24 October, 2019

इतना काहे मुसकिया रही हो मोना लीसा?

मोना लीसा। दुनिया की सबसे प्रसिद्ध तस्वीर। इतिहास की किताब में यूरोप के रेनिसां के बारे में पढ़ते हुए कुछ तस्वीरों को देखा था। उस समय की उसकी मुस्कान में ऐसा कुछ ख़ास दिखा नहीं कि जिसके पीछे दुनिया पागल हो जाए। ख़ूबसूरती के पैमाने पर भी मोना लीसा कोई बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं थी। कमानीदार तो क्या, नॉर्मल भवें भी नहीं थी उसकी कि उस समय के फ़ैशन में भवें शेव कर लेना था। हमारी ख़ूबसूरती की परिभाषा से बिलकुल अलग मोना लीसा। हमारे लिए ख़ूबसूरती का पैमाना हमारी अपनी बणी-ठनी थी। क्या ही तीखी नाक, कमानिदार भवें, बड़ी बड़ी आँखें (साइड प्रोफ़ायल है, तो एक ही आँख दिख रही है), मेहंदी रचे हाथ, चूड़ियाँ, ऋंगार…माथे पर से घूँघट। ओह, कितनी ही सुंदर।

बाद के साल में भी कभी ना कभी न्यूज़ में मोना लीसा दिखती ही रही। किताब आयी, दा विंची कोड, इसने फिर से मोना लीसा को ख़बर में ला खड़ा किया। कितनी सारी थ्योरी भी पढ़ी, जिसमें एक ये भी थी कि मोना लीसा असल में लीयनार्डो का सेल्फ़ पोर्ट्रेट है। तब तक कुछ ऐसे लोगों से भी मिलना हो रखा था जिन्होंने मोना लीसा की पेंटिंग को प्रत्यक्ष देखा था। उन्होंने बताया कि पेंटिंग का आकार छोटा सा है और पेरिस के लूव्रे म्यूज़ीयम में सबसे ज़्यादा भीड़ उसी कमरे में होती है। उतने सारे लोगों के बीच, भीड़ में धक्का मुक्की करते हुए, कोई पाँच फ़ीट की दूरी से काँच की दीवार के पीछे लगे मोना लीसा के चित्र में कोई जादू, या कि मुस्कान में कोई रहस्य नहीं नज़र आता है। वे काफ़ी निराश हुए थे उसे देख कर।

मैं पिछले साल लूव्रे म्यूज़ीयम गयी थी। वाक़ई मोना लीसा की पेंटिंग आकार में छोटी थी और कमरे में कई कई लोग थे। अधिकतर लोग मोना लीसा को देखने से ज़्यादा अपनी सेल्फ़ी लेने में बिजी थे। मैं भी भीड़ में शामिल हुयी और लोगों के हटते हटते इंतज़ार किया कि सबसे आगे जा के देख सकूँ। वहाँ से मुझे तस्वीर लेने की नहीं, वाक़ई मोना लीसा को देखने की उत्कंठा थी। उसे सामने देखना वाक़ई जादू है। उसकी आँखें बहुत जीवंत हैं और मुस्कान वाक़ई सम्मोहित करने वाली। उसे देख कर हम वाक़ई जानना चाहते हैं कि आख़िर क्यूँ मुस्कुरा रही है वो ऐसे कि इतने सौ साल में भी उसकी मुस्कान का रंग फीका नहीं पड़ा। वो कैसी ख़ुशी है।

मोना लीसा के बारे में थ्योरी ये है कि जब ये पेंटिंग बनायी गयी, मोना लीसा गर्भवती थी। उसकी सूजी हुयी उँगलियों से ये अंदाज़ा लगाया जाता है, इससे भी कि उसने हाथ में अपने विवाह की अँगूठी नहीं पहनी हुयी है। कुछ तथ्यों के मुताबिक़ ये सही अनुमान है। उसकी मुस्कान के इतने शेड्स इसलिए हैं कि वो अपने अजन्मे बच्चे के बारे में सोच रही है। कई सारी बातें। उसके भविष्य के सपने देख रही है। अपने प्रसव को लेकर चिंतित है। शायद कुछ शारीरिक कष्ट में भी हो। मन में ही ईश्वर से प्रार्थना कर रही है कि सब कुछ अच्छा हो। कई सारी बातों को सोचती हुयी मोना लीसा मुस्कुरा रही है। उसके चेहरे पर दो लोगों - दो आत्माओं के होने की मुस्कान भी है, मोना लीसा और उसके अजन्मे बच्चे की। लीयनार्डो ने इन सारी बातों में खिलती हुयी मुस्कान को उसी रहस्य के साथ अजर - अमर कर दिया है।

मोना लीसा को देख कर मैं भूल नहीं पायी। मैं उतनी देर पेंटिंग के सामने खड़ी रही, जितनी देर के बाद बाक़ी लोगों को दिक्कत होने लगती। वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था। उस पेंटिंग की अपनी आत्मा थी। अपना जादू, अपना तिलिस्म जो बाँध लेता था। लेकिन जैसे कि कोई आपसे बात करना चाह रहा हो और आप अपने में ही खोए या व्यस्त हों तो आप पर उसकी बात का क्या असर होगा…फिर वो व्यक्ति भी तो आपसे बात करने में इंट्रेस्टेड नहीं होगा। मोना लीसा के रहस्य को सुनने के लिए नोट्बुक का ख़ाली पन्ना खुला रखना होता है। वो कहती है कई कहानियाँ। खुली खिड़की के पीछे नज़र आते शहर की, अपनी ख़ूबसूरती की, अपने होने वाले बच्चे के सोचे हुए नाम भी बता देगी आपको … हो सकता है पूछ भी ले, कि कोई नाम तुम भी बताते जाओ मुसाफ़िर।

उस हॉल में अजीब उदासी फ़ील होती है। जैसे मोना लीसा तन्हा हो। इस भीड़ में सब उसे देखते हैं, अपने अपने पैमाने पर नापते हैं कि कितनी सुंदर है, कैसी मुस्कान है…कुछ लोगों को विजयी भी फ़ील होता है कि मोना लीसा की स्माइल उन्हें अफ़ेक्ट नहीं कर पायी। मुझे ऐसे लोगों पर तरस आता है। ये वही लोग हैं जो अपनी ज़िंदगी में मौजूदा प्यार को या कि ख़ूबसूरती को देख नहीं पाते। जिन्हें शाम देखे ज़माने गुज़र गए हैं। जो गुनगुनाना भूल गए हैं। मोना लीसा हमें याद दिलाती है कि ख़ूबसूरती ज़िंदगी का कितना ज़रूरी हिस्सा है। समझ नहीं आने के बावजूद। जैसे गार्डेंज़ में लगे हुए ट्युलिप… उनकी ख़ूबसूरती और रंग देख कर हम सवाल थोड़े करते हैं कि इसका क्या मतलब है। बस रंग के उस रक़्स में खड़े सोचते हैं, दुनिया कितनी ख़ूबसूरत है। अपने दिल में थोड़े रंग भर लेते हैं। थोड़ी ख़ुशी। कि कई कई साल बाद भी पेंटिंग के रंग जस के तस रहेंगे। उस मुस्कान का जादू भी।

कि सबकी ज़िंदगी में कोई ऐसी मोना लीसा हो। जो किसी शाम आपको देख कर मुस्कुराए तो आप भारी कन्फ़्यूज़ हुए जाएँ कि अब मैंने क्या ग़लती कर दी। और अगर आप शादी शुदा हैं और आपकी बीवी आपको देख कर ऐसे रहस्यमयी मुस्कान मुस्कुरा रही है तो समझ जाएँ, कि इन दिनों इसका एक ही मतलब है। चुपचाप झाड़ू या कि डस्टर उठाएँ और साफ़ सफ़ाई करने चल दें। दुनिया की सारी ख़ुशी एक साफ़ सुथरे घर में बसती है। या कि अगर आप लतख़ोर क़िस्म के इंसान हैं और मम्मी दो हफ़्ते से धमका रही है तो अब दिवाली बस आ ही गयी है, अब भी रूम साफ़ नहीं करने पर कुटाई होने का घनघोर चांस है। मोना लीसा आपको हरगिज़ नहीं बचा पाएगी। और जो कहीं अगर आप दीदी के साथ रूम शेयर करते हैं तब तो सोच लीजिए, दीदी ग़ुस्सा हुयी तो साल भर की सारी सीक्रेट्स की पोल-पट्टी खोल देगी। भले आदमी बनिए। मौसम सफ़ाई का है, सफ़ाई कीजिए। पढ़ना लिखना और कम्प्यूटर के सामने बैठ कर किटिर-पिटिर तो साल भर चलता ही रहता है।

PS: वैसे एक ज़रूरी बात बता दें। एक फ़्रेंच एंजिनियर ने बहुत रिसर्च करके पता लगाया कि पहले पेंटिंग में भवें थीं। लेकिन ज़्यादा साफ़ सफ़ाई के कारण वे मिट गयीं। फ़ालतू का ट्रिविया ऐसे ही। जाइए जाइए। इसके पहले कि मम्मी या कि बीवी या कि बहन की भवें तनें, सफ़ाई में जुटिए। 

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