18 February, 2026

क्या कहें, उस अजनबी से…तुम इतनी कड़वी सिगरेट न पिया करो, मेरा कलेजा जलता है!

The small things. Always the small things. 
सिगरेट कैसे भी पी लेने वाली चीज़ नहीं है। इससे जुड़ी हर छोटी-छोटी चीज़ से फ़र्क़ पड़ता है। मुझे सबसे अच्छी लगती है माचिस। उसमें भी लकड़ी की तीली वाली माचिस, जो लगभग चार सेंटीमीटर लंबी हो। वो जो काग़ज़ के ऊपर मोम लगा कर बनायी हुई तीली होती है, वो हमको एकदम भी अच्छी नहीं लगती। एक तो वो इतनी छोटी होती है, कि जलाते हुए हमेशा लगता है हाथ जल जाएगा। लकड़ी की छुअन, उसकी तासीर जलने की होती है। लगता है, इसे जलाया जा सकता है, इसे जलाया जाना चाहिए।

जैसे मुर्दा होता है ना। उसे छोड़ नहीं देते। उसे सूरज डूबने के पहले फूँक देते हैं।

माचिस आजकल रखना बंद कर रहे लोग, अधिकतर लोगों के पास लाइटर होता है। मुझे लाइटर सबसे अच्छा लगता है जिप्पो। पहली बार अनुपम के पास देखे थे। जिप्पो को जलाने, बुझाने का एक रिदमिक तरीक़ा होता है। फ़िल्मों में अक्सर देखा है, असल ज़िंदगी में कभी कभी। लेकिन जो जलती फ्लेम के एक झटके में खट से लाइटर के ढक्कन के बंद होते ही बुझ जाने का मजा है, किसी और चीज़ में नहीं। प्रैक्टिस कर कर के, हम भी सीख लिए हैं। स्ट्रेंजली मेरे दो अच्छे बॉस रहे, दोनों को जिप्पो पसंद था, और उनके पास हमेशा रहता भी था।

क्लिपर का लाइटर अच्छा लगता है मुझे, उसका जो गोल सा आकार होता है और ढेर सारे प्रिंट्स होते हैं। बहुत सारे अच्छे रंग भी। ब्लिंक-इट पर आजकल स्टैश प्रो के लाइटर मिलते हैं, वो भी अच्छे होते हैं। ये दोनों अगर नहीं रहे, तो नॉर्मल पान दुकान पर जो ट्रांसपेरेंट सा लाइटर होता है, १०-३० रुपए में मिलता है, फिर वो लाइटर भी चलता है।

मिनी का हुड ओपन रहता है, इसलिए उस में सिगरेट पीने में बहुत मज़ा आता है। उसमें जो लाइटर है, वो एक तरह का कॉइल नुमा होता है, जैसे पुराने ज़माने का हीटर होता था ना, वैसा। उसमें फ्लेम नहीं होती। धीप के लाल हो जाता है। तो चलती गाड़ी भी थोड़ा स्पीड घटा कर उसी से जला लेते हैं। वैसे अब तो इतना प्रैक्टिस हो गया है कि चलती गाड़ी में नॉर्मल लाइटर से भी सिगरेट जला लेते हैं। बैंगलोर में गाड़ी तो धीरे ही चलती है रोड पर। एक तो इतना स्पीडब्रेकर, उसपर गड्ढा।

एक होता है, जेट फ्लेम लाइटर। जिसमें फ्लेम दिखती नहीं है लगभग, पर बहुत तेज जलती है। यह विंड-प्रूफ लाइटर होता है। इसमें लौ नहीं होती है, बहुत तेज़ी से और बहुत ज़्यादा तापमान पर आग निकल रही होती है। बच्चे इससे हाथ न जला लें, इसलिए हम ये वाला लाइटर कभी नहीं ख़रीदते। एक बार मजबूरी में ख़रीदे भी थे, चलती गाड़ी में आदतन लाइटर जलाये और एकदम बीच हथेली जला लिए। उसके बाद कभी दूसरा विंड-प्रूफ लाइटर हम नहीं ख़रीदे।
***

सिगरेट के कुछ अलिखित नियम क़ानून होते हैं या नहीं, मालूम नहीं। लेकिन किसी को लाइटर देते हैं, किसी के लिए लाइटर जला देते हैं…कि पास आ कर सिगरेट जला लो। लेकिन किसी के लिए सिगरेट जलाने को लाइटर जला देना, जला पाना, एक क़िस्म की क्लोज़नेस या इंटिमेसी होती है। ये मुझे तब पता चला जब हम ऐसे ही अपनी सिगरेट जलाये और लाइटर बढ़ाने की जगह जला दिए…ये प्रोसेस कितनी सुंदर होती है, हमको पूजा पाठ का ढेर मालूम नहीं, नियम क़ानून भी नहीं फॉलो करते, लेकिन सिगरेट comes closes to being spiritual, for me…लाइटर की फ्लेम को हथेली से ढके हुए, किसी की ओर बढ़ा देना, दिखने में जितना सरल लगता है…कभी कभी होता नहीं। इक रोज़ ऐसे ही एक दोस्त ने सिगरेट जलायी, फिर दूसरे की बारी आई तो हम लाइटर की फ्लेम बुझा कर उसके हाथ में सिगरेट दे दिए…कि तुम ख़ुद जला लो। हम इतने बदतमीज़ हो जाएँगे, कभी ऐसा सोचे नहीं थे। It was rude, uncharacteristically rude. I still think about it, sometimes.

सोशल जीवन में, कुछ चीज़ों के वास्ते हमें किसी के क़रीब होने की इजाज़त होती है। करीब यानी की किसी के पर्सनल स्पेस में प्रवेश करना…यानी एक फुट रेडियस का घेरा जो हम अपने दोस्तों के इर्द-गिर्द भी मेंटेंन करते हैं, उसके भीतर आना…जो हमारे सच में करीबी नहीं हैं, उनके भी…क्यूंकि प्रैक्टिकल वजह है।

फ्लेम वाला लाइटर जलाना होता था तो अक्सर उसकी लौ ना बुझे इसके लिए कुल जमा तीन हाथ चाहिए होते थे, एक हाथ लाइटर जलाने के लिए और दो हाथों से फ्लेम को ढका जाता था ताकि वो ना बुझे और कोई सिगरेट जला ले। अब इन हाथों के दो ही कॉम्बिनेशन होते थे। या तो आप किसी के लिए लाइटर जलाओ, वो अपने दोनों हाथों से लाइटर की लौ को ढके, और उससे सिगरेट जला ले…या, आप एक हाथ से लाइटर जलाओ, एक हथेली आपकी हो, दूसरी हथेली दोस्त की…आप दोनों की हथेलियों से लपट ढकी जाये और फिर कोई सिगरेट जलाये।

ये सब हम जितना ध्यान से देखते और स्लो मोशन में अपने दिमाग में रिवाइंड करके प्ले करते हैं, असल में इतना सोचना होता नहीं है सिगरेट जलाने में…सब कुछ जैसे ऑटो-पायलट पर होता है। वैसे ही जैसे दोस्तों के साथ जब साथ में खाना खाने जाते हैं तो फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसने मेनू में क्या आइटम मंगाया है, जिसका भी आइटम पहले आयेगा, सब लोग उसी पर टूट पड़ेंगे।

आपने सिगरेट जलायी, बारी बारी से सब या तो लाइटर से जलायेंगे, या आप लाइटर जला दीजिए, सब पास आ आ कर सिगरेट जला लेंगे…

फिर आता है विंडप्रूफ़ लाइटर। फ़र्क़ ही नहीं पड़ता उसको किसी हथेली से। उसे किसी हवा से बचाने की जरूरत नहीं होती। इन फैक्ट, क्यूंकि उसकी फ्लेम बहुत तेज होती है और धूप वग़ैरह में दिखती नहीं है, तो उस लाइटर को हाथ से ढकना खतरनाक भी है। कुछ लोगों को खतरों से खेलने में मजा भी आता है। ऑटोपायलट पर चल देते हैं…मज़े से, ये सोचे बगैर कि शायद किसी के दिल को आँच लग जाये।

भोर की धूप में सब कुछ अच्छा दिखता है। लेकिन मैंने उसे देखा नहीं था। न मैंने लाइटर की फ्लेम को देखा। मालूम था वो जेट लाइटर रखता है। धूप में उसके अँगूठे और तर्जनी का हिस्सा चमक रहा था…ये जेट फ्लेम को कप क्यों कर रहा है, यह बुझेगी थोड़े…क़ायदे से हमको यही सोचना था, लेकिन हमारे दिमाग़ में पहला ख्याल आया कि उसका हाथ कितना सुंदर है…ज़बान से फिसलने ही वाला था वाक्य, कि तेरा हाथ कितना सुंदर है…मगर फिर सिगरेट जला चुके थे और एक गहरा कश…ऊपर वाले से शिकायत…काहे चैनल बदल बदल कर हमारे दिल तक आते हो? तुमको एंटरटेनमेंट के लिए किसी और का दिल नहीं मिलता कभी?

बहुत बहुत साल पहले ऐसे ही देखा था, उसका हाथ…कत्थई पत्थर की अंगूठी…किताबें। वो छुप के सिगरेट पीता था। याद नहीं उसे देखे हुए कितने साल हो गए। क्या अब भी सुंदर होंगे उसके हाथ!

धुएँ के पार सब कुछ सुंदर दिखता है। हमको सिगरेट पीना छोड़ देना चाहिए अब। या कमसेकम, सिर्फ़ अकेले में पिया करें। जान की आफत होती है ये सिगरेट कमबख़्त। कलेजा जलता है।

सिगरेट जलाने के लिए के लिए उसने लाइटर ऑन किया और हथेली से ढका, जैसे मैं कॉफ़ी कप तक रखती हूँ हथेली…जब किसी दोस्त का हाथ पकड़ के बैठे रहने का मन करता है। दोस्त ही तो। वो तो अजनबी था। हमको क्यों अजनबियों के साथ सिगरेट पीनी थी। मैंने पता नहीं क्यों, गौर से उसका हाथ देखा। इतना सुंदर हाथ था उसका, खूबसूरत कहते हैं जिसे। मन हुआ कहने का, लेकिन नहीं कहे। नहीं कह पाये।

होता है न कभी कभी, दिल pronoun भूल जाता है। दिमाग़ वाक्य फॉर्म नहीं कर पाया। उसको तू बोलते हैं, तुम बोलें या कि इंग्लिश में, you कह दें…इतनी मुश्किल बात नहीं थी। फिर ज़ुबान पर अटकी क्यों?

दो सिगरेटें।

क्या हमने कोई बात की? याद नहीं। शायद नहीं। चुपचाप सिगरेट पी रहे होंगे। धूप कितनी सुंदर थी। मन कितना हल्का था। सूरजमुखी खिला हुआ। “थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब, वो आए भी तो नींद न आई तमाम शब”। बहुत दिन बाद ऐसा हुआ कि किसी के पास खड़े हैं और उसका चला जाना दुख रहा है।

अचानक से उसके हाथ देखे। कहने वाली थी, कितने सुंदर हाथ हैं तुम्हारे। कहा नहीं।


The heart is bitter. And broken.
The heart is longing. And searching.

हम मशीनों को समझदार बना रहे हैं।
और अपना ख़ुद का दिल ही कुछ सोचने समझने के लायक नहीं रहता।
इतना बेवकूफ क्यों होता है दिल।

प्रेम, इश्क़, मुहब्बत…इन शब्दों से दिमाग़ में कोई इमेज नहीं बनती। एक ही सटीक शब्द होता था…बचपन में खूब सुना था…crush. 
क्या खतरनाक बला होती है ये कसम से! लगता है कोई ट्रक गुज़र गया है ख़ुद के ऊपर से…कभी लगता है धुर्मुस से कोई एकदम पूरे बदन को बराबर में कूट-कूट के मिट्टी बना गया है। लगता है कि मर के भी चैन नहीं आयेगा। और दुख तो इतना होता है, इतना होता है कि लगता है जान चली ही जाएगी इस बार।

लेकिन बच जाते हैं तो मन मेटाफर ढूँढता है।
कपूर की तरह होता है क्रश।
एक लौ लगती है और भभक के जलता है। जब तक आख़िरी कतरा हवा न हो जाये। कैसी ख़ुशबू होती है हथेली में। कैसा मोहक होता है उसका जलना। आरती लेते हैं, पानी से नीछते हैं। अर्घ्य ईश्वर तक पहुंचता है। हम कहते हैं, प्रभु…किसी और का दिल जला लो ना, इतने साल हो गए…और क्या बच्चे की जान लोगे! 

अपनी तासीर समझ आती है। हम प्यार मुहब्बत के लिए नहीं, यारी दोस्ती के लिए बने हैं। कितना ख़ुश रहते हैं दोस्तों के साथ। कितना कलपते हैं जब इश्क़ होता है। उसपर भी बिना किसी वार्निंग के। दिमाग़ इतने अल्टरनेट वर्ल्ड के इतने परम्यूटेशन कॉम्बिनेशन बनाता है कि core dump हो जाता है। समझ नहीं आता कि हम जो देख, सुन, समझ रहे हैं उसमें कितना सच का है और कितना हम ख़ुद मैन्युफैक्चर कर लिए हैं।

आग मेरी सबसे पसंदीदा चीज़ है और बर्फ शायद सबसे नापसंद। हम बहुत गर्मी में भी ठंढा पानी पी लें तो गला ख़राब हो जाता है। हम सिर्फ़ किसी परिचित के कहने पर बर्फ के टब में कूद जायें…ऐसे तो हैं हम…

बॉडी इतने शॉक में थी कि कुछ सोचने समझने तो रहने दो, महसूसने से भी परे थे। इसके लिए ही टर्म है, comfortably numb. दो घंटे की हाई इंटेंसिटी ट्रेनिंग की थी। बदन पूरा धीप रहा था। आसपास बर्फ के क्यूब्स थे। तो पानी तो ठंढा ही होगा। पर कुछ फील क्यों नहीं हो रहा! न बर्फ ठंढी लगी, ना उसका हाथ गर्म, जिसने हाथ थाम कर बर्फीले पानी से बाहर निकाला। दिल, दिमाग़, बदन…सब एक साथ काम करना बंद कर देते हैं कभी कभी।

क्या कहें, उस अजनबी से…तुम इतनी कड़वी सिगरेट न पिया करो, मेरा कलेजा जलता है! 
वो पलट के जो कह दे, लो बुझा दी तुम्हारे लिए...अब कभी नहीं पियेंगे। फिर? फिर क्या करेंगे हम!

हम Ice-Burst पीते हैं, क्या होता है उससे? दिल में जमे ग्लेशियर पिघलते हैं? नहीं ना...

हमेशा थोड़े कह सकते, तुम अच्छे लगते हो हमें...ये भी तो कह सकते हैं कभी कभी, पागल लगते हो!

फिर रहने ही दो ना...जान ही देनी है तो क्या फ़र्क़ पड़ता है कि क़ातिल का फ़ेवरिट क्या है...खुखरी, भाला, गोली...
या कि चुप्पी। 

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