02 May, 2012

गुरुदत्त- चिट्ठियों के झरोखे से

गुरुदत्त की चिट्ठियों की किताब...Yours Guru Dutt, Intimate letters of a great Indian film maker by Nasreen Munni Kabir...से उनकी एक चिट्ठी का कच्चा-पक्का अनुवाद कर रही हूँ. मैंने कभी भी अनुवाद नहीं किया है इसलिए सुधार की गुंजाईश होगी. 

गुरुदत्त की इस किताब में कुल ३७ चिट्ठियां हैं जो उन्होंने गीता दत्त और अपने बेटों तरुण और अरुण को लिखी हैं. गीता दत्त की जवाबी चिट्ठियां बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिलीं हैं. गुरुदत्त चिट्ठियां पढ़ने के बाद उन्हें नष्ट कर देते थे. (ऐसा एक जगह जिक्र आया है). 

इन सारी चिट्ठियों में प्रमुखतः तीन बातें स्पष्ट होती हैं...पहली गीता दत्त के प्रति उनका अगाध प्रेम...उन्होंने हर खत में बार बार इस बात का जिक्र किया है कि वो गीता से कितना प्यार करते हैं. दूसरी...उनके काम को लेकर उनकी दीवानगी...और तीसरी एक विरक्त भाव...एक अमिट प्यास...एक तलाश, एक बेचैन खोज. 

 २१ अगस्त १९५१ को गीता को लिखी एक चिट्ठी में वो कहते हैं...'मुझे सिर्फ दो चीज़ें प्यारी हैं, एक मेरा काम और दूसरी तुम. लेकिन काम करने में जो तसल्ली मिलती है वो तसल्ली तुम मुझे नहीं दे रही हो. बस इसलिए शायद मैं शायद(sic) unhappy हूँ.' 

गुरुदत्त की चिट्ठियों में कई बार इस बात का भी जिक्र आता है कि जब मैं नहीं रहूँगा तब शायद तुम्हें अहसास हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करता था. जुलाई १९५८ को कलकत्ता से लिखी एक चिट्ठी में वो कहते हैं...
'जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि मेरी जिंदगी में सब कुछ वक्त से पहले हुआ. जिंदगी में मेरी शुरुआत पहले हुयी...नौकरी...काम करना जल्दी शुरू किया...पहली फिल्म काफी जल्दी बनायी...और कामियाबी भी जल्दी हासिल हुयी...पर मुझे लगता है...मैं बूढा हो रहा हूँ. मैंने जिंदगी में इतना कुछ देखा है...मुझे लगता है बहुत कम सालों में ही मैं बूढा हो गया हूँ! मुझे नहीं मालूम...
और क्या लिखूं...मैं जल्द से जल्द आने की कोशिश करूँगा पर बेहतर होगा कि मैं पहले अपना काम खत्म कर लूं. 
डार्लिंग, जो भी हो, हमेशा याद रखना कि तुम मेरा हिस्सा हो और हमेशा मेरा हिस्सा रहोगी. शायद तुम नहीं जानती कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ. शायद तुम जान नहीं पाओगी कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ. शायद- जब मैं नहीं रहूँगा- तब तुम जान पाओगी. '

खतों में छोटी छोटी काम की चीज़ें लिखी हैं...उनके शहरों के ब्योरे हैं...गीता और बच्चों को बार बार मिस करने की बातें हैं और अनगिन चीज़ों के बीच उनकी अपनी परेशानियां लिखी हैं. इन चिट्ठियों को पढ़ना उन्हें बिना किसी परदे के जानना है...

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मुझे लगता है तुम अभी से मुझसे ऊब गयी हो. मैं तुम्हें क्या दे सकता हूँ- मेरे पास कुछ भी नहीं है. तुम एक ऐसे विचित्र मूर्ख से प्यार करती हो जो ख्वाबों की दुनिया में रहता है- और कभी कभी उसे ख्वाब और वास्तविकता के बीच का अंतर ज्ञात नहीं रहता. और एक दिन तुम मुझसे इस कदर परेशान हो जाओगी कि बेहतर होगा कि तुम मुझसे फिर कभी न मिलो. 

मैं कभी कभी सोचता हूँ कि अच्छा होता अगर मैं पैदा नहीं हुआ होता या फिर मैं सोचता हूँ कि काश मैं मर गया होता या कि मैं वो नहीं होता जो मैं हूँ और मैं नहीं जानता तुम्हें. जिंदगी एक मूर्खतापूर्ण जद्दोजहद है- इसके अंत में भी शांति नहीं मिलती. मैं तुम्हें चाहता हूँ- तुम मुझे नहीं मिलती. तुम मिलती हो तब भी मुझे खुशी नहीं मिलती. मैं एक पागल की तरह उस सुकून की तलाश में दर ब दर भटकता रहता हूँ जो मुझे कहीं नहीं मिलता. मुझे लगता है मेरे जैसे इंसान का मर जाना ही बेहतर है. कुछ यूँ मर जाऊं कि फिर कभी इस मानसिक स्थिति के साथ पैदा न होना पड़े.
तुम सब लोग मुझसे बिलकुल अलग हो. मुझे तुम लोगों की तरह आसानी से खुशियाँ नहीं मिलतीं. इसके अतिरिक्त. तुम सब अच्छे हो. मेरे लिए ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जो मुझे बाँध सके.

तुम इसे पढ़ कर शायद मेरे मानसिक संतुलन पर और भी ज्यादा शक करोगी.

अगर तुम्हें वक्त मिले तो अपने इस पागल प्रेमी को आकर देख लो. काश कि तुम्हें किसी बेहतर व्यक्ति से प्यार हुआ होता जो तुम्हारे लायक होता. काश कि मैं जैसा हूँ उससे बेहतर इंसान हो सकता. मैं किसी के काम का नहीं हूँ. न मैं तुम्हें खुश रख सकता हूँ, न अपने परिवार को, न अपने दोस्तों को...ऐसा जीवन का कोई फायदा नहीं है.

मैं वास्तव में बेहद थका और बेज़ार हूँ. तुम्हारे होने से कभी कभी मुझे शांति मिलती है मगर तुम्हारे भी बहुत सारे कर्त्तव्य और बाध्यताएं हैं और तुम मुझसे ज्यादा काबिल हो. अगर तुम्हारी इच्छा हो और तुम मुझे देखना चाहो तो प्लीज मुझे बताना.
G

(चिट्ठियों को पढ़ने के लिए कृपया तस्वीर पर क्लिक करें. गुरुदत्त पर एक और पोस्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं)

25 April, 2012

लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम

मैं ऐसी ही किसी शाम मर जाना चाहती हूँ...मैं दर्द में छटपटाते हुए जाना नहीं चाहती...कुछ अधूरा छोड़ कर नहीं जाना चाहती.

उफ़...बहुत दर्द है...बहुत सा...यूँ लगता है गुरुदत्त के कुछ किरदार जिंदगी में चले आये हैं और मैं उनसे बात करने को तड़प रही हूँ...विजय...विजय...विजय...पुकारती हूँ. सोचती हूँ उसके लिए एक गुलाब थी...कहीं कोई ऐसी जगह जाने को एक राह थी...जहाँ से फिर कहीं जाने की जरूरत न हो. मैं भी ऐसी किसी जगह जाना चाहती हूँ. आज बहुत चाहने के बावजूद उसके खतों को हाथ नहीं लगाया...कि दिल में हूक की तरह उठ जाता है कोई बिसरता दर्द कि जब आखिरी चिट्ठी मिली थी हाथों में. उसकी आखिरी चिट्ठी पढ़ी थी तो वो भी बहुत कशमकश में था...तकलीफ में था...उदास था. ये हर आर्टिस्ट के संवेदनशील मन पर इतनी खरोंचें क्यूँ लगती हैं...साहिर ठीक ही न लिख गया है...और विजय क्या कह सकता है कि सच ही है न...'हम ग़मज़दा हैं लायें कहाँ से ख़ुशी के गीत....देंगे वही जो पायेंगे इस जिंदगी से हम'.

ये शहर बहुत तनहा कर देने वाला है...यहाँ आसमान से भी तन्हाई ही बरसती है. आज दोपहर बरसातें हुयीं...किताब पढ़ रही थी और अचानक देखा कि बादल घिर आये हैं...थोड़ी देर में बारिश होने लगी...अब एक तरफ मिस्टर सिन्हा और उनके सिगार से निकलता धुआं था...दुनिया को नकार देने के किस्से थे...बेजान किताबें थीं और एक तरफ जिंदगी आसमान से बरस रही थी जैसे किसी ने कहा हो...मेरी जान तुम्हें बांहों में भर कर चूम लेने को जी चाहता है. मैंने हमेशा जिंदगी को किताबों से ऊपर चुना हो ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता...तो बहुत देर तक बालकनी से बारिशें देखती रही...फिर बर्दाश्त नहीं हुआ...शैम्पू करके गीले बालों में ही घूमने निकल गयी...एक मनपसंद चेक शर्ट खरीदी है अभी परसों...फिरोजी और सफ़ेद के चेक हैं...थोड़ी ओवरसाइज जैसे कोलेज के टाइम पापा की टीशर्ट होती थी. 

मेरी आँखों में मायनस दो पावर है पिछले दो सालों से लगभग...उसके पहले बहुत कम थी तो बिना चश्मे के सब साफ़ दिखता था. आजकल आदत भी हो गयी है बिना चश्मे के कभी नहीं रहने की...कुछ धुंधला फिर से किताब का याद आता है...गुरुदत्त को चश्मे के बिना कुछ दिखता नहीं था और एक्टिंग में आँखों का सबसे महत्वपूर्ण रोल है ऐसा वो मानते थे...हालाँकि ये बात उन्होंने कहीं सीखी नहीं...पर जीनियस ऐसे ही होते हैं. आज जब कोलनी में टहल रही थी तो चश्मा उतार दिया...ताकि बरसती बूँदें सीधे चेहरे और आँखों पर गिर सकें...आसमान को देखते हुए पहली बार ध्यान गया कि बिना चश्मे के चीज़ों का एकदम अलग संसार खुलता है...किसी गीली पेंटिंग सा...किसी कैनवास सा...खास तौर से बारिश के बाद. पेड़ों की कैनोपी...गुलमोहर के लाल फूल...सब आपस में ऐसे गुंथे थे जैसे मेरी यादों में कुछ नाम...कुछ लोग...और दुनिया जब साफ़ नहीं दिखती ज्यादा खूबसूरत दिखती है...थोड़ी सब्जेक्टिव भी हो जाती है...बहुत कुछ अंदाज़ लगाना पड़ता है...सामने से आती कार या बाइक में बैठे इंसान मुझे देख कर अगर हंस रहे थे तो मुझे दिखता नहीं. कभी कोई फिल्म बनाउंगी तो इस चीज़ को जरूर इस्तेमाल करूंगी...ये बेहद खूबसूरत था. 

बारिशें होती हैं तो कुछ लोगों की बहुत याद आती है और ये शहर एक बंद कमरा होने लगता है जिसमें बहुत सीलन है...और गीले खतों से सियाही बह चुकी है. मैं नए ख़त लिखने से डरती हूँ कि जब उदास होती हूँ ख़त नहीं लिखूंगी ऐसा वादा किया है खुद से. तन्हाई हमारे अन्दर ही खिलती है...और मैं यकीं नहीं कर पाती हूँ कि कितनी जल्दी सब अच्छा होता है और अचानक से जिंदगी एकदम बेज़ार सी लगने लगती है. 

ऐसे मूड में गुरुदत्त पर कुछ लिखूंगी तो सब्जेक्ट के साथ बेईमानी हो जायेगी इसलिए वो पोस्ट लिखना कल तक के लिए मुल्तवी करती हूँ...ऐसा सोच रही हूँ और रोकिंग चेयर पर झूलते हुए गाने सुन रही हूँ. आज एक दोस्त ने कहा उसे मेरी बहुत याद आ रही है...मुझे अच्छा लगा है कि किसी को मेरी याद आई है.

आज किसी से फोन करके दो तीन घंटे बात करने का बहुत मन कर रहा था...पूरी कोंटेक्ट लिस्ट स्क्रोल करके देख ली...हिम्मत न हुयी कि किसी से जिंदगी के तीन घंटे मांग लूं...मेरा क्या हक बनता है...ऐसा ही कुछ उलूल जुलूल खुद को समझाती हूँ...बालकनी से आसमान देखती हूँ...अनुपम की याद आती है...promise me you will never say that writing is a curse to you. वादा तो निभाना है. 

ऐसी किसी सुबह उठूँ...थोड़े से दर्द के साथ...कुछ दोस्तों से बात करने को दिल चाहे और फोन न कर पाऊं...बार बार फोन स्क्रोल करूँ...सोचूँ...कि कितना सही होगा खुद के लिए दो तीन घंटे का वक्त मांग लेना किसी की जिंदगी से...सोचूँ कि किसपर हक बनता है...फिर हज़ार बारी सोचूँ और आखिर फोन ना करूँ किसी को..चल जाने दे ना...रात को पोडकास्ट बना लेंगे. 

कल हमारे साहिबे आलम दिल्ली तशरीफ़ ले जा रहे हैं...जल्दी का प्रोग्राम बना है...हम यहाँ मर के रह गए दिल्ली जाने के लिए...पर कुछ मजबूरियां हैं...शाम से उदास हूँ जबसे खबर मिली है. अब कल गुरुदत्त को ही आवाज़ दूँगी...पुरानी चिट्ठियां पढूंगी...दर्द को दर्द ही समझता है...ओह...काश कि थोड़ा सुकून रहे...थोड़ा सा बस...काश!

24 April, 2012

गुरुदत्त को जानना एक अदम्य, अतृप्त प्यास से पूरा भर जाना है

अवचेतन मन बहुत आश्चर्यजनक होता है...नोस्टाल्जिया की परतों में गहरा गोता लगा कर कौन सी तस्वीर सामने खींच ले आएगा हम नहीं जानते...आश्चर्य होता है कि गुरुदत्त की पहली याद प्यासा के क्लाइमैक्स की है...किसी दिन दूरदर्शन पर आ रहा होगा...ब्लैक एंड वाईट छोटे से टीवी पर. 

फिर गुरुदत्त से गाहे बगाहे टकराती रही...उनके फिल्माए गीत टीवी पर खूब प्ले हुए हैं...प्यासा और कागज़ के फूल जितनी बार टीवी पर आये घर में देखे गए...तो कहीं न कहीं गुरुदत्त बचपन से मन में पैठ बनाते गए थे. कोलेज में फिल्म स्टडी के पेपर में गुरुदत्त हममें से अधिकतर के बेहद पसंदीदा थे...प्यासा और कागज़ के फूल जुबानी याद थीं...कैमरा एंगिल के डीटेल्स के साथ कि श्वेत-श्याम में प्रकाश और छाया का प्रयोग अद्भुत था. मुझे अच्छी सिनेमैटोग्राफी वाली फिल्में वैसी भी बहुत पसंद रही हैं. 

मेरा मानना है कि कला व्यक्तिपरक(subjective) होती है...क्लासिक फिल्मों में भी कुछ बेहद पसंद आती हैं...कुछ एकदम साधारण लगती हैं और समझ नहीं आता है कि दुनिया क्यूँ पागल है इस फिल्म के पीछे. फिल्म या किताब हमें वो पसंद आती है जिसमें कहीं न कहीं कुछ ऐसा मिल जाता है जो हमारे जीवन से जुड़ा होता है...कहीं न कहीं एक कांच का टूटा हुआ टुकड़ा जिसमें हम अपना एक टूटा सा ही सही अक्स देख लेते हैं. ऐसा मुझे लगता है...लोगों की अलग राय हो सकती है. 

फिल्मों पर हमेशा से इंग्लिश में लिखने की आदत कोलेज के कारण रही है... एक्जाम... पेपर... डिस्कसन... सब इंग्लिश में  होता था इसलिए बहुत सी शब्दावली वहीं की है...मगर ध्यान रखने की कोशिश करूंगी कि टेक्नीकल  जार्गन ज्यादा न हो. इधर इत्तिफाक से गुरुदत्त पर कुछ बेहतरीन किताबें मिल गयीं और फिर एक डॉक्युमेंट्री भी मिली, सब कुछ पढ़ते और देखते हुए एक सवाल बार बार कौंधता रहा कि हिंदी फिल्मों पर इतना कुछ इंग्लिश में क्यूँ लिखा गया है. किताब पढ़ कर मेंटली अनुवाद करती रही कि ये कहा गया होगा. आधी चीज़ों का जायका नहीं आता अगर अलग भाषा में लिखा गया है. डॉक्युमेंट्री भी आधी हिंदी आधी इंग्लिश में है...मैं कभी कुछ ऐसा करूंगी तो हिंदी में ही करूंगी. 

पहले रिसर्च डेटा की डिटेल्स: 
1. Yours Guru Dutt- Intimate letters of a great Indian filmmaker(गुरुदत्त के लिखे हुए ३७ ख़त, गीता दत्त और उनके बेटों तरुण और अरुण के नाम.)
2. Guru Dutt - A life in cinema (डॉक्युमेंट्री के सिलसिले में की गयी रिसर्च, कुछ अच्छी तसवीरें और लगभग डॉक्युमेंट्री के डायलोग)
3. In search of Guru Dutt/गुरुदत्त के नाम  (Documentary)
डॉक्युमेंट्री और किताब दोनों नसरीन मुन्नी कबीर की हैं...गुरुदत्त की चिट्ठियों का संकलन भी उन्हीं ने प्रस्तुत किया है. 
4. Ten years with Guru Dutt - Abrar Alvi's journey 
      - by Satya Saran (ये किताब कहीं बेहतर हो सकती थी...मुझे खास नहीं लगी पर कुछ घटनाएं अच्छी हैं जिनके माध्यम से गुरुदत्त की थोट प्रोसेस के बारे में जाने का अवसर मिलता है)

मुझे ये जानना है कि २५ से ३९ साल के अरसे में क्या कुछ सोचा होगा गुरुदत्त ने कि उसकी फिल्में अधिकतर ऑटोबायोग्राफिकल होती थीं...अगर जानना है कि एक आर्टिस्ट का मन कैसा होता है तो गुरुदत्त की फिल्में देखना और उसके बारे में जानना सबसे आसान रास्ता है. डॉक्युमेंट्री अच्छी बनी है...लोगों के इंटरव्यू बहुत कुछ कहते हैं मगर फिर भी बहुत कुछ बाकी रह जाता है...खुद के समझने और खोलने के लिए. 

गुरुदत्त- १४ महीने की उम्र में
गुरुदत्त का जन्म बैंगलोर में हुआ था...उनकी माँ वसंती पादुकोण  कहती हैं...' बचपन से गुरुदत्त बहुत नटखट और जिद्दी था...प्रश्न पूछना उसका स्वाभाव था...कभी कभी उसके प्रश्नों का उत्तर देते हुए मैं पागल हो जाती थी, किसी की बात नहीं मानता था...अपने दिल में अगर ठीक लगा तो ही वो मानता था...और गुस्से वाला बहुत था...इम्पल्सिव था, मन में आया तो करेगा ही...जरूर.' 

डॉक्युमेंट्री में बस इतना ही हिस्सा है उनके बारे में...मैं सोचती रह जाती हूँ कि फिल्म मेकर ने कितना एडिट किया होगा जो सिर्फ इतना सा उभर कर आया है...फिर छोटे से गुरुदत्त के बारे में सोचती हूँ...अनगिन सवाल पूछते हुए, बहुत सारी इन्फोर्मेशन मन के कोष्ठकों में कहीं कहीं सकेरते हुए कि उनकी जिंदगी में शायद ऐसा कुछ भी नहीं बीतता था जो उनके नज़र में न आये. किताब में पढ़ते हुए कुछ प्रसंग ऐसे ही दिखते है जो पूरे के पूरे फिल्म में परिवर्तित हो गए. 

गुरुदत्त फिल्म टुकड़े टुकड़े में बनाते थे...फिल्म समय की लीनियर गति से नहीं चलती थी...जहाँ जो पसंद आया उस सीन को फिल्मा लिया गया. गुरुदत्त अनगिनत रिटेक देते थे और सीन को तब तक शूट करते थे जब तक वो खुद और फिल्म के बाकी आर्टिस्ट संतुष्ट न हो जाएं. अबरार अल्वी किताब में कहते हैं कि वो जितनी फुटेज में एक फिल्म बनाते थे उतने में तीन फिल्में बन सकती थीं. गुरुदत्त की फिल्मों की शूटिंग जिंदगी की तरह चलती थी...जैसे जैसे आगे बढ़ती थी किरदार डेवलप होते जाते थे. गुरुदत्त की फिल्म यूनिट में लगभग स्थायी सदस्य होते थे...अबरार अल्वी और राज खोसला के साथ रोज  फिल्म की शूटिंग के बाद ब्रेनस्टोर्मिंग सेशन होते थे जिसमें रशेस देखे जाते थे और आगे की फिल्म का खाका तय किया जाता था. 

एक मजेदार वाकया है...वहीदा रहमान सुनाती हैं...'वो एक दिन शेव कर रहे थे और मूर्ति साहब के साथ शोट का डिस्कस कर रहे थे...तो हम लोग सब हॉल में बैठे हुए थे तो अचानक आवाज़ आई...उन्होंने इत्ती जोर से अपना रेज़र फेंका और बोले अरे क्या करते हो यार मूर्ति...तुमने बर्बाद कर दिया मुझे...तो मूर्ति साहब एकदम परेशान...मैंने क्या किया...हम तो शोट डिस्कस कर रहे थे...नहीं यार तुमसे शोट डिस्कस करते करते मैं अपनी एक तरफ की मूंछ काट दी, उड़ा दी...तो हम किसी से रहा नहीं गया तो हम हँस पड़े नैचुरली...जोर जोर से...कि तुम लोग हँस रहे हो...आज रात को शूटिंग है मैं क्या करूं...तो फिर मूर्ति साहब ने कहा...गलती आपकी थी, मेरी तो थी नहीं...फिर भी आप मुझे क्यूँ डांट रहे हैं...आप इस तरह कीजिये, दूसरी तरफ की भी मूंछ शेव कर डालिये फिर नयी नकली मूंछ लगानी पड़ेगी आपको...तो जब वो शोट के बारे में खास कर सोच रहे हों तब...बातें कर रहे हों तो सब कुछ भूल जाते थे'. 

आप प्यासा जैसी फिल्म देख कर बिलकुल अनुमान नहीं लगा सकते हैं कि ये फिल्म बिना किसी फाइनल स्क्रिप्ट की बनी थी...उसमें सब कुछ परफेक्ट है...सारे किरदार जैसे जिंदगी से उठ कर आये हैं. मुझे लगता है फिल्मों में किरदारों की आपसी  केमिस्ट्री इसी बिना स्क्रिप्ट के फिल्म बनने के कारण थी...अभिनेता फिल्म करते हुए वो किरदार हो जाते थे, वैसा सोचने लगते थे, वैसा जीने लगते थे...इसलिए फिल्म में कहीं कोई रूकावट...कोई खटका नहीं होता है. बेहतरीन निर्देशक वही होता है जो सारे अनगिनत रशेस में भी वो दूरदर्शिता रखता है...जिसे पूरी फिल्म मन में बनी दिखती है और उसी परफेक्शन की तलाश में वो अनगिनत रास्तों पर चलता है जब तक कि पूरी सही तस्वीर परदे पर न उतर जाए.

गुरुदत्त पर लिखना बहुत मुश्किल है...पोस्ट भी लम्बी होती जा रही है. अगली पोस्ट में फिर गिरहें खोलने की कोशिश करूंगी कि अद्भुत सिनेमा के रचयिता गुरुदत्त कैसे थे...क्या सोचते थे...कैसी चीज़ें पसंद थीं उन्हें. अगली पोस्ट उनके निजी खतों पर लिखूंगी जो उन्होंने गीता दत्त को और अपने बेटों तरुण और अरुण को लिखीं थीं. 

22 April, 2012

पैबंद के टुकड़े...

उसे मालूम नहीं है कि हम आखिरी बार मिल रहे हैं...

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लड़की आज वक़्त लेकर तैयार हुयी है...उसने आज अपनी पसंद के कपड़े पहने हैं...चिकन का काम किया हुआ ब्लैक  फुल स्लीव कुरता जिसकी आस्तीनें उसने बेपरवाही से ऊपर चढ़ा दी हैं...स्काईब्लू जींस. दायें हाथ में घड़ी और बायें हाथ में कांच का एक कड़ा जिसके रंग उसे बेहद पसंद हैं...कानों में सीपियों की बालियाँ...पत्तियों के आकार कीं. ब्लैक उसका फेवरिट कलर रहा है हमेशा से. उसके गोरे रंग पर काले कपड़े फबते भी थे बहुत ज्यादा...उसकी आँखें और ज्यादा काली और गहरी लगती थीं...किसी जादूगरनी सी.
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'पर तुम जाओगी कहाँ?'
जिंदगी सवाल करती है...मैं उसे बताना चाहती हूँ कि मैं उससे दूर भागना चाहती हूँ इसलिए उसे बता कर नहीं जा सकती...लहरें हमेशा समंदर की ओर लौटती हैं...मैं भी शायद...कहीं लौट जाना चाहूं...शायद अतीत के किसी क्षण में.
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'तुम्हें पहले जाना होगा...आई एम होपलेस एट गुडबाय्स'
'मतलब?'
'मुझे विदा करना नहीं आता...मैं अगर पहले जाती हूँ तो लौट लौट आती हूँ...उस लम्हा...उस लम्हे के बाद के काफी लम्हे...इसलिए तुम्हें पहले जाना होगा...मैं इसी जगह खड़ी तुम्हें देखती रहूंगी...और जब तुम वापस नहीं आओगे तो यकीन कर लूंगी कि तुम वापस आने के लिए नहीं गए थे'.
'तुम मज़ाक कर रही हो'
'आई एम सीरियस...आज इतने सालों में पहली बार तुम्हारा ध्यान गया है...याद करोगे तो याद आएगा कि मैं फोन तक नहीं काटती थी कभी.'
'अब...कहाँ जाना है...कब आओगी वापस...कुछ तो बताओ'
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बेस्ट फ्रेंड होने की अपनी तकलीफें हैं...कई बार तो लगता है कि सिर्फ रिसीवर है...फोन में माइक है ही नहीं...उसकी सारी बातें सुन सकता है...अपनी बातें समझाने की कोशिश कर सकता है पर जिद्दी लड़की करेगी एकदम अपने मन का ही...और उसे रोकने का कोई अधिकार नहीं है.
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It's strange how people sense the absolute power when it comes to people they love...coupled with their incessant capacity to hurt they so effortlessly can create a havoc in someone's life.
I wonder if I fall in love only to discover my vulnerability...my fragile sense of completeness. I am the last corner piece in his Jigsaw puzzle...it's anyway beautiful...while he becomes the key centre piece without whom I can't even think of putting the picture together...
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मैं ना रहूँ...यहाँ या कहीं और भी तो तुम्हें मेरी याद आएगी?
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16 April, 2012

पागल होने का कोई सही मौसम नहीं होता


कुछ भी सच नहीं है 
जब तक कि तुमने नहीं देखी हैं मेरी आँखें 

तुम प्यार से भरे हो
इसलिए मृत्युगीत में सुनते हो उम्मीद 

मुझे नफरत हो गयी है
सिर्फ त्योहारों पर घर आने वाली खुशियों से 

घर की देहरी पर पहरा देता है नज़र्बट्टू 
इसलिए उदासियाँ नहीं जा पाती हैं मेरे दिल से दूर 

बाँध की दीवारों पर लगे हुए हैं टाइम बम
तुमसे बात करती हूँ तो यादों के सब गाँव डूब जाते हैं 

वसंत के विथड्रावल  सिम्पटम्स जीने नहीं देते हैं 
गुलमोहर और अमलतास को कागज़ में रोल कर सुलगा दो 

पागल होने का कोई सही मौसम नहीं होता 
इस जून मॉनसून ब्रेक  होने के पहले चली आऊं तुम्हारे शहर?

इस बार मैं रीत गयी हूँ पूरी की पूरी
इश्क फिर भी सामने बैठा है जिद्दी बच्चे की तरह हथेली खोले हुए 

खुदा के रजिस्टर में नाम रैंडम अलोट हुए थे 
किसी की गलती नहीं थी कि हमें प्यार हुआ एक दूसरे से ही 

मुझसे मत कहो कि मैं कितनी अच्छी हूँ
मुझे बाँहों में भर कर चूमते रहो मेरे मर जाने तक

15 April, 2012

इन लव विद द चेक शर्ट...


तुमको कितना कहते हैं कि चेक शर्ट मत पहना करो तुमको समझ काहे नहीं आता है जी? बोले न बचपन से चेक शर्ट हमारा कमजोरी रहा है. स्कूल में मैथ के सर थे...वो एक ब्लू और ब्लैक का चेक पहन के आते थे...एकदम छोटे चेक...पर मुझे वो चेक इतना ज्यादा पसंद था कि किसी तरह तीन साल खुद को रोके कि पूछ न लें सर से कि कहाँ से ख़रीदे हैं शर्ट...फिर ये भी था कि सर केरला के थे तो अगर कह देते कि घर से ख़रीदे हैं तो क्या कहते...फिर मन का चोर तो जानता था कि चेक शर्ट तो बहाना है...वो कुछ और भी पहनते तो भी सोलिड क्रश था यार...कोई उपाय नहीं था. 
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तू तो है ही चिंदी...हमेशा तो सोलिड कलर्स पहनना पसंद था तुझे...तेरी वो जर्मन ब्लू शर्ट कितने दिन तक मेरी फेवरिट रही थी..फिर वो काई कलर की...नेवी ब्लू...ब्लैक...मैरून...रेड...बटर कलर...कितनी अच्छी अच्छी शर्ट्स थीं तेरे पास. मुझे तू हमेशा ऐसे ही याद आता है...प्योर कलर्स में...सिंगल शेड...और कितनी अच्छी चोइस थी तेरी और तेरी मम्मी की...तू कितना अच्छा, भला लड़का टाइप लगता था. कभी तेरी शर्ट पर एक क्रीज भी नहीं देखी...तुझे भी मेरी तरह आदत थी. कितना भी आयरन करके, तह लगा के रखा हुआ हो कुछ...पहनने के जस्ट पहले आयरन करेंगे ही. पहली बार तुझे चेक शर्ट में देखा...बड़ा अच्छा लग रहा है...डिफरेंट, क्लासिक...बात क्या है, कोई लड़की पटानी है? पक्का किसी ने कहा है न कि तू चेक में अच्छा लगता है...अब बता न...देख वरना मार खायेगा बहुत...और सुन...कितना भी तेरे पास चेक शर्ट्स पड़े हों, मुझसे मिलने प्लेन शर्ट पहन के आया कर...क्यूँ...अरे पगलेट...बेस्ट फ्रेंड है तू न मेरा...बचपन से...और चेक शर्ट मेरी वीकनेस है, जानता तो है तू...तेरे से प्यार होने का अडिशनल लफड़ा नहीं चाहिए हमको अभी लाईफ में...ओके?
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शाम का वक़्त है...आज कुछ ऐसी चीज़ों में उलझी कि खाना खाना भूल गयी...शाम हो गयी तो थोड़ा घर का सामान लेने बाहर निकली हूँ...आज बहुत दिन बाद बड़ी शिद्दत से एक सिगरेट पीने की ख्वाहिश जागी है...कोने से खोज कर मार्लबोरो का पैकेट निकालती हूँ...सिगरेट इज इन्जुरियस टू हेल्थ...हाँ हाँ...जानती हूँ बट सो इज लव...दज इट कम विद अ वार्निंग? बड़े आये तुर्रम खां...मेरी बला से! घर में रहो तो मौसम बड़ा ठहरा हुआ लगता है पर सड़क पर टहलने निकल जाओ तो दिखता है कि गुलमोहर को प्यार हुआ है और वो इश्क के रंग में डूबा है पूरी तरह...अमलतास और कई सारे रंग के फूल हैं...हलके गुलाबी...बैगनी...सफ़ेद... कुल मिला कर बेहद खूबसूरत नज़ारा है. मुझे कोलनी की सारी सड़कें याद हैं...कहाँ कैसे पेड़ हैं...किधर वो घर हैं जिनके आगे दरबान खैनी लगाते मिल जायेंगे...कहाँ बच्चे रोड पर साइकिल की प्रैक्टिस करते हैं शाम को...किधर सीनियर सिटिज़न लोग हैं...सब. 

मैं एक खाली सी सड़क पर हूँ...इधर कम लोग दिखते हैं...मैंने पहली सिगरेट सुलगाई है...हेडफोन पर किसी की आवाज़ है...पर मैं आवाज़ से बहुत दूर चली आई हूँ...कुछ देर तक आवाज़ मुझे पुकारती रहती है...मैं लौट कर आती हूँ और हँसती हूँ...कि मेरी जान वाकई...कभी कभी लगता है कि जिंदगी के धुएं में उड़ जाने से ज्यादा खूबसूरत रूपक हो ही नहीं सकता...अब आवाज़ का लहजा सख्त हो जाने की कोशिश करता है और मैं अपनी बेस्ट फ्रेंड के प्यार पर हँस पड़ती हूँ...अच्छा सुन न...जाने दे न...अच्छा मूड है, कौन सा रोज सिगरेट पीती हूँ...डांट मत न...ओकेज्नाली न...तो आज कौन सा ओकेजन है...वो गुस्से में भरी पूछती है...मैं मुस्कुराती हूँ बस. 

हवा में वसंत की गंध है...प्यार करना है तो वसंत कह लो...तारीफ करनी है तो बहार. एक वक़्त था मुझे सिगरेट के धुएं से अलर्जी थी...बर्दाश्त नहीं कर पाती थी...इसलिए कभी तबियत से स्मोकिंग की नहीं, कभी एकदम ही मूड ख़राब हुआ  तो खुद को तकलीफ देने के लिए पिया करती थी...वक़्त के साथ क्या कुछ बदल जाता है...बस नहीं बदला है तो सिगरेट का ब्रैंड...आज भी मार्लबोरो...अल्ट्रा माइल्ड्स.
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कॉन्वेंट की ड्रेस काफी स्मार्ट हुआ करती थी...शोर्ट ब्लू एंड ब्लैक चेक स्कर्ट और व्हाइट शर्ट...मोज़े एकदम करीने से नीचे मोड़े हुए...बस स्टैंड पर वेट करती हुयी अच्छी लगती होउंगी इसका अंदाज़ बाइक पर तफरी करते लड़कों से लग जाता था. उसमें से एक मुझे बेहद पसंद था...भूरी आँखें थी उसकी और अक्सर मिलिट्री प्रिंट के ट्राउजर्स पहनता था. आँखें तो उसकी बहुत बाद में देखी थीं...वो प्रिंट मेरी आज भी सबसे पसंदीदा प्रिंट में से एक है...दोस्त चिढाती थीं मुझे कि मैं लड़कों को उनके कपड़ों से नाम देती हूँ...ब्लैक टी शर्ट, मिलिट्री प्रिंट, येलो चेक्स, वाईट एंड ब्लू...मैं उनपर हँसती थी कि मैं कपड़ों में देखती हूँ तो वैसे ही नाम देती हूँ...तुम लोग क्या बिना कपड़ों के देखती हो...उसके बाद एक  झेंपा हुआ सन्नाटा था और फिर किसी ने मुझे किसी के नाम के बारे में नहीं चिढ़ाया. मुझे आज भी लड़के मेरी पसंद के कपड़ों में ही याद रहते हैं...मेरी यादें ब्लैक एंड वाईट नहीं होतीं. 
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धुआं फूंकते हुए ऊपर देखती हूँ...हलके नीले आसमान में पेड़ की शाखों की कैनोपी है...ब्लू चेक शर्ट...मैं अपने को-रिलेट करने की क्षमता पर खुद ही मुस्कुराती हूँ...लेफ्ट के आर्च पर बोगनविलिया में कुछ फूल आये हैं...जैसे उसकी हलकी मुस्कान...क्यूट...मैं फिर मुस्कुराती हूँ...मेरी सहेलियां मेरे प्यार में गिरने पड़ने से परेशान रहती हैं...उसे बताती तो कहती...फिर से? इसलिए उसे बताया नहीं...फोन चुप है...गाने ख़त्म...इयरफोन अब बस म्यूट करने के काम आ रहा है...सारा शोर... सारा दर्द...सारे लोग...मैं अक्सर बिना गानों के हेडफोन लगा के घूमती हूँ...ऐसे में अपने मन के गाने बजते हैं...अपनी दुनिया होती है...एकदम चुप...सिगरेट का धुआं जैसे शांत कमरे में ऊपर जा रहा है...गिरह गिरह खुलता हुआ...ये दूसरी सिगरेट ख़त्म हुयी...आखिरी का आखिरी कश. दो सिगरेट के बाद मिंट...ज़बान पर घुलता हुआ...जैसे फीके होते आसमान में उभरता अहसास...किसी चेक शर्ट से प्यार हो गया है मुझे. 

अनलिखे की डायरी

डिस्क्लेमर: मुझे लिख के एडिट करना न आया है न आएगा...कुछ वाक्य थे जो सोने नहीं दे रहे थे...इनमें कोई काम की बात नहीं है...आप इस पोस्ट को पढ़ना स्किप कर सकते हैं.
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रतजगे का सोचना...इसे आधी रात का जागना भी नहीं कह सकते...आधी रात को तो मैं हमेशा नींद में होती हूँ...जाग जाती हूँ कुछ २ बजे से चार बजे के बीच. नींद मेरी हमेशा से कम रही है...बचपन से बहुत सारा पढ़ने की आदत और बहुत कुछ सकेर लेने का मोह. इधर इंटरव्यू में शायद किसी ने सवाल पूछा था...इतना सारा कुछ करने के लिए वक़्त कैसे निकाल लेती हो...और मेरा जवाब था...आई स्लीप लेस. यानि मैं कम सोती हूँ...चार से पांच घंटे हमेशा मेरे लिए काफी रहे हैं. स्कूल के दिनों में रात ग्यारह बारह तक सिलेबस पढ़ना होता था और उसके बाद एक दो घंटे अपने पसंद का कुछ...मुझे आज भी रात को बिना कुछ पढ़े नींद नहीं आती.

कोलेज में आकर तो और आदत ही हो गयी रात दो बजे सोने की...आदत दिल्ली तक बरकरार रही...उसपर सुबह छह से सात बजे तक हर हाल और हर मौसम में उठ जाने की भी आदत बनी रही. इधर तीन चार सालों से थोड़ा रूटीन भी गड़बड़ था और नींद भी ज्यादा आती थी. अभी फिर पिछले तीन चार महीनों से वही पहले वाला हाल...चार घंटे, पांच घंटे की नींद. कल रात भी कोई १२ बजे सोयी होउंगी...तीन बजे नींद खुल गयी...और कितना भी चाहूं नींद आएगी नहीं. 

सब अच्छा रहता और इतना दर्द न रहता तो हमेशा की तरह इस वक़्त तुम्हें एक चिट्ठी जरूर लिखती...ब्लॉग पर यूँ अलाय बलाय लिखने के बजाये या फिर लिखने के पहले...पर आजकल मुझे जाने क्या हो गया है...एक एक शब्द को पकड़ कर रखती हूँ. मुझे तुम्हारी बहुत याद भी आ रही है अभी...अकेले तुम्हारी नहीं, कुछ और अजीज दोस्तों की भी...तो कह सकती हूँ कि तुम्हारे लिए मेरे मन में कोई खास कोर्नर या कोना नहीं है जिसके लिए मैं या तुम परेशान होना चाहो. 

मुझे लिखे बिना रहना नहीं आता...मेरी आदत है...मुझे लोग बहुत समझाते हैं कि हर बात लिखनी नहीं चाहिए...कुछ मन में भी रखना चाहिए...उसे गुनना चाहिए...फिर जाके अच्छा लिखना होता है. इसी तरह लोग बोलने के बारे में भी समझाते हैं कि कभी चुप भी रहना चाहिए...मुझसे नहीं होता. मैं क्या करूँ...कितना चाहती हूँ हाथ रोकूँ...मुझसे होता नहीं...पर हर बार जब ये कोशिश करती हूँ मैं बेहद उदास हो जाती हूँ...कलम की सारी सियाही आँखों में बहने लगती है और फिर रात रात नींद नहीं आती. 

एक बार ऐसे ही उदासी में अनुपम से कह दिया था...राइटिंग इज अ कर्स टु मी...उसने बहुत डांटा था कि ऐसे कभी नहीं कहते...कि काश वो मेरी तरह होता...कि उसे एक लाइन लिखने में कितनी दिक्कत होती है, कितना सोचना होता है तब जा के लिखता है. मैं जब ऑफिस में थी तब भी ऐसी ही थी. उसने कहा कि उसके साथ जितने ट्रेनी लोगों ने काम किया है सिर्फ मैं ऐसी थी कि वो निश्चिंत रहता था कि बॉडी कॉपी अगले दिन तैयार रहेगी. परसों से अनुपम की बहुत याद आ रही है...और ऐसा हो जा रहा है कि उससे बात करने का टाइम नहीं मिल पा रहा. जब मैं फ्री रहती हूँ वो नहीं रहता...जब वो फ्री रहता है मैं नींद में बेहोश. अभी सोच रही थी कि मंडे को उसे चिट्ठी लिखूंगी...बहुत दिन हो गए. 
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बहुत चाह रही हूँ कि सोचूँ उसके शब्दों के बारे में...मगर आज ही पहली बार तस्वीर देखी है और बाकी शब्द धुंधलाते दिख रहे हैं...मन एक ही बात पर अटका है...कवि कितना खूबसूरत है...बेहद से भी ज्यादा. दुनिया की फिलोसफी मुझे कभी जमी नहीं...मेरे जिंदगी के अपने फंडे रहे हैं...तो मन की खूबसूरती जैसी बकवास बातों पर कभी मेरा यकीन नहीं रहा...ये और बात है कि दोस्त हमेशा कहते थे कि तेरी खूबसूरती का पैमाना बायस्ड है. मुझे जो लोग अच्छे लगते हैं वो मुझे खूबसूरत लगने लगते हैं, आम से लोग पर मुझसे सुनोगे कि वो कैसे दिखते हैं तो लगेगा दुनिया में उनसे अच्छा कोई है ही नहीं. 
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मैं बेहद थक गयी हूँ अब...बहुत साल हो गए मेरे नाम एक भी चिट्ठी नहीं आई...मैं यूँ तनहा दीवारों से बातें करते थक गयी हूँ...मैं तुम्हारे नाम लगातार चिट्ठियां लिखते लिखते थक गयी हूँ...पूरी पूरी जिंदगी मौत का इंतज़ार करते करते थक गयी हूँ. मैं दो ही चीज़ों से ओब्सेस्ड हूँ...जिंदगी और मौत. बार बार सोचती हूँ कि कोई तुम्हारे जैसा कैसे होता है...समझ नहीं आता...शायद मैं बहुत आत्मकेंद्रित हूँ कि मुझे अपने से अलग लोग समझ नहीं आते...मुझे लगता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि आपको किसी की याद आये और आप उसे बताएं नहीं...किसी से प्यार हो और उसी से छुपा ले जाएँ...किसी से प्यार ख़त्म हो चुका हो और झूठ उसे यकीन दिलाते जायें...कैसे जी लेते हैं लोग झूठ के मुखोटे में. 

मुझे किसी की याद आती है तो बता देती हूँ...किसी से प्यार होता है तो जता देती हूँ...कभी प्यार टूटता है तो समझा देती हूँ...किसी को भूल जाती हूँ तो माफ़ी मांग लेती हूँ...मुझे कॉम्प्लीकेटेड होना नहीं आता. पर आज तकलीफ है बहुत...बेहद...जिंदगी हम जैसे लोगों के लिए नहीं है...और मैं क्या करूँ कि मुझे तो झूठ का हँसना भी नहीं आता...तुमने बहुत हर्ट किया है मुझे...जितना मैं तुम्हें बताउंगी नहीं...और जितना मेरे शब्दों में खुल कर दिखता है उससे कहीं ज्यादा. 

पर मैं क्या करूँ...मैं ही कहती थी न...कोई आपको दुःख सिर्फ और सिर्फ तब पहुंचा सकता है जब वो आपसे प्यार करता हो...उलझी हूँ...कोई सुझा दे...गिरहें. 

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