25 May, 2011

खुदा कभी मेरा घर देखे

आग का दरिया, तेरी अर्थी
कैसे कैसे मंज़र देखे

राह के गहरे अंधियारे में
चुप्पे, सहमे, रहबर देखे 

तेरी आँखें सूखी जबसे
जलते हुए बवंडर देखे 

तेरी चिट्ठी जो भी लाये 
घायल वही कबूतर देखे 

पूजाघर की सांकल खोली
दुश्मन सारे अन्दर देखे 

गाँव से जब रिश्ता टूटा तो
रामायण के अक्षर देखे 

बनी हुयी मूरत ना देखी
सब हाथों में पत्थर देखे 

बसा हुआ है मंदिर मंदिर
खुदा कभी मेरा घर देखे 

16 comments:

  1. बेहद खूबसूरत ग़ज़ल..

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  2. ye aajmaaish achhi lagi... prashansaniya.


    arsh

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  3. बहुत खूबसूरत,
    भावनाएं शब्दों मैं उतर जाएँ ,
    तो कविता जी सी जाती हैं

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  4. राह के गहरे अंधियारे में
    चुप्पे, सहमे, रहबर देखे

    तेरी आँखें सूखी जबसे
    जलते हुए बवंडर देखे
    Harek pankti gazab hai!

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  5. तेरी चिट्ठी जो भी लाये
    घायल वही कबूतर देखे

    पूजाघर की सांकल खोली
    दुश्मन सारे अन्दर देखे
    अद्भुत। बेहतरीन।

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  7. अच्छी अभिव्यक्ति ......

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  8. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  9. पलट-पलट कर मैंने देखा

    कभी पलटकर तू गर देखे

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  10. छोटे बहर की बड़ी गज़ल।

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  11. wah kya bat hi....
    bahut hi khubsurat gazal...!
    bhawporn gazal ke liye badhai.

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