04 January, 2019

मैन्यूअल ओवरराइड

ख़ुश होने के लिए क्या चाहिए?
हमको...
आज सुबह कुणाल को एक दिन के लिए बाहर जाना था। भोर तीन बजे टैक्सी बुक किए, जैसे ही गाड़ी आए, जाने कैसे तो अचानक से घर की लाइट चली गयी। इन्वर्टर में कुछ ख़राबी थी। फिर फ़ोन की बैटरी भी कम। तो टैक्सी कैंसल कर दिए और दो मिनट में कपड़े बदल कर अपनी गाड़ी से ही चल लिए। 

सुबह तीन बजे बहुत ठंड थी आज बैंगलोर में...9 डिग्री। स्वेटर का तो ख़याल ही नहीं आया। एयरपोर्ट पर ठंड होती है, लेकिन इतनी होगी, सोचे नहीं थे। ख़ैर। सोचे ये कि सुबह होने तक का दो ढाई घंटा उधर ही बिताएँगे फिर रौशनी होगी तो घर आएँगे। इस चक्कर में अलग अलग जगह बैठ कर चाय, कॉफ़ी और मशरूम सूप पिए। ठंड ग़ज़ब थी। उससे भी ज़्यादा मुश्किल कि सिर्फ़ एक हल्की सी जैकेट पहनी थी, ऊनी कुछ भी नहीं। 

इंतज़ार करना अच्छा लगता है मुझे। किसी भी चीज़ का। आज सुबह का इंतज़ार कर रही थी। कुछ देर नोट्बुक पर कुछ लिखा। कुछ देर आसपास लोगों की शक्लें देखीं। उजाला होने को आया तो गाड़ी के पास आए। मज़े का बात ये कि मेरी आक्टेविया keyless एंट्री वाली कार है। मतलब, इसमें चाभी लगाने की कोई जगह ही नहीं है। तो चाबी की बैटरी डाउन थी। गाड़ी के दरवाज़े खुले ही नहीं। कुछ दिन से बैटरी कम होने का सिग्नल दे रहा था और सर्विस सेंटर वालों के पास इसकी बैटरी थी नहीं। हम लेकिन हर चीज़ के लिए पहले तैय्यार रहते हैं, तो आख़िरी बार जब सर्विस में गयी थी तो उससे पूछ लिए थे कि मैनुअल कैसे खोलते हैं दरवाज़ा। तो दरवाज़ा तो खोलना आता था लेकिन उसके बाद उसने कहा था कि इग्निशन के बटन के पास चाबी सटाने से गाड़ी स्टार्ट हो जाएगी, सो हुआ नहीं। धुंध हो गयी थी सुबह। गाड़ी के दरवाज़े भी लॉक नहीं हो रहे थे अंदर से क्यूँकि कार में चाभी डिटेक्ट ही नहीं हो रही थी। फिर गूगल किया तो पता चला कि बिना चाभी के स्टार्ट होने वाली गाड़ियों की चाभी में एक छोटा ट्रैन्स्मिटर होता है। कार के स्टार्ट बटन के इर्द गिर्द एक मेटल की सर्कल होती है...चाभी के आगे वाले हिस्से को उस मेटल के सर्किल से छुआने पर गाड़ी स्टार्ट हो जाएगी। हमने ठीक ऐसा किया और कार स्टार्ट हो गयी। हमने अपनी पीठ ठोकी, कि कभी भी घबराते नहीं हैं और हर आफ़त का उपाय निकाल लेते हैं। 

आज सुबह सुबह इतनी धुंध थी जितनी मैंने बैंगलोर में कभी नहीं देखी। कार के काँच पर धुंध थी। ऊँगली से उसपर एक दिल बनाए। सोचे। कि हमें कहीं भी जगह मिले, हम कुछ लिखना चाहते हैं। इसके सिवा कुछ चाहिए नहीं होता है हमको। बहुत धुंध थी और वाइपर चलाने के बाद भी पीछे का कुछ नहीं दिख रहा था। मैंने इतनी धुंध में पहले कभी गाड़ी नहीं चलायी है। एक मन तो किया थोड़ी देर रुक जाते हैं। फिर लगा नींद आने लगेगी। घर पर काम भी बहुत है और पैकिंग भी करनी है। गाने लगाए। मौसम ऐसा था कि खिड़की खोलने में डर लगे। तापमान नौ डिग्री। दिल्ली और बैंगलोर एक ही मौसम में थे इस सुबह। गाने लगा दिए, अच्छे वाले, पसंद की प्लेलिस्ट। सुबह बहुत सुंदर थी। धुंध के पीछे छिपी हुयी। गाड़ी चलाते हुए ज़्यादा देख तो नहीं सकते, लेकिन फ़ील होता है आसपास सब कुछ ही। 

गाड़ी चलाते हुए रास्ते से कोई दो किलोमीटर ऑफ़ रूट एक दोस्त का घर पड़ता है। सोचती रही, कि उसके घर जाऊँ, कहूँ उससे कि एक कप चाय पीने का मन है। हम बनाते हैं, दोनों साथ बैठ के पिएँगे। इतनी सुबह उसका बेटा भी स्कूल चला जाता है और पति के ऑफ़िस जाने में टाइम होता है थोड़ा। एक चाय की फ़ुर्सत रहती है। एयरपोर्ट से आते हुए कई किलोमीटर ये सोचते हुए गाड़ी चलायी, कि उसके घर जाने का मन है। और ये सोच सोच के ख़ुश होती रही कि उसके घर जा सकती हूँ। 

गाने अच्छे थे। सुबह अच्छी थी। ट्रैफ़िक बमुश्किल था। अस्सी की स्पीड लिमिट में चलाती आयी आराम से पूरे रास्ते। 

घर आ के भी सोचे। हम सिर्फ़ किसी के होने के ख़याल से ख़ुश रहते हैं। किसी के होने में दख़ल नहीं देते। बस, इतना ख़याल कि उससे मिला जा सकता है मेरे शहर को सुंदर रखता है। कि इस शहर में एक दोस्त है ऐसी जिससे मिलने का मन करे तो मिलने जाया जा सकता है। 

चिट्ठियों का भी ऐसा ही है तो। एयरपोर्ट पर नया वाला लाल डिब्बा लगा है। पोस्ट्बाक्स। उसे देख कर सोचती रही, इस बार दिल्ली में तुम्हारे लिए किताब ख़रीदूँगी तो उसे वहीं से भेज दूँगी। हाँ इस बार चिट्ठियाँ नहीं पोस्टकार्ड लिखूँगी तुम्हें और तुम्हारे लिए भी कुछ पोस्टकार्ड भेज दूँगी, सादे पोस्टकार्ड। मुझे लगता है तुम्हें पोस्टकार्ड अच्छे लगेंगे। 

कल वो लाल डिब्बा देख कर उस चिट्ठी के बारे में सोचती रही जो तुम्हें लिखूँगी। पता है, मैं हमेशा पोस्ट्बाक्स देख कर चिट्ठी लिखने के बारे में सोचती हूँ। दुनिया के किसी भी देश, किसी भी शहर में रहूँ। तुम्हें चिट्ठियाँ लिखने के बारे में। मैं नहीं लिखती हूँ तुम्हें चिट्ठी। पर ये ख़याल कि मैं तुम्हें लिख सकती हूँ, इतना ही काफ़ी है मेरे लिए। 

कल दिल्ली। पुस्तक मेला। मेरा सालाना तीरथ। इस बार फिर से खोजूँगी। कविता की कोई ख़ुश, मीठी किताब। हिंदी की। 

ज़िंदगी जाने कैसे चल रही थी, ऑटमैटिक पर। इस साल सोचा है, ज़रा कंट्रोल अपने हाथ में लूँगी। मैन्यूअल ओवरराइड। ज़िंदगी ज़रा मेरे हिसाब से चलेगी। देखें। 

31 December, 2018

फ़ुट्नोट्स


उसने अलविदा कहना ईश्वर से सीखा था। उसने मेरी पलकें चूमीं और मेरी मुट्ठी में एक शब्द रखा, 'अचरज'। उसने कहा कि जब भी तुम किसी नए दृश्य, रंग, गंध या स्वाद को लेकर अचरज से भरोगी, तुम्हें मैं याद रहूँगा। जिस दिन तुम्हें दुनिया पुरानी लगने लगेगी, मैं बिसर जाऊँगा।












When it's time, there is beauty in letting go.
Goodbye 2018.

26 December, 2018

लम्हों ने ख़ता की थी

शब्दों में जीने वाले लोगों से ऐसी उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि वे ज़िम्मेदार रहें। बेवक़ूफ़ी और बचपना एक उम्र तक ही ठीक रहता है। फिर हमें चाहिए कि लिखने के पहले नहीं तो पब्लिश करने के पहले तो ज़रूर सोचें एक बार। कि हम किसी काल्पनिक दुनिया में तो रहते नहीं हैं। न ही वे लोग जो रैंडम ही हमारे लिखे में चले आते हैं।

लेकिन सोच समझ के लिखना हमसे हो नहीं पाता। सारे शब्द नापतोल कर लिखने पर भी कभी कभी कोई एक शब्द रह जाता है ऐसा बेसिरपैर का और चुभ जाता है तलवे में... या कि आँख में ही और दुखता है बेसबब। 

फिर हम कैसी अजीब बातें सुनते बड़े हुए हैं जैसे कि, 'एक ग़लती तो भगवान भी माफ़ कर देता है'। भगवान का तो पता नहीं, लेकिन ग़लतियाँ माफ़ करने के केस में अपना भी क़िस्सा थोड़ा बुरा ही है। हाँ ग़लतियाँ करने में शायद अच्छी ख़ासी केस हिस्ट्री निकल आएगी। पता नहीं कितनों का दिल दुखाया होगा। जान बूझ के नहीं...लेकिन फ़ितरतन। मतलब कि ऐसा कुछ कह देने, बोल देने का आदत है। बोलते भी उसी तरह हैं बिना कॉमा फ़ुल स्टॉप के, लिखते भी उसी तरह हैं। इतना कहने लिखने में कभी कभी हो जाता है शब्द का हेरफेर। 

हम लेकिन कभी कभी रेस्ट्रोसपेक्टिव में देखते हैं। यूँ भी साल के आख़िरी दिन कुछ ऐसे ही बीतते हैं। हिसाब किताब में। कितने लोग खो गए। कितने हमारी ग़लती से बिसर गए। फिर ज़िंदगी जब सज़ा देती है तो गुनाह को ठीक ठीक माप के थोड़े ना देती है। हाँ स्लेट कोरी रहती तो शिकायत भी करते, थोड़ी ग़लती तो है ही हमारी।

आज पहली बार लग रहा है कि लोग खो जाते हैं कि हमको वाक़ई बात कहने का सलीक़ा नहीं है। कितनी बड़ी विडम्बना है ये। लिखने में हम जितना ही सुंदर रच सकते हैं कुछ भी, रियल ज़िंदगी में उतने ही हिसाब के कच्चे हैं। रिश्ते निभाना नहीं आता। सहेजना नहीं आता। 

फिर लगता है। यूँ ही हम ख़ुद को विलगाते जा रहे हैं सबसे। अच्छा ही है। कभी कभी तो लगता है एक ज़रा भी क्यूँ टोकना किसी को। कहना किसी से कुछ भी। पहले इस दुनिया के थोड़े क़ायदे सीख लें। फिर सोचेंगे। वैसे रहते कहाँ हैं हम... साल का सात दिन का बुक फ़ेयर। बस। फिर तो फ़ोन कभी बजता नहीं। मेसेज हम ज़्यादा किसी को करते नहीं। कभी कभार। थोड़ा बहुत।

कैसी उदास सी फ़ीलिंग आ रही है ये लिखते हुए। कि मेरे होने से, मेरे लिखने से अगर किसी को दुःख पहुँचता है, तो हे ईश्वर... उससे ज़्यादा दुःख मेरी क़िस्मत में लिखना। 

अस्तु।

21 December, 2018

नींद की धूप में सोने के दिन हैं

A door, Paris
सुबह का गुनगुना सपना था। मैं नींद की धूप में सोती रही देर तक।

तुम्हारा गाँव था नदी किनारे। वहीं तुम्हारा बड़ा सा घर। धान के टीले लगे हुए थे। धूप में निकाली हुयी खटिया थी। फिर पता नहीं कैसे तो मेरे पापा तुम्हारे घर वालों को जानते थे। कितने खेत थे घर के आसपास। कोई त्योहार था। शायद सकरात या फिर रामनवमी। गाँव के एंट्री पर चिमकी वाला झंडी लगा हुआ फहरा रहा था हवा में फरफ़र।

घर पर सब लोग जब ऐडजस्ट हो गए। गपशप मारा जा रहा था। कहीं आग लहकाया हुआ था। गुड़ की गंध भी आ रही थी आँगन में। लड़ुआ बन रहा होगा। तिल, चूड़ा, मूर्ही। मिट्टी वाली दीवार थी,  हम बाहर आए तो तुमको देखे। तुम बैगी वाला स्वेटर पहने मोटरसाइकिल लेकर कहीं जा रहे थे। शायद मिठाई मिक्चर कुछ लाने को। ऐसा स्वेटर 90s में ख़ूब चला था। स्वेटर का रंग हल्का नारंगी लाल जैसा था। एक तरह का मिक्स ऊन आता था। उसी का। गोल गला, हाथ का बुना हुआ स्वेटर। लाल बॉर्डर का कलाई और गला। हम पीछे से जा के पूछे, हम भी चलें। तुम हँस के बोले हो, डरोगी नहीं तुम? फिर एकदम एक जगह से फ़ुल ट्विस्ट करके बाइक घुमाए हो। हम पीछे बैठे हैं तुम्हारे। पुरानी यामाहा बाइक है। ठंढा है बहुत। हवा

एकदम सनसना के लग रहा है। दायाँ गाल और आधा चेहरा तुम्हारी पीठ पर टिका हुआ है, माथा भी। आँख बंद है। ऊन का खुरदरापन और गरमी दोनों महसूस होता है गाल पे। तुम्हारा होना भी।

नहर किनारे पुआल का टाल बन रहा है। आधा हुआ है, आधा का काम शायद शाम को शुरू होगा। कोहरा है दूर दूर तक लेकिन अब थोड़ा धूप निकलना शुरू हुआ है। हम एकदम ठंडी हथेली सटाते हैं तुम्हारे गाल से। तुम एक मिनट ठहर कर मुझे देखते हो, मैं तुम्हें। हाथ पकड़ कर तुम मुझे थोड़ा पास लाते हो और गले लगाते हो। जाड़ों वाली फ़ीलिंग आती है तुम्हारे गले लग के। अलाव वाली। तुम कोई मौसम लगते हो। जाड़ों का। धीरे धीरे जैसे आँखें मुंदती हैं…जैसे रुकते हैं मौसम। कुछ महीनों तक।

***
मैं सोचती हूँ मेरे सपनों में तुम और गाँव दोनों अक्सर आते हैं। एक साथ ही। अक्सर नहर के पास वाली कोई जगह होती है। हम कहाँ रह गए हैं कि ऐसी छूटी हुयी जगह जाते हैं सपने में साथ। पता नहीं क्यूँ एक और बात भी याद आती है। कहीं पढ़ा था कि हम सपने में अगर किसी को देखते हैं तो इसका मतलब वो व्यक्ति हमारे बारे में सोच रहा होगा, या कि उसने भी सपने में हमें देखा होगा। इस थ्योरी के ख़िलाफ़ ये तर्क दिया जाता है कि उनका क्या जिन्होंने सपने में माधुरी दीक्षित को देखा है, माधुरी थोड़े ना उन्हें सपने में देख रही होगी। फिर मुझे याद आते हैं वे सपने जिनमें आए हुए लोगों की शक्ल मैंने पहले नहीं देखी थी। ये तो वे लोग हो सकते हैं ना? तो हो सकता है, माधुरी ने वाक़ई सपने में ऐसे लोग देखे हों जिन्हें उसने ज़िंदगी में कभी नहीं देखा, बस सपने में देखा है।

***
कभी कभी कुछ दुःख इतने गहरे होते हैं कि हम उनके इर्द गिर्द एक चहारदीवारी खींच देते हैं कि हम इन्हें किसी और दिन महसूस करेंगे। कि हमारा आज का नाज़ुक दिल इस तरह का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। कल तुमसे बात करना ऐसा ही था। हमारे बीच भी बात करने को चीज़ें ना हों। किसी अजनबी की तरह तुमसे बात करना तरतीब से मेरे टुकड़े कर रहा था। मैंने उस दोपहर को ही अपने ख्याल से परे रख दिया है। मैं सोच ही नहीं सकती इस तरह से तुम्हारे बारे में।

किसी रोज़ इत्मीनान से सोचूँगी कि हमारे बीच ऐसे पूरे पूरे महाद्वीप कब उठ खड़े हुए। मेरे तुम्हारे शहर इतने दूर कैसे हो गए। कि तुम्हारी हँसी के रंग का आसमान देखने के लिए कितनी स्याह रातें दुखती आँखें काटेंगी। कि तुमसे प्यार करना दुःख कब से देने लगा। कि हम प्रेम में बैराग लाना चाह रहे हैं। ख़ुद को बचाए रखना, इतना ज़रूरी कब से हो गया।

एक दिन तुम बिसर जाओगे। पर तब तक जो ये ठंढ का मौसम तुम्हारी आवाज़ में उतर आता है। मैं इस मौसम में ठिठुर के मर जाऊँगी।

17 December, 2018

लौट आते चूम कर, दरगाह की चौखट, और शहज़ादे की स्याह उँगलियाँ।

ये बहुत साल पहले की बात है। ज़िंदा शब्दों के जादू और तिलिस्म में पहली बार गिरफ़्तार होने के समय की। इसके पहले हमने बेजान काग़ज़ पर छपे क़िस्से पढ़े थे। फिर भी ऐसा कभी ना हुआ था कि किसी लेखक से प्रेम हो जाए। कोई बहुत अच्छा लगा भी कभी तो ज़िंदगी से बहुत दूर जा चुका होता था।

उन दिनों हमारी दुनिया ही नयी नयी थी। बहुत सारा कुछ पढ़ना लिखना जारी था। लाइब्रेरी में कई तल्ले थे और इश्क़, दोस्ती और आवारगी के बाद भी हमारे पास पढ़ने के लिए बहुत वक़्त बच जाता था। मुझे जब पहली बार उन शब्दों से इश्क़ हुआ तो उनका कोई चेहरा नहीं था। यूँ भी वे शब्द ऐसे मायावी थे कि पढ़ते हुए लगता कि मैंने ही लिखे हैं। दोस्तों में बड़ी सरगर्मी थी। सब जानना चाहते थे इन शब्दों को लिखने वाले के हाथ कैसे हैं। उसका चेहरा कैसा, हँसी कैसी और उसकी उदासियाँ किस रंग की हैं। मैंने कभी नहीं जानने की कोशिश की। मेरे लिए वो काला जादू था। रात के स्याह अंधेरे से मेरे ही रूह के काले क़िस्से लिखता हुआ। वो मेरा अपना था कि उसका कोई चेहरा नहीं था। 

एक दूर से खींची हुयी तस्वीर थी जिसमें उसका चेहरा नहीं दिखता था। फिर एक रोज़ बड़ा हंगामा हुआ कि बात होते होते मुझ तक पहुँची कि किसी ने शब्दों के पीछे का चेहरा देखा है। उसने कहा मुझसे कि ये तिलिस्म रचने वाला कोई अय्यार नहीं, हमारे जैसा कोई शख़्स है। मैंने उस रोज़ नहीं माना कि वो हमारे जैसा कोई है। उसकी तस्वीर देखी। अच्छा लगा। वो भी अच्छा लगा, उसकी तस्वीर भी। फिर दिन, महीने, साल बीतते रहे, उसकी कई तस्वीरें आयीं। मैंने कई बार देखा मगर ख़्वाहिश बाक़ी रही कि उसकी एक तस्वीर मैं उतार सकूँ कभी। 

उससे पहली बार मिली तो उसके हाथों की तस्वीर उतारी। वो कुछ लिख रहा था। उसके हाथ में हरे रंग की क़लम थी। उसकी उँगलियाँ लम्बी, पतली, साँवली थीं। वो ख़ुद, क़यामत था। उसे देख कर वाक़ई मर जाने को जी चाहता था। मैंने जो पहली तस्वीरें उतारीं उनमें वो इतना ख़ूबसूरत था जितने उसके रचे गए किरदार। इतनी ख़ूबसूरत तस्वीरें कि डिलीट कर दीं। उन्हें देख कर ऐसा लगता था, तस्वीर खींचने वाली उस शब्दों के शहज़ादे से इश्क़ करती है। 

यूँ तो मेरे लिए ज़िंदा चीज़ों की तस्वीर खींचना मुश्किल है। इंसानों की तो और भी ज़्यादा। उसके ऊपर कोई ऐसा जिसके शब्दों के तिलिस्म में आपने सालों बिताए हों… नामुमकिन सा ही कुछ। कैमरा से देखती तो भूल जाने का मन करता कि क्लिक करना है। उसे देखते रहने का मन करता। देर तक धूप में। कोहरे में। उसपर सफ़ेद कुछ ज़्यादा खिलता। कोरे पन्ने जैसा। वो सफ़ेद पहनता तो गुनाह करने को जी चाहता। दरगाह में स्त्रियों को अंदर जाने की इजाज़त नहीं। हम दरगाह की चौखट चूम कर लौट आते और शहज़ादे की स्याह उँगलियाँ। हमारी ज़ुबान पर उनका नाम होता। 

वो रूह है। उसे तस्वीर में क़ैद करना मुश्किल है। बहुत साल पहले मैं सिर्फ़ फ़ोटो खींचना चाहती थी। मुझे लगता था रोशनी सही हुयी तो फ़्रेम में कैप्चर हो जाएँगी उसकी स्याह उँगलियाँ... उसकी पसंद की क़लम... उसके शहर का मौसम। लेकिन कैमरा में इतनी जान नहीं कि ज़िंदा रख सके तस्वीरों को। फिर जब ऐसी ख़्वाहिशें होती थीं तो Monet और पिकासो की पेंटिंग्स कहाँ देखी थीं। ना जैक्सन पौलक को जानती थी कि समझ पाऊँ, रूह को पेंटिंग में कैप्चर किया जाता है। पौलक को पहली बार देखा था तो वो अपनी एक पेंटिंग के सामने खड़ा था। उसने जींस पहन रखी थी जिसकी पीछे वाली जेब में एक हथौड़ी थी। उसकी पेंटिंग्स में कहीं कहीं सिगरेट के टुकड़े भी हैं। खोजने से मिलते हैं। बहुत ज़िंदा होती है उसकी पेंटिंग। एकदम तुम्हारे शब्दों जैसी। छुओ तो आज भी आत्मा को दुःख होता है। 

मैं उसकी पेंटिंग बनाना चाहती हूँ अब। एक लकड़ी की नक्काशीदार मेज़ हो। किनारे पर सफ़ेद इन्ले वर्क। खिड़की के पास रखी हो और खिड़की के बाहर धूप हो। वो मेज़ पर बैठ कर काग़ज़ पर कुछ लिख रहा हो। दाएँ हाथ में क़लम और ऊँगली में फ़िरोज़ी स्याही लगी हो कि क़लम मेरी है। उसे किसी भी क़लम से फ़र्क़ नहीं पड़ता। बाएँ हाथ में सिगरेट, धुँधलाता हुआ काग़ज़ का पन्ना। मैं चाहती हूँ कि एक ही पेंटिंग में आ जाए उसका सफ़ेद कुर्ता, उसका स्याह दिल, उसके रेत के शहर, उसके सपनों का समंदर, उसकी कहानियों वाली प्रेमिकाएँ भी। 

इस चाह में और कुछ नहीं, बात इतनी सी है। किसी ख़ूबसूरत शहर का स्टूडीओ हो जिसमें अच्छी धूप आए। जितनी देर भर में उसकी पेंटिंग बने, वो मेरी नज़रों के सामने रहे। मेरा रहे। बस। शब्दों से तिलिस्म रचने वाले को रंगों में रख सकूँ, ये ख़याल कितना विम्ज़िकल है...सोचना भी जैसे मुश्किल हो। 'वे दिन' में उसका एक शब्द है पसंदीदा, 'विविड'। वैसी ही कोई विविड पेंटिंग हो। उसके हाथ देखो तो कविता लिखने को जी चाहे। या कि प्रेम पत्र लिखने को। 

और काग़ज़ कोरा छोड़, देर रात अपनी कलाइयाँ सूँघते हुए, उसके नाम के अत्तर को याद करने को भी तो। वो जो छूने में ख़्वाब जैसा हो, उसके जैसा, कोई, वहम। 

16 December, 2018

छोटे सुखों का रोज़नामचा

कभी कभी जो चीज़ें हमसे खो जाती हैं, हम नहीं जानते कि उनके खोने में कौन सी बात हमें सबसे ज़्यादा परेशान कर रही है। कि उसके किस हिस्से को सबसे ज़्यादा याद कर रहे हैं। फिर जब वो चीज़ वापस मिल जाती है तो हमारा ध्यान जाता है कि ‘अरे, अच्छा, इसलिए इसकी ज़रूरत थी’।

इधर कुछ महीनों से कुछ न कुछ कारण से स्कूटी या मोटरसाइकल, दोनों नहीं चला पा रही हूँ। कुछ दिन हम टूटे-फूटे थे, हम ठीक हुए तो गाड़ियाँ दोनों मुँह फुला कर बैठ गयीं। स्कूटी तो कुछ ज़्यादा ही दुलरुआ है, उसपर जब से एनफ़ील्ड आयी है बेचारी का डीमोशन हो गया है, कि उसको बाइक नहीं कहती, स्कूटी कहती हूँ। तो, आज फिर से स्कूटी ठीक करवायी। रात आठ बजे के आसपास वापस मिली। बहुत दिन हो गए थे तेज़ रफ़्तार चलाए हुए। जब बाइक पर उड़ते हुए जा रही थी तो याद आया कि किस चीज़ की याद आ रही थी ज़्यादा। बाइक चलाते हुए हवा की आवाज़ होती है, साँय साँय कानों में चीख़ती है। सिर्फ़ तेज़ चलाने से ऐसी आवाज़ आती है। ये आवाज़ बहुत दिन बाद सुनी। और एकदम। उफ़। यहाँ घर के पास एक बड़ा सा तालाब या झील जो कहिए है…फ़िलहाल वहाँ बहुत कचरा है, बैंगलोर के बाक़ी सभी झीलों की तरह लेकिन उसकी साफ़ सफ़ाई चल रही है। उसके इर्द गिर्द की सड़क एकदम ख़ाली रहती है और बहुत तेज़ हवा भी चलती है उस तरफ़ से।

शाम को चाय पीने के लिए और थोड़ा सा और स्कूटी चलाने के लिए यहाँ पसंद का एक रेस्ट्रॉंट है, वहाँ गयी। मुझे वहाँ की निम्बू की चाय बहुत पसंद है। गयी तो थोड़ी भूख लगी थी, सो एक प्लेन दोसा का भी ऑर्डर दे दिया। मेरी आदत है कि अगर खाना ऑर्डर किया है तो पहले खा लेती हूँ, फिर निम्बू की चाय का ऑर्डर देती हूँ। तो आज निम्बू की चाय एकदम कमाल की आयी थी। मुझे जब चाय बहुत ज़्यादा पसंद आती है तो मैं चश्मा उतार के चाय पीती हूँ। एक सिप के बाद की धुँधली पड़ी दुनिया अच्छी लगने लगती है। (literally, not figuratively). कोई शार्प एज नहीं, सब कुछ आउट औफ़ फ़ोकस। फिर लगता नहीं है कि सामने मेज़ पर पड़ी चाय के सिवा और कुछ देखने की ज़रूरत भी है। हम चश्मा उतार कर रख देते हैं। दुनिया पहले दिखनी बंद होती है और फिर पूरी तरह गुम जाती है। बस चाय होती है हक़ीक़त। एक कप गर्म। सुनहली। निम्बू की चाय। मैं छोटे छोटे सिप लेती हूँ। अक्सर आँख बंद कर के। डूब जाती हूँ एक छोटे से चाय के काँच ग्लास में। चाय ख़त्म होती है। चश्मा वापस पहनती हूँ और दुनिया अपने पूरे तीख़ेपन के साथ दिखने लगती है। मैं इंतज़ार करती हूँ ऐसी चाय का…जिसके पीने भर तक दुनिया गुमी हुयी रह सके…

फिर मुझे लगता है। दुनिया का क्या है। एक गिलसी चाय में मोला लें हम।

 वहाँ अकेले खाते हुए और फिर बाद में चाय पीते हुए भी In the mood for love के किरदार की याद आयी, मिसेज़ चान की। लंच बॉक्स लेकर संकरी सीढ़ियों से गुज़रने के दृश्य का इतना कलात्मक प्रयोग है फ़िल्म में कि उफ़! उसे अकेले के लिए खाना बनाना पसंद नहीं था। मुझे घर में अकेले खाना खाना नहीं पसंद है। ख़ास तौर से डिनर। बाहर किसी जगह अकेली कैसे खाना पसंद है, मालूम नहीं। ऐसे सेल्फ़ सर्विस वाले रेस्ट्रॉंट जहाँ ठीक ठाक भीड़ हो, मुझे अच्छे लगते हैं। ये वोंग कार वाई की मेरी सारी पसंदीदा फ़िल्मों में कहीं ना कहीं दिखते हैं।

तृश कहता था कि वो सिर्फ़ उनके साथ खाना खाता है जो लोग उसे बहुत पसंद हों। मैंने तब तक इस बात पर ग़ौर नहीं किया था, लेकिन मैं भी ऐसा ही करती आयी थी। ऐसे किसी रेस्ट्रॉंट में लोगों को देख कर कहानी दोतरफ़ा सोचती रहती हूँ। सोचती हूँ वो पर्ची काटने वाला मेरे बारे में क्या सोचता होगा। अक्सर रात को मैं गयी हूँ वहाँ और कमोबेश एक ही ऑर्डर होता है। दोसा और चाय। ये फ़ैमिली रेस्ट्रॉंट है और अधिकतर लोग यहाँ परिवार के साथ खाने को आए होते हैं। मेरे पास अक्सर एक नोट्बुक रहती है। जब तक खाना तैय्यार होता है मैं कुछ स्केच कर रही होती हूँ या लिख रही होती हूँ। मुझे इतनी भीड़भाड़ में लिखना अच्छा लगता है।

मुझे अपनी रैंडमनेस अच्छी लगती है। ये जो थोड़ा जो मन में आया, सो करती हूँ। वो।

दिल्ली में पहली बार जब अकेले घूमना शुरू किया था तो बहुत जगह अकेले खाना खाया। स्कूल और कॉलेज में भी टिफ़िन अकेले करने की आदत रही, हमेशा कुछ पढ़ते हुए। मैं सोच रही थी कि जान पहचान की जितनी औरतों को जानती हूँ, उनमें से कोई होगी जो पति के शहर से बाहर जाने पर इस तरह किसी जगह बाहर डिनर करें, अकेली। फिर मुझे अपने जैसे लोगों की याद आयी। मेरी अपनी दोस्तों की। कॉलेज के टाइम की।

कई सारी जगहें याद आयीं। क्रैको का टाउनस्क्वेयर - राइनेक ग्लोनी … वहाँ की धूप में बैठे हुए अक्सर पेस्तो पास्ता और पीच आइस टी ऑर्डर करती थी। आसमान में एकदम नीले बादल रहते थे उन दिनों। स्विट्सर्लंड घूमते हुए तो सिर्फ़ चोक्लेट खाती थी या फिर कोई तरह की पेस्ट्री। बैठ के अकेले, इत्मीनान से खाना खाना पहली बार पोलैंड से शुरू किया। डैलस में ट्रेन स्टेशन के पास एक मेक्सिकन जगह थी। वहाँ मैं टोरतिया खाती थी। कभी कभी म्यूज़ीयम में भी खाना खाया है, वो भी अच्छा लगा है।

लौट कर घर आयी तो बहुत एनर्जेटिक फ़ील कर रही थी। इतनी एनर्जी मुझे बौरा देती है। आजकल अमेजन प्राइम म्यूज़िक पर गाने सुन रही हूँ, तो उसी में कोई डान्स मिक्स लगा दिया और जी भर डान्स किया। पसीने पसीने होने के बाद थोड़ी राहत मिली। सोफ़े पर आ के उलट गए। आराम से। बोस के स्पीकर से फ़ोन कनेक्ट कर दिया था। जैज़ सुन रही थी। हल्की ठंढ थी हवा में। शाम में ऊनी स्टोल निकाला था उसी को ओढ़ लिया थोड़ा सा। ख़ाली घर में बजता हुआ जैज़ जादुई लगता है। सोफ़े पर ऐसे पसर जाना भी। शाम से देर रात तक बस यही किया। सोफ़े पर पड़े पड़े जैज़ सुनती रही। फिर थोड़ी भूख लगी तो दूध में दालचीनी डाल के खौला लिए और थोड़ा केक के टुकड़े निकाल लिए। टेबल पर रखी तो इतना ख़ूबसूरत कॉम्पज़िशन था कि तस्वीर उतारे बिना रहा नहीं गया।

छोटी छोटी चीज़ें ज़िंदगी को सुंदर बनाती हैं। जीने लायक़। हम अपनी उदासी परे रख दें तो पाएँगे कि जाते मौसम के कुछ आख़िरी गिरे हुए फूल भी हवा में ख़ुश्बू छोड़ जाते हैं। हाँ, उदासी पर ध्यान दें तो कुछ भी सुंदर महसूस नहीं होगा।



ज़िंदगी में बड़े बड़े दुःख हैं और यही, इतने से छोटे छोटे सुख। लेकिन फिर भी। ज़िंदगी हसीन है।

15 December, 2018

पानी पानी रे...

मुझे बेहद अजीब चीज़ों का शौक़ है। और एकदम अजीब से, पर्सनल भय हैं, सामाजिक भयों से इतर। कुछ भय सामाजिक होते हैं। जैसे अंधेरे में बाहर जाने का भय। चोर, लुटेरे, डाकुओं का भय। युद्ध या दंगे होने का भय।

बैंगलोर का मौसम सालों भर थोड़ा ठंडा ही रहता है, इसलिए हल्के गर्म पानी से नहाने की आदत पड़ गयी है। जब तक कि मौसम एकदम गर्म ना हो, ठंडे पानी से नहीं नहा सकती। 

पिछले वाले घर में बड़ा गीज़र था जो गर्म पानी को स्टोर करके भी रखता था। इस वाले घर में धूप से पानी गर्म करने वाला गीज़र है, सोलर पावर वाला, जो पता नहीं कितना पानी गर्म रखता है। जब से आयी हूँ, कमोबेश बीमार ही रही हूँ। ज़्यादा देर खड़े होने में दिक्कत रही है इसलिये शॉवर लेना शुरू किया। पर आदत बाल्टी और मग से नहाने की है तो शॉवर लेकर अक्सर संतोष नहीं होता। विदेश जाती हूँ तो जैसे नहा के दिल ही नहीं भरता भले ही आधा घंटा शॉवर में नहा लो। 

गाँव में कुआँ था और देवघर में भी। हम लोग जब छोटे थे तो कुआँ पर ही नहाया करते थे। पूरा एक बाल्टी पानी माथे पर ऊझलने का ग़ज़ब ही मज़ा है। गाँव में तो अब भी टंकी और मोटर नहीं है, तो जब जाते हैं, कुआँ पर ही नहाते हैं। दुमका में थे बचपन में। उन दिनों घर से थोड़ा दूर चापाकल था। सब बच्चे लोग वहीं नहाते थे। घर में हौद में पानी स्टोर होता था। मुझे वो हौद बहुत विशाल लगती थी उन दिनों में। पटना में सप्लाई का पानी दो टाइम आता था और बड़े बड़े ड्रम में स्टोर करके रखते थे। उस समय या तो पानी आते समय नहा लिए, वरना स्टोर किए पाने से नहाना पड़ता था जो मुझे एकदम ही पसंद नहीं था। 

हमारे देवघर वाले घर में दो तल्ले थे। जब ख़ूब बारिश होती थी और छत का पानी दूसरे तल्ले से गिरता था, उस धार में नहाने का मज़ा मैं आज भी नहीं भूल पाती हूँ। वो हमारा पहला झरने का अनुभव था। बचपन में बहुत सी चीज़ें अलाउड होती हैं। ख़ूब ही नहाते थे हम लोग। ख़ास तौर से बहुत ज़्यादा वाली गरमी के बाद जब बारिश आती थी तो अपनाप में त्योहार होती थी।

दुनिया में जितने समंदर देखे हैं, पट्टाया का समंदर सबसे अलग था। उसका पानी गुनगुना था। मैंने कभी समंदर का पानी गर्म नहीं देखा था। वो कमाल का अनुभव था। कोरल आयलंड था और उसके इर्दगिर्द पानी। मन ही नहीं करता था पानी से निकलने का। ऐसे ही जब सन फ़्रैन्सिस्को गयी तो समंदर देखा। ठंढ थी और कोई समंदर में जाने को तैयार ही नहीं। और हम कि ऐसा तो हो नहीं सकता कि समंदर किनारे आए हैं और पानी में पैर ना डालें। वहाँ समंदर का पानी बर्फ़ीला था, धारदार जैसे। लगा पैर कट जाएँगे ठंडे पानी से... वो भी पहला अनुभव था कि समंदर का पानी इतना ठंडा भी हो सकता है। 

मुझे पानी बहुत पसंद है। नदी, समंदर, झरना, बाथ टब, स्विमिंग पूल। कहीं का भी पानी। पटना में सप्लाई का पानी होने के कारण ये डर होता था कि नहाने की लाइन में अगर आख़िर में गए हैं, जब कि पानी के जाने का टाइम हो गया है तो पानी चला जाएगा। वो मुझे बहुत ख़राब लगता था। बहुत, अब तक भी। गर्म पानी ख़त्म हो जाता है तो ऐसे ही बुरा लगता है।

कि पानी आते रहना चाहिए जब तक कि आत्मा तक धुल के साफ़ ना हो जाए। यूँ हमारी आत्मा साफ़ सफ़ेद ही रहती है। लेकिन कभी कभी लगता है कितनी स्याही लग रखी है। फिर हम देर तक रगड़ रगड़ के बदन से स्याह धुलते रहते हैं कि आत्मा साफ़ हो। लेकिन कमबख़्त उँगलियों के पोर कभी साफ़ सफ़ेद होते ही नहीं। हमेशा फ़िरोज़ी। हमेशा।

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