02 October, 2019

तितली की बहन तिकनी

हम अगर बात नहीं करते हैं तो कई सारे शब्द खो जाते हैं। बात करना यानी कि सामने सामने से बात करना। पिछले कोई 11-12 साल से मैं बैंगलोर में हूँ। मेरी बोल-चाल की भाषा में कई नए शब्द जुड़े हैं जो यहाँ ज़्यादा बोले जाते हैं। टेक्नॉलजी, इवेंट, स्ट्रैटेजी, कम्यूनिकेशन, ईमेल, मोबाइल ऐप, इन्वेस्टर, लौंग वीकेंड, लौंग ड्राइव, चिलिंग, व्हिस्की, पब, सिगरेट, जींस, स्मार्ट वाच, आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स और entrepreneurship जैसे कई कई शब्द। ग़ौर करने पर देखती हूँ, इनमें अधिकतर अंग्रेज़ी के शब्द हैं। मैं जितने शहर घूमी हूँ और हमारे शहर जिस तरह से बदले हैं, तो मेट्रो, मौसम, ट्रेन स्टेशन, न्यू यॉर्क, पेरिस, डैलस, अमरीका, सीपी, फ़ोटोग्राफ़ी, ह्यूस्टन, टैक्सी, फ़ॉल, पोस्टकार्ड, स्टैम्प, म्यूज़ीयम, मैप, टाइम ज़ोन ... कई शब्द जो मैंने हाल फ़िलहाल में ज़्यादा इस्तेमाल किए हैं। हम जिन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वे हमारी ज़िंदगी की कहानी बयान कर सकते हैं। किसी से थोड़ी देर बात करके पता चल जाएगा वो किस फ़ील्ड में काम करती है, उसकी पसंद क्या रही है, उसकी ज़िंदगी में किस तरह के शहर रहे हैं...अगर आप मेरी तरह थोड़े observant हुए तो। 

मैं लिखे हुए शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर सकती। किताब में पढ़ा कोई शब्द मुझे ज़िंदा नहीं लगता। जैसे निर्मल की ‘एक चिथड़ा सुख’ में चहबच्चे शब्द का इतना इस्तेमाल है कि दो तीन बार तो इस शब्द के खटकने के कारण मैं किताब पढ़ नहीं पायी। हम पढ़ते हुए कई नए शब्दों और उनके इस्तेमाल तक पहुँचते हैं, लेकिन मेरे लिए जब तक वे शब्द मैंने किसी से बातचीत में नहीं सुने हैं, मैं उन्हें इस्तेमाल नहीं कर सकती। ब्लॉग या फ़ेस्बुक, इससे अलग है… मेरे कुछ पसंदीदा लेखक भी। चूँकि उनसे मिल चुकी हूँ, या उनसे बात होती रहती है, मैं जब उनका लिखा पढ़ती हूँ तो कई बार लगता है उन्हें बोलते हुए सुन रही हूँ। इसका और कोई ठीक ठीक स्पष्टीकरण नहीं है मेरे पास कि ऐसा कैसे है। बस है। 

बहुत साल पहले जब मैं बैंगलोर आयी थी तो बहुत बातूनी थी। लोगों को टोक कर बात कर लेती थी, हँसती मुस्कुराती ज़्यादा थी। ख़ुश ज़्यादा रहती थी। मेरे इर्द गिर्द एक एनर्जी बबल रहता था। बहुत हाइपर क़िस्म के लोगों में आती थी। कुछ उम्र की बात थी, कुछ शहर की। शायद दिल्ली में रहती तो बहुत हद तक वैसी ही रहती। बैंगलोर में ऑफ़िस में अधिकतर लोग अंग्रेज़ी में बात करने वाले मिले। परायी भाषा में आप जानकारी का आदान प्रदान कर लेते हैं, सम्बंध नहीं जोड़ पाते। उसके लिए ज़रूरी है हम उस भाषा में बात करें जो हमारी अपनी हो। मुझे अपने जीवन में इसका एक ही अपवाद मिला है और वो कुछ ऐसा था कि उसके लिए एक पूरी कहानी लिखनी पड़ी। मेरे और उसके बीच बहुत सा संगीत भी था, इसलिए शायद भाषा की ज़्यादा ज़रूरत महसूस नहीं हुयी। अभी भी दिल्ली जाती हूँ तो कोई और हो जाती हूँ, ऐसा हमेशा लगता है। भले अंग्रेज़ी मेरी सेकंड लैंग्विज रही हो और कॉन्वेंट स्कूल में लगभग std 9 से इसका नियमित इस्तेमाल स्कूल, कॉलेज और फिर ऑफ़िस में किया है लेकिन अभी भी हिंदी में बोलना ज़्यादा आसान है। सहज है। 

कई सारे शब्द हमारे इस्तेमाल से बाहर होते हैं क्यूँकि वे वस्तुएँ हमें नहीं दिखतीं तो हम उनके बारे में बात नहीं करते। या कई बार वे लोग नहीं होते जिनसे हम उन चीज़ों के बारे में बात कर सकें, जिन्हें उससे फ़र्क़ पड़ता है। मैं लिख के सहेजना चाहती हूँ बहुत सारा कुछ जो शायद मेरे बहुत से दोस्त होते तो सिर्फ़ कह लेती उनसे और बात ख़त्म हो जाती। लिखने को तब भी बहुत कुछ बचता, लेकिन तब मैं इतना नियमित नहीं लिखती। लिखना एक आदत बनती गयी इस शहर के अकेलेपन के कई साल में। It’s strange, actually. कि इतने साल में भी शहर में ऐसे लोग नहीं जिनसे नियमित मिल सकूँ। कुछ इसलिए भी कि पसंद के लोग शहर छोड़ कर चले भी गए हैं। मैं बात करना भूलती जा रही हूँ और ये बात मेरे लिखने में भी मुझे महसूस होती है कि मेरे किरदार भी बात करने की जगह चुपचाप बैठ कर कहीं एक सिगरेट पीना चाहते हैं… किसी सोलो बाइक ट्रिप पर जाना चाहते हैं… कॉफ़ीशॉप में किसी किताब को पढ़ते हुए या चिट्ठी लिखते हुए अकेले रहते हैं। अपने अकेलेपन में रचे-बसे किरदार। उनके इस इर्द गिर्द में जगह बनाने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी होती है। 

खो जाना सिर्फ़ वस्तुओं का नहीं होता। खो जाना रिश्तों का भी होता है, उस छोटी सी उम्मीद या आदत का भी जिसमें लोग शुमार होते हैं। दिल्ली जाती हूँ तो इतना मालूम होता है कि न सही, शाम थोड़ी देर मिल सकते हैं किसी से। अगर ऐसे किसी शहर में रहती, तो हफ़्ते में एक बार तो किसी ना किसी से मिलने का प्रोग्राम बनता ही। फ़िल्में, नाटक, लिटरेचर फ़ेस्टिवल, फ़िल्म फ़ेस्टिवल जैसी चीजों के साथ अकेले जाना नहीं, किसी के साथ जाना और फिर डिस्कस करने, इंतज़ार करने की बातें भी जुड़ी होतीं। ये सब अचानक नहीं हुआ है लेकिन पिछले कुछ सालों में शहर ने मुझे बेतरह तन्हा किया है। हुआ ये, कि पिछले कुछ साल दिल्ली गयी तो ये देखा कि ज़िंदगी कुछ और भी हो सकती थी। 

मुझे लिखने को अच्छा काग़ज़ चाहिए होता है। मूड के हिसाब से सफ़ेद, आइवरी, पीला या नीला। मैंने अधिकतर ऐसे रंग के काग़ज़ पर ही लिखा है। कुछ दिन पहले चिट्ठियाँ लिखने का काग़ज़ मँगाया जो कि बहुत महँगा था। आजकल उसपर थोड़ा थोड़ा लिख रही हूँ। उस काग़ज़ के ऊपर ड्रैगनफ़्लाई बनी हैं। हल्के फ़िरोज़ी रंग में। कल मैंने लिखते हुए तितलियों की बात लिखी… किसी ने ट्विटर पर लिखा ये ड्रैगनफ़्लाई हैं… मुझे मालूम है ये क्या हैं। उस व्यक्ति का ऐसा पोईंट करना मुझे अखर गया। कि इन्हें तितलियों से कन्फ़्यूज़ नहीं कर सकते लेकिन बचपन में इनको तितली ही बोलते थे, या ऐसा ही कुछ, सो याद था मुझे। ड्रैगनफ़्लाई तो कोई नहीं बोलता था, तो मैं चाहूँ भी तो लिखने में इस शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकती… और जो शब्द था, बचपन का ठीक-ठीक, वो याद नहीं आ रहा। 

इस तरह कितने शब्द हैं जो रोज़मर्रा के हिस्से से खो गए हैं। यहाँ ये वाली तितली दिखती नहीं है, सो इसके बारे में बात भी नहीं करते हैं। इसी तरह रोज़ के इस्तेमाल की चीज़ में खोयी एक चीज़ है हँसुआ। मम्मी लोग खड़े होकर सब्ज़ी काट नहीं सकती थी। टेक्निक्ली बैठ कर सब्ज़ी काटना आसान भी ज़्यादा होता है, हम शरीर के भार का इस्तमाल करते हुए जब हँसुआ से सब्ज़ी काटते हैं तो कलाई पर ज़ोर कम लगता है। चाक़ू से सब्ज़ी काटने में मेहनत भी ज़्यादा लगती है और वक़्त भी। चुक्कु-मुक्कु या पीढ़ा पर बैठनने से हेल्थ भी बेहतर रहती थी। मैं कई सारे देसी शब्दों को बहुत मिस करती हूँ। गाँव आना जाना भी एकदम बंद हो गया है, एक ये कारण भी है। जैसे पगडंडी को हम बचपन में कच्चा रास्ता बोलते थे। याद करूँगी तो ऐसे कई शब्द याद आएँगे और ऐसे कई शब्द होंगे जो एकदम याद नहीं आएँगे। जैसे ड्रैगन्फ़्लाई। 

दोस्त लोग को रात में मेसेज किए थे, सुबह दीदी लोग से बतियाए, बचकन सबको भी पूछे, कि क्या बोलते हैं इसको। इधर उधर whatsapp मेसिज किए। घर में सब जानता है कि हम थोड़े सटके हुए हैं तो भोरे भोर ड्रैगनफ़्लाई का हिंदी पूछने लगते हैं तो घबराता नहीं है। इसका अलग अलग वर्ज़न मिला। सिकिया/सुकिया बोलते हैं कि इसका लम्बा पूँछ सिक्की जैसा दिखता है। सिक्की माने सीधी, पतली रेखा जैसी कोई चीज़। जैसे सिकिया झाड़ू नारियल झाड़ू को बोलते हैं। बचपन में कान का छेद बंद न हो जाए इसलिए नीम का सिक्की डालते थे उसमें। दूसरा नाम मिला टुकनी या तिकनी जो कि तितली से मिलता जुलता नाम है। टुकनी शायद इसलिए भी होगा कि इसका बहुत बड़ा बड़ा आँख होता है और ऐसा लगता है जैसे देख रही है। याद करने का कोशिश करते हैं लेकिन बचपन में ये दिखती तो है, इसको क्या बोलते थे, वो याद नहीं आता। बदमाश बच्चा लोग इसको पकड़ कर इसके पूँछ में धागा बाँध के पतंग जैसा उड़ाता भी था इसको। हम लोग कभी कभी पंख से पकड़ के इसको किसी के पास ले जाते थे, इसका पैर से गुदगुदी लगता था। मम्मी देख के हमेशा डाँट देती थी। किसी जीव को कष्ट देना ग़लत काम में आता था। 

पिछले कुछ साल में देवघर जाती भी हूँ तो ससुराल जाती हूँ बस। वहाँ इतना बड़ा संयुक्त परिवार है कि दो हफ़्ते की छुट्टी में सबसे आपस में ही बात-चीत करते करते छुट्टी ख़त्म हो जाती है। सोच रही हूँ, समय निकाल कर गाँव जाने का प्रोग्राम रखूँ साल में एक बार कमसे कम। किसी एक त्योहार में। दुर्गा पूजा जैसे कि हमको बहुत पसंद है। गाँव का मेला। वहाँ की अलग मिठाइयाँ। वैसे उसका भी रूप रंग इतने साल में बदल गया होगा बहुत हद तक, फिर भी। अपनी भाषा, अपनी ज़मीन से जुड़ा रहना भी ज़रूरी है कि हमारे लिखने का ही नहीं, हमारे जीवन का पोषण भी वहीं से होता है। बंजारामिज़ाजी अच्छी है। लेकिन लौट के आने को एक घर, एक भाषा होनी चाहिए।

ये खोज भी अपने अंदर थोड़ी सी बची रहे तो एक रोज़ बाक़ी सब आ जाएगा, धीरे धीरे। 

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 3.10.2019 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3477 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  2. स्याही वाकई खूबसूरत है।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वगात है।
    iwillrocknow.com

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  3. बहुत सुन्दर

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