11 May, 2018

फिर कभी…

यातना शिविर के नाज़ी गार्ड पागल हो रहे थे। हवा की सुगबुगाहट पर जैसे कोई उम्मीद की धुन उड़ती आ रही थी। ‘ज़दीकिम निस्तारिम…ज़दीकिम निस्तारिम’। एक लोककथा ये थी कि जब तक इस दुनिया में ३६ भले लोग बचे रहेंगे, चाहे बाक़ी दुनिया कितनी भी बर्बर और क्रूर हो जाए, ईश्वर इस दुनिया को ख़त्म नहीं करेगा। छत्तीस लोगों की अच्छाई इस दुनिया को बचाए रक्खेगी। दो हफ़्ते पहले की घटना थी, एक क़ैदी फ़रार हो गया था और नियम के अनुसार उसके बंकर के दस लोगों को भूखा मार देने के लिए सेल में भेजा जाना था। दस चुने हुए लोगों में एक रोने और चीख़ने लगा, ‘मेरे बीवी बच्चों का क्या होगा’। उसी बंकर में एक पादरी भी था, वो पादरी आगे आया और उसने अफ़सर से कहा, उसकी जगह मैं मरना चाहता हूँ। अफ़सर ने इस अदला बदली की इजाज़त दे दी।

दो हफ़्ते में बाक़ी ९ लोग तो मर गए थे लेकिन पादरी अभी भी जीवित था। आख़िर ज़हरीला इंजेक्शन देना पड़ा ताकि वो मर सके और उसी कालकोठरी में किसी और क़ैदी को डाला जा सके। जब से पादरी के मृत होने की ख़बर यातना शिविर में फैली थी, क़ैदी लोक कथा ‘ज़दीकिम’ की बात करने लगे थे। जिन लोगों के होने से दुनिया बची रहेगी। ये फुसफुसाहट हर ओर सुनायी देने लगी थी। नींद में, भूखे मरते लोगों के आख़िरी शब्दों में, चीख़ में, चुप्पी में। कुछ ऐसा करना ज़रूरी हो गया था कि क़ैदी चुपचाप मर जाया करें। रोज़ रोज़ लोगों को गोली मारते मारते फ़ाइअरिंग स्क्वॉड भी थक रही थी। नए तरीक़े इजाद करना ज़रूरी था।

अपना मन लगाए रखने के लिए भी ज़रूरी था कोई नया कौतुक शुरू हो। दो एसएस गार्ड्ज़ में शर्त लग गयी कि क्या एक गोली से दो लोगों को मारा जा सकता है। सुबह के नाश्ते के पहले रोल-कॉल के लिए क़ैदी लाइन में लगे हुए थे। गार्ड्ज़ ने पब्लिक अनाउनसेमेंट सिस्टम पर क़िस्सा सुनाया, ‘बात सुनने में आ रही इसी श्रम शिविर में ज़दीकिम निस्तारिम हैं - छुपे हुए भले लोग - इसलिए हम उन्हें बाहर निकालेंगे - देखते हैं दुनिया कब तक बचाए रखते हैं भले लोग’। यहूदी पवित्र संख्या ३० और ६ वाले दो क़ैदी तलाशे गए। यहीं पास में वो ख़ूनी दीवार थी जिसकी ओर मुँह कर के क़ैदियों को गोली मारी जाती थी।

एक कमसिन पोलिश लड़की और एक युवा पोलिश लड़का एक दूसरे के आमने सामने खड़े थे। वे अपना नाम तो कई दिनों पहले भूल चुके थे। उनकी पहचान अब उनकी कलाई में बने टैटू वाली संख्या ही थी। मरने के पहले वे ठीक एक दूसरे के सामने खड़े थे।

लड़का इस शिविर में आने के पहले एक छोटे से स्कूल में संगीत सिखाया करता था। एक पहाड़ी पर उसका छोटा सा गाँव था जहाँ पाँच भाई बहनों वाला उनका ख़ुशहाल परिवार रहता था। उसके पिता दूर के शहर में एक बैंक में काम करते थे और हर इतवार घर आया करते थे। उसे कैम्प में आए कितने दिन हुए थे उसे याद नहीं। बहुत पहले की धुँधली याद में उसने पूरा चाँद देखा था, लेकिन वो इसलिए कि उस दिन ऊँचे वाले बिस्तर के क़ैदी की मौत हो गयी थी और वो ऊपर वाले बिस्तर पर सोने चला गया था। निचले बिस्तर पर पानी का जमाव रहता था और माँसाहारी चूहे काट खाते थे। ऊपर वाले बिस्तर से छत पर का छेद दिखता था जिससे बर्फ़ गिरती थी। जिस पहली रात वो ऊपर के बिस्तर पर गया था, भूख के कारण उसे नींद नहीं आ रही थी और थकान के कारण उसका बदन टूट रहा था। उसी समय उसने देखा कि छत पर के छेद के पीछे पूरा गोल चाँद है। बहुत समय तो उसे चाँद को पहचानने में लग गया। इन दिनों उसे हर चीज़ सिर्फ़ खाने के लिए चाहिए होती थी लेकिन किसी तरह वो चाँद को पहचान गया। उस दिन बहुत दिन बाद उसने एक लोकगीत के बारे में सोचा।

लड़की चार भाइयों के बाद मन्नतों से माँगी हुयी इकलौती बहन थी। माँ पिता की आँखों का तारा। नीली आँखों वाली लड़की। नदी किनारे शहर में रहती थी। बहुत ऊँचे क़िले के पास छोटा सा घर था उनका। माँ नर्स थी और पिता चमड़े के कारख़ाने में काम करते थे। उसके भाई बहुत पढ़े-लिखे और समाज में सम्मानित व्यक्ति थे। उसका सबसे बड़ा भाई तो विदेश के कॉलेज में वक्तव्यों के लिए बुलाया भी जाता था। उससे ठीक बड़ा भाई एक हीरों के व्यापारी के यहाँ काम करता था। कहते थे उसके हाथ में बहुत हुनर था। लेकिन एक वक़्त पर इन सारी चीज़ों पर उनका धर्म भारी पड़ गया। जब उनके पूरे परिवार को ट्रेनों में भर कर कैम्प भेजा जा रहा था, ठीक उसी वक़्त ट्रेन स्टेशन से दौड़ता हुआ उसका बड़ा भाई लौटा था। उसे वहीं गोली मार दी गयी थी उसकी पत्नी और बच्चे के साथ। लड़की उसी समय भूल गयी थी कि उसने अपने हीरे के झुमके कहाँ रखे हैं। वो चाहती थी कि भूल जाए कि उसे अंधेरी कोठरी से रौशनी में क्यूँ लाया जाता था। कि दिन भर बाक़ी क़ैदियों के साथ काम करने के बाद वो बाक़ी औरतों की तरह सो क्यूँ नहीं सकती थी। कि गार्ड्ज़ सिर्फ़ बलात्कार नहीं करना चाहते थे, वे उसकी चीख़ भी सुनना चाहते थे। कि जिस रात उसने चीख़ना बंद करने की कोशिश की वो पहली रात थी जब वो बेहोश हो गयी थी और मालूम नहीं कितनी देर बाद होश में आयी थी। कि वो दिन भर एक शब्द नहीं कहती थी ताकि रात को चीख़ने के लिए अपनी आवाज़ और अपनी ऊर्जा बचा के रख सके। उसे गूँगे हो जाने का डर सताता था।

उन्होंने एक दूसरे की आँखों में देखा। उन्हें बात करने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। वे एक दूसरे को सुन सकते थे, पढ़ सकते थे। मृत्यु के पहले सारी इंद्रियाँ बहुत तेज़ हो जाती हैं।

‘ओह, इसकी आँखें कितनी नीली हैं। मुझे याद नहीं मैंने आख़िरी बार आसमान कब देखा था।’
‘ओह, इसकी आँखों में इतना ख़ालीपन क्यूँ है। कोई तो दुःख होना चाहिए था। क्या इस लड़के ने कभी प्रेम नहीं किया’

‘इसके माथे पर ये नीला निशान क्यूँ है? क्या किसी ने इसका सिर दीवार पर दे मारा था?’
‘इसके होंठ कैसे नीले पड़ गए हैं। ये ज़रूर अपनी बैरक में ऊपर वाले बिस्तर पर सोता है। क्या इसके बिस्तर के ऊपर भी कोई सुराख़ है। क्या कल पूरी रात की बर्फ़बारी में उसके बदन पर बर्फ़ गिरी है?’  

‘इसकी आँखों में रौशनी टिमटिम करती है। काश मैं एक बार इसे अपना उकेलेले सुना पाता। जब बहुत तेज़ तेज़ नाचती तो इसके गाल कितने दहकने लगते और आँखों में एक गर्माहट का गोला घूमने लगता।’
‘अगर ये मुझे पिछले साल मेले में मिला होता तो मैं उस बेवक़ूफ़ टिम की जगह इसे चूम रही होती। शायद अब तक हमारी शादी हो चुकी होती। [लड़की की आँखें पनियाती हुयीं] ओह, नहीं…हमारे बच्चे को नाज़ियों ने मार दिया होता। और इस समय इसकी आँखें सुख में होतीं।

‘ये लड़की क्यूँ रो रही है। क्या उसे मौत से डर लग रहा है? क्या इसे अपने किसी पूर्व प्रेमी की याद आ रही है? क्या कोई उम्मीद है इसकी ज़िंदगी में, जिसके लिए इसका थोड़ा और जीने का मन है?’
‘मेरी आँखों में आँसू देख कर लड़के की आँखें थोड़ी कोमल हो आयी हैं। इसे मेरे मरने की चिंता हो रही है क्या?’

‘क्या इस लड़की को स्ट्रॉबेरीज़ पसंद होंगी? काश मैं इसे अपनी नानी के बग़ीचे वाली स्ट्रॉबेरीज़ खिला पाता। उनसे मीठी स्ट्रॉबेरीज़ दुनिया में कहीं नहीं होती हैं। हम दोनों नानी की आँख बचा कर चुपचाप बग़ीचे में घुस जाते और लड़की की फ़्रॉक में हम ख़ूब से स्ट्रॉबेरीज़ तोड़ लाते और बाद में क्रीम के साथ खाते’।
‘मैं इस लड़के के लिए ख़ूब गहरे नीले रंग का ऊन का मफ़लर बनाती। करोशिये का उतना सुंदर काम गाँव भर की किसी लड़की के बस का नहीं था। लड़का अपने गले में मफ़लर डालता और मेरे हाथ चूम लेता। उसके दोस्तों की गर्लफ़्रेंड्ज़ मुझसे सीखना चाहतीं कि कैसे बनाते हैं इतना सुंदर मफ़लर। मैं ढिठाई से हँसती और कहती, “प्रेम से” ’

‘माँ मुझे इस लड़की से शादी करने के लिए तुरंत हाँ कह देती। माँ को नीले रंग की आँखों वाली लड़कियाँ कितनी पसंद हैं’
‘मुझे ऐसा क्यूँ लगता है कि इस लड़के की आँखों में कोई धुन बह रही है। क्या इसे कोई वाद्ययंत्र बजाना आता है? मेरे भाइयों को एक उकेलेले बजाने वाले की कितनी ज़रूरत थी। अगर ये उकेलेले बजाता तो मेरे भाइयों के साथ मेले में जा सकता था। मैं इनकी धुनों पर कितना ख़ुश होकर नाचती’।

‘मैं इस लड़की के साथ वसंत देखना चाहता हूँ. कौन से फूल पसंद होंगे इसे। जब इसके बाल लम्बे होंगे तो मैं उनमें फूल गूँथ दूँगा’
‘क्या इस लड़के को चेरी वोदका पसंद होगी? गरमी के दिनों में हम कभी कभी स्कूल से भाग कर विस्तुला में नहाने चले जाते और फिर गर्म घास पर लेटे हुए एक दूसरे को चूमते और चेरी वोदका पीते। दीदियाँ कहती हैं वोदका पीने के बाद चूमने का स्वाद अलौकिक होता है’

‘जीवन में पहली बार प्रेम हुआ और वो भी इतने कम वक़्त के लिए’
‘प्रेम जीवन के आख़िरी लम्हे तक रहा। ये बुरा तो नहीं’

‘शादी के तोहफ़े में दादी इसे अपनी सबसे पसंदीदा नीले हीरों का झुमका देती। बचपन से हम सब भाई बहन लड़ते रहे कि दादी वो किसे देगी’
‘धूप वाली खिड़की में बैठ कर माँ मेरे लिए शादी का जोड़ा बना रही होती। उसके गले से कितना मीठा लोकगीत फूटता है। मैं बैठे बैठे रोने लगती तो मेरे भाई मेरी चोटियाँ खींचते और इस लड़के को भद्दी गालियाँ दे देकर चिढ़ाते, मैं उन्हें मारने के लिए उनके पीछे पीछे कितना दौड़ती’

‘अगर मेरी कोई बेटी हो तो एकदम इस लड़की जैसी हो, ऐसी नीली आँखों वाली’
‘__ ___ __ __ __ __’ [लड़की चुप रही। अजन्मे बच्चे का नाम सोच रही थी शायद]

[सैनिक अब आपस में बहस कर रहे थे कि बंदूक़ की नली किसके सर पर रखी जाए और दोनों को एक ही गोली से मारने के लिए बेहतर क्या होगा, वे एक दूसरे के सामने खड़े रहें, अग़ल-बग़ल खड़े रहें, या पीठ से पीठ टिका कर]

“__ __ __ __ __ __ __ __” [लड़के के देखने में चुप्पी थी। जैसे उसके सोचने में भी शब्द ख़त्म हो गए हों। वो बस चाहता था कि सैनिक जल्दी गोली चलाएँ और वह मर जाए। अब सोचना थका देने वाला था। दुखा देने वाला भी]
‘चाहे मैं मर जाऊँ। पर काश ये लड़का बच जाए। दुआ में ज़्यादा वक़्त कहाँ माँग सकती हूँ। लेकिन काश कि मुझे इसका मृत शरीर ना देखना पड़े। भले ही मुझसे एक लम्हा ज़्यादा जी सके।’

‘मैं इस लड़की को मरा हुआ नहीं देख सकता हूँ। अगर मैं अभी विद्रोह कर दूँ तो क्या सैनिक मुझे गोली मार देंगे? लेकिन ऐसा तो नहीं कि वे फिर इस खेल की जगह कोई और मनोरंजन तलाशने लगें? अगर उन्हें मेरी आँखों में इस लड़की के प्रति प्रेम दिख गया तो वे मेरी आँखों के सामने इसका बलात्कार करेंगे। बार बार। और बहुत तड़पा के मारेंगे मुझे। नहीं नहीं। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं आना चाहिए’।

[लड़की उसका कठोर होता चेहरा देखती है]
‘ओह। शायद ये ख़ुद को मज़बूत कर रहा है ताकि मृत्यु से ना डरे। मैं एक बार इसके बाल सहलाना चाहती हूँ। अगर मैं ऐसा करूँ तो क्या होगा? शायद सैनिकों को नया कौतुक मिल जाए। फिर वो मेरी आँखों के सामने इसे तड़पा कर मारेंगे। ओह। नहीं। मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मृत्यु जितनी जल्दी आ जाए, बेहतर है। शायद मुझे भी अपना चेहरा एकदम कठोर कर लेना चाहिए।’

[लड़का उसके चेहरे की खिंचती नसें देखता है]
‘ओह। ये लड़की मेरा कठोर चेहरा देख कर कठोर होने की कोशिश कर रही है। शायद इसे लगे कि मैं मृत्यु से डर रहा हूँ। और ये मुझे संबल देने की कोशिश कर रही है।’
‘___ ___ ___ ___ ___’

[सैनिकों ने तय कर लिया है। लड़के के सिर के पीछे बंदूक़ की नली रखते हैं।
वे दोनों बहुत धीरे धीरे और एक साथ अपनी आँखें बंद करते और खोलते हैं।
दोनों एक आख़िरी बार एक दूसरे की आँखों में देखते हैं।]

‘फिर कभी’
‘फिर कभी’

गोली चलती है और दोनों के सिरों के पार निकलती हुयी दीवार में जा के धँस जाती है। उनके बदन एक साथ गिरते हैं। उन्होंने आख़िरी लम्हे में एक दूसरे का हाथ पकड़ लिया था। गार्ड्ज़ बहुत कोशिश करते हैं पर लाशों की मुड़ी हुयी उँगलियाँ उलझ गयी हैं, हड्डियाँ खुलती नहीं। उन्हें एक साथ ही जलती भट्ठी में फेंकना पड़ता है।

एक उलझे हुए प्रेम से बची रह जाती है दुनिया। वक़्त से हारी हुयी लड़ाई से। एक ‘काश’ से। उस छुपे हुए प्रेम से जो मृत्यु की आँख में आँख डाल कर देख सकती है और बिना इजाज़त, बिना इकरार के मिट भी सकती है।


उम्मीद की मीठी धुन पर गुनगुनाती है…जीवन के संजीवन मंत्र…प्रेम, आना, फिर कभी। 

09 April, 2018

अनुगच्छतु प्रवाहं

अगर हम ज़िंदगी को किसी कहानी की तरह देखें, तो कभी कभी हमारी ज़िंदगी में एक 'point of no return' आता है। जैसे कि हर लम्बी कहानी के किरदार के साथ होता है, उस पोईंट पर हमें एक निर्णय लेना पड़ता है, और उस निर्णय के साथ होने वाले cause-effect के लिए तैय्यार रहना पड़ता है।

मैं अपनी ज़िंदगी में ऐसे ही एक क्षण पर खड़ी हूँ कि लगता है यहाँ से कोई एकदम ही अलग दिशा बनानी पड़ेगी।

जो दो चीज़ें मुझे बहुत ज़्यादा परेशान करती हैं वो हैं १. नैतिकता - नीति - शील - morality vs आज़ादी : कि जीने का नहीं, लेकिन क्या लिखने वाले की कोई नैतिकता होती है। जब मैं अपनी कल्पना के घोड़ों को खुला छोड़ती हूँ तो उनकी आज़ादी की कोई सीमारेखा है? क्या जीवन जीने के जो मानक नियम हैं, जो समाजिकता है...वही लेखन पर भी लागू होती है क्या लेखन का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है जिसे समाज के नियमों से बँधने की ज़रूरत नहीं है। लिखते हुए मैं सीमा कहाँ बनाती हूँ, कहाँ बनानी चाहिए। लिखते हुए जो डर मुझे परेशान किए रहते हैं, दुनिया के खड़े किए हुए डर...ये वे ही डर हैं जो मुझे जीने नहीं देते। तो मेरी क़लम इनसे कितनी बग़ावत कर सकती है। मैं जिन विषयों पर लिखना चाहती हूँ, मैं जैसे किरदार रचना चाहती हूँ...मेरे किरदारों को जिस तरह के भीषण दुःख देना चाहती हूँ...उनके पहले ये कौन सी सेल्फ़-सेन्सर्शिप लगा रखी है मैंने। उस लेखक का क्या हुआ जिसने किताब लिखने के बाद कहा था, सबसे ही, मैं आपके किसी सवाल का जवाब दूँ, आप इसका हक़ नहीं रखते। मेरा जो मन करेगा मैं लिखूँगी, आप मेरी ज़िंदगी को कटघरे में खड़ा कर सकते हैं, मेरे लेखन को नहीं।

२. शब्द - व्यक्ति - दोस्त - रिश्ते - बातें : मेरे जीवन में मेरे अधिकतर क़रीबी मित्र लेखन से जुड़े हैं। कुछ यूँ कि मेरी गहरी दोस्ती उन लोगों से हुयी जो लिखते रहे हैं और जिससे मेरी गहरी दोस्ती रही, उसे मैं कभी ना कभी लिखने की दिशा में धकियाया ज़रूर। तो चाहे वे लिखें या ना लिखें, वे पढ़ते ख़ूब ख़ूब हैं। मैं अपने इन क़रीबी दोस्तों से सबसे ज़्यादा बात करते हुए लिखने-पढ़ने का बहुत सारा कुछ साथ लिए आती हूँ। हमारे बीच पसंद की किताबें होती हैं। ईमेल होते हैं। चिट्ठियाँ होती हैं। कहने का मतलब ये, कि मुझे शब्दों की बहुत ज़रूरत पड़ती है और ये शब्द मेरे क़रीबी दोस्तों से मिलते हैं मुझे।
पिछले कुछ सालों से लेकिन पैटर्न ये रहा है कि किसी से दोस्ती होने, उस मित्रता को पनपने और ठीक वहाँ पहुँचने जहाँ बात कहने के साथ ही कॉंटेक्स्ट देने की ज़रूरत ना पड़े...इसमें ठीक ठीक दो साल लगते हैं। फिर ठीक इसी बिंदु पर पहुँच कर वे दोस्त छूट जाते हैं। कभी ज़िंदगी ऐसे हालात खड़े कर देती है, कभी कुछ यूँ ही हम अलग अलग दिशाओं में चल देते हैं। मतलब, कारण मालूम नहीं रहता, लेकिन ऐसा हो जाता है - हमेशा। मुझे हर समस्या का हल खोजने की आदत है, इसलिए ये दिक़्क़त मुझे बहुत परेशान करती है। तो अब ये वक़्त आ गया है कि मैं इस समस्या को हल करने की ज़िद छोड़ दूँ और समझ जाऊँ कि कुछ चीज़ें मुझे समझ नहीं आतीं...कुछ चीज़ों पर मेरा बस नहीं चलता।
मुझे हमेशा लगता रहा है कि लोगों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। मैं किसी से बात करने के किसी भी मौक़े को जाने नहीं देती। मुझे लोगों से बात करना बहुत अच्छा लगता है। मैं हमेशा चिट्ठियाँ और जवाबों से लम्बे जवाब दिया करती हूँ। तो ऐसे में लगता है, कि दोस्त ना सही, जो सेकंड सर्कल औफ़ फ़्रेंड्ज़ होते हैं, वो होनी चाहिए। ऐसे लोग जो दोस्त नहीं हों, लेकिन जिनसे गाहे बगाहे बात की जा सके। लिखने पढ़ने पर या कि उनकी ज़िंदगी में होती घटनाओं पर भी।
फिर मुझे लगता है कि इस समस्या का इकलौता और अंतिम समाधान है चुप्पी। लेकिन ओढ़ी हुयी नहीं, थोपी हुयी नहीं...ऐसी चुप्पी नहीं जो अंदर तक जला दे...बल्कि एक शांति...तो ऐसे में सही शब्द होता है - मौन।
मेरे जैसे धुर वाचाल का मौन धारण करना मेरे स्वभाव के एकदम विपरीत है और अगर मैं इस स्टेप को ठीक से हैंडल नहीं करती तो मैं घुट के मर जाऊँगी। मुझे इस मौन के साथ सामंजस्य बिठाना होगा क्यूँकि ये अंतिम सत्य है।

तो मैं ज़िंदगी के इस पोईंट औफ़ नो रिटर्न पर खड़ी ये सोच रही हूँ कि पूर्ण स्वतंत्रता - आज़ादी और गहरा मौन - शांति, इनको जीवन में शामिल करूँ तो कैसे और इस मुश्किल रास्ते को आसान कैसे करूँ। कि मेरे अंदर बहुत ही ज़्यादा छटपटाहट भर गयी है और मैं ऐसे जी नहीं सकती हूँ।

जब जाने का मन करता है तो एक जगह से जाने का मन नहीं करता...सारी जगहों से जाने का मन करता है...बात नहीं करनी होती है तो किसी से भी बात नहीं करनी होती है।

तो कुछ महीने सारी बातें बंद कर के मैं सिर्फ़ अपने एकांत में, अपनी चुप्पी में और अपने मन के अंदर की आज़ाद दुनिया में उतरना और रहना चाहती हूँ।

चाहती हूँ।
करूँगी तो क्या ये तो ब्रह्मा भी नहीं जानते!

14 March, 2018

सपने में एक नदी बहती थी

मेरे सपनों में कुछ जगहें हमेशा वही रहती हैं। बहुत सालों तक मुझे एक खंडहर की टूटी हुयी दीवाल का एक हिस्सा सपने में आता रहा। उन दिनों मैं बिलकुल पहचान नहीं पाती थी कि ये कहाँ से उठ के आया है। आज पहली बार उस बारे में सोचते हुए याद आया है कि पटना में नानीघर जाने के रास्ते रेलवे ट्रैक पड़ता था। रेलवे ट्रैक के किनारे किनारे दीवाल बनी हुयी थी। वो ठीक वैसे ही टूटी थी जैसे कि मैं सपने में देखती आयी रही थी, कई साल। हाँ सपने में वो हिस्सा किसी क़िले की सबसे बाहरी चहारदिवारी का हिस्सा होता था।

इन दिनों जो सपने में कई दिनों से देख रही हूँ, लौट लौट कर जाते हुए। वो एक मेट्रो स्टेशन है। मैं हमेशा वही एक मेट्रो स्टेशन देखती हूँ। काफ़ी ऊँचा। कोई तीन मंज़िल टाइप ऊँचा है। और मैं हमेशा की तरह सीढ़ियों से चढ़ती या उतरती हूँ। इसे देख कर कुछ कुछ कश्मीरी गेट के मेट्रो की याद आती है। वहाँ की ऊँची सीढ़ियों की। मैं कब गयी थी किसी से मिलने, कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर उतर कर? याद में सब भी कुछ साफ़ कहाँ दिखता है हमेशा। या कि अगर दिखता ही हो, तो हमेशा जस का तस लिख देना भी तो बेइमानी हुआ। वो कितने कम लोग होते हैं, जिनका नाम हम ले सकते हैं। किसी पब्लिक फ़ोरम पर। ईमानदारी से। फिर ऐसे नाम लेने के बाद लोग एक छोटे से इन्सिडेंट से कितना ही समझ पाएगा कोई। हर नाम, हर रिश्ता अपनेआप में एक लम्बी कहानी होता है। छोटे क़िस्से वाले लोग कहाँ हैं मेरी ज़िंदगी में।

इस मेट्रो स्टेशन के पास नानी की बहन का घर होता है। स्टेशन से कुछ डेढ़ दो किलोमीटर दूर। हमेशा। मैं जब भी इस मेट्रो स्टेशन पर होती हूँ, मेरे प्लैंज़ में एक बार वहाँ जाना ज़रूर होता है।

आज रात सपने में में इस मेट्रो स्टेशन से उतर कर तुम्हारे बचपन के घर चली गयी। शहर जाने कौन सा था और मुझे तुम्हारा घर जाने कैसे पता था। और मैं ऐसे गयी जैसे हम बचपन के दोस्त हों और तुम्हारे घर वाले भी जानते हों मुझे अच्छे से। तुम घर के बरांडे में बैठ कर कॉमिक्स पढ़ रहे थे। हम भी कोई कॉमिक्स ले कर तुमसे पीठ टिकाए बैठ गए और पढ़ने लगे। आधा कॉमिक्स पहुँचते हम दोनों का मन नहीं लग रहा था तो सोचे कि घूमने चलते हैं।

हम घूमने के लिए जहाँ आते हैं वहाँ एक नदी है और मौसम ठंढा है। नदी में स्टीमर चल रहे हैं। जैसे स्विट्ज़रलैंड में चलते थे, उतने फ़ैन्सी। हम हैं भी विदेश में कहीं। मैं स्टीमर जहाँ किनारे लगता है वहाँ एक प्लाट्फ़ोर्म बना है। तुम कहते हो तैरते हैं पानी में। मैं कहती हूँ, पानी ठंढा है और मेरे पास एक्स्ट्रा कपड़े नहीं हैं। तभी प्लैट्फ़ॉर्म शिफ़्ट होता है और मैं सीधे पानी में गिरती हूँ। पानी ज़्यादा गहरा नहीं है। तुम भी मेरे पीछे जाने बिना कुछ सोचे समझे कूद पड़ते हो। फिर तुम तैरते हुए नदी के दूसरे किनारे की ओर बढ़ने लगते हो। मुझे तैरना ठीक से नहीं आता है पर मैं ठीक तुम्हारे पीछे वैसे ही तैरती चली जाती हूँ और हम दूसरे किनारे पहुँच जाते हैं। ये पहली बार है कि मैंने तैरते हुए इतनी लम्बी दूरी तय की है। हम पानी से निकलते हैं और सीढ़ियों पर खड़े होते हैं। इतना अच्छा लग रहा है जैसे लम्बी दौड़ के बाद लगता है। पानी साफ़ है। थोड़ा आगे सीढ़ियाँ बनी हुयी हैं और दूसरी ओर पहाड़ हैं। मैं कहती हूँ, आज मुझे तुम्हारे कपड़े पहनने पड़ेंगे। थोड़ी देर घूम भटक कर वापस जाने का सोचते हैं। उधर रेस्ट्रांट्स की क़तार लगी हुयी है नदी किनारे। हम उनके पीछे नदी की ओर पहुँचते हैं तो देखते हैं कि उनकी नालियों से नदी का पानी एकदम ही गंदा हो गया है। कोलतार और तेल जैसा काला। वहाँ से पानी में घुसने का सोच भी नहीं सकते। हम फिर तलाशते हुए नदी के ऊपर की ओर बढ़ते हैं जहाँ पानी एकदम ही साफ़ है। तुम होते हो तो मुझे पानी में डर एकदम नहीं लगता। हम हँसते हैं। रेस करते हैं। और नदी के दूसरे किनारे पहुँच जाते हैं। तुम्हारी सफ़ेद शर्ट है उसका एक बटन खुला हुआ है। मैं अपनी हथेली तुम्हारे सीने पर रखती हूँ। पानी का भीगापन महसूस होता है।

हम किसी डबल बेड पर पड़े हुए एक स्टीरियो से गाने सुन रहे हैं। एक किनारे मैं हूँ, लम्बे बाल खुले हुए हैं और बेड से नीचे झूल रहे हैं।एक तरफ़ तुम दीवार पर टाँग चढ़ाए सोए हुए हो। घर में गेस्ट आए हैं। तुम्हारी दीदी या कोई किचन से चिल्ला के पूछ रही है मेरे घर के नाम से मुझे बुलाते हुए...ये मेरा पटना का घर है...और स्टीरियो प्लेयर वही है जो मैंने कॉलेज के दिनों में ख़ूब सुना था। कूलर पर रख के, कमरे में अँधेरा कर के, खुले बाल कूलर की ओर किए, उन्हें सुखाते हुए। तुम मेरे इस याद में कैसे हो सकते हो। इतनी बेपरवाही से।

***
सपने में चेहरे बदलते रहे हैं, सो याद नहीं कितने लोगों को देखा। पर जगहें याद हैं और पानी की ठंढी छुअन। फिर मेरे पीछे तुम्हारा पानी में कूदना भी। सुकून का सपना था। जैसे आश्वासन हो, कि ज़िंदगी में ना सही, सपने में लोग हैं कितने ख़ूबसूरत।

तेज़ बुखार में तीन दिन से नहाए नहीं हैं, और सपना में नदी में तैर रहे हैं! 

07 March, 2018

अलविदा के गीत

कुछ फ़िल्में हमें बहुत बुरी तरह अफ़ेक्ट करती हैं। हम नहीं जानते कौन सा raw nerve ending touch हो जाता है। कुछ एकदम कच्चा, ताज़ा, दुखता हुआ ज़ख़्म होता है। रूह में गहरे कहीं। हम उन दुखों के लिए रो देते हैं जो हमारे अपने नहीं हैं। रूपहले परदे पर की मासूमियत कैसा कच्चा ख़्वाब तोड़ती है। कौन से दुःख की शिनाख्त कराती है? क्या कुछ दुःख यूनिवर्सल होते हैं? जैसे बचपने की मृत्यु।

हम कितनी चीज़ें फ़ॉर ग्रंटेड लेते हैं। आज़ादी। प्रेम। दोस्ती।
किसी को प्रेम करने का अधिकार।

फ़िल्म सिम्फ़नी फ़ॉर ऐना का एक सीन भुलाए नहीं भूलता है मुझे...स्कूल के बच्चे हैं, कुछ चौदह साल के आसपास की उम्र के...उनके साथ ही पढ़ने वाले एक लीडर की गोली मार के हत्या कर दी गयी है। बच्चे उसके कॉफ़िन को हाथों में ले कर चल रहे हैं। यह दृश्य श्वेत श्याम में फ़िल्माया गया है। सब बच्चों की आँखों में आँसू हैं। उन्होंने आँखें झुका रखी हैं। वे रो रहे हैं। लेकिन जैसे जैसे क़ाफ़िला उनके पास आता है, वे हाथ उठा कर V का सिम्बल बना रहे हैं। विक्टरी का। जीत का। अपने साथी को विदा कहते हुए भी वे कहते हैं कि हम जीतेंगे। Ever onward, to victory! ऐना इस सीन को नैरेट कर रही होती है। वो कहती है कि उस दिन के बाद हम सब बदल गए। हम बड़े हो गए।

मैं इस फ़िल्म को देखने के बाद देर तक रोती रही थी। चौदह पंद्रह साल के बच्चे...उनके हिसाब के क्रांति के उनके आदर्श। चे ग्वारा के नारे लगाते। लड़ते एक बेहतर दुनिया के लिए। जिस उम्र में उन्हें ठीक से दुनिया समझ भी नहीं आती, उस उम्र में उन्हें अरेस्ट कर लिया जाता है और फिर वे 'गुम' हो जाते हैं। फ़िल्म में कहती है इसा, तुम 'अरेस्ट' कर ली गयी, क्यूँकि उन दिनों हमारे पास 'disappear' शब्द नहीं था। बच्चे जो ग़ायब कर दिए गए। मार दिए गए। लम्बे समय तक टॉर्चर किए गए। इनसे सत्ता को कितना ख़तरा हो सकता था।

फ़िल्म के ट्रेलर में एक गीत होता है जो मैं पहचान नहीं पाती हूँ। youtube पर एक कमेंट में सवाल पूछा है जिसका कल जवाब आया है। मैं देर तक उसी गाने को सुनती रही हूँ। वो एक इतालवी युद्ध गीत है, एल पासो देल एबरो एक लोकगीत...जो कई सालों से गाया जाता रहा है। युद्ध चिरंतर हैं।

कल रात मैं देर तक अर्जेंटीना के इस स्टेट टेररिज़म के बारे में पढ़ती रही। इसे डर्टी वार कहा गया है। गंदा युद्ध। इसमें विरोधी राजनीतिक ख़याल रखने वालों लोगों को, जिनमें बच्चे, छात्र, औरतें थीं, मारा गया, अपहृत किया गया और ग़ायब कर दिया गया। इस जीनोसाइड में लगभग तीस हज़ार लोग मारे गए। औस्वितज से गुज़रना आपको ज़िंदगी भर के लिए बदल देता है। कुछ ऐसे कि उस समय भी मालूम नहीं होता है। किसी भी क़िस्म की जीनोसाइड के साथ एक मृत्युगंध चली आती है। उँगलियों में, हथेलियों में, बर्फ़ पड़ते सीने में और मैं एक मानवता के बेहद स्याह पन्ने तक पहुँच जाती हूँ। पढ़ते हुए जानती हूँ कि जो बच्चे ग़ायब कर दिए गए, उन्हें याद रखे रखने के लिए की गयी कोशिशें हैं। उनकी माएँ टाउन स्क्वेयर जाती हैं, अब भी, हर बृहस्पतिवार और अपने ग़ायब किए गए बच्चों के बारे में जानकारी माँगती हैं। अर्जेंटीना के इस ग्रूप का नाम Mothers of the Plaza de Mayo है। 

अलविदा। कैसा दुखता शब्द है। फ़िल्म के आख़िरी फ़्रेम में कुछ विडीओ रेकॉर्डिंज़ हैं जो उस समय की गयी थीं जब Ana, Lito और Isa एक समंदर किनारे गए हैं और ख़ुश हैं। प्रेम में हैं। मुझे अलविदा के कुछ लम्हे याद आते हैं।

आख़िरी बात कहता है वो मुझे, 'Au revoir' कहते हैं फ़्रेंच में। इसका मतलब होता है, फिर मिलेंगे। मैं नहीं जानती मैं उसे कब मिलूँगी फिर। दुनिया बहुत बड़ी है और तन्हाई इतनी कि दुनिया भर में बिखर जाए और पूरी ना पड़े। हम फिर कब मिलेंगे?

दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर उसे आख़िरी बार देखा था। ट्रेन के मुड़ जाने तक। उस दिन को बारह साल हुए। मैंने उसकी एक तस्वीर भी नहीं देखी है। वो कहता है मुझसे उम्र भर नहीं मिलेगा। मैं नहीं जानती ज़िंदगी कितनी लम्बी है। मैं नहीं चाहती मेरे मर जाने के बाद उसे इस बात का अफ़सोस हो कि मुझे एक बार मिल लेना चाहिए था।

सुनते हुए मैं Bella Ciao तक पहुँचती हूँ। जंग के समय एक व्यक्ति अपनी ख़ूबसूरत महबूबा को अलविदा कह रहा है, यह कहते हुए कि अगर मैं मर गया तो मुझे उस पहाड़ी पर दफ़नाना और वहाँ पर एक ख़ूबसूरत फूल उगेगा मेरी क़ब्र पर तो सब कहेंगे कि कितना ख़ूबसूरत फूल है।

सुनते हुए मैं hasta siempre तक पहुँचती हूँ। चे ग्वेरा के फ़िदेल को लिखे आख़िरी ख़त जिसमें वो कहते हैं 'Until victory, always' के जवाब में गाया गाया ये गीत अपने कमांडर को अलविदा कहता है 'until forever'. चे की मृत्यु के बाद क्यूबा की क्रांति में ये गीत बहुत महत्वपूर्ण रहा। इसे सुनते हुए अपना इंक़लाब ज़िंदाबाद याद आता है।

चीज़ों के समझने का हमारा अलगोरिदम लॉजिकल नहीं होता। यादों के साथ कहाँ कौन सा रेशा जुड़ेगा हम नहीं जानते। मेरी परवरिश एक नोर्मल मिडल क्लास परिवार में हुयी। हमारे परिवार में राजनीति के लिए जगह नहीं रही। पापा ने अपने समय में जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया, चाचा शाखा में जाते हैं मगर ये बात अब समझ में आयी। बचपन में बस ये याद है कि चाची उनके हाफ़ पैंट पहनने पर ग़ुस्सा करती थी। मैंने कभी कार्ल मार्क्स की किताबें नहीं पढ़ीं। हाँ, मोटरसाइकल डाइअरीज़ ज़रूर पढ़ी है...लेकिन उसमें चे सिर्फ़ ख़ुद को तलाशते और समझते एक घुमक्कड़, सहृदय, युवा डॉक्टर की तरह दिखे हैं मुझे।

युद्ध से मेरी पहली मुलाक़ात महाभारत में हुयी। दूसरी, पानीपत के युद्ध में और फिर गॉन विथ द विंड पढ़ते हुए। इतिहास हमें इतने बोरिंग तरीक़े से पढ़ाया जाता है कि किसी को अच्छा नहीं लगता। अगर पढ़ाई का तरीक़ा बदल दिया जाए तो इतिहास झूठी कहानियों से बहुत ज़्यादा रोचक लगेगा। इतनी बड़ी दुनिया में इतनी सारी चीज़ें मुझे नहीं समझ आती हैं। मैं थोड़ा थोड़ा सब कुछ समझने की कोशिश करती हूँ। मेरे दिल में प्रेम के बाद की बची हुयी जगह में एक बहुत बड़ा ख़ाली मैदान है।  वहाँ अलग अलग बंजारा ख़याल डेरा डालते हैं। इन दिनों कला की प्रदर्शनी उठ गयी है और टेक्नॉलजी और युद्ध अपने खेमे डाल रहे हैं।
Screenshot from Symphony for Ana

मैं तुम्हारी अधूरी चिट्ठियाँ जला देना चाहती हूँ।
मैं तुम्हारी आवाज़ मिस करती हूँ।
और तुम्हें।

अलविदा के शब्दों को लिख रखा है। आख़िरी बार कहूँगी तुमसे। कितनी भाषाओं में गुनगुनाते हुए...अलविदा।

Hasta Siempre
Bella Ciao
Au revoir

*ये लेख तथ्यात्मक रूप से ग़लत हो सकता है। यहाँ इतिहास की घटनाएँ मेरी याद्दाश्त में घुलमिल गयी हैं, और फिर विकिपीडिया पर बहुत ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता। 

03 February, 2018

सुनो, तुम अपना दिल सम्हाल के रखना।

नहीं। मेरे पास कोई ज़रूरी बात नहीं है, जो तुमसे की जाए। 
ये वैसे दिन नहीं हैं जब 'दिल्ली का मौसम कैसा है?' सबसे ज़रूरी सवाल हुआ करता था। जब दिल्ली में बारिश होती थी और तुमने फ़ोन नहीं किया होता तो ये बेवफ़ाई के नम्बर वाली लिस्ट में तुम्हारा किसी ग़ैर लड़की से बात करने के ऊपर आता था। 
हमारे बीच दिल्ली हमेशा किसी ज़रूरी बात की तरह रही। बेहद ज़रूरी टॉपिक की तरह। कि तुम्हारे मन का मौसम होता था दिल्ली। नीले आसमान और धूप या दुखती तकलीफ़देह गर्मियाँ या कि कोहरा कि जिसमें नहीं दिखता था कि किससे है तुम्हें सबसे ज़्यादा प्यार। 
अब कहते हैं लोग मुझे, दिल्ली अब वो दिल्ली नहीं रही। तुम्हें दस साल हुए उस शहर को छोड़े हुए। अब भी तुम्हें उसके मौसम से क्या ही फ़र्क़ पड़ता है। 
उस लड़के को छोड़े हुए भी तो बारह साल हुए। तुम उसके बालों की सफ़ेदी देखना चाहती हो? उसकी आँखों के इर्द गिर्द पड़े रिंकल? या होठों के आसपास पड़ी मुस्कान से पड़ी हुयी रेखाएँ? तुम क्यूँ देखना चाहती हो कि जो रेखा तुम्हारे और उसके हाथों में ठीक एक सी थी, वो इतने सालों में बदली या नहीं। तुम उसे देखना क्यूँ चाहती हो? जिस लड़के को तुमने ही छोड़ा था, उसके गले लग कर उसी से बिछड़ने के दुःख में क्यूँ रोना चाहती हो। उसके ना होने के दुःख का ग्लेशियर अपने दिल में जमाए हुए तुम जियो, यही सज़ा तय की थी ना तुम दोनों ने? उसकी आँखों में मुहब्बत होगी अब भी जिसे वो नफ़रत का नाम देता है। उसकी आवाज़ से तुम्हारे दिल की धड़कन क्यूँ रूकती है? इतना प्यार करना ही था उससे तो उसे छोड़ा ही क्यूँ था? उसके पास रह कर उससे दूर हो जाने का डर था तुम्हें?
दुखता हुआ शहर दिल्ली। सीने में पिघलता। जमता। दूर होता जाता। बहुत बहुत दूर। पूछता। 'ताउम्र करोगी प्यार मुझसे?'
***
हम जिनसे प्यार करते हैं, वो इसलिए नहीं करते हैं कि उनसे बेहतर कोई और नहीं था। प्यार में कोई आरोहण नहीं होता कि उस सबसे ऊँची सीढ़ी पर जो मिलेगा हम उससे सबसे ज़्यादा प्यार करेंगे। या उससे ही प्यार करेंगे। 
हमें जो लेखक पसंद होते हैं, वे इसलिए नहीं होते कि वे दुनिया के सबसे अच्छे लेखक होते हैं। उनका लिखा पुरस्कृत होता है या बहुत लोगों को पसंद होता है। हमें कोई लेखक इसलिए पसंद आता है कि कहीं न कहीं वो हमारी कहानी कहता है। हमारे प्रेम की, हमारे बिछोह की। अक्सर वो कहानी जो हम जीना चाहते थे लेकिन जी ना सके। हो सकता है हम उनके बाद कई और लेखकों को पढ़ें और कई और शहरों के प्रेम में पड़ें। लेकिन अगर हमने एक बार किसी के लिखे से बहुत गहरा प्रेम किया है तो हम उस लेखक के प्रेम से कभी नहीं उबर सकते। हम उस तक लौट लौट कर जाते हैं। कई कई साल बाद तक भी। 
आज मैंने कुछ वे ब्लॉग पोस्ट पढ़े जो २०१० में लिखे गए थे। ये ऐसे क़िस्से हैं जिनकी पंक्तियाँ मुझे हमेशा याद रही हैं। ख़ास तौर से दुःख में या सफ़र में। उन लेखों में दुःख है, अवसाद है, मृत्यु है और इन सब के साथ एक लेखक है जिसका उन दिनों मुझे नाम, चेहरा, उम्र कुछ मालूम नहीं था। ये शब्दों के साथ का विशुद्ध प्रेम था। मैं उन पोस्ट्स तक लौटती हूँ और पाती हूँ कि अच्छी विस्की की तरह, इसका नशा सालों बाद और परिष्कृत ही हुआ है। 
मैंने इस बीच दुनिया भर के कई बड़े लेखकों को पढ़ा है। कविताएँ। कहानियाँ। लेख। आत्मकथा। कई सारे शहर घूम आयी। लेकिन उन शब्दों की काट अब भी वैसी ही तीखी है। वे शब्द वैसे ही हौंट करते हैं। वैसे ही ख़याल में तिरते रहते हैं जैसे उतने साल पहले होते थे। 
प्यारे लेखक। तुम्हारा बहुत शुक्रिया। मेरी ज़िंदगी को तुम्हारे ख़ूबसूरत और उदास शब्द सँवारते रहते हैं। तुम बने रहो। दुआ में। अगली बार मैं किसी शहर जाऊँगी विदेश के, तो फिर से पूछूँगी तुमसे, 'क्या मैं आपको चिट्ठियाँ लिख सकती हूँ?'। इस बार मना मत करना। तुम्हारे बहुत से फ़ैन्स होंगे। हो सकता है कोई मुझसे ज़्यादा भी तुमसे प्यार करे। लेकिन मेरे जैसा प्यार तो कोई नहीं करेगा। और ना मेरे जैसी चिट्ठियाँ लिखेगा। तुमसे जाने कब मिल पाएँगे। मेरा इतना सा अधिकार रहने दो तुमपर, किसी दूर देश से चिट्ठियाँ लिखने का। मुझे इसके सिवा कुछ नहीं चाहिए तुमसे। लेकिन मेरे जीने के लिए इतना सा रहने दो। 
तुम्हारी,
(जिसे तुमने एक बार यूँ ही बात बात में पागल कह दिया था)
ज़िंदगी रही तो फिर मिलेंगे।
***
कुछ शौक़ आपको जिलाए रखते हैं। 
मुझे सिगरेट की आदत कभी नहीं रही। लेकिन शौक़ रहा। दोस्तों के साथ कभी एक आध कश मार लिया। लिखते हुए मूड किया तो सिगरेट के खोपचे से दो सिगरेट ख़रीद ली और फूँक डाली। किसी दिन मूड बौराया तो बीड़ी का बंडल उठा लाए और देर रात ओल्ड मौंक पीते रहे और बीड़ी फूँकते रहे। किसी कसैलेपन को मिठास में बदलने की क़वायद करते रहे। 
जब तक किताब नहीं छपी थी अपनी, ज़िंदगी में सिर्फ़ ढाई कप चाय पी थी। पहली बार कॉलेज से एजूकेशनल ट्रिप पर कोलकाता गयी थी...वहाँ टाटा के ऑफ़िस में उन्होंने कुछ समझाते हुए सारी लड़कियों के लिए चाय भिजवायी थी। आधी कप वो, कि ना कहने में ख़राब लगा और पीने में और भी ख़राब। दूसरा कप इक बार दिल्ली में एक दोस्त ने ज़िद करके बनायी, जाड़े के दिन हैं, खाँसी बुखार हो रखा है, मेरे हाथ की चाय पी, जानती हूँ तू चाय नहीं पीती है, मर नहीं जाएगी एक कप पी लेने से। तीसरा कप बार एक एक्स बॉयफ़्रेंड ने प्यार से पूछा, मैं चाय बहुत अच्छी बनाता हूँ, तू पिएगी? तो उसको मना नहीं किया गया। दिल्ली गयी किताब आने के बाद और वहाँ दोस्तों को चाय सिगरेट की आदत। मैं ना चाय पीती थी, ना सिगरेट। फिर प्रगति मैदान में लगे नेसकैफ़े के स्टॉल्ज़ से इलायची वाली चाय पी...इक तो किताबों और हिंदी का नशा और उसपर दोस्त। अच्छी लगी। 
अपने सबसे फ़ेवरिट लेखक के साथ एक सिगरेट पीने की इच्छा थी। उनसे गुज़ारिश की, आपके साथ एक सिगरेट पीने का मन है। उस एक गुज़ारिश के लिए आज भी ख़ुद को माफ़ नहीं कर पाती हूँ। कि मुझे मालूम नहीं था उन्होंने कई साल से सिगरेट नहीं पी है। मैं कभी ऐसी चीज़ नहीं माँगती। वाक़ई कभी नहीं। इसके अगले दो साल मेरे लिए दिल्ली बुक फ़ेयर यानी ख़ुशी, चाय और सिगरेट हुआ करती थी। लोग मेरी तस्वीरें देख कर कहते, आप बैंगलोर में इतनी ख़ुश कभी नहीं होतीं। 
बैंगलोर आके फिर चाय पीना बंद। सिगरेट बहुत रेयर। पिछले साल कभी कभी चाय पीनी शुरू की। घर पर। अपने हाथ की चाय। फिर पता चला, पहली बार कि मैं वाक़ई बहुत अच्छी चाय बनाती हूँ और लोग जो कहते हैं तारीफ़ में, सच कहते हैं। मगर सिगरेट की तलब एकदम ख़त्म। 
हुआ कुछ यूँ भी कि पिछले साल जिन दोस्तों से मिली, वे सिगरेट नहीं पीते थे। उनके साथ रहते हुए, बहुत सालों बाद ऐसा लगा कि सिगरेट ज़रूरी नहीं है दो लोगों के बीच। कि इसके बिना भी होती हैं बातें। हँसते हैं हम। गुनगुनाते हैं। कि मेरे जैसे और भी लोग हैं दुनिया में जो कॉफ़ी के लिए कभी मना नहीं करेंगे लेकिन चाय देख कर रोनी शक्ल बनाएँगे। कि ज़हर नहीं, लेकिन नामुराद तो है ही चाय।
सिगरेट का कश लिए कितने दिन हुए, अब याद नहीं। शौक़ से विस्की पिए कितने दिन हुए, वो भी याद नहीं। ओल्ड मौंक तो पिछले साल की ही बात लगती है। दिल्ली के कोहरे में मिला के पी थी। 
तो मेरा मोह टूट रहा है...अब इसके बाद जाने क्या ही तोड़ने को जी चाहेगा। सुनो, तुम अपना दिल सम्हाल के रखना।
प्यार। बहुत।
***
छाया गांगुली गा रही हैं...'फ़र्ज़ करो, हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो, दीवाने हों'

'हम' दोनों, क्या हो सकते हैं...फ़र्ज़ करो...दीवाने ही होंगे। 

29 January, 2018

मिट्टी अत्तर का शहर होना

Have you ever had a longing for a city you never visited?
मुझे समझ नहीं आता कि प्यार कैसे होता है। किसी भी चीज़ से। आख़िर कैसे हो सकता है कोई शहर हूक जैसा?

कन्नौज के बारे में पहली बार कोई पाँच-छह साल पहले अख़बार में पढ़ा था। एक ऐसा शहर जहाँ मिट्टी अत्तर बनता है। इस शहर के बारे में, ख़ुशबुओं के बारे में कहानियाँ मुझ तक पहुँचती रहीं। तीन रोज़ इश्क़ में जो 'ख़ुशबुओं के सौदागर' की कहानी है, वो एक ऐसी तलाश है...कल्पना की ऐसी उड़ान है जो मैं भर नहीं सकती। ये वैसे सपने हैं जो मेरी कहानियों की दुनिया में देखती हूँ मैं। 

ख़ुशबुएँ मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। बचपन में ख़ुशबू वाले रबर बहुत दुर्लभ होते थे और सहेज के रखे जाते थे। मैं जब टू या थ्री में पढ़ती थी तो मेरे स्कूल के बग़ल के एक मैदान में स्पोर्ट्स डे होता था। वहाँ एक लगभग कटा हुआ पेड़ था। कुछ ऐसे गिरा हुआ कि उसपर बैठा जा सकता था। मैंने उसकी लकड़ी क्यूँ सूंघी मुझे मालूम नहीं। लेकिन उसमें एक ख़ुशबू थी। कुछ कुछ तारपीन के तेल की और कुछ ऐसी जो मुझे समझ नहीं आयी। उस पेड़ की लकड़ी का एक टुकड़ा मेरे पेंसिल बॉक्स में दसवीं तक हुआ करता था। मैं उसे निकाल के सूँघती थी और मुझे ऐसा लगता था कि मेरी पेंसिल और क़लम सब उसके जैसी महकती है। 

छह साल पहले टाइटन ने अपने पर्फ़्यूम लौंच किए थे। Titan Skinn। वो प्रोजेक्ट मैंने अपनी पिछली कम्पनी में किया था। लौंच के लिए पहले ख़ूब सी चीज़ें पढ़ी थीं।इत्र के बारे में। शायद, मुझे ठीक से याद नहीं...पर उन्हीं दिनों लैवेंडर के खेतों के बारे में पहली बार पढ़ा था। उस ख़ुशबू के ख़याल से नशा हो आया था।

मैं नहीं जानती मेरा उपन्यास कब पूरा होगा। लेकिन उसके पूरे होने के पहले कुछ शहर मेरी क़िस्मत में लिखे हैं। न्यू यॉर्क एक ऐसा शहर था। वहाँ की कुछ झलकियाँ कहानी में बस गयी हैं। अब जो दूसरा शहर चुभ रहा है आज सुबह से, वो कन्नौज है। मैंने उसका नाम इतरां क्यूँ रखा? इत्र से इतरां...जाने क्यूँ लगता है कि उसे समझने के लिए अपने देश में रहते हुए इत्र के इस शहर तक जाना ही होगा। 

आज थोड़ा सा पढ़ने की कोशिश की है शहर के बारे में। सुबह से कन्नौज के बारे में क्यूँ सोच रही थी पता नहीं। सुबह एक दोस्त से बात करते हुए कहा उसे कि जोधपुर गयी थी, वहाँ मिट्टी अत्तर देखा। क़िले में। मुझे एक बार जाना है वहाँ दुबारा। फिर वो कह रहा था कि कन्नौज में भी बनता है। कि कन्नौज उसके घर के पास है। आप मेरे साथ चलिए। और मैं सोच रही थी। कभी कभी। कि लड़का होती तो कितना आसान होता ना, ऐसे मूड होने पर किसी शहर चले जाना। जिस वीकेंड टिकट सस्ती होती, दिल्ली चल लेते या लखनऊ और फिर कन्नौज। पहली बार मैप्स में देखा कि कन्नौज कहाँ पर है। और सोचा। कि कितने दूर लगते है ये सारे शहर ही बैंगलोर से।

मेरे ख़यालों में उस शहर से उठती मिट्टी अत्तर की गंध उड़ रही है। बारिश में भीगती गंध। मैं पटना वीमेंस कॉलेज में जब पढ़ती थी तो माँ सालों भर मुझे छतरी रख के भेजती थी बैग में। कि ग़लती से भी कहीं बारिश में ना फँस जाऊँ। उस रोज़ मैं उस लड़के से मिली थी, कॉलेज का सेकंड हाफ़ बंक कर के। बचपन का दोस्त और फिर लौंग डिस्टन्स बॉयफ़्रेंड। जिसे मैंने समोसे के पैसे बचा बचा कर PCO से कॉल किए थे ख़ूब। पर मिली थी तीन साल में पहली बार।हम सड़क पर टहल रहे थे। बहुत बहुत देर तक। पहली बार उस दिन छाता लाना भूल गयी थी। मौसम अचानक से बदल गया था। एकदम ही बेमौसम बरसात। मैं बेहद घबरा गयी थी। भीग के जाऊँगी तो माँ डाँटेगी। भीगने से नहीं, डांट के डर से...मैं घबराहट में थरथरा रही थी। बचपन के बेफ़िकर दिनों के बाद मैं कभी बारिश में नहीं भीगी थी। कई कई कई सालों से नहीं। और बारिश ने मौक़ा देख कर धावा बोला था। मैं बड़बड़ कर रही थी। आज तो मम्मी बहुत डाँटेगी। अब क्या करेंगे। मैं सुन ही नहीं रही थी, लड़का कह क्या रहा है। उसने आख़िर मेरे काँधे पकड़े अपने दोनों हाथों से...मुझे हल्के झकझोरा और कहा...'पम्मी, ऊपर देखो'। मैंने चेहरा ऊपर उठाया। वो लगभग छह फ़ुट लम्बा था। उसका चेहरा दिखा। पानी में भीगा हुआ। बेहद ख़ूबसूरत और रूमानी। और फिर मैंने चेहरे पर बारिश महसूस की। पानी की बूँदों का गिरना महसूस किया। मैं भूल गयी थी कि चेहरे पर बारिश कैसी महसूस होती है। 

मैं कन्नौज नहीं। उस पहली बारिश को खोज रही हूँ। कि आज भी जब बारिश में भीगने चलती हूँ तो चेहरा बारिश की ओर करते हुए लगता है आँखों को उसकी आँखें थाम लेंगी। भीगी हुयी मुस्कुराती आँखें। काँधे पर उसके हाथों की पकड़। कि वो होगा साथ। मुझे झकज़ोर के महसूस कराता हुआ। 
कि बारिश और मुहब्बत में। भीगना चाहिए।
कि किसी गंध के पीछे बावली होकर कोई शहर चल देने का ख़्वाब बुनना भी ठीक है। कि ज़िंदगी कहानियों से ज़्यादा हसीन है। 


कन्नौज। सोचते हुए दिल धड़कता है। कि लगता है इतरां की कहानी का कोई हिस्सा उस शहर में मेरा इंतज़ार कर रहा है। कि जैसे बहुत साल पहले बर्न गयी थी और लगा था कि इस शहर से कोई रिश्ता है, बहुत जन्म पुराना। आज वैसे ही जब अपने दोस्त से बात कर रही थी तो लगा कि शहर जैसे अचानक से materialize कर गया है। कि अब तक यक़ीन नहीं था कि शहर है भी। मगर अब लगता है कि ऐसा शहर है जिसे महसूसा जा सकता है। कलाई पर रगड़ी जा सकती है जिसकी गंध। 

कि शहर लिख दिया है दुआओं में। कभी तो रिसीव्ड की मुहर लगेगी ही।
अस्तु।

24 January, 2018

क़िस्सों का एक कमरा

मैंने अपने जीवन में बहुत कम घर बदले हैं। देवघर के अपने घर में ग्यारह साल रही। पटना के घर में छह। और बैंगलोर के इस घर में दस साल हुए हैं। मुझे घर बदलने की आदत नहीं है। मुझे घर बदलना अच्छा नहीं लगता। मैं कुछ उन लोगों में से हूँ जिन्हें कुछ चीज़ें स्थायी चाहिए होती हैं। घर उनमें से एक है। देवघर में मेरा घर हमारा अपना था। पहले एक मंज़िल का, फिर दूसरी मंज़िल बनी। मेरे लिए बचपन अपने ख़ुद के घर में बीता। वहाँ की ख़ाली ज़मीन के पेड़ों से रिश्ता बनाते हुए। नीम का पेड़, शीशम के पेड़। मालती का पौधा, कामिनी का पौधा। रजनीगंधा की क्यारियाँ। कुएँ के पास की जगह में लगा हुआ पुदीना। वहीं साल में उग आता तरबूज़।

बैंगलोर में इस घर में जब आयी तो हमारे पास दो सूटकेस थे, एक में कपड़े और एक में किताबें। ये एक नोर्मल सा २bhk अपर्टमेंट है। पिछले कुछ सालों में इसके एक कमरे को मैंने स्टडी बना दिया है। यहाँ पर एक बड़ी सी टेबल है जिसपर वो किताबें हैं जो मैं इन दिनों पढ़ रही हूँ। इसके अलावा इस टेबल पर दुनिया भर से इकट्ठा की हुयी चीज़ें हैं। शिकागो से लाया हुआ जेली फ़िश वाला गुलाबी पेपरवेट। डैलस से ख़रीदी हुयी रेतघड़ी और एक दिल के आकार का चिकना, गुलाबी पत्थर। न्यू यॉर्क से लाया हुआ स्नोग्लोब। एक दोस्त का दिया हुआ छोटा सा विंडमिल। दिल्ली से लाए दो पोस्टर जिनमें लड़कियाँ पियानो और वाइयलिन बजा रही हैं। पुदुच्चेरी से लायी नटराज की एक छोटी सी धातु की मूर्ति। एक टेबल लैम्प, दो म्यूज़िक बॉक्स। कुछ इंक की बोतलें। स्टैम्प्स। पोस्ट्कार्ड्ज़। बोस का ब्लूटूथ स्पीकर। अक्सर सफ़ेद और पीले फूल...और बहुत सा...वग़ैरह वग़ैरह।

इस टेबल के बायें ओर खिड़की है जो पूरब में खुलती है। आसपास कोई ऊँची इमारतें नहीं हैं इसलिए सुबह की धूप हमारी अपनी होती है। सूरज की दिशा के अनुसार धूप कभी टेबल तो कभी नीचे बिछे गद्दे पर गिरती रहती है। खिड़की से बाहर गली और गली के अंत में मुख्य सड़क दिखती है। बग़ल में एक मंदिर है। मंदिर से लगा हुआ कुंड। खिड़की पर मनीप्लांट है और ऊपर एक पौंडीचेरी से लायी हुयी विंडचाइम।

मैं सुबह से दोपहर तक यही रहती हूँ अधिकतर। लिखने और पढ़ने के लिए। दीवारों पर नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव के पोस्टर्ज़ हैं। एक बिल्ली का पोस्टर जो चुम्बक से लायी हूँ। एक बुलेटिन बोर्ड में दुनिया भर की चीज़ें हैं। न्यूयॉर्क का मैप। 'तीन रोज़ इश्क़' के विमोचन में पहना हुआ झुमका, जिसका दूसरा कहीं गिर गया। एक ब्रेसलेट जो ऑफ़िस से रिज़ाइन करने के बाद मेरे टीममेट्स ने मुझे दिया था, कुछ पोस्ट्कार्ड्ज़। कॉलेज की कुछ ख़ूबसूरत तस्वीरें। ज़मीन पर बिछा सिंगल गद्दा है जिसपर रंगबिरंगे कुशन हैं। एक फूलों वाली चादर है। ओढ़ने के लिए एक सफ़ेद में हल्के लाल फूलों वाली हल्की गरम चादर है। बैंगलोर में मौसम अक्सर हल्की ठंढ का होता है, तो चादर पैरों पर हमेशा ही रहती है। हारमोनियम और कमरे के  कोने में एक लम्बा सा पीली रोशनी वाला लैम्प है।

ये घर अब छोटा पड़ रहा है तो अब दूसरी जगह जाना होगा। मैं इस कमरे में दुनिया में सबसे ज़्यादा comfortable होती हूँ। ये कमरा पनाह है मेरी। मेरी अपनी जगह। मैं आज दोपहर इस कमरे में बैठी हूँ कि जिसे मैं प्यार से 'क़िस्साघर' कहती हूँ। किसी घर में दोनों समय धूप आए। साल के बारहों महीने हवा आए। बैंगलोर जैसे मेट्रो में मिलना मुश्किल है। फिर ऐसा कमरा कि धूप बायीं ओर से आए कि लिखने में आसान हो। एकदम ही मुश्किल। और फिर सब मिल भी जाएगा तो ऐसा तो नहीं होगा ना।

मुझे इस शहर में सिर्फ़ अपना ये कमरा अच्छा लगता है। जो दोस्त कहते हैं कि बैंगलोर आएँगे, उनको भी कहती हूँ। मेरे शहर में मेरी स्टडी के सिवा देखने को कुछ नहीं है। मगर वे दोस्त बैंगलोर आए नहीं कभी। अब आएँगे भी तो मेरे पढ़ने के कमरे में नहीं आएँगे। मैं आख़िरी कुछ दिन में उदास हूँ थोड़ी। सोच रही हूँ, एक अच्छा सा विडीओ बना लूँ कमसे कम। कि याद रहे।

हज़ारों ख़्वाहिशों में एक ये भी है। कभी किसी के साथ यहीं बैठ कर कुछ किताबों पर बतियाते। चाय पीते। दिखाते उसे कि ये अजायबघर बना रखा है। तुम्हें कैसा लगा।

एक दोस्त को एक बार विडीओ पर दिखा रही थी। कि देखो ये मेरी स्टडी ये खिड़की...जो भी... उसने कहा, आपका कमरा मेरे कमरे से ज़्यादा सुंदर है, तो पहली बार ध्यान गया कि इस कमरे को बनते बनते दस साल लगे हैं। कि इस कमरे ने एक उलझी हुयी लड़की को एक उलझी हुयी लेखिका बनाया है।

साल की पहली पोस्ट, इसी कमरे के नाम। और इस कमरे के नाम, बहुत सा प्यार।

और अभी यहाँ सोच रही हूँ...तुम आते तो...

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