14 April, 2012

यूँ भी कोई रूठता है पहाड़ों से...

सारे पहाड़ों से आवाज़ लौट कर नहीं आती...कुछ ऐसे भी पहाड़ होते हैं जिन्हें कितनी भी आवाजें दो...अपने पत्थर के सीने में सकेर कर रख लेंगे...संकरी पगडंडियों के किनारे चलती छोटी सी लड़की सोचती है...पहाड़ों के दिल नहीं होता न!

लड़की इस पच्चीस तारीख को सोलह साल की हो जायेगी...अभी कुछ ही दिन पहले उसके १०वीं के रिजल्ट आये थे जिसमें वो बहुत अच्छे नंबरों से पास हुयी थी. उसके पापा ने खुश होकर भारत का मानचित्र सामने खोला था और कहा था बेटा आप ऊँगली रखिये कि आप कहाँ जाना चाहती हैं. जब पापा बहुत खुश होते थे तो लाड़ में उसे 'आप' बुलाते थे. लड़की ने कभी पहाड़ों पर बादल नहीं देखे थे...उसने सपनों के शहर पर ऊँगली रखी...दार्जलिंग.

लड़की बेहद खूबसूरत थी और क्लास के लगभग सभी लड़के मरते थे उसपर...उसे मालूम नहीं था कि इकतरफा प्यार क्या होता है पर ये तब तक था जब तक उसने दार्जलिंग से नज़र आती हिमालय पर्वत श्रृंखला नहीं देखी थी. आसमान तक सर उठाये...बर्फ का मुकुट पहने, जिद्दी, अक्खड़, पत्थर सा सख्त, बारिशों में सनकी और खतरनाक मोड़ों से भरा हुआ...उसे पहाड़ से पहली ही नज़र में प्यार हो गया था. लड़की को वैसा कोई मिला नहीं था कभी...उसे सब अच्छे भले लोग मिले थे...उसने दिल में सोचा...प्रेडिक्टेबल...हाउ बोरिंग...जबकि पहाड़ का कोई नियत मूड नहीं होता...कहीं ग्लेशियर होते हैं कहीं दूर तक बिछते घास के मैदान...कहीं कंदराएं तो कहीं फूलों की घाटी.

छोटी लड़की ने चाय के बगान देखे...ढलानों पर उतरती औरतें...नाज़ुक उँगलियों से चाय की लम्बी पत्तियां तोड़ती हुयीं...उसने जाना कि दार्जलिंग के ठंढे मौसम और यहाँ की मिटटी के कारण यहाँ की चाय बेहद खुशबूदार होती है...और चाय का ऐसा स्वाद सिर्फ दार्जलिंग में उगती चाय में आता है...कांच की नन्ही प्यालियों में चाय आई...सुनहले रंग की...एकदम ताज़ी खुशबू में भीगती हुयी. लड़की ने उसके पहले चाय नहीं पी थी जिंदगी में...चाय के कप के इर्द गिर्द उँगलियाँ लपेटी...गहरी सांस ली...और पहाड़ों की गंध को यादों के लिए सहेजा...फिर पहला नन्हा घूँट...हल्का तीखा...थोड़ा मीठा...और थोड़ा जादुई...जैसे स्नोवाईट को नींद से उठाता राजकुमार. अंगूठे और तर्जनी से उसने एक चाय की पत्ती तोड़ी...बुकमार्क बनाने के लिए और वापस लौट आई. रात होटल के कमरे में बेड टी पीती लड़की अपनी डायरी में लिख रही थी...पहाड़ों के पहले चुम्बन के बारे में...और जबां पर देर तक ठहरे आफ्टरटेस्ट के बारे में भी.

उसके दोस्त उसे पहाड़ी नदी बुलाते थे...हंसती खिलखिलाती...कलकल बहती हुयी...पर लड़की घाटी के आखिरी मुहाने पर खड़ी सोच रही है कि पहाड़ तो उससे प्यार ही नहीं करता...सिर्फ पहाड़ों में बहने से कोई पहाड़ी नदी हो जाती है क्या...व्यू पॉइंट पर उसने पुकारा...पियुsssssss...कोई आवाज़ लौट कर नहीं आई...वो एक लम्हा रुकी, गहरी सांस लेते हुए फेफड़ों में हवा भरी...इस बार उसने नाम को दो अक्षरों में तोड़ा और पहाड़ों के बीच की लम्बी खाई में अपने नाम को दूर तक जाने दिया...पिssssss युsssssssss....पहाड़ ने उसका नाम वापस नहीं किया...लड़की गुस्से में पैर पटक रही थी...फिर उसने खुद के सारे नामों से पहाड़ों को टेलीग्राम भेजा...पिहू...सिली...नदी...छु.ट.की...पिया...छोटी सी लड़की का चेहरा इतनी जोर से नाम पुकारने के कारण लाल होता जा रहा था...वो हर बार एक गहरी सांस खींचती, दोनों नन्ही हथेलियों से ध्वनि तरंगों की दिशा निर्धारित करती और अपना नाम पुकारती...पहाड़ एकदम खामोश था...कितना भी उम्र का अनुभव हो उसके पाले में...प्यार से किसे डर नहीं लगता...वो भी ऐसी लड़की से.

लड़की रात को थोड़ी उदास थी...कल सुबह वापस लौटना था...उन पहाड़ों में पैदल...जीप पर और घोड़े पर उसने अनगिन नज़ारे देखे थे...वो जितना पहाड़ों को जानती उतने ही गहरे प्यार में गिरती जाती...वो उम्र भी कुछ ऐसी थी कि उसे मालूम नहीं था कि जितना देख रही हैं आँखें और जितना संजो रहा है मन सब कुछ बाद में चुभेगा. आसमान तक पहुँचते देवदार के पेड़ों से सर टिकाये उसने बहुत से ख्वाब बुने...कच्ची उम्र के ख्वाब जिनमें पहाड़ों पर बार बार लौट आने के वादे थे. निशानी के लिए उसने अपना स्कार्फ व्यू पॉइंट के पास वाले पेड़ पर बाँध दिया...उसे क्या मालूम चलना था कि हवा में उड़ते स्कार्फ से पहाड़ को गुदगुदी लगेगी...वो तो बस चाहती थी कि पहाड़ उसे कभी भूले न.

सुबह सूरज के उगने के पहले वो व्यू पॉइंट पहुँच चुकी थी...इस बार उसने अपना नाम नहीं लिया...
आई...लव...यू...फिर एक साँस भर की चुप्पी और आखिरी और सबसे खूबसूरत शब्द...
फॉर...एवर.  

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उस दिन के बाद कभी जाना नहीं हुआ पहाड़ों पर...उम्र के कई पड़ाव पार कर चुकी है नन्ही सी लड़की और आजकल  पहाड़ों के देश से बहुत दूर निर्जन में है...जहाँ सिर्फ मैदान है दूर दूर तक...धरती औंधी कटोरी की तरह दिखती है...लड़की आज भी सुबह सुबह ब्लैक टी पीती है...खास दार्जलिंग से लायी हुयी...कांच की प्याली में...उँगलियाँ लपेटते हुए पहली चुस्की लेती है...ओह...आई स्टिल लव द वे यु किस...उसका पति उसके चाय प्रेम से परेशान है...चिढ़ाता है...लोगों को प्यास लगती है तुम्हें चयास लगती है...लड़की कुछ नहीं कहती...सुबह की पहली चाय के वक़्त वो कहीं और होती है...किसी और समय में...पहले प्यार की कसक को घूँट घूँट जीती हुयी. 
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एक पहाड़ था जहाँ लड़कियां नहीं जाना चाहती थीं...उस पहाड़ की गहरी लाल चट्टान पर यूँ तो कोई आवाज़ लौट कर नहीं आती थी...पर ठीक शाम जब बादल घर लौटने लगते थे...एक गुलाबी स्कार्फ हवा में हलके हिलने लगता था...अलविदा कहता हुआ...उस वक़्त पहाड़ों को किसी भी नाम से पुकारो...वो एक ही नाम लौटाता था...
पिssssssss युssssssss...
पिssssssss युssssssss...
पिssssssss युssssssss...  

11 April, 2012

खुदा की लिक्खी अधूरी कविता...


उसके पैरों में घुँघरू नहीं बंधे थे...पायल का एक नन्हा सा घुँघरू भी नहीं...फिर भी वो खुश होती थी तो थिरक उठती थी और विंडचाइम की तरह महीन सी धुन बजने लगती थी...वो इसे मन का गीत कहती थी...उसके मन में बजता था पर उस दिन दुनिया एकदम खूबसूरत हो जाती...ये वैसे कुछ दिन में से एक होता था जब उसे खुद से प्यार हो जाता था...

वो ऐसे किसी दिन सोचती थी कि सारी बेचैनियाँ उसे अंदर हैं और सारा सुकून भी उसके अंदर ही है...वो दिल पर हाथ रखे अपनी धडकनों को सुनती थी...कितनी खूबसूरत लय है...किसी का नाम नहीं लेता है जब दिल...एकदम खामोश होता है तो रात की ख़ामोशी में बारिश की हलकी फुहारों सी आवाज़ आती है...एकदम मद्धम...जैसे कोई चुपके कह गया हो कानों में...आई लव यू...इतना धीमे कि हर बार वो उलझी सी सोचे...कोई था क्या...कोई सच में आया था क्या...किसे प्यार है उससे. वो मन की इस बारिश में भीगती खुदा से पूछती है...ओ पगले...तुझे तेरी इस पागल बेटी से कितना प्यार है?

खुदा हँसता है और कुछ ओले नीचे फ़ेंक मारता है...ओला लड़की के सर में लगता है और उसका ढीला स्क्रू थोड़ा और ढीला हो जाता है...वो रात में अकेले हँसती है...ठेंगा दिखाती है...झगड़ा करती है कि ऊपर बैठ कर ज्यादा होशियार मत बनो...मैं चाँद फ़ेंक कर मारूंगी तो फिर किसी लड़की का मन अधूरा छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाओगे...पगले कहीं के...तुम्हें सर चढा रखा है मैंने...अभी नीचे उतारती हूँ. 

खुदा की और उसकी केमिस्ट्री से सब जलते हैं...खुदा के सारे बंदे...धरती के सारे इंसान...सब कितना मस्का लगाते हैं खुदा को, कितनी घूस देते हैं...उसके कान भी भरते हैं कि ये लड़की एकदम पागल है...खराब भी है...खुदा मानता ही नहीं...खुदा के मन का एक टुकड़ा लगा है न लड़की में...इसलिए वो जानता है कि चाहे जो खराब हो...चाहे जितनी बदमाशियां करे लड़की उसका मन साफ़ है एकदम...और बचपन में जैसी थी वैसी ही है लड़की...बाकी जितनी ऊपर से परतें चढ जाएँ उसपर उसने मन को वैसा ही साफ़ और पारदर्शी रखा है जैसा उसने दे कर भेजा था...इसलिए वो खुदा की सबसे फेवरिट बेटी है. 

खुदा का जब दिल्लगी का मूड होता है तो वो उस लड़की को प्यार की लंघी मार देता है...फिर लड़की शाम शाम बडबडाती रहती है...सिगरेट फूँकती है, खुदा को बैरंग चिट्ठियां लिखती है...खूब सारा झगड़ा करती है...खुदा जी खोल कर हँसता है...कहता है कित्ती बुद्दू हो रे...हर बार एक ही गलती करती हो...अब तुम सुधरोगी नहीं तो मैं क्या करूँ...कोई इतनी सारी गलतियाँ कैसे कर सकता है एक छोटी सी जिंदगी में. लड़की कहती है...माय फुट छोटी जिंदगी...ऊपर से कोरी धमकी देते हो...डरते तो तुम हो असल में मुझसे, ज्यादा हिम्मत है तो जान लो तो सही देखो कैसे पूरे स्वर्ग में तुम्हें दौड़ाती हूँ...डरपोक हो एक नंबर के...२९ की हो जाउंगी जून में...बड़े आये छोटी सी जिंदगी में...जानती नहीं हूँ तुम्हें...तुम चैन से बैठे हो कि अभी नीचे से जितना हल्ला करना है कर ले लड़की...ऊपर बुलाओ तो सही देखो कैसे तुम्हारा जीना मुहाल करती हूँ.

खैर...आप कितनी सुनेंगे ये बातें...लड़की तो पागल है ही और खुदा का को दिमाग ठीक होता तो वो आपकी जिंदगी में एक ऐसी लड़की लिखता? नहीं न. शाम होने को आई...खुदा खुदा कीजिये...और मुझसे पीछा छुड़ाने के उपाय ढूँढिये...वैसे चांस कम है...मेरी जिंदगी में बस आने का रास्ता है. 

मन बंजारा फिर पगलाए, भागे रह रह तोरे देस...


ऊपर वाले ने हमें बनाया ही ऐसा है...कमबख्त...डिफेक्टिव पीस. सारा ध्यान बाहरी साज सज्जा पर लगा दिया, दिन रात बैठ कर चेहरे की कटिंग सुधारता रहा...आँखों की चमक का पैरामीटर सेट करता रहा और इस चक्कर में जो सबसे जरूरी कॉम्पोनेन्ट था उसपर ही ध्यान नहीं दिया...मन को ऐसे ही आधा अधूरा छोड़ दिया. अब ये मन का मिसिंग हिस्सा मैं कहाँ जा के ढूंढूं. कहीं भी कुछ नहीं मिलता जिससे मन का ये खालीपन थोड़ा भर आये. अब ये है भी तो डिवाइन डिफेक्ट तो धरती की कोई चीज़ कहाँ से मेरे अधूरे मन को पूरा कर पाएगी...मेरे लिए तो आसमान से ही कोई उतर कर आएगा कि ये लो बच्चा...ऊपर वाले की रिटन अपोलोजी और तुम्हारे मन का छूटा हुआ हिस्सा. 

तब तक कमबख्त मारी पूजा उपाध्याय करे तो क्या करे...कहाँ भटके...शहर शहर की ख़ाक छान मारे मन का अधूरा हिस्सा तलाशने के लिए...कि भटकने में थोड़ा चैन मिलता है कि झूठी ही सही उम्मीद बंधती है कि बेटा कहीं तो कुछ तो मिलेगा...चलो पूरा पूरा न सही एक टुकड़ा ही सही...ताउम्र भटक कर शायद मन को लगभग पूरा कर पाऊं...कि हाँ कुछ क्रैक्स तो फिर भी रहेंगे धरती की फॉल्ट लाइंस की तरह कि जब न तब भूचाल आएगा और मन के समझाए सारे समीकरण बिगाड़ कर चला जाएगा. 

करे कोई भरे कोई...अरे इत्ती मेहनत से बनाया था थोड़ा सा टेस्टिंग करके देखनी थी न बाबा नीचे भेजने के पहले...ऐसे कैसे बिना पूरी टेस्टिंग के मार्केट में प्रोडक्ट उतार देते हो, उपरवाले तेरा डिपार्टमेंट का क्वालिटी कंट्रोल  कसम से एकदम होपलेस है. मैं कहती हूँ कुणाल से एक अच्छा सा सॉफ्टवेर इंटीग्रेशन कर दे आपके लिए कि सब डिपार्टमेंट में सिनर्जी रहे. वैसे ये सब कर लेने पर भी मेरा कुछ हुआ नहीं होता कि ख़ास सूत्रों से खबर यही मिली है मैं पूरी की पूरी आपकी मिस्टेक हूँ...आपने स्पेशल कोटा में मुझे माँगा था...स्पेशली बिगाड़ने के लिए, बाकियों को जलन होती है कि मैं फैक्टरी मेड नहीं हैण्ड मेड हूँ...वो भी खुदा के हाथों...अब मैं सबको क्या समझाऊं कि खुदा कमबख्त होपलेस है इंसान बनाने में...उसे मन बनाना नहीं आता...या बनाना आता है तो पूरा करना नहीं आता...या पूरा करना भी आता है तो मेरी तरह कहानियों के ड्राफ्ट जैसा बना देता है कमबख्त मारा...अरे लड़की बना रहा था कोई कविता थोड़े लिख रहा था कि ओपन एंडेड छोड़ दिया कि बेटा अब बाकी हिस्सा खुद से समझो.

हालाँकि कोई बड़ी बात नहीं है कि इसमें खुदा की गलती ना हो...उनको डेडलाइन के पहले प्रोडक्ट डिलीवर करने बोल दिया गया हो...तो उन्होंने कच्चा पक्का जो मिला टार्गेट पूरा करने के लिए भेज दिया हो...हो ये भी सकता है कि उन्होंने भी रीजनिंग करने की कोशिश की हो कि इतने टाइम में प्रोडक्ट रेडी न हो पायेगा...पर डेडलाइन के लिए रिस्पोंसिबल कोई महा पेनफुल छोटा खुदा होगा जो जान खा गया होगा कि अब भेज ही दो...आउटर बॉडी पर काम कम्प्लीट हो गया है न...क्या फर्क पड़ता है. खुदा ने समझाने की कोशिश की होगी...कि छोटे इसका मन अभी आधा बना है...जितना बना है बहुत सुन्दर है पर अभी कुछ टुकड़े मिसिंग हैं...बस यहीं छोटा खुदा एकदम खुश हो गया होगा...मन ही अधूरा है न, क्या फर्क पड़ता है...दे दो ऐसे ही...ऐसे में क्या लड़की मर जायेगी...खुदा ने कहा होगा...नहीं, पर तकलीफ में रहेगी...बेचैन रहेगी...भटकती रहेगी. छोटे खुदा ने कहा होगा जाने दो...ऐसे तो धरती पर आधे लोग तकलीफ में रहते ही हैं...एक ये भी रह लेगी...खुदा ने फिर समझाने की कोशिश की...बाकी लोगों की तकलीफ का उपाय है...इसकी तकलीफ का कोई उपाय नहीं होगा...छोटा खुदा फिर भी छोटा खुदा था...माना नहीं...बस हम जनाब आ रहे रोते चिल्लाते धरती पर...लोग समझ नहीं पाए पर हम उस समय से खुदा के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे थे. 

मम्मी बताती थी कि मेरी डिलीवरी वक़्त से पंद्रह दिन पहले हो गयी थी...वो बस रेगुलर चेक-अप के लिए गयी थी कि डॉक्टर ने कहा इसको जल्दी एडमिट कीजिये...वक़्त आ गया है...बताओ...हमें कभी कहीं चैन नहीं पड़ा...पंद्रह दिन कम थोड़े होते हैं...खुदा भी बिचारा क्या करता, कौन जाने हम ही जान दे रहे हों धरती पर आने के लिए. 

यूँ अगर आप दुनिया को देखें तो सब कुछ एकदम एटोमिक क्लोकवर्क प्रिसिजन से चलता है...मेरे आने के पहले पूरी दुनिया में मेरी जगह कहाँ होगी...खाका तैयार ही होगा...पंद्रह दिन लेट से आते तो कितने लोगों से मिलना न होता...लाइफ...लाईक लव...इस आल अ मैटर ऑफ़ टाइमिंग टू. तो जो लोग मेरी जिंदगी में हैं...अच्छे बुरे जैसे भी हैं...परफेक्ट हैं. हाँ मेरे आने से उनकी जिंदगी में एक बिना मतलब की उथल पुथल जरूर हो जाती है. मेरे जो भी क्लोज फ्रेंड हैं कभी न कभी मैं उन्हें बेहद परेशान जरूर कर देती हूँ इसलिए बहुत सोच समझ कर किसी नए इंसान से बातें करती हूँ...मगर जेमिनी साइन के लोगों का जो स्वाभाव होता है...विरोधाभास से भरा हुआ...किसी से दोस्ती अक्सर इंस्टिक्ट पर करती हूँ...कोई अच्छा लगता है तो बस ऐसे ही अच्छा लगता है. बिना कारण...फिर सोचती हूँ...बुरी बात है न...खुद को थोड़ा रोकना था...मान लो वो जान जाए कि वो मेरी इस बेतरतीब सी जिंदगी में कितना इम्पोर्टेंट है...मुझे कितना प्यारा है तो उसे तकलीफ होगी न...आज न कल होगी ही...तो फिर हाथ  रोकती क्यूँ नहीं लड़की? 

पता है क्यूँ? क्यूंकि मन का वो थोड़ा सा छूटा हुआ हिस्सा जो है न...वो शहरों में नहीं है...लोगों में है...जिसे जिसे मिली हूँ न...अधूरा सा मन थोड़ा थोड़ा पूरा होने लगा है...और उनका पूरा पूरा मन थोड़ा थोड़ा अधूरा होने लगा है...है न बहुत खतरनाक बात? चलो आज सीक्रेट बता ही दिया...अब बताओ...मिलोगे मुझसे?

07 April, 2012

तुम ठीक कहते थे...डायरियां जला देनीं चाहिए


मेरे साथ ऐसा बहुत कम बार होता है कि मेरा कुछ लिखने को दिल हो आये और मैं कुछ लिख नहीं पाऊं...कि ठीक ठीक शब्द नहीं मिल रहे लिखने को...कुछ लिखना है जो लिखा नहीं पा रहा है. जाने क्या कुछ लिख रही हूँ...कॉपी पर अनगिन पन्ने रंग चुकी हूँ...दिन भर ख्यालों में भी क्या क्या अटका रहता है...पर वो कोई एक ख्याल है कि पकड़ नहीं आ रहा है...फिसल जा रहा है हाथ से. 

जैसे कोई कहानी याद आके गुम गयी हो...जैसे किरदार मिलते मिलते बिछड़ जायें या कि जैसे प्यार हुआ हो पहली बार और कुछ समझ ना आये कि अब क्या होने वाला है मेरे साथ...मुझे याद आता है जब पहली बार एक लड़के ने प्रपोज किया था...एकदम औचक...बिना किसी वार्निंग के...बिना किसी भूमिका के...सिर्फ तीन ही शब्द कहे थे उसने...आई लव यू...न एक शब्द आगे...न एक शब्द पीछे...चक्कर आ गए थे. किचन में गयी थी और एक ग्लास पानी भरा था...पानी गले से नीचे ही नहीं उतर पा रहा था...जैसे भांग खा के वक़्त स्लो मोशन में गुज़र रहा हो. 

कुछ अटका है हलक में...और एकदम बेवजह सिगरेट की तलब लगती है...जिस्म पूरा ऐंठ जाता है...लगता है अब टूट जाएगा पुर्जा पुर्जा...लगता है कोई खोल दे...सारी गिरहें...सारी तहें. एक किताब हो जिसमें मेरे हर सवाल का जवाब मिल जाए...कोई कह दे कि अब मुझे ताजिंदगी किसी और से प्यार नहीं होगा...या फिर ऐसी तकलीफ नहीं होगी.

मैं बहुत कम लोगों को आप कहती हूँ...मुझे पचता ही नहीं...आप...जी...तहजीब...सलीका...नहीं कह पाती...फिर उनके नाम के आगे जी नहीं लगाती...जितना नाम है उसे भी छोटा कर देती हूँ...इनिशियल्स बस...हाँ...अब ठीक है. अब लगता है कि कोई ऐसा है जिससे बात करने के पहले मुझे कोई और नहीं बनना पड़ेगा...बहुत सी तसवीरें देखती हूँ...ह्म्म्म...मुस्कराहट तो बड़ी प्यारी है...बस जेठ के बादलों की तरह दिखती बड़ी कम है. वो मुझे बड़े अच्छे लगते हैं...कहती हूँ उनसे...आप बड़े अच्छे हो...सोचती हूँ कितना हँसता होगा कोई मेरी बेवकूफी पर...इतना खुलना कोई अच्छी बात है क्या...पर कुछ और होने में बहुत मेहनत है...अगर सच कहो और अपनी फीलिंग्स को न छुपाओ तो चीज़ें काफी आसान होती हैं...छुपाने में जितनी एनेर्जी बर्बाद होती है उसका कहीं और इस्तेमाल किया जा सकता है. 

दोस्त...तेरी बड़ी याद आ रही थी...कहाँ था तू...वो मेरी आवाज़ में किसी और को मिस करना पकड़ लेता है...पूछता है...फिर से याद आ रही है...मैं चुप रह जाती हूँ. उसे बहकाती हूँ...वो मुझे कुछ जोक्स सुनाता है...शायरी...ग़ालिब...फैज़...बहुत देर मेरी खिंचाई करता है...अपनी बातें करता है...पूछता है...तुझे मुझसे प्यार क्यूँ नहीं होता...तुझे मुझसे कभी प्यार होगा भी कि नहीं. मैं बस हंसती हूँ और मन में दुआ मांगती हूँ कि भगवान् न करे कि कभी मुझे तुझसे प्यार हो...उनकी बहुत बुरी हालत होती है जिनसे मुझे प्यार होता है...तू जानता है न...अपने जैसी सिंगल पीस हूँ...मुझे भुलाने के लिए किसी से भी प्यार करेगा तो भी भूल नहीं पायेगा...प्यार में कभी निर्वात नहीं हो सकता...किसी की जगह किसी और को आना होता है. 

वो कहती है...तू ऐसी ही रहा कर...प्यार में रहती है तो खुश रहती है...वो कोशिश करती है कि ऐसी कोई बात न कहे कि मुझे तकलीफ हो...मुझसे बहुत प्यार करती है वो, मेरी बहुत फ़िक्र करती है. मुझे यकीन नहीं होता कि वो मेरी जिंदगी में सच मुच में है. मुझे वैसे कोई प्यार नहीं करता...लड़कियां तो बिलकुल नहीं...मैं उससे कहती हूँ...मैं ऐसी क्यूँ हूँ...इसमें मेरी क्या गलती है...मैं तेरे जैसी अच्छी क्यों नहीं.

मेरा मन बंधता क्यूँ नहीं...क्या आध्यात्म ऐसी किसी खोज के अंत में आता है? पर मन नहीं मानता कि हिमालय की किसी कन्दरा में जा के सवालों के जवाब खोजूं...मन कहता है उसे देख लूं जिसे देखने को नींद उड़ी है...उससे छू लूं जिसकी याद में तेल की कड़ाही में ऊँगली डुबो दिया करती हूँ...उसे फोन कर लूं जिसकी आवाज़ में अपना नाम सुने बिना शाम गुज़रती नहीं...उसे कह दूं कि प्यार करती हूँ तुमसे...जिससे प्यार हो गया है. सिगरेट सुलगा लूं और पार्क की उस कोने वाली सीमेंट की सीढ़ियों पर बैठूं...एक डाल का टुकड़ा उठाऊँ और तुम्हारा नाम लिखूं...जो बस तब तक आँखों में दिखे जब तक लकड़ी में मूवमेंट है...
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मेरे सच और झूठ की दुनिया की सरहदें मिटने लगी हैं...मैं वो होने लगी हूँ जिसकी मैं कहानियां लिखती हूँ...मैं धीरे धीरे वो किरदार होने लगी हूँ जो मेरी फिल्म स्क्रिप्ट्स में कोमा में पड़ी है...न जीती है न मरती है. अनुपम ने मेरी हथेली देख कर कहा था कि मैं ८० साल तक जियूंगी...मैं जानती हूँ कि उसने झूठ कहा होगा...पक्का मैं जल्दी मरने वाली हूँ और उसने ऐसा इसलिए कहा था कि वो जानता है मैं उसकी बातों पर आँख मूँद के विश्वास करती हूँ...कि यमराज भी सामने आ जायें तो कहूँगी अनुपम ने कहा है कि मैं ८० के पहले नहीं मरने वाली. 

मुझमें मेरा 'मैं' कहाँ है...कौन है वो जो मुझसे प्यार में जान दे देने को उकसाता है...मेरे अन्दर जो लड़की रहती है उसे दुनिया दिखती क्यूँ नहीं...मैं बस इन शब्दों में हूँ...आवाज़ के चंद कतरों में हूँ...तुम कैसे जानते हो मैं कौन हूँ...वो क्या है जो सिर्फ मेरा है...तुमने मुझे छू के देखा है? तुम मुझे मेरी खुशबू से पहचान सकते हो? तुम्हें लगता है तुम मुझे जानते हो क्यूंकि तुम मुझे पढ़ते हो...मैं कहती हूँ कि तुमसे बड़ा बेवक़ूफ़ और कोई नहीं...लिखे हुए का ऐतबार किया? जो ये लिखती है मैं वो नहीं...मैं जो जीती हूँ वो मैं लिखती नहीं...आखिर कौन हूँ मैं...और कहाँ हो तुम...आ के मुझे अपनी बाँहों में भरते क्यूँ नहीं?

06 April, 2012

रात के अँधेरे में एक दूज का चाँद खिल जाता उसकी उँगलियों के बीच.


एक छोटी सी लड़की है...दिन में उसकी काली आँखों में जुगनू चमकते हैं...पर उसे मालूम नहीं था...एक शाम उसकी आँखों से एक जुगनू बाहर आ गया...नन्ही लड़की ने बड़े कौतुहल से जुगनू को देखा और अपनी छोटी छोटी हथेलियों से कमल के फूल की पंखुड़ियों सा उसे बंद कर लिया. देर रात हो गयी तो जुगनू की ठंढी हलकी हरी चमक मद्धम पड़ने लगी...लड़की को यकीन नहीं होता की उसकी हथेलियों से जुगनू गायब नहीं हो गया है...उँगलियों के बीच हलकी फांक करके देखती...रात के अँधेरे में एक दूज का चाँद खिल जाता उसकी उँगलियों के बीच. 

रात लड़की खाना खाने के मूड में नहीं थी...खाने के लिए हथेलियाँ खोलनी पड़तीं और जुगनू उड़ जाता...वो एकदम छोटी थी इसलिए उसे मालूम नहीं था कि जुगनू उसकी आँखों की चमक से ही आता है और अगली शाम फिर से आ जाएगा...नया जुगनू...रात को आसमान की औंधी कटोरी पर तारे बीनने का काम था उसकी मम्मी का...जब किसी तारे में कोई खोट होता तो उसकी मम्मी उस तारे को आसमान से उठा कर फ़ेंक देती...वो टूटता तारा लोग देखते और मन में दुआ मांग लेते...तारे बीनने का काम बहुत एकाग्रता का होता था...तो छोटी लड़की की मम्मी उसे मुंह में कौर कौर करके खाना नहीं खिला सकती थी. 

जब बहुत देर तक चाँद की फांक से लुका छिपी खेलती रही तो फिर लड़की को यकीन हो गया कि जुगनू सच में है...और मुट्ठी खोलते ही गायब नहीं हो जायेगा...उसने हौले से अपनी मुट्ठी खोली...जुगनू कुछ देर तो उसकी नर्म हथेली पर बैठा रहा...सहमा हुआ, कुछ वैसा जैसे पिंजरे का दरवाज़ा खोलो तो कुछ देर तोता बैठा रहता है...उसे यकीन ही नहीं होता कि वो वाकई जा सकता है...उड़ सकता है...और फिर जुगनू ने सारी दुनिया एक बच्चे की आँखों के अन्दर से देखी थी...ये दुनिया उसे डराती भी थी...चौंकाती भी थी और पास भी खींचती थी. 

जुगनू ऊपर आसमान की ओर उड़ गया...जहाँ उसे तारों को बीनने में लड़की की मम्मी की हेल्प करनी थी. 
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१२ साल बाद का पहला दिन...

आज पहली बार किसी लड़के ने उसका हाथ पकड़ा था...उसने अपनी हथेली में उसके लम्स को वैसे ही कैद कर लिया था जैसे उस पहली शाम जुगनू को मुट्ठी में बाँधा था...उसे देर रात लगने लगा था कि हथेली खोल के देखेगी तो दूज के चाँद की फांक सी उस लड़के की मुस्कराहट नज़र आएगी. 

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तीस के होने के पहले का कोई साल...

We could have danced away to the dawn...

तुम्हारे आफ्टर शेव की हलकी खुशबू मेरी आँखों में अटकी है...आज भी शाम आँखों से जुगनू आते हैं...मुझे देख कर मुस्कुराते हैं और ऊपर आसमान की ओर उड़ जाते हैं, मैं अब उन्हें रोकती नहीं...मम्मी रिटायर हो गयी है...और ऊपर कहीं तारा बन गयी है...

मैं बस जरा देर को तुम्हें मुट्ठी में बंद कर देखना चाहती हूँ कि तुम वाकई हो कि नहीं...जिस लम्हे यकीन हो जायेगा तुम्हारे होने का मुट्ठी खोल कर तुम्हें जाने दूँगी...पर सोचने लगी हूँ बहुत...तो लगता है तुम्हारा दम घुटने न लगे...इसलिए कभी तुम्हें ठहरने को नहीं कहती. लेकिन सुनो न...आज रात नींद नहीं आ रही...आज की इस लम्बी सी रात काटने के लिए मेरी आँखों में जुगनू बन के ठहर जाओ न!

05 April, 2012

खेतों में उगा दूं मैं तेरे खतों की फसलें

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रहने दो न यार...कहीं एक कोने में पड़ी रहेगी...तुम कब से परफेक्शन के चक्कर में पड़ने लगी...अनगढ़ है...थोड़ी कच्ची है. पर एक मन कहता है...इस उम्र में बचपना शोभा नहीं देता...मन माँ की कही एक बात भी खींच के लाता है...ज्यादा कच्चा आम खाओगी तो पेट में दर्द होगा...फिर भी मन नहीं मानता. इसे किसी कागज़ में लिख कर बिसरा देने को जी नहीं चाहता...कभी कभी कैसा अनुराग हो जाता है अपने लिखे से...की जैसे वसंत में फूटती पेड़ के नयी कोपल हो या घर में लगाये कलमी गुलाब में आता पहला फूल...

ग़ज़ल, नज़्म या उसके जैसा कुछ भी अब नहीं लिखती...वो एक बेहद मुश्किल विधा है मेरे लिए...मुझे लगता है कि जो लोग ग़ज़ल लिखते हैं वो नैसर्गिक रूप से उसी फॉर्म में उन्हें इमैजिन करते होंगे. मैं छोटी सी छेनी लेकर बैठी हूँ कि इसे थोड़ा सुधार सकती हूँ क्या...पर तभी लगता है की ये पत्थर के प्रतिमा नहीं हाड़-मांस की एक नन्ही सी बच्ची है...इसे दर्द होगा. वैम्पायर बेबी की तरह जो कभी बड़े नहीं होते...उम्र में फ्रीज हो जाते हैं...उनका बचपना जब बुरा लगता है तब भी नहीं जाता. तो लिखे में जितना कच्चापन है मुझमें उतनी ही जिद...कि ग़ज़ल लिखना नहीं सीखूंगी...मीटरबाजी नहीं करुँगी...तो सिंपल ये बचता है कहना कि कृपया इसे ग़ज़ल न समझें...इसे कुछ भी न समझें...ये पोस्ट इग्नोर कर दें...क्यूंकि मैं इसे छूने वाली नहीं.

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लहरों पे कश्तियाँ ले चाँद उतर जाए
लिख जाए साहिलों पे तेरा नाम इन्किलाब 

जिस्म से खुरच दे उम्र भर की झुर्रियां 
हाथों की लकीरों से तेरा नाम इन्किलाब 

शहर शहर दरख्तों पर विषबेल लिपट जाए
खो जाए जो लिक्खा था तेरा नाम इन्किलाब 

खेतों में उगा दूं मैं तेरे खतों की फसलें 
सुनहरी बालियों में झूमे तेरा नाम इन्किलाब 

टेसू का जंगल है और मुट्ठी भर इमली भी
तेरे होटों से भी मीठा तेरा नाम इन्किलाब 

हम इश्क में फ़ना हों तो इसमें रिहायी कैसी 
हमें इश्क जिंदगी है तेरा नाम इन्किलाब 

04 April, 2012

Three Cs...कुर्सी, कलम और कॉफी मग

हम हर कुछ दिन में 'जिंदाबाद जिंदाबाद...ए मुहब्बत जिंदाबाद' कहते हुए इन्किलाबी परचम लहराने लगते हैं...इश्क कमबख्त अकबर से भी ज्यादा खडूस निकलता है और हमें उनके घर में जिन्दा चिनवाने की धमकी देता है...कि शहजादा ताउम्र किले की दीवार से सर फोड़ता फिरे कि जाने किस दीवार के पीछे हो अनारकली के दिल की आखिरी धड़कनें...शहजादा भी एकदम बुद्दू था...अब अगर प्यार इतनी ही बड़ी तोप चीज़ है तो थोड़े न अनारकली के मरने के बाद ख़त्म हो जाती...खैर...जाने दें, हमें तो अनारकली इसलिए याद आ गयी कि वो आजकल डिस्कोथेक के रस्ते में दिखने लगी है ऐसा गीत गा रहे हैं लोग.

ये रूहानी इश्क विश्क हमको समझ नहीं आता...हम ठहरे जमीनी इंसान...उतना ही समझ में आता है जितना सामने दीखता है अपनी कम रौशनी वाली आँखों से...किस गधे ने आँखों के ख़राब होने की यूनिट 'पॉवर' सेट की थे...कहीं मिले तो पीटें पकड़ के उसको. पॉवर बढ़ती है तो फील तो ऐसा होता है जैसे सुपरमैन की पॉवर हो...धूप में जाते ही बढ़ने लगी...पर होता है कमबख्त उल्टा...आँख की पॉवर बढ़ना मतलब आँख से और कम दिखना...कितना कन्फ्यूजन है...तौबा! खैर...हम बात कर रहे थे प्यार की...ये दूर से वाले प्यार से हम दूर ही भले...एक हाथ की दूरी पर रहो कि लड़ने झगड़ने में आराम रहे...गुस्सा-वुस्सा होने में मना लेने का स्कोप हो...खैर, आजकल हमारा दिल तीन चीज़ों पर आया हुआ है.


पहली चीज़...मेरी रॉकिंग चेयर...मैं कुछ नहीं तो पिछले चार साल में तो ढूंढ ही रही हूँ एक अच्छी रॉकिंग चेयर पर कभी मिलती ही नहीं थी. हमेशा कुछ न कुछ फाल्ट, कभी एंगिल सही नहीं...तो कभी बहुत छोटी है कुर्सी तो कभी आगे पैर रखने वाली जगह कम्फर्टेबल नहीं...तो फाईनली मैंने ढूंढना छोड़ दिया था कि जब मिलना होगा मिल जाएगा. इस वीकेंड हम सोफा ढूँढने चले थे और मिल गयी ये 'थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फोरेवर'. हाई बैक, ग्राफिक अच्छे, मोशन सही...झूलना एकदम कम्फर्टेबल. बस...हम तो ख़ुशी से उछल पड़े. बुक कराया और घर चले आये ख़ुशी ख़ुशी.

मंडे को कुर्सी घर आई और तब से दिन भर इसपर हम लगातार इतना झूला झूले हैं कि कल रात को हलके चक्कर आ रहे थे...जैसे तीन दिन के ट्रेन के सफ़र के बाद आते हैं. पर यार कसम से...क्या लाजवाब चीज़ है...इसपर बैठ कर फ़ोन पर बतियाना हो कि कुछ किताब पढना हो या कि ख्याली पुलाव पकाने हों...अहह...मज़ा ही कुछ और है. ये फोटो ठीक कुर्सी के आते ही खींची गयी है...पीछे में हमारा लैपटॉप...और कॉपी खुली है जिसमें कि कुछ लिख रहे थे उस समय.

दूसरी चीज़ जिसपर हमारा दिल आया हुआ है वो है ये कॉफ़ी मग...इसके कवर में एक बेहद प्यारी और क्यूट बिल्ली बनी हुयी है. इसकी छोटी छोटी आँखें...लाल लाल गाल और कलर कॉम्बिनेशन...सफेत पर काली-नीली...ओहो हो...क्या कहें. देखते साथ लगा कि ये बिल्ली तो हमें घर ले जानी ही होगी उठा कर. कल सुबह इस मस्त कप में कॉफ़ी विद हॉट चोकलेट पिया...कितना अच्छा लगा कि क्या बताएं. टेबल पर रखा भी रहे इतना अच्छा कॉफ़ी मग न तो उसे देख कर ही कुछ कुछ लिखने का मन करे. मुझे न अपने घर में वैसे तो ख़ास आर्डर की दरकार नहीं है. घर अधिकतर बिखरा हुआ ही रहता है...पर कुछ चीज़ें मुझे एकदम अपनी वाली चाहिए होती हैं, उसमें कोई कम्प्रमाइज नहीं कर सकती. जैसे चोकलेट या कॉफ़ी पीनी होगी तो अपने कॉफ़ी मग में ही पियूंगी...उसमें किसी और को कभी नहीं दूँगी. बहुत पजेसिव हूँ अपनी पसंदीदा चीज़ों को लेकर.

तीसरी चीज़ जिसके लिए हम एकदम ही पागल हो रखे हैं वो है हमारी नयी कलम...लिखने को लेकर हम वैसे भी थोड़े सेंटी ही रहते हैं. पहली बार हम खुद के लिए महंगा पेन ख़रीदे हैं...हमको अच्छे पेन से लिखना अच्छा लगता है...उसमें भी नीले या काले रंग के इंक से लिखने में मज़ा नहीं आता...इंक भी हमेशा कुछ दूसरा रंग ही अच्छा लगता है. ये मेरा पहला पार्कर है...इंक पेन...और रंग एकदम जैसा मुझे पसंद हो...पेन की बनावट भी ऐसी है कि लिखने में सुविधा होती है. निब एकदम स्मूथ...कागज़ पर फिसलता जाता है. गहरे गुलाबी-लाल रंग का पेन इतना खूबसूरत है कि लिखने के पहले मन करता है पेन पर ही कुछ लिख लें पहले. आजकल इसमें शेल पिंक इंक भरा हुआ है :) जिस दिन से पेन लायी हूँ...कॉपी में बहुत सारा कुछ जाने क्या क्या लिख लिया है.

संडे को नयी इंक भी खरीदी...ओरेंज क्रश...तो मेरे पास तीन अच्छी अच्छी कलर की इंक्स हो गयीं हैं...Daphne Blue, Shell Pink and Orange Crush. अधिकतर फिरोजी रंग से ही लिखती हूँ...मुझे बहुत अच्छा लगता है...खुश खुश सा रंग है, पन्ने पर बिखरता है तो नीला आसमान याद आता है...खुला खुला. पर पिछले कई दिनों से एक ही रंग से लिख रही थी और नारंगी रंग को उसी बार देख भी रखा था...नारंगी रंग भी अच्छा है...खुशनुमा...फ्रेश...बहार के आने जैसा. मैं अधिकतर इन दोनों रंग से लिख रही हूँ आजकल. फिर से चिट्ठी लिखने को मन कर रहा है...सोच रही हूँ किसको लिखूं. हरे रंग से लिखने का फिर कभी मूड आएगा तो लिखूंगी.

तो अगर आप मेरे घर आये हो...और मैं आपको अपनी रॉकिंग चेयर पर बैठने देती हूँ...और अपने फेवरिट मग में कॉफ़ी पेश करती हूँ और कॉपी देकर कहती हूँ...औटोग्राफ प्लीज...तो मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ...इसमें से एक भी मिसिंग है तो यु नो...वी आर जस्ट गुड फ्रेंड्स ;-)  ;-)

ya ya...I am a materialistic girl! :-) 

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