। ख़र्चा क़रीबन ३ हज़ार के आसपास आएगा। हम आराम से बाइक ख़रीद के ले आए। बाइक पर बैठने के बाद मुश्किल से मेरे पैर का अँगूठा ज़मीन को छू भर पाता था, बस। वो भी तब जब कि स्पोर्ट्स शूज पहने हों जिसमें हील ज़्यादा है। बिना जूतों के तो पैर हवा में ही रह रहे थे। निशान्त ने कहा, अब तो सच में गाना गा सकती हो, 'आजकल पाँव ज़मीं पर, नहीं पड़ते मेरे'।

एनफ़ील्ड आयी लेकिन जब तक कोई पीछे ना बैठा हो, हम चला नहीं सकते थे, और ज़ाहिर तौर से, कोई मेरे पीछे बैठने को तैयार ना हो। कुणाल बैठे तो उसको इतना डर लगे कि अपने हिसाब से बाइक बैलेंस करना चाहे। इस चक्कर में बाइक को आए दस दिन हो गए। १८ तारीख़ को राखी थी। हमारे यहाँ राखी के बाद भादो का महीना शुरू हो जाता है जिसमें कुछ भी शुभ काम नहीं करते हैं। हमने बाइक की पूजा अभी तक नहीं करायी थी कि आकाश को छुट्टी नहीं मिल रही थी बाइक घर पहुँचाने की। ये वो महीना था जिसमें पूरे वक़्त सारी छुट्टियाँ कैंसिल थीं। सब लोग वीकेंड्ज़ पर भी पूरा काम कर रहे थे। राखी के एक दिन पहले पापा से बात हो रही थी, पापा ख़ूब डाँटे। 'एनफ़ील्ड जैसा भारी गाड़ी ले लिए हैं, रोड पर चलाते है और ज़रा सा पूजा कराने का आप लोग को फ़ुर्सत नहीं, कल किसी भी हाल में पूजा कर लीजिए नै तो भादो घुस जाएगा, बस' (पापा ग़ुस्सा होते हैं तो 'आप' बोलके बात करते हैं)। अब राखी के दिन आकाश को आते आते दोपहर बारह बज गया और मंदिर बंद। ख़ैर, दोनों भाई राखी बाँध के ऑफ़िस निकला, आकाश बोल के गया कि शाम को आ के पूजा करवा देगा। शाम का ५ बजा, ६ बजा, ७ बजा। मेरा हालत ख़राब। फ़ोन किए तो बोला अटक गया है, आ नहीं सकेगा। अब कमबख़्त एनफ़ील्ड ऐसी चीज़ है कि बहुत लोग चलाने में डरते हैं। मैंने अपने आसपास थोड़ी कोशिश की, कि चलाना तो छोड़ो, कोई पीछे बैठने को भी तैयार हो जाए तो मंदिर तो बस घर से ५०० मीटर है, आराम से ले जाएँगे। कोई भी नहीं मिला। साढ़े सात बजे हम ख़ुद से एनफ़ील्ड स्टार्ट किए और मुहल्ले में चक्कर लगा के आए। ठीक ठाक चल गयी थी लेकिन डर बहुत लग रहा था। कहीं भी रोकने पर मैं गाड़ी को एकदम बैलेंस नहीं कर सकती थी।

तब तक बाइक का रेजिस्ट्रेशन नम्बर आ गया था। मैं थिपसंद्रा निकली कि स्टिकर बनवा लेंगे। साथ में मंदिर में पूछती आयी कि मंदिर कब तक खुला है। पुजारी बोला, साढ़े नौ तक। हम राहत का साँस लिए कि ट्रैफ़िक थोड़ा कम हो जाएगा। नम्बर प्लेट पर नम्बर चिपकाए। स्कूटी से निकले कि रास्ता देख लें, इस नज़रिए से कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ स्पीड ब्रेकर है। इस हिसाब से कौन से रास्ते से जाना सबसे सही होगा। एनफ़ील्ड निकालते हुए क़सम से बहुत डर लग रहा था। एक तो कहीं भी बंद हो जाती थी गाड़ी। क्लच छोड़ने में देर हो जाए और बस। फिर घबराहट के मारे जल्दी स्टार्ट भी ना हो। ख़ैर। किसी तरह भगवान भगवान करते मंदिर पहुँचे तो देखते हैं कि मंदिर का गेट बंद है और बस एक पुजारी गेट से लटका हुआ बाहर झाँक रहा है। हम गए पूछने की भाई मंदिर तो साढ़े नौ बजे बंद होना था, ये क्या है। पुजारी बोला मंदिर बंद हो गया है। हमारा डर के मारे हालत ख़राब। उसको हिंदी में समझा रहे हैं। देखो, भैय्या, कल से हमारा दिन अशुभ शुरू हो जाएगा। आज पूजा होना ज़रूरी है। आप कुछ भी कर दो। एक फूल रख दो, एक अगरबत्ती दिखा दो। कुछ भी। बस। वो ना ना किए जा रहा था लेकिन फिर शायद मेरा दुःख देख कर उसका कलेजा पसीजा, तो पूछा, कौन सा गाड़ी है। मैं उसके सामने से हटी, ताकि वो देख सके, मेरी रॉयल एनफ़ील्ड स्क्वाड्रन ब्लू। उसके चेहरे पर एक्सप्रेसन कमाल से देखने लायक था। 'ये तुम चला के लाया?!?!?!' हम बोले, हाँ। अब तो पुजारी ऐसा टेन्शन में आया कि बोला, इसका तो पूरा ठीक से पूजा करना होगा। फिर वो मंदिर में अंदर गया, पूरा पूजा का सामग्री वग़ैरह लेकर आया और ख़ूब अच्छा से पूजा किया। आख़िर में बोला संकल्प करने को जूते उतारो। हम जूता, मोज़ा उतार के संकल्प किए। फिर वो बाइक के दोनों पहियों के नीचे निम्बू रखा और बोला, अब बाइक स्टार्ट करो और थोड़ा सा आगे करो। हम भारी टेन्शन में। पुजारी जी, बिना जूता के स्टार्ट नहीं कर सकते। पैर नहीं पहुँचता। वो अपनी ही धुन में कुछ सुना नहीं। स्टार्ट करो स्टार्ट करो बोलता गया। हम सोचे, हनुमान मंदिर के सामने हैं। पूजा कराने आए हैं। आज यहाँ बाइक हमसे स्टार्ट नहीं हुआ और गिर गया तो आगे तो क्या ही चलाएँगे। उस वक़्त वहाँ आसपास जितने लोग थे, फूल वाली औरतें, पान की दुकान पर खड़े लड़के, जूस की दुकान और सड़क पर चलते लोग। सबका ध्यान बस हमारी ही तरफ़ था। कि लड़की अब गिरी ना तब गिरी। हम लेकिन हम थे। बाइक स्टार्ट किए। एक नम्बर गियर में डाले, आगे बढ़ाए और निम्बू का कचूमर निकाल दिए। वालेट में झाँके तो बस ५०० के नोट थे जो भाई से भोर में ही रक्षाबंधन पर मिले थे। तो बस, ५०० रुपए का दक्षिणा पा के पुजारी एकदम ख़ुश। ठीक से जाना अम्माँ(यहाँ साउथ इंडिया में सारी औरतों को लोग अम्माँ ही बोलते हैं, उम्र कोई भी हो)। घर किधर है तुम्हारा।


हम कभी कभी ऐसे कारनामे कर गुज़रते हैं जिससे हम में इस चीज़ का हौसला आता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं। एक कोई लगभग पाँच फ़ुट की लड़की २०० किलो, ५०० सीसी के इस बाइक को इस मुहब्बत से चलाती है कि सारी चीज़ें ही आसान लगती हैं। घर आते हुए मैं गुनगुना रही थी, 'आजकल पाँव ज़मीं पर, नहीं पड़ते मेरे, बोलो देखा है कभी तुमने मुझे, उड़ते हुए, बोलो?'

17 November, 2016

मेरी रॉयल एनफ़ील्ड स्क्वाड्रन ब्लू

आज मैं अपनी दो मुहब्बतों के बारे में लिख रही हूँ। मेरी आदत है जिससे इश्क़ होता है उसके प्रति बहुत ज़्यादा पजेसिव हो जाती हूँ। कुछ इस क़दर कि कभी अपनी आँखों में भी इश्क़ लरजे तो पलकें बंद कर लेती हूँ कि ख़ुद की ही नज़र लग जाएगी। मेरी रॉयल एनफ़ील्ड स्क्वाड्रन ब्लू, और मेरा हमसफ़र।

बचपन से बॉलीवुड फ़िल्में देख कर लगता था कि बस प्यार एक ही बार होता है। उसमें भी दिल तो पागल है टाइप फ़िल्में देख कर तो सोलमेट वग़ैरह जैसे चीज़ें देखीं और लगा कि ऐसा कुछ होता होगा। लड़कपन की पहली आहट के साथ ज़िंदगी में प्यार भी दबे पाँव दाख़िल हुआ। मगर ये वो उम्र थी जहाँ प्यार आपसे ज़्यादा आपकी सहेलियों को पता होता है। उसकी हर बात पसंद होती है। उसके डिम्पल, उसकी हैंडराइटिंग, उसका डान्स, सब कुछ। उस उम्र ये भी लगता है कि उसे कभी भूल नहीं पायेंगे और कि प्यार दोबारा कभी नहीं होगा। मगर पहली बार दिल टूटता है तो लगता है कि इस प्यार से तो बिना प्यार के भले। मगर इसके बाद कई कई बार प्यार होता है और हर बार ये विश्वास ज़रा सा टूटता है कि उम्र भर का प्यार होता है। 

इसी दिल टूटने, जुड़ने, टूटने के दर्मयान लड़कपन गुज़र जाता है, घर पीछे छूट जाता है और दिल्ली को आँखों में बसाए हुए IIMC आ जाती हूँ। नौकरी। आत्मनिर्भरता। और एक नया आत्मविश्वास आता है। पुराने स्कूल के दोस्तों से बात होनी शुरू होती है। इश्क़ की पेचीदगी थोड़ी बहुत समझ आती है। चीज़ें उतनी सिम्पल नहीं लगती हैं जितनी बचपन की गुलाबी दुनिया में दिखती थीं। ऑफ़िस। लेट नाइट। नए प्राजेक्ट्स। ख़ुद की पहचान तलाशने का दौर था वो। जब मुझे पहली बार मिला तो जो पहली चीज़ महसूस की थी वो थी आश्वस्ति। कि मैं उसपर भरोसा कर सकती हूँ। इसमें बचपन का रोल था कि हमारे स्कूल का हेड प्रीफ़ेक्ट था वो। उसके साथ होते हुए कभी किसी चीज़ से डर नहीं लगता था। उसके साथ ज़िंदगी एक थ्रिल लगती थी। उन्हीं दिनों पहली बार ये भी महसूस किया था कि वो मेरा हमेशा के लिए है। बिना कहे भी। हमारे बीच हर चीज़ से गहरी जो चीज़ थी वो थी दोस्ती। 

शादी के ९ साल हो गए हैं अब साथ। हमारे बहुत झगड़े होते हैं। इतने कि लगता है कि आज तो बस जान दे ही दें। कूद वूद जाएँ छत पे चढ़ कर। लेकिन वो जानता है मुझे। वो जानता है मुझे हैंडिल करना। डेटिंग के शुरू में जो बातें हम करते थे, तुम मेरी पूरी दुनिया हो टाइप। वो अब भी सच हैं। मैं इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक उसको ही प्यार करती हूँ। एक सिर्फ़ उसको। किसी रोज़ कुछ अच्छा पहन लिया, चाहे एक झुमका ही क्यूँ ना हो, पहली तारीफ़ उससे ही चाहिए होती है। मेरे यायावर मन को उसके होने से ठहार मिलता है। घर मिलता है। 

उसे मोटरसाइकिल का शौक़ कभी नहीं रहा। इन फ़ैक्ट उसके दोस्तों में भी किसी को नहीं। कॉलेज में फिर भी कभी चलाया होगा लेकिन नौकरी पकड़ते ही उसने कार ख़रीदी। अभी भी उसे नयी कार, उसके माडल्ज़, इंटिरीअर्ज़ वग़ैरह सब बहुत मालूम रहती हैं। उसके क़रीबी दोस्त कि जो सारे IIT बॉम्बे से ही हैं, उनमें भी किसी के पास बाइक नहीं है। सब कार वाले लोग हैं। हाँ, उसके ऑफ़िस में, उसकी पूरी टीम में सबके पास रॉयल एनफ़ील्ड है। सबके ही पास। पहले साक़िब ने थंडरबर्ड ख़रीदी तो उसने एक आधी बार चलायी। लेकिन ज़्यादा नहीं।  लेकिन जब रमन ने डेज़र्ट स्टॉर्म ख़रीदी तो उसको पहली बार थोड़ा रॉयल एनफ़ील्ड का शौक़ लगा। उन्ही दिनों कुणाल के एक दोस्त से बात होते हुए उसने कहा कि उसका एक दोस्त है जो रॉयल एनफ़ील्ड कस्टमाइज करता है। हमने बात की इस बारे में कि वो हाइट में कम लोगों के लिए बाइक छोटी कर देता है। हम दोनों बहुत दिन तक इसपर हँसते रहे कि बाइक का jpeg ड्रैग करके छोटा कर देता है। मगर बहुत दिन बाद आँखों में चमक आयी थी। कोई सोया सपना जागा था। कि शायद मैं सच में कभी ज़िंदगी में एनफ़ील्ड चला पाऊँगी। मगर ये सब मज़ाक़ लगता था। 

मेरा बर्थ्डे पास आ रहा था और मैं हमेशा की तरह उसको चिढ़ा रही थी कि क्या दोगे हमको। ऐसी ही नोर्मल सी शाम हम वॉक पर निकले थे तो कुणाल हमको एनफ़ील्ड के शोरूम ले गया और बोला, आज तुमको एनफ़ील्ड बुक कर देते हैं। हमको यक़ीन नहीं हो रहा था। लगा मज़ाक़ कर रहा है। लेकिन वो बोला कि सीरियस है। उसने पूरा पूछ वूछ लिया है। मेरे हिसाब से ऐडजस्ट हो जाएगी। 'एक ही ज़िंदगी है है हमारे पास। एनफ़ील्ड चलाना तुम्हारा सपना था ना? मेरे रहते तुम्हारा कोई सपना अधूरा रह जाए, ये मैं होने दूँगा? बताओ?'। हम सोच के गए थे कि डेज़र्ट स्टॉर्म ख़रीदेंगे लेकिन शोरूम गए तो क्लासिक ५०० का नया रंग देखा। स्क्वाड्रन ब्लू। हम दोनों उसपर फ़िदा हो गए। उसी को बुक कर दिया। 

अब मैंने सोचा कि मोटरसाइकल और रॉयल एनफ़ील्ड में अंतर होता है। तो एक बार चलाना सीख लेते हैं। अपनी नयी बाइक पर हाथ साफ़ तो नहीं करूँगी। गूगल किया तो एक ग्रूप पाया, हॉप ऑन गर्ल्स  का, यहाँ लड़कियाँ ही लड़कियों को बुलेट सिखाती थीं। ये बात थोड़ी आश्वस्त करने वाली थी। मेरी ट्रेनर बिंदु थी। कोई पाँच फ़ुट पाँच इंच की छोटी सी दुबली पतली सी लड़की। मगर उसे रॉयल एनफ़ील्ड चलाते हुए देख कर कॉन्फ़िडेन्स आया कि हो जाएगा। दो दिन की चार चार घंटे की ट्रेनिंग। पहले दिन जो लौटी तो क़सम से लगा हथेलियाँ टूट जाएँगी। इतना दर्द था। लेकिन ज़िद्दी तो ज़िद्दी हूँ मैं। गयी अगले दिन भी। खुली सड़क पर पहली बार जब एनफ़ील्ड को रेज किया और वो हवा से बातें करने लगी तो लगा कि नशा इसे कहते हैं। 

अगस्त, फ़्रेंडशिप डे के अगले दिन बाइक की डिलेवरी थी। ऑफ़िस में इतना काम था कि कुणाल नहीं जा सका। उसके सिवा ऑफ़िस के अधिकतर लोग गए। मैं कार चलाते हुए सोच रही थी। मुहब्बत सिर्फ़ हमेशा साथ रहना ही नहीं होता है। जो दिन मेरे लिए बहुत ज़रूरी था, वहाँ कुणाल को ऑफ़िस में रहना था क्यूँकि एक ज़रूरी कॉल थी। उसका काम ज़रूरी है ताकि मैं अपने ऐसे शौक़ पूरे कर सकूँ। बाद में मैंने सोचा कि मैं अगले दिन तक इंतज़ार भी कर सकती थी। ये मेरी ग़लती थी। बाइक आने पर मैं इतनी ख़ुशी से पागल हो गयी थी कि इंतज़ार नहीं कर पायी। एक दिन रूकती तो हम दोनों साथ जा कर ले आते। 

ख़ैर। एनफ़ील्ड आयी तो घर आयी ही नहीं। आकाश ने वहीं से टपा ली। मेरे पैर नहीं पहुँचते थे ज़मीन तक। उसपर आकाश मेरा लाड़ला देवर है। तो बोला कुछ दिन हम चला लेते हैं भाभी। तो रहने दिए। इधर कुणाल बोल दिया था लेकिन उसको डर लगता था कि हमसे वाक़ई चलेगी या नहीं। आकाश को तो और भी डर लगता था। पहली बार कुणाल जब बैठा बाइक पर पीछे तो महसूस हुआ कि बाइक थोड़ा सा दबी और मेरे पैर थोड़े से पहुँचे। मगर बहुत कम चलाने को मिला। फिर सच ये है कि एनफ़ील्ड का वज़न २०० किलो है। इस भार को सम्हालने के लिए थोड़ी आदत लगनी ज़रूरी है। यहाँ गाड़ी हमको मिले ही ना। दोनों भाई लोग लेके फ़रार। इन फ़ैक्ट इसका नीला रंग एकदम नया आया था तो ऑफ़िस में भी सबको बहुत पसंद थी। नतीजा ये कि दोपहर की वॉक पर सब लोग एनफ़ील्ड से निकलने लगे। कुणाल ने भी महसूस किया कि अपनी एनफ़ील्ड की बात और होती है। मैं देख रही थी कि उसको भी पहली बार ज़रा ज़रा मोटरसाइकल का चस्का लग रहा था। बेसिकली रॉयल एनफ़ील्ड और बाक़ी मोटरसैक़िलस में बहुत अंतर होता है। पहली तो चीज़ होती है इसकी आवाज़। इसका वायब्रेशन। फिर डिज़ाइन भी क्लासिक है। और अगर इतने में भी दिल ना फिसला, तो फिर है इसकी पावर। ५०० सीसी की बाइक है। एक बार रेज दो तो ऐसे उड़ती है कि बस। 

एनफ़ील्ड का नाम रखना था अब। लड़के अपने एनफ़ील्ड का नाम अक्सर किसी लड़की के नाम पर रखते हैं। उसे अपनी गर्लफ़्रेंड या बीवी की तरह ट्रीट करते हैं। मगर यहाँ ये मेरी एनफ़ील्ड थी। तो इसका नाम कुछ ऐसा होना था कि जिससे मेरी धड़कनों को रफ़्तार मिले। फिर इन्हीं दिनों जब इतरां की कहानी लिखनी शुरू की थी तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मेरे पास मेरी अपनी रॉयल एनफ़ील्ड होगी। इसका नीला रंग। तो बस। नाम एक ही होना था। रूद्र। 

किसी भी तरह का टू वहीलर चलाना एक तरह का नशा होता है। चेहरे पर जब हवा लगती है तो वाक़ई ऐसा लगता है कि उड़ रहे हैं। बाइकिंग एक तरह की कंडिशनिंग होती है। मैंने अपने पापा से सीखी। बाइक के प्रति प्यार भी उनमें ही देखा। हमारी राजदूत मेरे जन्म के साल ख़रीदी थी पापा ने। हम ख़ुद को 'born biker' कहते हैं। मेरे परिवार में सबके पास टू वहीलर है। भाइयों के पास, कजिंस के पास। पापा, नानाजी, मामा, उधर चाचा के बच्चों के पास। मगर कुणाल के घर में सबको टू वहीलर से डर लगता है। घर में किसी भाई को परमिशन नहीं मिली। सबको ऐक्सिडेंट होने का डर भी लगता है। हालाँकि पहले घर में यामाहा rx १०० थी और सब लोग उसपर बहुत हाथ साफ़ किया है। आजकल भी एक मोटरसाइकल है। मगर वहाँ मोटरसाइकल को लेकर कोई जुनून नहीं है। फिर कुणाल के दोस्तों को भी शौक़ नहीं है। कुणाल के लिए मेरे बाइक चलाने से ज़्यादा डरावनी बात नहीं हो सकती। उसको हज़ार चीज़ों से डर लगता है। एनफ़ील्ड से गिरी तो कुछ ना कुछ टूटेगा ही। किसी को ठोक दिया तो उसको भी भारी नुक़सान होगा। उसपर मैं इत्ति सी जान और २०० किलो की मशीन। उसपे ५०० सीसी का इंजन। उसपर मेरा पागल दिमाग़ कि जो स्कूटी को ९० किमी प्रति घंटा पर उड़ाने को थ्रिल समझता था। ये सब जानते हुए। डरते हुए। फिर भी वो समझता है कि मेरे लिए एनफ़ील्ड क्यूँ ज़रूरी है। या मेरा सपना क्यूँ है। और इस सपने को उसने हक़ीक़त किया। मेरे लिए यही प्यार है। यही हमारी गहरी दोस्ती है। जहाँ आप दूसरे की कमज़ोरी नहीं, ताक़त बनते हैं। 
उसने जब पहली बार मुझे एनफ़ील्ड पर देखा तब भी उसे यक़ीन नहीं हो रहा था कि मैं सच में चला लूँगी। उसे लगता था कि मैं ऐसे ही हवा में बात करती हूँ जब कहती हूँ की पापा ने मुझे राजदूत सिखायी थी। मगर धीरे धीरे मेरा भी कॉन्फ़िडेन्स बढ़ा और कुणाल का भी। 

हर बार जब पार्किंग से निकालती हूँ तो एनफ़ील्ड में पेट्रोल दौड़ता है और मेरी रगों में इश्क़। हर बार मुझे लगता है कि सपने देखने चाहिए। हर बार थोड़ा सा और प्यार हो जाता है उस लड़के से जिसके साथ २४ की उम्र में फेरे लिए थे मैंने। सात जनम तक, ५०० सीसी तक और जाने कितने किलोमीटर तक। जब तक मेरा दिल धड़के इसमें बस एक उसी का नाम है। 

उसके लिए लिखी मेरी सबसे पसंदीदा लाइन। 'Of all the things I am, my love, what I love most, I am yours'.

चश्मेबद्दूर। 

07 November, 2016

आइ लव यू टू, शैतान । God is a postman (9)


रूद्र ने सिखाया इतरां को। जब दिल करे। घास पर पड़ी रहना। बेफ़िक्र। आसमान में जो हो, उसे देखना। सूरज हो तो बंद आँखों से। चाँद या सितारे हों तो खुली आँखों से। हर रोशनी को हमेशा चूमने देना अपना माथा। आत्माओं की दुआ से बनती है रोशनी। सबसे शुद्ध। सफ़ेद। रोशनी का हर स्पर्श तुम्हें सुख से भर देगा। अपने अंधेरों को इन चमकती पुतलियों में बाँध कर नहीं रखना, हर रात वे चाहेंगी उड़ के बाक़ी अंधेरों में मिल जाना। उन्हें जाने देना। अंधेरों की ज़रूरत सिर्फ़ चिट्ठियाँ लिखते हुए होगी। उस समय अपनी रूह के सबसे अंदर झाँक के देखना। वहाँ हमेशा इतना अंधेरा तो मिल ही जाएगा कि उससे स्याही बन सके।

जब रूद्र नहीं होता इतरां घास पर पड़ी होती। बाल फैलाए। कभी सितारों को जोड़ कर अपनी मर्ज़ी की कहानियों को आसमान में फिरते हुए देखती। जन्म के समय से इतरां के लम्बे घुंघराले काले बाल थे। पाँच साल की हुयी इतरां तो मन्नत के हिसाब से तारापीठ में उसका मुंडन हुआ। उसके इतने सुंदर बालों पर उस्तरा चला तो दादी सरकार की आँख भर आयी। लेकिन बालों का क्या था। बढ़ आए फिर। बोर्डिंग स्कूल जाते हुए इतरां के बाल काँधे से नीचे थे। जाने के पहले कुछ दिन लगातार दादी सरकार ने उसे दो चोटियाँ गूँथनी सिखायीं ताकि वहाँ स्कूल में उसे कोई दिक़्क़त ना हो और बाल कटवाने ना पड़ें।

पहली बार हवाईजहाज़ से स्कूल देखा तो इतरां उसके तिलिस्म में क़ैद हो गयी। बादलों के बीच से दूर दूर तक रेत के धोरे दिख रहे थे और उनके बीच पानी की मरीचिका सा शाद्वल चमक रहा था। भूगोल के क्लास में पढ़ा हुआ ओएसिस वाक़ई कहीं ज़िंदा, साँस लेता हुआ दिखेगा, ऐसा तो उसने कभी सोचा भी नहीं था। एक लम्हे के लिए वो सब भूल गयी, पीछे छूटते हुए परिवार वाले, चवन्नी जैसे दोस्त, बुलेट की व्हीली…सब। रेगिस्तान का जादू घेरता है तो किसी और याद के लिए जगह कहाँ बचती है।

रूद्र के लौटने के बाद इतरां को महसूस हुआ कि इकतरफ़ा प्रेम आसान नहीं होता। रेत की प्यास का मुक़ाबला कोई मुहब्बत नहीं कर सकती थी। रेत उसके सारे आँसू सोख लेती और झील का पानी एक इंच भी नहीं बढ़ता। अभी तक उसके एक आँसू पर घर भर में फ़साद खड़ा हो जाया करता था। बोर्डिंग स्कूल उससे वो घास का क़ालीन छीन रहा था जिसपर पड़े रह कर रोशनी को आँखों में बुलाया जा सकता था।

पहला फ़ोन कॉल
नयी जीप में बैठ कर सब लोग शहर गए इतरां को फ़ोन करने के लिए। रूद्र। इंदर। दादी सरकार। घर के बाक़ी बच्चे। रूद्र ने सबको बताया था कि फ़ोन से इतरां की आवाज़ सुनी जा सकती है। इधर से भी बात कर सकते हैं। कॉल लगायी गयी। सबसे पहले दादी सरकार ने फ़ोन का चोंगा पकड़ा...'इतरां। इतरां। कैसी है बेटा…मेरी चंदा…इतरां.’ उधर से कोई आवाज़ नहीं। दादी की आवाज़ और ऊँची होती जा रही थी।

‘आहिस्ता बड़ी सरकार, इतना तेज़ बोलेंगी तो बिना फ़ोन के ही आवाज़ पहुँच जाएगी’। रूद्र ने अपनी घबराहट छुपाने के लिए बड़ी सरकार को छेड़ा और सारे बच्चे हँस पड़े। बड़ी सरकार से ठिठोली की हिमाक़त एक रूद्र ही कर सकता था। सरकार लेकिन सरकार थीं, फ़ोन बूथ वाले को हड़काया और फ़ोन इंदर को थमा दिया। इंदर ने आवाज़ में बहुत सा दुलार भर कर इतरां का नाम पुकारा। एक पल को तो लगा जैसे माही ने पुकारा हो अपनी बेटी को। लेकिन उधर से कोई भी आवाज़ नहीं आयी। अब रूद्र की बेसब्री और इंतज़ार नहीं कर सकती थी। इंदर से लगभग फ़ोन का चोंगा छीनते हुए इतरां का नाम पुकारा। 'इतरां। क्या हुआ। कुछ बोल तो सही। स्कूल पसंद नहीं आया? क्लास अच्छी नहीं है? खाना वाना देते हैं तुझे? किसी ने परेशान किया क्या। बता तो सही। क्या हुआ। इतरां। इत्ति। इत्तु। मेरी इतरमिश्री। कुछ बोल तो’

कोई भी आवाज़ नहीं।

रूद्र ने एक गहरी साँस ली और फ़ोन में हौले से पुकारा, ‘सरकार’।

फ़ोन के उस तरफ़ से सिर्फ़ एक सिसकी आयी।

सिसकी। सिर्फ़ एक सिसकी।

ठंढी। लोहे की कील। सीने में ठुकी हुयी। ख़ून का बहना रोकती। साँस का आना।

इतरां की सिसकी से ऐसा तीखा दर्द हुआ कि रूद्र का मन किया आँधी की तरह बुलेट पर उड़ता जाए, कोई जादू का क़ालीन मंगा ले कहीं से…कि स्कूल विस्कूल जाए भाड़ में, इतरां को उठा कर ले आए। उसके जीते जी इतरां रो जाए तो ऐसा जीना किस काम का। लेकिन इतरां सिर्फ़ उसकी थोड़ी थी, घर में किसी को भी मालूम हो जाए इतरां उस तरफ़ रो रही है, वे वाक़ई उसे स्कूल से उठा कर ले आते। इतरां के लिए ज़रूरी था वो पढ़े…और इसी स्कूल में पढ़े। रूद्र के चेहरे पर तबाह इमारत का सफ़ेद सन्नाटा फैलता गया। घर वाले पूछते रहे क्या हुआ, इतरां ने कुछ कहा या नहीं, लेकिन रूद्र ने कुछ नहीं कहा। ये ऐसा दुःख था जो किसी से बाँटा नहीं जा सकता था।

रूद्र ने बगरो को जब आख़िरी बार सीने से लगाया था तो उसने भी कुछ कहा नहीं था। एकदम चुप। सिर्फ़ एक सिसकी थी। अब तक सीने में चुभी हुयी। सिसकियों के पीछे की चुप नदी जानता था रूद्र। बाँध के छेद में ठोकी हुयी कील थी ऐसी सिसकी।

कॉल के बाद घर पर सब लोगों ने निर्णय लिया कि ये फ़ोन नाम की चीज़ बकवास है। चिट्ठी लिखी जाए इतरां को। शहर की सारी दुकानें तलाशी गयीं। सबने अपनी अपनी पसंद का काग़ज़ ख़रीदा। बच्चों ने झिलमिल और चिमकी ख़रीदी। चवन्नी ने पतंग बनाने का काग़ज़ ख़रीदा। उसने किसी फ़िल्म में देखा था कि प्रेमी प्रेमिका पतंग पर शायरी लिख कर भेजते हैं। इतरां के जाते ही चवन्नी ने ग्यारहवीं कक्षा के सभी लड़कों के बीच सीना चौड़ा कर कर ऐलान कर दिया था कि इतरां के लौट कर आते ही वे दोनों शादी कर लेंगे। पूरे घर वालों ने अपने अपने हिसाब से इतरां को चिट्ठी लिखी। रूद्र के पास कोई शब्द नहीं थे जो इतरां के काम आते। उसने पाब्लो नेरुदा की किताब, ’२० लव सौंग्स ऐंड अ सौंग औफ़ डिस्पेयर’ भेजा। इसके कई कई कई दिनों बाद तक इतरां के जवाब का इंतज़ार हुआ। पोस्टऑफ़िस वाले अगर इतरां से इतना प्यार नहीं करते तो सुबह शाम के सवालों से तबाह हो जाते। गाँव का डाकिया एक बार इतना परेशान हो गया कि उसने सोचा वो ख़ुद ही इतरां की तरफ़ से कोई चिट्ठी लिख दे। घर वालों को कुछ तो सुकून आएगा। सच बोलना बिलकुल आसान होता है लेकिन झूठ बोलने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है। उसमें बात इतरां की थी तो झूठ बोलने में सबकी ही रूह कांपती।

चिट्ठी १
किसी के मर जाने के लिए उसका मर जाना ज़रूरी नहीं होता। दूर जाना भी मर जाना होता है।

चिट्ठी २
जेल हमेशा किसी पाप के लिए नहीं होती। कभी कभी भविष्य में होने वाले पापों के लिए पहले ही सज़ा भुगत लेनी होती है। क़िस्मत को हमारे जीवनकाल पर भरोसा नहीं होता। मान लो कहीं जल्दी मर गए तो। सिर्फ़ सज़ा भुगतने के लिए दूसरा जन्म लेना कितना मुश्किल है।

चिट्ठी ३
मुझे जवाब लिखने नहीं आते तो तुम लोग चिट्ठी लिखना बंद कर दोगे? सब नालायक हो तुम सब के सब। मैं वापस आयी ना तो देखना किसी से बात नहीं करूँगी। ग़ुस्सा मैं हूँ। तुम लोगों का कोई हक़ नहीं होता ग़ुस्सा होने का।

चिट्ठी ४
कल एक्जाम है। फ़ेल कर गयी तो वापस तो नहीं भेज देंगे? स्कूल उतना भी बुरा नहीं है। मैं यहाँ की टॉपर बनना चाहती हूँ।
लव यू आल।
मिस यू रूद्र।

चार चिट्ठियाँ लिखीं इतरां ने अपने पूरे स्कूल के टाइम में। बाक़ी तीनों तो ठीक हैं। कोहराम का कारण बनीं लेकिन आख़िरी चिट्ठी जो थी उसमें आख़िर में सिर्फ़ रूद्र के लिए मिस यू था। स्पेशल। घर का तापमान इतना बढ़ गया था उस रात कि एकबारगी तो लगा कि दादी सरकार रूद्र को दुबारा घर से निकाल देंगी। रूद्र के हाथ चिट्ठी लगने ही ना दे कोई। भाभियों ने थाली पटकने में कोई कसर ना रखी। बच्चे उसे बेमतलब चुट्टी काटते रहे दिन भर। रूद्र हरान परेशान की आफ़त की पुड़िया ने अब क्या लिख मारा है कि पूरा घर दुश्मन बना पड़ा है। 

देर रात रूद्र को जी भर सता कर सबका जी भर गया तो आख़िर बड़ी सरकार ने चिट्ठी रूद्र के हाथ में दी। दी भी क्या जैसे भीख दे रही हो। रूद्र का जी तो हुआ वहीं खोल ले लेकिन इतरां पर इतना हक़ महसूसता था वो कि सबकी नज़रों के सामने पढ़ नहीं सकता था। पूरा घर खा पी के शांत हुआ तो रूद्र घर से बाहर अपने पसंदीदा आम के पेड़ की ओर बढ़ गया। पूरे चाँद की रात थी। भयंकर गरमी में ऐसा महसूस हो रहा था जैसे दूर कहीं बारिश हुयी हो। घास पर लेटा रूद्र और चाँदनी में छिपे एक आध तारों को देखता रहा। चिट्ठी खोली तो चाँद इतरा रहा था। चाँदनी में चिट्ठी की आख़िरी लाइन चमक उठी। 
‘मिस यू रूद्र’। 
उसे ऐसा लगा जैसे घास नहीं क़ालीन है कोई, हवा में उड़ा जा रहा है। ख़ुद में बुदबुदाया। 
‘आइ लव यू टू, शैतान’।
***
लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. कहानी की ये 8वीं किस्त है. इसके पहले के हिस्सों के लिए इस लेबल पर क्रमवार पढ़ें। 

06 November, 2016

इश्क़ के बाद तो मौत आती है। समझदारी नहीं।


वो किसी वाहियात सी फ़िल्म को देख कर आयी थी। घिसी पिटी कहानी। बेमानी डायलोग और एक ही जैसे किरदार निभाते ऐक्टर्स। ज़िंदगी के हज़ार रंगों में परदे पर कोई रंग चमकता क्यूँ नहीं। 

चमकते मॉल के एस्केलेटर से लोग उतर रहे थे, चढ़ रहे थे। सब कुछ स्लो मोशन में ही था। रेलिंग पर हाथ टिकाए वो लोगों को सीधा, बेझिझक देख रही थी। हर चेहरे पर बेचैनी। हर चेहरे पर एक अजीब तलाश थी। कि जैसे सुख, सुकून, प्रेम, दोस्ती...सब कुछ मॉल में मिल जाएगा। लोग आते और गुज़र जाते उसके पास से। अचानक से उसे एक चेहरा याद आया। किसी की हँसी याद आयी। उसकी आँखों का रंग याद आया। उसके गले लगना याद आया। 'f*ck. प्यार हो रहा है मुझे उससे'। घबराहट हुयी। बेतरह। उसने याद करने की कोशिश की कि कब आख़िरी बार उसे किसी से प्यार होने पर घबराहट नहीं, ख़ुशी हुयी थी। कब दिल में ख़याल आया था, 'wow, प्यार हो रहा है'। उसे याद नहीं आया। प्यार उसे हमेशा एक लम्हे में हो जाता था। बिना आगे पीछे सोचे हुए। 

तो फिर ये क्या था? हिंदी फ़िल्में देखने से हुए बेतरह के फ़ितूर? हिंदी फ़िल्मों की और कौन सी बात सच होती है? लोग चार्टर्ड प्लेन से आते जाते हैं? पेरिस में छुट्ठियाँ मनाते हैं? नहीं ना? 

रेलिंग की ठंढ हाथों को भली लग रही थी। लड़की ने अपने नाख़ून देखे। बेतरह कुतरे हुए। लड़की। कि जो कभी मैनिक्योर कराने पार्लर भी नहीं गयी, पेरिस तो दूर की बात है। उसे क्यूँ लगता कि हिंदी फ़िल्मों का वो एक डाइयलोग सही है, 'लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते?'। ये कहाँ का आख़िरी नियम है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता। फ़िल्मों के सिवा कहीं भी तो नहीं लिखा है ऐसा। फ़िल्मों में उसके जैसे लोग होते भी तो नहीं। उस लड़के के जैसे भी नहीं। किसी डिरेक्टर को कहाँ मालूम है कि उसे उसकी कौन सी बात अच्छी लग गयी है। लड़के को ख़ुद कहाँ मालूम। 

किसी से साथ ख़ुशी या ग़म के किसी लम्हे को बाँटने की चाह दोस्ती भी तो होती है। गहरी। इसमें प्यार की मिलावट होनी ज़रूरी है। कुछ बेहद पसंद आया तो सबसे पहले माँ को फ़ोन करने का मन करता था ना। उसके नहीं रहने के बरसों बाद भी। फिर। हिंदी फ़िल्मों को सुधारने की ज़रूरत है। ये एक ढंग की फ़िल्म क्यूँ नहीं बनाते। एक बार। सिर्फ़ एक बार। एक्सेप्शन के लिए सही। दोस्ती सिर्फ़ लड़कों में होती है? लड़कियाँ रोड ट्रिप पे क्यूँ नहीं जातीं? जाने कितनी सारी चीज़ें और। लड़की सोचती रही। फिर ट्राइयल रूम में सफ़ेद शर्ट पहनी। गहरी नीली कि जो लगभग काली थी। जींस के जैसे लुक वाली, आसमानी। उसका दिल किया अपने अलमारी में रक्खे अट्ठारह सफ़ेद लिबासों में एक और जोड़ दे। मगर उसके काले रंग पर सफ़ेद बहुत कांट्रैस्ट करता था। एक और शर्ट पर पैसे बर्बाद करने से क्या फ़ायदा। 

मोबाइल देखती रही देर तक। सोचती रही। इन जगहों से उसकी ख़ुशबू कब जाएगी। उसकी आँखों से उसकी ख़ुशबू कब जाएगी। ख़ुशबू। उसकी उँगलियों में उसकी ख़ुशबू थी। सिर्फ़ इसलिए कि उसके नम्बर पर टाइप किए हज़ारों मेसेजेस थे। ड्राफ़्ट फ़ोल्डर्ज़ में। इससे कहीं ज़्यादा वो मेसेजेस थे जो उसने टाइप तक नहीं किए। कि कभी भेजने ही नहीं थे। कितना मुश्किल है उससे कहना, 'आइ मिस यू'।

कुछ फ़ैसले अपने हाथ में भी तो होते हैं। उसे कभी नहीं बताने का...गुम हो जाने का...या कि यूँ मुस्कुराने का जैसे सब पहले जैसा ही है। 'कि जहाँ से लौट गयी थी। वहीं पर डूब गयी हूँ। सुनो। कभी हम एकदम टूटे तो वो ब्लैक शर्ट दे दोगे मुझे? उसमें तुम बहुत अच्छे लगते हो। मैं नहीं चाहती मेरे बाद कोई लड़की तुम्हें उस शर्ट में देखे। पूछ लो, क्या करूँगी तुम्हारी शर्ट का। आग लगा दूँगी उसमें। बस। इतना तो कर सकती हूँ। मुहब्बत ना सही'।

'जब सब कुछ ही ख़त्म जो जाएगा। मैं आग लगा दूँगी, तुम्हारी ब्लैक शर्ट के साथ अपनी अट्ठारह सफ़ेद शर्ट्स को, तुम बताना...जो तुमने कहा था'। 'तुम मेरे बेस्ट फ़्रेंड बनना चाहते हो।' मैंने कहा था उस दिन भी, बहुत मुश्किल है मेरा बेस्ट फ़्रेंड बनना। मेरे आशिक़ों के बयान सुनने पड़ेंगे, मेरे लव लेटर एडिट करने पड़ेंगे। मेरे boyfriends के लिए तोहफ़े ख़रीदने चलना पड़ेगा मेरे साथ। बोलो। कर सकोगे सब? मगर उन दिनों मुझे नहीं लगा था कभी कि तुमसे गहरा प्यार होगा। कभी। 

लड़की। उसे दोस्त से ज़्यादा नहीं होने देगी कुछ। 

हम जो महसूस करते हैं उसे रोक नहीं सकते, मगर हम जो क़दम उठाते हैं, हम जो निर्णय लेते हैं, वो हमारे बस में हैं। लड़की आइना देखते मुस्कुरायी। वो पूरी तरह भूल गयी थी प्यार करना। पूरी तरह भूल गयी थी किसी दोस्त पर अपना हक़ जताना। मैं जा रही हूँ के बजाए, आइ मिस यू लिखना आसान नहीं था? सुसाइड लेटर लिखने के बजाए, sms करना आसान नहीं था?

दोस्ती आसान नहीं थी?
मगर लड़की। उफ़। उसे तो इश्क़ होना था। इश्क़। इश्क़ के बाद तो मौत ही आती है। समझदारी नहीं। फिर आख़िर वो कहानी का किरदार थी। कोई जीती जागती लड़की कहाँ। हैप्पी एंडिंग सिर्फ़ फ़िल्मों में होती है। किताबों की शुरुआत ही मरने से होती है। जीते जागते पेड़ को मार कर बनाया जाता है काग़ज़। उस पर छपी कोई किताब क़त्ल में डूबी होती है। ग़म में। तकलीफ़ में। काग़ज़ पर इश्क़ लिखते हैं। रिहाई नहीं। 

लड़की सोचती थी अपने रेजयूमे पर लिख दूँ...'मैं सुसाइड लेटर अच्छा लिखती हूँ'। फिर उसे वो सारे रक़ीब याद आए जिनकी उसने हत्या की थी और वो पागलों की तरह हँस पड़ी। 

'Why die when you can kill?'

31 October, 2016

बसना अफ़सोस की तरह। सीने में। ताउम्र।

अलग अलग शौक़ होते हैं लोगों के। मेरा एक दिल अज़ीज़ शौक़ है इन दिनों। अफ़सोस जमा करने का। बेइंतहा ख़ूबसूरत मौसम भी होते हैं। ऐसे कि जो शहर का रंग बदल दें। इस शहर में एक मौसम आया कि जिसे यहाँ के लोग कहते हैं, ऑटम। फ़ॉल। देख कर लगा कि फ़ॉल इन लव इसको कहते होंगे। वजूद का सुनहरा हो जाना। कि जैसे गोल्ड-प्लेटिंग हो गयी हो हर चीज़ की। गॉथेन्बर्ग। मेरी यादों में हमेशा सुनहरा।

यहाँ की सड़कें यूँ तो नोर्मल सी ही सड़कें होती होंगी। बैंगलोर जैसी। दिल्ली जैसी नहीं की दिल्ली की सड़कों से हमेशा महबूब जुड़े हैं। यारियाँ जुड़ी हैं। मगर इन दिनों इन सड़कों पर रंग बिखरता था। सड़कों पर दोनों ओर क़तार में सुनहले पेड़ लगे हुए थे। मैंने ऐसे पेड़ पहली और आख़िरी बार कश्मीर में देखे थे। तरकन्ना के पेड़। ज़मीन पर गिरे हुए पत्तों का पीला क़ालीन बिछा था। हवा इतनी तेज़ चलती थी कि सारे पत्ते कहीं भागते हुए से लगते थे। उस जादुई पाइप प्लेयर की याद आती थी जिसने चूहों को सम्मोहित कर लिया था और वे उसके पीछे पीछे चलते हुए नदी में जा के डूब गए थे। ये पत्ते वैसे ही सम्मोहित सड़कों पर दीवाने हुए भागते फिरते थे। इस बात से बेख़बर कि ट्रैफ़िक सिग्नल हरा है या लाल। उन्हें कौन महबूब पुकारता था। वे कहाँ खिंचे चले जाते थे? मुझे वो वक़्त याद आया जब याद यूँ बेतरह आती थी जब कोई ऐसा शहर पुकारता था जिसकी गलियों की गंध मुझे मालूम नहीं।

कई दिनों से मेरा ये आलम भी है कि सच्चाई और कहानियों में अंतर महसूस करने में मुश्किल हो रही है। दिन गुज़रता है तो यक़ीन नहीं होता कि कहीं से गुज़र कर आए हैं। लगता है काग़ज़ से उतर कर ज़िंदा हुआ कोई शहर होगा। कोई महबूब होगा सुनहली आँखों वाला।

हम जिनसे भी कभी मुहब्बत में होते हैं, हमें उनकी आँखों का रंग तब तक याद रहता है जब तक कि उस मुहब्बत की ख़ुशबू बाक़ी रहे। याने के उम्र भर।

शहर की सफ़ाई करने वाले कर्मचारियों ने पीले पत्ते बुहार कर सड़क के किनारे कर दिए थे। तेज़ हवा चलती और पत्ते कमबख़्त, बेमक़सद दौड़ पड़ते शहर को अपनी बाँहों में लिए बहती नदी में डूब जाने को। मैं किसी कहानी का किरदार थी। तनहा। लड़की कोई। उदास आँखों वाली। लड़की ने एक भागते पत्ते को उठाया और कहा तुम सूने अच्छे नहीं लगते और उसपर महबूब का नाम लिखा अपनी नीली स्याही से। पत्ते को बड़ी बेसब्री थी। हल्के से हवा के झोंके से दौड़ पड़ा और पुल से कूद गया नीचे बहते पानी में। जब तक पत्ता हवा में था लड़की देखती रही महबूब का नाम। नदी के पानी में स्याही घुल गयी और अब से सारे समंदरों को मालूम होगा उसके महबूब का नाम। मैंने देखा लड़की को। सोचा। मैं लिखूँ तुम्हारा नाम। मगर फिर लगा तुम्हारे शहर का पता बारिशों को नहीं मालूम।

लड़की भटक रही थी बेमक़सद मगर उसे मिलती हुयी चीज़ों की वजह हुआ करती थी। धूप निकली तो सब कुछ सुनहला हो गया। आसमान से धूप गिरती और सड़क के पत्तों से रेफ़्लेक्ट होती। इतना सुनहला था सब ओर कि लड़की को लगा उसकी आँखें सुनहली हो जाएँगी। उसे वो दोस्त याद आए जिनकी आँखों का रंग सुनहला था। वो महबूब भी। और वे लड़के भी जो इन दोनों से बचते हुए चलते थे। शहर के पुराने हिस्से में एक छोटे से टीले पर एक लाल रंग की बेंच थी जिसके पास से एक पगडंडी जाती थी। उसे लगा कि ये बेंच उन लड़कों के लिए हैं जिन्हें यहाँ बैठ कर कविताएँ पढ़नी हैं और प्रेम पत्र लिखने हैं। ये बेंच उन लोगों के लिए हैं जिनके पास प्रेम के लिए जगह नहीं है।

ये पूरा शहर एक अफ़सोस की तरह बसा है सीने में। ठीक मालूम नहीं कि क्यों। ठीक मालूम नहीं कि क्या होना था। ठीक मालूम नहीं कि इतना ख़ूबसूरत नहीं होना था तो क्या होना था। उदास ही होना था। हमेशा?

हाथों में इतना दर्द है कि चिट्ठियाँ नहीं लिखीं। पोस्टकार्ड नहीं डाले। ठंढे पानी से आराम होता था। सुबह उठती तो उँगलियाँ सूजी हयीं और हथेली भी। कुछ इस तरह कि रेखाओं में दिखते सारे नाम गड़बड़। डर भी लगता। कहीं तुम्हारा नाम मेरे हाथों से गुम ना जाए। जब हर दर्द बहुत ज़्यादा लगता तो दोनों हथेलियों से बनाती चूल्लु और घूँट घूँट पानी पीती। दर्द भी कमता और प्यास भी बुझती।

वो दिखता। किसी कहानी का महबूब। हँसता। कि इतना दुःख है। काश इतनी मुहब्बत भी होती। मैं मुस्कुराती तो आँख भर आती। हाथ उठाती दुआ में। कहती। सरकार। आमीन। 

01 September, 2016

थेथरोलोजी वाया भितरिया बदमास



नोट: ये अलाय बलाय वाली पोस्ट है। आप कुछ मीनिंगफुल पढ़ना चाहते हैं तो कृपया इस पोस्ट पर अपना समय बर्बाद ना करें। धन्यवाद।
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दोस्त। आज ऊँगली जल गयी बीड़ी जलाते हुए तो तुम याद आए। नहीं। तुम नहीं। हम याद आए। तुम्हें याद है हम कैसे हुआ करते थे?
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ये वो दिन हैं जब मैं भूल गयी हूँ कि मेरे हिस्से में कितनी मुहब्बत लिखी गयी है। कितनी यारियाँ। कितने दिलकश लोग। कितने दिल तोड़ने वाले लोग। इन्हीं दिनों में मैं वो कहकहा भी भूल गयी हूँ जो हमारी बातों के दर्मयान चला आता था हमारे बीच। बदलते मौसम में आसमान के बादलों जैसा। तुम आज याद कर रहे हो ना मुझे? कर रहे हो ना?
***
हम। मैं और तुम मिल कर जो बनते थे...वो बिहार वाला हम नहीं...बहुवचन हम...लेकिन हमारा हम तो एकवचन हो जाता था ना? नहीं। मैं और तुम। एक जैसे। जाने क्या। क्यूँ। कैसे। कब तक?

हम। जिन दिनों हम हुआ करते थे। मैं और तुम।
तुम्हारे घर के आगे रेलगाड़ी गुज़रती थी और मैं यहाँ मन में ठीक ठीक डिब्बे गिन लेती थी। याद है? पटना के प्लैट्फ़ॉर्म पर हम कभी नहीं मिले लेकिन अलग अलग गुज़रे हैं वहाँ से अपने होने के हिस्से पीछे छोड़ते हुए कि दूसरा जब वहाँ आए तो उसे तलाशने में मुश्किल ना हो।

हम एक ऐसे शहर में रहते थे जहाँ घड़ी ठीक रात के आठ बजे ठहर जाती थी। तब तक जब तक कि जी भर बतिया कर हमारा मन ना भर जाए। गंगा में आयी बाढ़ जैसी बातें हुआ करती थीं। पूरे पूरे गाँव बहते थे हमारे अंदर। पूरे पूरे गाँव रहते थे हमारे अंदर। नहीं? इन गाँवों के लोग कितना दोस्ताना रखते थे एक दूसरे से। दिन में दस बार तो आना जाना लगा हुआ रहता था। कभी धनिया पत्ता माँगने तो कभी खेत से मूली उखाड़ने। झालमूढ़ि में जब तक कच्चा मिर्चा और मूली ना मिले, मज़ा नहीं आता। झाँस वाला सरसों का तेल। थोड़ा सा चना। सीसी करते हुए खाते जाना। तित्ता तित्ता।

लॉजिक कहता है तुम वर्चुअल हो। आभासी। आभासी मतलब तो वो होता है ना जिसके होने का पहले से पता चल जाए ना? उस हिसाब से इस शब्द का दोनों ट्रान्सलेशन काम करता है। याद क्यूँ आती है किसी की? इस बेतरह। क्या इसलिए कि कई दिनों से बात बंद है? तुमसे बात करना ख़ुद से बात करने को एक दरवाज़ा खोले रखना होता था। तुमसे बात करते हुए मैं गुम नहीं होती थी। तुम ज़िद्दी जो थे। अन्धार घर में भुतलाया हुआ माचिस खोजना तुमरे बस का बात था बस। हम जब कहीं बौरा कर भाग जाने का बात उत करने लगते थे तुम हमको लौटा लाते थे। मेरे मर जाने के मूड को टालना भी तुमको आता था। बस तुमको। सिर्फ़ एक तुमको।

सुगवा रे, मोर पाहुना रे, ललका गोटी हमार, तुम रे हमरे पोखर के चंदा...तुम हमरे चोट्टाकुमार। जानते हो ना सबसे सुंदर क्या है इस कबीता में? इस कबीता में तुम हमरे हो...हमार। उतना सा हमरे जितना हमारे चाहने भर को काफ़ी हो। कैसे हो तुम इन दिनों? हमारे वो गाँव कैसे उजड़ गए हैं ना। बह गए सारे लोग। सारे लोग रे। आज तुम्हारा नाम लेने का मन किया है। देर तक तुमसे बात करने का मन किया है। इन सारे बहे हुए लोगों और गाँवों को गंगा से छांक कर किसी पहाड़ पर बसा देने का मन किया है। लेकिन गाँव के लोग पहाड़ों पर रहना नहीं जानते ना। तुम मेरे बिना रहना जानते हो? हमको लगता था तुम कहीं चले गए हो रूस के। घर का सब दरवाज़ा खुला छोड़ के। लेकिन तुम तो वहीं कोने में थे घुसियाए हुए। बीड़ी का धुइयाँ लगा तो खाँसते हुए बाहर आए। आज झगड़ लें तुमसे मन भर के? ऐसे ही। कोई कारण से नहीं। ख़ाली इसलिए कि तुमको गरिया के कलेजा जरा ठंढा पढ़ जाएगा। बस इसलिए। बोलो ना रे। कब तक ऐसे बैठोगे चुपचाप। चलो यही बोल दो कि हम कितना ख़राब लिखे हैं। नहीं? कहो ना। कहो कि बोलती हो तो लगता है कि ज़िंदा हो।

मालूम है। इन दिनों मैंने कुछ लिखा नहीं है। वो जो लिखने में सुख मिलता था, वो ख़त्म हो गया है। कि मैंने बात करनी ही बंद कर दी है। काहे कि हमेशा ये सोचने लगी हूँ कि ये भी कोई लिखने की बात है। वो जो पहले की तरह होता था कि साला जो मेरा मन करेगा लिखेंगे, जिसको पढ़ना है पढ़े वरना गो टू द (ब्लडी) भाड़। इन दिनों लगता है कि बकवास लिखनी नहीं चाहिए, बकवास करनी भी नहीं चाहिए। लेकिन वो मैं नहीं हूँ ना। मैं तो इतना ही बोलती हूँ। तो ख़ैर। जिसको कहते हैं ना, टेक चार्ज। सो। फिर से। लिखना इसलिए नहीं है कि उसका कोई मक़सद है। लिखना इसलिए है कि लिखने में मज़ा आता था। कि जैसे बाइक चलाने में। तुम्हें फ़ोन करके घंटों गपियाने में। तेज़ बाइक चलाते हुए हैंडिल छोड़ कर दोनों हाथ शाहरुख़ खान पोज में फैला लेने में। नहीं। तो हम फिर से लिख रहे हैं। अपनी ख़ुशी के लिए। जो मन सो।

हम न आजकल बतियाना बंद कर दिए हैं। लिखना भी। जाने क्या क्या सोचते रहते हैं दिन भर। पढ़ते हैं तो माथा में कुछ घुसता ही नहीं है। चलो आज तुमको एक कहानी सुनाते हैं। तुम तो नहींये जानते होगे। ई सब पढ़ सुन कर तुमरे ज्ञान में इज़ाफ़ा होगा। ट्रान्सलेशन तो हम बहुत्ते रद्दी करते हैं, लेकिन तुम फ़ीलिंग समझना, ओके? तुम तो जानते हो कि हारूकी मुराकामी मेरे सबसे फ़ेवरिट राईटर हैं इन दिनों। तो मुराकामी का जो नॉवल पढ़ रहे हैं इन दिनों उसके प्रस्तावना में लिखते हैं वो कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कई काम उलटे क्रम से किए हैं। उन्होंने पहले शादी की, फिर नौकरी, और आख़िर में पढ़ाई ख़त्म की। अपने जीवन के 20s में उन्होंने Kokubunji में एक छोटा सा कैफ़े खोला जहाँ जैज़ सुना जा सकता था। वो लिखते हैं कि 29 साल की उम्र में एक बार वे एक खेल देखने गए थे। वो साल १९७८ का अप्रील महीना था और जिंग़ु स्टेडीयम में बेसबाल का गेम था। सीज़न का पहला गेम Yakult Swallows against the Hiroshima Carp। वे उन दिनों याकुल्ट स्वालोज के फ़ैन थे और कभी कभी उनका गेम देखने चले जाते थे। वैसे स्वॉलोज़ माने अबाबील होता है। अबाबील बूझे तुम? गूगल कर लेना। तो ख़ैर। मुराकामी गेम देखने के लिए घास पर बैठे हुए थे। आसमान चमकीला नीला था, बीयर उतनी ठंढी थी जितनी कि हो सकती थी, फ़ील्ड के हरे के सामने बॉल आश्चर्यजनक तरीक़े से सफ़ेद थी...मुराकामी ने बहुत दिन बाद इतना हरा देखा था। स्वालोज का पहला बैटर डेव हिल्टन था। पहली इनिंग के ख़त्म होते हिल्टन ने बॉल को हिट किया तो वो क्रैक पूरे स्टेडियम में सुनायी पड़ा। मुराकामी के आसपास तालियों की छिटपुट गड़गड़ाहट गूँजी। ठीक उसी लम्हे, बिना किसी ख़ास वजह के और बिना किसी आधार के मुराकामी के अंदर ख़याल जागा: 'मेरे ख़याल से मैं एक नॉवल लिख सकता हूँ'।

अंग्रेज़ी में ये शब्द, 'epiphany' है। मुझे अभी इसका ठीक ठीक हिंदी शब्द याद नहीं आ रहा।

मुराकामी को थी ठीक वो अहसास याद है। जैसे आसमान से उड़ती हुयी कोई चीज़ आयी और उन्होंने अपनी हथेलियों में उसे थाम लिया। उन्हें मालूम नहीं था कि ये चीज़ उनके हाथों में क्यूँ आयी। उन्हें ये बात तब भी नहीं समझ आयी थी, अब भी नहीं आती। जो भी वजह रही हो, ये घटना घट चुकी थी। और ठीक उस लम्हे से उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गयी थी।

खेल ख़त्म होने के बाद मुराकामी ने शिनजकु की ट्रेन ली और वहाँ से एक जिस्ता काग़ज़ और एक फ़ाउंटेन पेन ख़रीदा। उस दिन उन्होंने पहली बार काग़ज़ पर कलम से अपना नॉवल लिखना शुरू किया। उस दिन के बाद से हर रोज़ अपना काम ख़त्म कर के सुबह के पहले वाले पहर में वे काग़ज़ पर लिखते रहते क्यूँकि सिर्फ़ इसी वक़्त उन्हें फ़ुर्सत मिलती। इस तरह उन्होंने अपना पहला छोटा नॉवल, Hear the Wind Sing लिखा।

कितना सुंदर है ऐसा कुछ पढ़ना ना? मुझे अब तो वे दिन भी ठीक से याद नहीं। मगर ऐसा ही होता था ना लिखना। अचानक से मूड हुआ और आधा घंटा बैठे कम्प्यूटर पर और लिख लिए। ना किसी चीज़ की चिंता, ना किसी के पढ़ने का टेंशन। हम किस तरह से थे ना एक दूसरे के लिए। पाठक भी, लेखक भी, द्रष्टा भी, क्रिटिक भी। लिखना कितने मज़े की चीज़ हुआ करती थी उन दिनों। कितने ऐश की। फिर हम कैसे बदल गए? कहाँ चला गया वो साधारण सा सुख? सिम्पल। साधारण। सादगी से लिखना। ख़ुश होना। मुराकामी उसी में लिखते हैं कि वो ऐसे इंसान हैं जिनको रात ३ बजे भूख लगती तो फ्रिज खंगालते हैं...ज़ाहिर तौर से उनका लिखना भी वैसा ही कुछ होगा। तो बेसिकली, हम जैसे इंसान होते हैं वैसा ही लिखते हैं।

बदल जाना वक़्त का दस्तूर होता है। बदलाव अच्छा भी होता है। हम ऐसे ही सीखते हैं। बेहतर होते हैं। मगर कुछ चीज़ें सिर्फ़ अपने सुख के लिए भी रखनी चाहिए ना? ये ब्लॉग वैसा ही तो था। हम सोच रहे हैं कि फिर से लिखें। कुछ भी वाली चीज़ें। मुराकामी। मेरी नयी मोटरसाइकिल, रॉयल एंफ़ील्ड, शाम का मौसम, बीड़ी, मेरी फ़ीरोज़ी स्याही। जानते हो। हमारे अंदर एक भीतरिया बदमास रहता है। थेथरोलौजी एक्सपर्ट। किसी भी चीज़ पर घंटों बोल सकने वाला। जिसको मतलब की बात नहीं बुझाती। होशियार होना अच्छा है लेकिन ख़ुद के प्रति ईमानदार होना जीने के लिए ज़रूरी है। हर कुछ दिन में इस बदमास को ज़रा दाना पानी देना चाहिए ना?

और तुम। सुनो। बहुत साल हो गए। कोई आसपास है तुम्हारे? लतख़ोर, उसको कहो मेरी तरफ़ से तुम्हें एक bpl दे...यू नो, bum पे लात :)

कहा नहीं है इन दिनों ना तुमसे।
लव यू। बहुत सा। डू यू मिस मी? क्यूँकि, मैं मिस करती हूँ। तुम्हें, हमें। सुनो। लिखा करो। 

21 June, 2016

लड़की धुएँ से टांक देती उसकी सफ़ेद शर्ट्स में अपना नाम



जिन दिनों तुम नहीं होते हो जानां। तलाशनी होती है अपने अंदर ही कोई अजस्र नदी। जिसका पानी हो प्यास से ज़्यादा मीठा। जिससे आँखें धो कर आए गाढ़ी नींद और पक्के रंग वाले सपने। जिस नदी के पानी में डूब मर कर की जा सके एक और जन्म की कामना।
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लड़की धुएँ से टांक देती उसकी सफ़ेद शर्ट्स में अपना नाम। लड़के की जेब से मिलती माचिस। उसके बैग में पड़े रहते लड़की की सिगरेट के ख़ाली डिब्बे। लड़की चेन स्मोकिंग करती और लड़के की दुनिया धुआँ धुआँ हो उठती। वो चाहता चखना उसके होंठ लेकिन नहीं छूना चाहता सिगरेट का एक कश भी। लड़के की उँगलियों में सिर्फ़ बुझी हुयी माचिस की तीलियाँ रहतीं। लड़की को लाइटर से सिगरेट जलाना पसंद नहीं था। लड़के को धुएँ की गंध पसंद नहीं थी। धुएँ के पीछे गुम होती लड़की की आँखें भी नहीं। लड़की के बालों से धुएँ की गंध आती। लड़का उसके बालों में उँगलियाँ फिराता तो उसकी उँगलियों से भी सिगरेट की गंध आने लगती। लड़के की मर्ज़ी से बादल नहीं चलते वरना वो उन्हें हुक्म देता कि तब तक बरसते रहें जब तक लड़की की सारी सिगरेटें गीली ना हो जाएँ। इत्ती बारिश कि धुल जाए लड़की के बदन से धुएँ की गंध का हर क़तरा। वो चाहता था कि जान सके जिन दिनों लड़की सिगरेट नहीं पीती, उन दिनों उससे कैसी गंध आती है। सिगरेट उसे रक़ीब लगता। लड़की धुएँ की गंध वाले घर में रहती। लड़का जानता कि इस घर का रास्ता मौत ने देख रखा है और वो किसी भी दिन कैंसर का हाथ पकड़ टहलती हुयी मेहमान की तरह चली आएगी और लड़की को उससे छीन कर ले जाएगी। वो लड़की से मुहब्बत करता तो उसका हक़ होता कि लड़की से ज़िद करके छुड़वा भी दे लेकिन उसे सिर्फ़ उसकी फ़िक्र थी…किसी को भी हो जाती। लड़की इतनी बेपरवाह थी कि उसके इर्द गिर्द होने पर सिर्फ़ उसे ज़िंदा रखने भर की दुआएँ माँगने को जी चाहता था।

वो खुले आसमान के नीचे सिगरेट पीती। उसके गहरे गुलाबी होठों को छू कर धुआँ इतराता हुआ चलता कि जैसे जिसे छू देगा वो मुहब्बत में डूब जाएगा। मौसम धुएँ के इशारों पर डोलते। जिस रोज़ लड़की उदास होती, बहुत ज़्यादा सिगरेट पीती…आँसू उसकी आँखों से वाष्पित हो जाते और शहर में ह्यूमिडिटी बढ़ जाती। सब कुछ सघन होने लगता। कोहरीले शहर में घुमावदार रास्ते गुम हो जाते। यूँ ये लड़की का जाना पहचाना शहर था लेकिन था तो तिलिस्म ही। कभी पहाड़ की जगह घाटियाँ उग आतीं तो कभी सड़क की जगह नदी बहने लगती। लड़की गुम होते शहर की रेलिंग पकड़ के चलती या कि लड़के की बाँह। लड़का कभी कभी काली शर्ट पहनता। उन दिनों वो अंधेरे का हिस्सा होता। सिर्फ़ माचिस जलाने के बाद वाले लम्हे में उसकी आँखें दिखतीं। शहद से मीठीं। शहद रंग की भीं। उससे मिल कर लड़की का दुखांत कहानियाँ लिखने का मन नहीं करता। ये बेइमानी होती क्यूँकि पहाड़ के क़िस्सों में हमेशा महबूब को किसी घाटी से कूद कर मरना होता था। लड़की को सुख की कल्पना नहीं आती थी ठीक से। प्रेम के लौट आने की कल्पना भी नहीं। यूँ भी पहाड़ों में शाम बहुत जल्दी उतर आती है। लड़की उससे कहती कि शाम के पहले आ जाया करे। वो जानती थी कि जब वो लड़के की शर्ट की बाँह पकड़ कर चलती है तो उसकी सिगरेट वाली गंध उसकी काली शर्ट में जज़्ब हो जाती है। फिर बेचारा लड़का रात को ही ठंढे पानी में पटक पटक कर सर्फ़ में शर्ट धोता था ताकि धुएँ की गंध उसके सीने से होते हुए उसके दिल में जज़्ब ना हो जाए। धुएँ की कोई शक्ल नहीं होती, जहाँ रहता है उसी की शक्ल अख़्तियार कर लेता है। अक्सर लड़की से मिल कर लौटते हुए लड़का देखता कि घरों की चिमनी से उठता धुआँ भी लड़की की शक्ल ले ले रहा है।

लड़की सिगरेट पीने जाती तो आँख के आगे बादल आते और धुआँ। वो चाहती कि बालों का जूड़ा बना ले। या कि गूँथ ले दो चोटियाँ कि जहाँ धुएँ की घुसपैठ ना हो सके। मगर उसकी ज़िद्दी उँगलियाँ खोल देतीं जो कुछ भी उसके बालों में लगा हुआ होता, क्लचर, रबर बैंड, जूड़ा पिन। खुले बालों में धुआँ जा जा के झूले झूलता। लड़के को समझ नहीं आता, क़त्ल का इतना सामान होते हुए भी लड़की ने सिगरेट को क्यूँ चुना है अपना क़ातिल। उससे कह देती। वो अपने सपनों में चाकू की धार तेज़ करता रहता। लड़की की सफ़ेद त्वचा के नीची दौड़ती नीली नसों में रक्त धड़कता रहता। लड़का उसके ज़रा पीछे चलता तो देखता उसके बाल कमर से नीचे आ गए हैं। उसकी कमर की लोच पर ज़रा ज़रा थिरकते। लड़की अक्सर किसी संगीत की धुन पर थिरकती चलती। उसके पीछे चलता हुआ वो हल्के से उसके बाल छूता…उसकी हथेली में गुदगुदी होती।

उन्हें आदत लग रही थी एक दूसरे की…लड़के को पासिव स्मोकिंग की…लड़की को रास्ता भटक जाने की। या कि उसके बैग में सिगरेट, माचिस वग़ैरह रख देने की। लड़की देखती धुआँ लड़के को चुभता। इक रोज़ जिस जगह लैम्पपोस्ट हुआ करता था वहाँ बड़े बड़े काँटों वाली कोई झाड़ी उग आयी। लड़के ने सिगरेट जलाने के लिए अंधेरे में माचिस तलाशी तो उसकी ऊँगली में काँटा चुभ गया। अगली सुबह लड़की की नींद खुली तो उसने देखा ऊँगली पर ज़ख़्म उभर आया है, ठीक उसी जगह जहाँ लड़के को काँटा चुभा था। ये शुरुआत थी। कई सारी चीज़ें जो लड़के को चुभती थीं, लड़की को चुभने लगीं। जैसे कि एक दूसरे से अलग होने का लम्हा। वे दिन जब उन्हें मिलना नहीं होता था। वे दिन जब लड़का शहर से बाहर गया होता था। कोई हफ़्ता भर हुआ था और लड़की बहुत ज़्यादा सिगरेट पीने लगी थी। ऐसे ही किसी दीवाने दिन लड़की जा के अपने बाल कटा आयी। एकदम छोटे छोटे। कान तक। उस दिन के बाद से शहर का मौसम बदलने लगा। तीखी धूप में लड़के की आँखें झुलसने लगी थीं। गरमी में वो काले कपड़े नहीं पहन सकता। जिन रातों में उसका होना अदृश्य हुआ करता था उन रातों में अब उसके सफ़ेद शर्ट से दिन की थकान उतरती। वो नहीं चाहता कि लड़की उसकी शर्ट की स्लीव पकड़ कर चले। यूँ भी गरमियों के दिन थे। वो अक्सर हाफ़ शर्ट या टी शर्ट पहन लिया करता। लड़की को उसका हाथ पकड़ कर चलने में झिझक होती। इसलिए बस साथ में चलती। सिगरेट पर सिगरेट पीती हुयी। अब ना बादल आते थे ना उसके बाल इतने घने और लम्बे थे कि धुआँ वहाँ छुप कर बादलों को बुलाने की साज़िश रचता। लड़का उसकी कोरी गर्दन के नीचे धड़कती उसकी नस देखता तो उसके सपने और डरावने हो जाते। लड़की के गले से गिरती ख़ून की धार में सिगरेटें गीली होती जातीं। लड़का सुबकता। लड़की के सर में दर्द होने लगता।

उनके बीच से धुआँ ग़ायब रहने लगा था। धुएँ के बग़ैर चीज़ें ज़्यादा साफ़ दिखने लगी थीं। जैसे लड़की को दिखने लगा कि लड़के की कनपटी के बाल सफ़ेद हो गए हैं। लड़के ने नोटिस किया कि लड़की के हाथों पर झुर्रियाँ पड़ी हुयी हैं। कई सारी छोटी छोटी चीज़ें उनके बीच कभी नहीं आती थीं क्यूँकि उनके बीच धुआँ होता था। लड़की ने सिगरेट पीनी कम करके वैसी होने की कोशिश की जैसी उसके ख़याल से लड़के को पसंद होनी चाहिए। चाहना का लेकिन कोई ओर छोर नहीं होता। लड़की ने सिगरेट पीनी लगभग बंद ही कर दी थी। लेकिन किसी किसी दिन उसका बहुत दिन करता। ख़ास तौर से उन दिनों जब धूप भी होती और बारिश भी। ऐसे में अगर वो सिगरेट पी लेती तो लड़का उससे बेतरह झगड़ता। सिगरेट को दोषी क़रार देता कि उन दोनों के बीच हमेशा किसी सिगरेट की मौजूदगी रहती है। लड़की कितना भी कम सिगरेट पीने की कोशिश करती, कई शामों को उसका अकेलापन उसे इस बेतरह घेरता कि वो फिर से धुएँ वाले घर में चली जाती। वहाँ से उसके लौटने पर लड़का बेवफ़ाई के ताने मारता। इन दिनों लड़के के बैग में ना माचिस होती थी, ना सिगरेट के ख़ाली डिब्बे। इन दिनों लड़की का दिल भी ख़ाली ख़ाली रहता। और मौसम भी।

वो एक बेहद अच्छी लड़की हो गयी थी इन दिनों…और इन्ही दिनों लड़के को लगता था, उसे किसी बुरी लड़की से इश्क़ हुआ था…किसी बुरी लड़की से इश्क़ हो जाना चाहिए। 

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