12 December, 2011

दिल्ली मेरी जान...उफ्फ्फ दिल्ली मेरी जान!

वो कहते हैं तुम्हारे जन्म को इतने साल हो गए, उतने साल हो गए...मगर दिल्ली मेरी जान...मेरे लिए तो तुम जन्मी थी उसी दिन जिस दिन पहली बार मैंने तुम्हारी मिटटी पर पैर रखा था...उसी लम्हे दिल में तुम्हारी नन्ही सी याद का चेहरा उगा था पहली बार...वही चेहरा जो कई सालों तक लौट लौट उगता रहा पार्थसारथी के चाँद में.

तुम मुझमें किसी अंकुर की तरह उगी जिससे मैंने तब से प्यार किया जबसे उसके पहले नन्हे हरियाले पत्तों ने मेरी ओर पहली बार मासूमियत से टुकुर टुकुर देखा...तुम्हारी जड़ें मेरे दिल को अपने गिरफ्त में यूँ लेती गयीं जैसे तुम्हारी सडकें मेरे पांवों को...दूर दूर पेड़ों के बीच जेऐनयु में चलती रही और तुम मेरे मन में किसी फिल्म की तरह दृश्य, रंग, गंध, स्वाद सब मिला कर इकठ्ठा होती गयी.

अब तो तुम्हारा इत्र सा बन गया है, जिसे मैं बस हल्का सा अपनी उँगलियों से गर्दन के पास लगाती हूँ और डूबती सी जाती हूँ...तुमसे इश्क कई जन्मों पुराना लगता है...उतना ही पुराना जितना आरके पुरम की वो बावली है जिसे देख कर मुझे लगा था कि किसी जन्म में मैं यहाँ पक्का अपने महबूब की गोद में सर रखे शामें इकठ्ठा किया करती थी. पत्थर की वो सीढियां जो कितनी गहरी थीं...कितनी ऊँची और बेतरतीब...उनपर नंगे पाँव उतरी थी और लम्हा लम्हा मैं बुत बनती जा रही थी...वो तो मेरे दोस्त थे कि मुझे उस तिलिस्म से खींच लाये वरना मैं वहीँ की हो कर रह जाती.

तुम्हें मैं जिस उम्र में मिली थी तुमसे इश्क न होने की कोई वजह नहीं थी...उस अल्हड लड़की को हर खूबसूरत चीज़ से प्यार था और तुम तो बिछड़े यार की तरह मिली थी मुझसे...बाँहें फैला कर. तुम्हारे साथ पहली बारिश का भीगना था...आसमान की ओर आँखें उठा कर तुम्हारी मिटटी और तुम्हारे आसमान से कहना कि मुझे तुमसे बेपनाह मुहब्बत है.

आईआईएमसी की लाल दीवारें मुहब्बत के रंग में लाल थी...वो बेहद बड़ी इमारत नहीं थी, छोटी सी पर उतनी छोटी कि जैसे वालेट में रखा महबूब का पासपोर्ट साइज़ फोटो...कि जिसे जब ख्वाइश हो निकल कर होठों से लगा लिया और फिर दुनिया की नज़र से छुपा पर वापस जींस की पीछे वाली जेब में, कि जहाँ किसी जेबकतरे का हाथ न पहुँच सके. उफ़ दिल्ली, तुम्हें कैसे सकेरती हूँ कि तुम्हारी कोई तस्वीर भी नहीं है जिसे आँखों से लगा कर सुकून आये.

दिल्ली मेरी जान...तुम मेरी तन्हाइयों का सुकून, मेरी शामों की बेकरारी और मेरी जिंदगी का सबसे खुशनुमा पन्ना हो...तुमसे मुझे दिल-ओ-जान से मुहब्बत है और तुम्हें क्या बताऊँ कि कैसी तड़प है तुम्हारी बांहों में फिर से लौट आने की.

दिल्ली तेरी गलियों का, वो इश्क़ याद आता है...
पुराने फोल्डर्स में देखती हूँ तो एक शाम का कतरा मिला है...पार्थसारथी का...अपने लिए सहेज कर यहाँ लगा रही हूँ...गौर से अगर देखोगी तो इस चेहरे को अपने इश्क में डूबा हुआ पाओगी...और हालाँकि ये लड़की बहुत खूबसूरत नहीं है...पर इश्क करते हुए लोग बड़े मासूम और भले से लगते हैं.

दिल्ली मेरी जान...उफ्फ्फ दिल्ली मेरी जान!

10 December, 2011

वसीयत

मौत की सम्मोहक आँखों में देखते हुए मैं तुम्हें बार बार याद करती हूँ...इत्मीनान है कि तुम्हें आज शाम विदा कह चुकी हूँ...बता भी चुकी हूँ कि तुमसे कितना प्यार करती हूँ...दोनों बाँहों के फ़ैलाने से जितना क्षेत्रफल घिरता है, उतना...मेरे ख्याल से इतने प्यार पर तुम अपनी बची हुयी जिंदगी बड़े आराम से काट लोगे...मुझे यकीन है...तुम बस याद रखना कि ये वाक्य संरचना नहीं बदलेगी 'मैं तुमसे प्यार करती हूँ' कभी भी 'मैं तुमसे प्यार करती थी' नहीं होगा. मेरे होने न होने से प्यार पर कोई असर नहीं होगा.

मैं ऐसे ही मर जाना चाहती हूँ, तुम्हारे इश्क में लबरेज़...तुम्हारी आवाज़ के जादू में गुम...तुम्हारे यकीन के काँधे पर सर रखे हुए कि तुम मुझसे प्यार करते हो. इश्क के इस पौधे पर पहली वसंत के फूल खिले हैं...यहाँ पतझड़ आये इसके पहले मुझे रुखसत होना है...तुम ये फूल समेट कर मेरे उस धानी दुपट्टे में बाँध दो...मेरे जाने के बाद दुपट्टे से फूल निकाल कर रख लेना और दुपट्टा अपने गाँव की नदी में प्रवाहित कर देना...उसके बाद तुम जब भी नदी किनारे बैठोगे तुम्हें कहीं बहुत दूर मैं धान के खेत में अपना दुपट्टा हवा में लहराते हुए, मेड़ पर फूल से पाँव धरते नज़र आउंगी. मेरा पीछा मत करना...मेरा देश उस वक़्त बहुत दूर होगा.

यकीन करना कि मैं कहीं नहीं जा रही...तुम्हारे आसपास कहीं रहूंगी...हमेशा...हाँ ध्यान रखना, मेरी याद में आँखें भर आयें तो उस रात पीना नहीं...कि खारा पानी व्हिस्की का स्वाद ख़राब कर देता है और तुम तो जानते ही हो कि व्हिस्की को लेकर मैं कितना 'टची' हो जाती हूँ. तुम्हें ऐसा लगेगा कि मैं ये सब नहीं देख रही तो मैं आज बता देती हूँ कि मरने के बाद तो मैं और भी तुम्हारे पास आ जाउंगी...आत्मा पर तो जिस्म का बंधन भी नहीं होता, न वक़्त और समाज की बंदिशें होती हैं उसपर...एकदम आज़ाद...मेरे प्यार की तरह...मेरे मन की तरह. 

जिंदगी जितनी छोटी होती है, उतनी ही सान्द्र होती है...तुम तो मेरे पसंद के सारे लोगों को जानते हो कि जो कम उम्र में मर गए...कर्ट कोबेन, दुष्यंत कुमार, गुरुदत्त, मीना कुमारी...उनकी आँखों में जिंदगी की कितनी चमक थी...जिसके हिस्से जितनी कम जिंदगी होती है उसकी आँखों में खुदा उतनी ही चमक भर देता है. तुमने तो मेरी आँखें देखी हैं...क्या लगता है मेरी उम्र कितने साल है?

इतनी शिद्दत से किसी को प्यार करने के बाद जिंदगी में क्या बाकी रह जाता है कि जिसके लिए जिया जाए...मैं नहीं चाहती कि इस प्यार में कुछ टूटे...मुझे इस प्यार के परफेक्ट होने का छलावा लिए जाने दो. मैं टूट जाने से इतना डरती हों कि वक़्त ही नहीं दूँगी ये देखने के लिए कि हो सकता है इस प्यार में वक़्त के सारे तूफ़ान झेल लेने की ताकत हो. 

मुझे चले जाने से बस एक चीज़ रोक रही है...फ़र्ज़ करो कि तुमने मेरे ख़त नहीं पढ़े हैं...ये ख़त भी तुम तक नहीं पहुंचा है...अपने दिल पर हाथ रख के जवाब दो, तुम्हें पूरा यकीन है तो सही कि मैं तुमसे बेइंतेहा प्यार करती हूँ या कि मेरे जाने के बाद कन्फ्यूज हो जाओगे? 
मेरे बाद की कोई शाम...




मैं तुम्हारे नाम अपनी बची हुयी धड़कनें करती हूँ...कि मोल लो इनसे इश्क के बाज़ार में तुम्हें जो भी मिले...याद का सामान जुगाड़ लो कि भूली हुयी शामों में राहत हो कि एक पागल लड़की ने चंद छोटे लम्हों के लिए सही...तुम्हें प्यार बहुत टूट के किया था. 

09 December, 2011

मौन की भाषा में 'आई लव यू' कहना...

कैसा होता होगा तुम्हें मौन की भाषा में 'आई लव यू' कहना...जब कि बहुत तेज़ बारिश हो रही हो और हम किसी जंगल के पास वाले कैफे में बैठे हों...बहुत सी बातें हो हमारे दरमियाँ जिसमें ये भी बात शामिल हो कि जनवरी की सर्द सुबहों में ये आसमान तक के ऊंचे पेड़ बर्फ से ढक जाते हैं.

एक सुबह चलना शुरू करते हुए जंगल ख़त्म न हो पर दिन अपनी गठरी उठा कर वापस जाता रहे...उस वक़्त कहीं दूर रौशनी दिखे और हम वहां जा के शाम गुजारने के बारे में सोचें. किसी ठंढे और शुष्क देश में ऐसा जंगल हो जिसमें आवाजें रास्ता भूल जाया करें. कैफे में गर्म भाप उठाती गर्म चोकोलेट मिलती है...कैफे का मालिक एक मझोले से कद का मुस्कुराती आँखों वाला बूढ़ा है...वो मुझसे पूछता है कि क्या मैं चोकलेट में व्हिस्की भी पसंद करुँगी...मेरे हाँ में सर हिलाने पर वो तुम्हारा ड्रिंक पूछता है...तुम उसे क्या लाने को कहते हो मुझे याद नहीं आता. शायद तुम हर बार की तरह इस बार भी किसी अजनबी से कहते हो कि अपनी पसंदीदा शराब लाये. लोग जिस चीज़ को खुद पसंद करते हैं, उसे सर्व करते हुए उसमें उनकी पसंद का स्वाद भी 'घुल जाता है.

उस अनजान देश में...जहाँ मैं तुम्हारे अलावा किसी को नहीं जानती...जहाँ शायद कोई भी किसी को नहीं जानता, वो बूढ़ा हमें बेहद आत्मीय लगता है. बाहर बेतरह बारिशें गिरने लगी हैं और ऐसा लगता है कि आज रात यहाँ से कोई और राह नहीं जन्मेगी. बारिश का शोर हर आवाज़ को डुबो देता है और मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे मैं सामने कुर्सी पर नहीं, तुम्हारे पास बैठी हूँ, तुम्हारी बाहों के घेरे में...जहाँ तुम्हारी धड़कनों के अलावा कोई भी आवाज़ नहीं है और वक़्त की इकाई तुम्हारी आती जाती सांसें हैं.

जब कोई आवाजें नहीं होती हैं तो मन दूसरी इन्द्रियों की ओर भटकता है और कुछ खुशबुयें जेहन में तैरने लगती हैं...तुम्हारी खुशबू से एक बहुत पुराना वक़्त याद आता है...बेहद गर्म लू चलने के मौसम होते थे...जून के महीने में अपने कमरे सोयी रहूँ और पहली बारिश की खुशबू से नींद खुले...तुम्हारे इर्द गिर्द वैसा ही महसूस होता है जैसे अब रोपनी होने वाली है और धान के खेत पानी से पट गए हैं. गहरी सांस लेती हूँ अपने मन को संयत करने के लिए जिसमें तुम्हारा प्यार दबे पाँव उगने लगा है.

मुझे आज शाम ही मालूम पड़ा है कि नीला रंग तुम्हें भी बेहद पसंद है...मैं अनजाने अपने दुपट्टे के छोर को उँगलियों में बाँधने लगी हूँ पर मन कहीं बंधता नहीं...सवाल पूछता है कि आज नीले रंग के सूट में तुमसे मिलने क्यूँ आई...मन का मिलना भी कुछ होता है क्या. सोचने लगती हूँ कि मैं तुम्हें अच्छी लग रही होउंगी क्या...वैसे ही जैसे तुम मुझे अच्छे लगने लगे थे, जब पहली बार तुम्हें जाना था तब से. आई तो थी यहाँ लेखक से मिलने, ये कब सोचा था कि उस शख्स से प्यार भी हो सकता है. सोचा ये भी तो कहाँ था कि तुम फ़िल्मी परदे के किसी राजकुमार से दिखोगे...या कि तुम्हारी आँखें मेरी आँखों से यूँ उलझने लगेंगी.

मैं अब भी ठुड्डी पर हाथ टिका तुमसे बातें कर रही हूँ बस मन का पैरलल ट्रैक थोड़ा परेशान कर रहा है. तुमसे पूछती हूँ कि तुम्हें उँगलियों की भाषा आती है क्या...और सुकून होता है कि नहीं आती...तो फिर मैं तुम्हारे पास बैठती हूँ और तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेती हूँ...हथेली के पीछे वाले हिस्से पर उँगलियों से लिखती हूँ 'I' और पूछती हूँ कि ये पढ़ पाए...तुम न में सर हिलाते हो...फिर मैं बहुत सोच कर आगे के चार अक्षर लिखती हूँ L-O-V-E...तुम्हें गुदगुदी लगती है और तुम हाथ छुड़ा कर हंसने लगते हो. मुझे लगता है कि जैसे मैं घर में बच्चों को लूडो खेलने के नियम सिखा रही हूँ, जानते हुए कि वो अपने नियम बना के खेलेंगे...आखिरी शब्द है...और सबसे जरूरी भी...तीन अक्षर...Y-O-U. तुम्हारे फिर इनकार में सर हिलाने के बावजूद मुझे डर लग जाता है कि तुम समझ गए हो.










तुमसे वो पहली और आखिरी बार मिलना था...वैसे हसीन इत्तिफाक फिर कभी जिंदगी में होंगे या नहीं मालूम नहीं...मैं अपनी रूह के दरवाजे बंद करती हूँ कि तुम्हारी इस एक मुलाकात के उजाले में जिंदगी की उदास और याद की तनहा शामें काटनी हैं मुझे. यकीन की मिटटी पर तुम्हारे हाथ के रोपे गुलाब में फूल आये हैं...इस खुशबू से मेरी जिंदगी खुशनुमा है कि मैंने तुमसे कह दिया है कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ. 

08 December, 2011

भूल तो नहीं जाओगी?

भूल जाउंगी तुम्हें...

जैसे लड़की भूलती है
सरस्वती पूजा के मंडप पर
रखना
आम के बौर 

जैसे मंदिर भूल जाए
सुबह सुबह की घंटी
और लड़की के कंठ में फूटता
अलौकिक प्रेम का कोई स्वर 

जैसे लड़की फिर से भूल जाए
गुरुवार को ओढ़ना 
अपना वासंती दुपट्टा
तुम्हारे प्यार में रंगने पर भी 

जैसे शिवरात्रि भूल जाए
भांग के नशे में
किसी लड़की का तुम्हें मांगना
व्रत न रखने के बाद भी 

जैसे सावन भूल जाए 
रचना तुम्हारे नाम की मेहंदी 
और झूले के 
आसमान तक की पींगें

जैसे शंख भूल जाए
पूजा ख़त्म होने का अंतिम नाद
आये हुए देवता
यज्ञभूमि में बस जायें 

जैसे आत्मा भूल जाए
जिस्म के किसी बंधन को
तुमसे मांग बैठे
तुम्हें पूरा का पूरा 


जैसे कौड़ियाँ भूल जायें 
गिनती हमारे साथ के सालों की
और तुम हमेशा के लिए 
हो जाओ मेरे 

07 December, 2011

होना तो ये चाहिए था कि इतने में तुम्हारी याद की आमद कमसे कम कल सुबह तक मुल्तवी हो जाए...

यूँ कहने को तो वो सारा सामान मौजूद था कि जिससे तुम्हारी याद न आये...कहा यूँ भी जा सकता है कि तुम बिन जीने का सारा सामान मौजूद था...एक मेरे जैसे ही स्माल साइज़ में व्हिस्की (JD- यही कहते हो न तुम जैक डैनयल्स को ?), दो अदद बोतल बीयर, चार-पांच फ्लेवर्स में बकार्डी ब्रीजर...औरेंज, ब्लैकबेरी, लाइम और जमैकन पैशन...रंग बिरंगी बोतलों में बंद जिंदगी के रंगों से फ्लेवर्स या कि तुम्हारी याद के रंगों के...मार्लबोरो लाइट्स...पसंदीदा लाइटर...अपनी कार और खुली सडकें...हाँ रॉकस्टार के गाने भी, सीडी में पहला गाना ही था...मेरी बेबसी का बयान है, बस चल रहा न इस घड़ी...होना तो ये चाहिए था कि इतने में तुम्हारी याद की आमद कमसे कम कल सुबह तक मुल्तवी हो जाए. बड़ी मेहनत से एक साथ ये सारी चीज़ें जुगाड़ी थीं...तुम्हारे आने के पहले इतनी तनहा तो कभी नहीं थी मैं.

तो कायदे से होना ये चाहिए था कि तुम्हारी आवाजों के चंद कतरे कतार में लगा दूं और बाकी खालीपन को शराब और सिगरेट के नशे में डुबो दूं...प्यार होता है तो सबसे पहले खाना बंद हो जाता है मेरा...सुबह से एक कौर भी निगल नहीं पायी हूँ...पानी भी गले से नहीं उतरता...ड्राइव करते हुए आज पहली बार सिगरेट पी...ओह्ह्ह क्या कहूँ तुमसे प्यार करना क्या होता जा रहा है मेरे लिए...एक खोज, एक तलाश की तरह है कि जिसमें मैं अपने अंधेर कुएं में सीढ़ियाँ लगा कर उतरने लगी हूँ.

पर तुम्हारी ये आवाज़ के कतरे भी दुष्ट हैं, तुम्हारी तरह. सच्ची में, कमबख्त बड़े मनमौजी हैं...एक तो नशे के कारण थोडा बैलंस वैसे भी गड़बड़ाया है उसपर ये कतरे पूरे घर में उधम मचाते घूम रहे हैं...किसी दिन तुम्हारे प्यार में घर जला बैठूंगी मैं...अपनी हालत नहीं सम्हलती उसपर सिगरेट की मनमर्जी...उँगलियों से यूँ लिपटी है कमज़र्फ कि जैसे तुम्हारा हाथ थाम किसी न ख़त्म होने वाली सड़क पर चल रही हूँ.

पैग बना रही हूँ...बर्फ के टुकड़े खाली ग्लास में डालती हूँ तो बड़ी महीन सी आवाज़ आती है...जैसे शाम बात करते हुए तुमने अचानक से कहा था 'कितनी ख़ामोशी बिखर गयी है न!'...ये कैसी ख़ामोशी है कि चुभती नहीं...पिघलती है, कतरा कतरा...जैसे मैं पिघल रही हूँ...जैसे बर्फ पिघल रही है व्हिस्की में डूबते उतराते हुए. ग्लास पहले गालों से सटाती हूँ...पानी की ठंढी बूँदें चूम लेती हैं...कि जैसे पहाड़ों से उतर कर तुम आते हो और शरारत से अपनी ठंढी हथेलियों में मेरा चेहरा भर लेते हो...खून बहुत तेजी से दौड़ता है रगों में और कपोल दहक उठते हैं तुम्हारे होठों की छुअन से. उसपर तुम छेड़ देते हो कि तुम्हें शर्माना भी आता है!

तुमने किया क्या है मेरे साथ? मुझे लगता था कि जितनी पागल मैं आलरेडी हूँ, उससे आगे कुछ नहीं हो सकता  पर जैसे हर शाम कई नए आयाम खुल जाते हैं मेरे खुद के...जिंदगी उफ़ जिंदगी...इश्क का ऐसा रंग बचा भी है मुझे कब मालूम होना था. हर शाम ग्लास में एक आखिरी घूँट छोड़ देती हूँ...तुम कहोगे कि शराब की ऐसी बर्बादी नहीं करते...पर जानां, तुम नहीं समझोगे हर शाम उम्मीद करना क्या होता है...कि आखिरी घूँट तक शायद तुम आ जाओ इस इंतज़ार में रात कट जाती है.



इस सलीकेदार दुनिया में तुम्हें इसी पागल से प्यार होना था...अब? क्या करोगे? जाने दो इतनी बातें कि इनमें उलझ गए तो जिंदगी ख़त्म हो जायेगी और तुम्हें पता भी न चलेगा...जहाँ हो अपना ग्लास उठाओ...आज अलग अलग शहर में, एक आसमान के नीचे बैठ चलो इश्क के नाम अपने जाम टकराते हैं, चाँद गवाही देगा कि जिस लम्हे तुमने अपना जाम उठाया था, उसी लम्हे मैंने भी...चीयर्स!

06 December, 2011

उसकी आँखों का इंतज़ार अब भी कच्चा ही था...

फिर उसने कच्ची इमली दांतों से काट कर उसका खट्टापन ख़त्म होने के पहले आँखें मींचे मीचे मीचे ही पक्का वादा किया की वो आज के बाद उसे भूल जायेगी, एकदम से पक्का भूल जायेगी. यह कहते हुए उसकी आँखें बंद थीं और खट्टापन इतना था कि हमेशा की तरह उसे कुछ और सूझ नहीं रहा था...भिंची हुयी आँखों से कुछ दिख भी नहीं रहा था...और वादा उस छोटे से पल में ही मांग लिया गया था...गोया कि लड़के को पता था की आँखें खुलते ही लड़की उसकी कोई बात नहीं मानने वाली...और लड़की ने आँखें ऐसे भींची थीं जैसे सब सपना हो और आँखे खोलते ही पहले जैसी हो जायेंगे चीज़ें.

लड़की को चिंता इस बात की ज्यादा थी कि उसके चले जाने के बाद टिकोले के मौसम में सबसे पहले टिकोले कौन ला के देगा...लड़का जानता नहीं था कि उसका सबसे बड़ा कॉम्पिटिशन बाकी लड़के नहीं, टिकोले और इमलियाँ हैं...वो शायद लड़की से इतना बड़ा वादा करवाता भी नहीं. कौन सा हमेशा के लिए जा रहा था...डिफेन्स अकेडमी में भी छुट्टियाँ होती थी, वो भी बाकी कॉलेज के लड़कों की तरह घर आता. पर लड़के के मन में जाने क्या हुआ कि उसने बंद आँखों वाली लड़की से वादा मांग लिया. वैसे भी जब वो इमली या टिकोले खा रही होती थी उससे कुछ भी मांग लो मिल जाता था...उसकी धानी चूनर में जड़ा शीशा हो कि शहर से आई नयी कलम.

लड़की का नाम भी ऐसा था कि कहीं भूलती नहीं थी...जुगनू...किताबों में से उजाले की तरह झाँकने लगती थी. ऐसे में वो पढ़ाई कैसे करता. उसने पहले तो सोचा था कि जुगनू को कहेगा उसे चिट्ठियां लिखती रहे पर जुगनू का कभी पढ़ाई में मन लगे तब तो, सारे वक़्त इधर उधर दौड़ती मिलती थी...कच्चे अमरुद हों, आम के बौर आये हों, पेड़ में नयी नारंगी फली हो या कि अनार का लाल फल झाँक रहा हो उसे तो सब पेड़ों के सारे फल  याद रहते थे. इसके साथ उसे ये भी तो याद रहता था कि कब गाँव से कुछेक किलोमीटर वाली पक्की सड़क पर फ़ौज का ट्रक जाता था...उसे शायद याद नहीं रहता था, बस उसे पता चल जाता था...और फिर जुगनू उसका हाथ पकड़े मेड़ पर दौड़ती चलती थी...उसे बस ट्रक को देख कर हाथ हिलाना होता था.

वैसे तो पूरे गाँव को यकीं था कि जुगनू का फौजी भाई एक दिन लौट आएगा कहीं से पर सबसे ज्यादा यकीन जुगनू को था की भैय्या वापस आएगा. आश्चर्य ये था कि जुगनू को हर फौजी उसका भाई या भाई का दोस्त लगता था और वो पूरे मन से हर साल अनगिन राखियाँ भेजती थी, बहुत सारे पतों पर...जिन जिन पतों पर उसके भाई की पोस्टिंग थी, उन सभी पतों पर.

लड़का जानता था कि जुगनू इंतज़ार कर सकती है...पर वो नहीं चाहता था कि उसके खो जाने पर जुगनू की चिट्ठियां कोई और पढ़े...उसने जुगनू को तब भी देखा है जब कोई और नहीं देखता. गाँव में तो कोई यकीन ही न करे कि जुगनू रोती भी है, सब उसे बस हमेशा उधम मचाते और पेड़ों से भगाते ही रहते हैं...इसके अलावा भी कोई जुगनू है जो कितनी बार पेड़ की फुनगी के पास कहीं देखती है की जितनी दूर तक दिख रहा है वहां पर उसके भैय्या की वर्दी दिखाई पड़ी या नहीं...सिर्फ लड़के ने जुगनू का इंतज़ार देखा है. उसकी अधीरता...उसका हर शाम उदास होना देखा है.

जिस दिन जुगनू को बताया कि वो डिफेन्स अकैडमी जा रहा है, जुगनू की आँखें चमक उठी थीं...उसे जाने कैसे तो लगा था कि लड़का पक्का भैय्या को कहीं से ढूंढ लाएगा...या कोई अन्दर की बात बताएगा जो उसे कोई नहीं बताता...कुछ समझाएगा जो बाकी लोगों को समझ नहीं आता. लड़का घबराता था...जुगनू का दिल जाने कैसा तो होगा...उसे अकेले छोड़ने पर परेशान भी हो रहा था...पर फिर उसने जुगनू से वादा ले लिया था कि वो उसे भूल जायेगी, उसे ढूंढेगी नहीं, उसे चिट्ठियां भी नहीं लिखेगी.

------------
बहुत साल हुए जब जुगनू उसे दिखी...उसकी आँखों का इंतज़ार अब भी कच्चा ही था...आर्मी में डॉक्टर थी वो. जाने कैसे समय में इतना पढ़ लिया उसने कि AFMC की उतनी कठिन परीक्षा पास कर डॉक्टर बन गयी. लड़का मानता ही नहीं कि वो जुगनू है...शाम के धुंधलके में उस बहुमंजिली बिल्डिंग की छत पर एक आकृति दिखी थी उसे...कुछ बहुत जाना पहचाना था उसमें तो वो कुछ देर रुक गया. सिगरेट जलने की गंध से पलटा था तो जुगनू की आँखें नज़र आई थीं, लाइटर की रौशनी में.

दो आँखों में दो इंतज़ार पल रहे थे...दोनों इंतज़ार उतने ही सच्चे थे...लड़के ने आगे बढ़ कर जुगनू का एक इंतज़ार तो ख़त्म कर दिया...उस बात को भी बहुत साल हुए...दोनों के इर्द गिर्द एक घर उग आया...घर में खुशियाँ, गीत, डांस, पार्टियाँ सब आने लगी बारी बारी से. दुनिया का हिसाब किताब चलता रहा...सियासत न बदली थी, न बदली.

बहुत साल हुए...जितने में सब ख़त्म हो जाने लगा था...हाँ लेकिन दूसरा इंतज़ार अब भी दोनों बाँट कर करते हैं...

या फिर कहरवा - धा-गे-न-ति-नक-धिन...

तुम वहाँ से लौटा लाओ मुझे जहाँ से दुनिया ख़त्म होती है...उस परती जमीन पर पैर धरने से रोको कि वहाँ सदियों सदियों कुछ भी नहीं उगा है...वहाँ की धरती दरकी हुयी है और दरारें खूबसूरत पैरों में बिवाइयाँ डाल देती हैं...वहाँ बहुत धूल है और पानी का नामो निशान नहीं...ऐसी जमीन पर खो गयी तो कहीं नहीं जा पाऊँगी फिर...उजाड़ देश में जाके सारी नदियाँ सूख जाती हैं...मुझे लौटा लाओ जमीन के उस आखिरी छोर से कि मैं सरस्वती नहीं होना चाहती...मैं अभिशप्त जमीन के नीचे नहीं बह सकती...मुझे लौटा लो, मेरा हाथ पकड़ो...वो बहुत खतरनाक रास्ता है...वहाँ से लौटना नहीं होता.

मेरी बाहें थामो कि आज भी पहाड़ों की गहराई मुझे आमंत्रण देती है...मुझे पल भर को भी अकेला मत छोड़ो कि तुम नहीं जानते कि इन आसमान तक ऊँचे पहाड़ों के शिखरों को देखते हुए कब मैं इन सा हो जाना चाहूंगी...तुम सेकण्ड के उस हजारवें हिस्से में बस मेरे दुपट्टे का आखिरी छोर पकड़ पाओगे कि तुम भी गुरुत्वाकर्षण के नियम को अच्छी तरह समझते हो...तुम्हें पता होता कि नीचे जाने की रफ़्तार क्या होगी...बहुत उंचाई से जब नदी गिरती है तो प्रपात हो जाती है...पर तुम भी जानते हो कि मैं नदी नहीं हूँ पर पहाड़ों से गिरना वैसे ही चाहती हूँ...मैं वहाँ से गिरूंगी तो मिटटी में लुप्त हो जाउंगी...फिर सदियों में कहीं सोता फूटेगा पर अभी का मेरा पहाड़ी नदी का अल्हड़पन नहीं रहेगा उसमें...

न ना, मेरी कान्गुरिया ऊँगली को अपनी तर्जनी में फँसाये रहो कि उतना भर ही बंधन होता है जिंदगी से बंधा हुआ...मुझे छुओ कि मुझे अहसास हो कि मेरा होना भी कुछ है...सड़क पार करते हुए कभी भी मेरा हाथ मत छोड़ो कि मुझे हमेशा से तेज़ रफ़्तार दौड़ती चीज़ें आकर्षित करती हैं. कभी देखा है मंत्रमुग्ध सी गुजरती ट्रेन को...पटरियों पर कैसी धड़-धड़ गुजरती है कि जैसे एक्सपर्ट कुक किचन में सब्जियां काटता है...खट-खट-खट...क्या लाजवाब रिदम होती है...जैसे तबले पर तीन ताल बज रहा हो...या फिर कहरवा - धा-गे-न-ति-नक-धिन...धा-गे-न-ति-नक-धिन. देखा है कैसे उँगलियाँ तबले पर के कसे हुए चमड़े पर पड़ती हैं...क्षण का कौन सा वां हिस्सा होता है वो? फ्रैक्शन ऑफ़ अ सेकण्ड...कैसा...कैसा होता है कि एकदम वही आवाज़ आती है...देखो न मेरी आँखों में वैसी ही हैं...सफ़ेद और फिर बीच में काली. पलक झपकने में भी एक ताल होता है, एकदम ख़ामोशी में सुनोगे तो सुनाई देगा...

मेरी आवाज़ तुम्हें तरसती है कि जैसे कैमरा की आँख पल पल घटती जिंदगी में से किसी क्षण को...कहाँ बाँध लूं, कहाँ समेट लूं...कैसे कैसे सहेज लूँ इस छोटी सी जिंदगी में तुम्हें...और कितना सहेज लूँ कि हमारे यहाँ तो कहते हैं कि मरने के बाद भी सब ख़त्म नहीं होता...उसके बाद कुछ और ही शुरू होता है...फिर हम ये झगड़ा क्यूँ करते हैं कि ये मेरा कौन सा जन्म है और तुम्हारा कौन सा...तुम्हें भी एक जिंदगी काफी नहीं लगती न?

तुम मुझे वहाँ से लौटा लाओ जहाँ दुनिया ख़त्म होती है...

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...