
जिंदगी में दो बार हुआ है कि मैं ख़ुद पे फ़िदा हो गई हूँ...
पहली बार तो अपने 12th के farewell के लिए साड़ी पहनी थी, जिंदगी में पहली बार। और जब आइना देखा तो मंत्रमुग्ध सी देखती रह गई, कि ये मैं ही हूँ क्या...शायद तरुणाई की आहट पहली बार महसूस हुयी थी। वैसे भी वो उम्र होती है आइना देखने की, सजने सँवरने की पर मुझे उस दिन से पहले कभी फुरसत नहीं मिली थी। भाइयों के साथ कभी पेड़ों पर टँगी पायी जाती तो कभी शर्त लगाती कि आंगन की ऊँची सी दीवार पर सब से पहले कौन चढ़ सकता है। और इन खुराफातों से फुरसत मिलती थी तो आराम से सीटी बजती कभी फील्ड में घूमती रहती, माँ कहती रहती कि कब लड़की के गुण आयेंगे इसमें। मुहल्ले के लड़के भी छेड़ते कि कभी तो लगे कि पड़ोस में कोई लड़की रहती है लगता है कि और एक लड़का ही रहता है, कभी सीटी मारती हो कभी लंघी मारती हो सुधर जाओ कौन शादी करेगा तुमसे। मुझे बड़ा मज़ा आता था, क्लास में भी जब बाकी लड़कियां कॉस्मोपोलिटन की बातें discuss करती थी मैं बोरे हो जाती थी, और बड़ा अजीब सा लगता था। कभी कभी जरूर मैं भी उस खुसुर पुसर में लगी हूँ पर ज्यादा मन नहीं लगता।
मेरे लिए बातें थी कि मुझे मोटरसाईकिल क्यों नहीं चलने मिलता है, एक्सीडेंट करुँगी तो देखा जायेगा, बाकी लोगो कि मुझे परवाह नहीं थी कि मेरी बाईक से ठुक के बेचारों के शरीर में कितनी हड्डियाँ बचेंगी. वैसे तो मैं साईकिल पर भी चलती थी तो लोग मुझे रास्ता दे देते थे और तो और बस चलता तो शायद रास्ते के सारे खम्भे भी हट जाते, पता नहीं कितनी बार मैं टकरा चुकी थी. पर मुझे इसमें भी मज़ा आता था. लोग मुझे हेलीकॉप्टर कहते थे, झाँसी की रानी और आफत भूचाल टाइप की हुआ करती थी मैं. मेरे रास्ते पड़ने वालो की शामत.
पर इन सबके बीच अचानक से मेरा farewell आ गया, और जैसा की सब पहनते थे माँ ने मुझे भी साड़ी पहना के तैयार कर दिया, पर झटका तो तब लगा जब सामने देखा। एक पल को तो लगा की कोई और खड़ी है. फ़िर आंखें खुली और महसूस हुआ की ये जो इत्त्तीई सुन्दर लड़की है आईने में, मैं ही हूँ...और शायद जिंदगी में पहली बार मैं शरमा गई...
खैर वो लड़कपन के दिनों तो अब क्या आयेंगे...पढ़ाई और अब जॉब में इतना व्यस्त हो गई की ध्यान ही नहीं रहा फ़िर से ख़ुद को देखने का. इधर कुछ दोस्त आए थे मुम्बई से, उन्हें कुतुब मीनार दिखाना था, तो चल पड़े हम. क्या धूप थी, बाप रे!!!पर मज़ा बहुत आया, और उससे भी ज्यादा आया जब फोटो देखी...धूप में ऐसा खिला हुआ था जैसे सूरजमुखी...लगा की ये मैं ही हूँ...उजली खिली हुयी सी, धूप गर्मी से बेखबर...खिलखिलाती हुयी...चंचल हँसती हुयी...
अपने इस बेलौसपने पर मैं फ़िर से फ़िदा हो गई :)