12 March, 2012

भीगे कैनवास पर पेंटिंग

हैरी पोटर हीरो है...सिर्फ इसलिए नहीं की वो बहादुर है और मौत के सामने भी हिम्मत रखता है...इसलिए भी नहीं कि वह वोल्डेमोर्ट के खिलाफ अकेला खड़ा होता है...वो ये सब है...मगर इन सबके साथ वो एक एकलौता लड़का भी है जिसके कंधे पर सर रख कर मैं सबसे ज्यादा रोई हूँ...मैं जानती हूँ कि वो समझता है क्यूंकि उसने भी अपनी माँ को खो दिया है...ये बात हमेशा उस किताब में नहीं आती...पर जब भी आती है मैं जानती हूँ कि वो कैसा महसूस कर रहा होगा. हर परेशानी के बावजूद वो इस बात का ध्यान रखता है कि उस फंतासी की दुनिया में मेरा हाथ उससे कभी न छूटे. जे के रोलिंग के बहुत से फैन्स हैं...पर मेरा शुक्रिया एकदम अलग है...हर एक किताब दुनिया में इसलिए आती है कि कहीं उसे पढ़ने के लिए कोई पैदा हुआ है...

IIMC का दूसरा सेमेस्टर चल रहा था. पहले सेमेस्टर में जो ग्रुप था अब वो ग्रुप नहीं था तो उस समय के दोस्तों के साथ वक़्त नहीं मिल पाता था. ऐसे में मोलोना से कभी कभार बात हो पाती थी...ऐसी ही एक रात उसके कमरे में बैठी थी...कोई सुबह के चार बज रहे होंगे. उसके सिरहाने हैरी पोटर की किताब थी...हमेशा की तरह. मैंने पूछा 'Why do you read this book Molo?'. उस समय तक का नियम था कि किसी भी बहुचर्चित किताब को नहीं पढूंगी...जिस किताब को अवार्ड मिला है नहीं पढूंगी...पढूंगी बस वो किताब जिसे छूने पर, पन्ने पलटने पर पढ़ने का मन करे. इसी कारण कभी हैरी पोटर नहीं पढ़ी थी कि सारे लोग पढ़ रहे थे...मोलो ने कहा कि तुम इसके चार पन्ने पढो...और अगर उसके बाद जो तुम्हारा मन करे...मैंने पढ़े चार पन्ने और फिर किताब अपने कमरे में ले गयी...मोलोना ने फिर और चार किताबें दीं पढ़ने के लिए...वो नहीं होती तो मेरी जिंदगी में हैरी पोटर नहीं होता...इन किताबों में उसका असीम प्यार भी उमड़ता है...कुछ अच्छा हुआ तो मेरे साथ बांटने का प्यार...चाहे वो किताबें हों, रात को गर्म पानी या फिर बॉयफ्रेंड का दिया डार्क चोकलेट. मुझे जानने वाले समझते हैं कि चोकलेट शेयर करने से बड़ी दोस्ती मैं इस दुनिया में नहीं जानती. मोलो के कारण ही मैं फेसबुक पर आई...वो कहीं और थी ही नहीं...दो साल तक उसका कोई पता नहीं...आखिर मुझे ही झुकना पड़ा...सिर्फ उस एक लड़की के लिए मैं फेसबुक पर हाज़िर थी.

परसों स्कूल की मेरी बेस्ट फ्रेंड का फोन आया...स्मृति के बाद एक उसको ही बेस्ट फ्रेंड की पदवी से नवाज़ा था...और उसे चिट्ठियां लिखी थीं...दो साल तक. वनस्थली के उस जंगल में मेरी चिट्ठियां...शायद रेगिस्तान का रास्ता तब से ही देख रखा था...उसकी चिट्ठियां धूलभरी आतीं...एकदम उजाड़, सुनसान...खडूस वार्डन और बुरी लड़कियों के किस्से...वहां दूर दूर तक कोई ख़ुशी नहीं दिखती. हमारी चिट्ठियों में एक्जाम के भूत का भयानक साया रहता...मेरा भी 12th बुरा बीता था...एक तो गर्ल्स स्कूल...उसपर टीचर किसी करम के नहीं...उसपर लाइब्रेरी फ्राईडे को कि जब सारी अच्छी किताबें जा चुकी हों...जिंदगी एकदम बेरंग...बस चिट्ठियां थीं और डाकिया था कि जिंदगी में कुछ जीने लायक था.

मुझे पढ़ी हुयी चीज़ें तब तक याद नहीं रहतीं जब तक उनमें मुझे अपनी जिंदगी के किसी लम्हे का अक्स न दिख जाए...चाहे मेरी तन्हाई हो या मेरी मुस्कराहट...मुझे जो चीज़ें पसंद आती हैं पागलों की तरह पसंद आती हैं. मुझे बीच का रास्ता नहीं आता...प्यार करती हूँ तो एकदम मर जाउंगी जैसा...दोस्त अगर वाकई में माना है तो जान हाज़िर है...तुम्हारी हर परेशानी मेरी...तुम्हारे सारी खुशियाँ मेरी अपनी...और एक बार दिल टूट जाता है तो फिर जिंदगी में जुड़ नहीं पाता. अब तक ब्लॉग जितना जितना भी पढ़ा है..कुछ लोग हैं जिनसे कभी एक बार मिलने का मन है...बस एक बार...छू के देखने भर के लिए...न ना...इतने भर के लिए नहीं...एक बार बाँहें गले में डाल कर ये कहने के लिए...कि तुम्हारे लिखे के बदले जान मांग लो...कुर्बान जाएँ...दुआओं सा लिखते हो दोस्त...दुआओं सा. खुदा तुम्हारी कलम को मुहब्बत बक्शे.
You are my hero! (Call me sexist but no women here ;) )


Cheers to Harry Potter, Molona, Anshu, and my beloved writers...you know who  you are :) :)
I love you. 

06 March, 2012

Wordpress audio player on blog/ ब्लॉग पर वर्डप्रेस ऑडियो प्लेयर

आज की इस पोस्ट में हम सीखेंगे कि वर्डप्रेस ऑडियो प्लेयर को ब्लॉग में कैसे इन्टीग्रेट करते हैं. पोस्ट थोड़ी टेक्नीकल है तो हम पहले आगाह किये देते हैं कि आप इसे पढ़ कर वक़्त बर्बाद न करें :)

हमें पिछले कुछ दिनों से पोडकास्टिंग का कीड़ा काट रहा है...तो गाहे बगाहे हम कुछ न कुछ पोडकास्ट करते रहते हैं. पोडकास्ट होस्ट करने के लिए डिवशेयर का इस्तेमाल करते हैं पर डिवशेयर का प्लेयर मुझे खास पसंद नहीं आता...थोड़ा क्लटर ज्यादा है उसमें...वैसे तो जितने ऑनलाइन प्लेयर दिखे हैं मुझे...सबसे नीट यही है फिर भी उतना अच्छा नहीं लगा. वर्डप्रेस का ऑडियोप्लेयर का लेआउट  एकदम क्लीन है...इसे आप अपने ख़ास गाने भी ब्लॉग पर पोस्ट करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.

कल सुबह मूड हुआ कि इसे ब्लॉग पर चिपकाया जाए...सोचा नहीं था कि इतना मुश्किल होगा. सुबह कुणाल ऑफिस गया तब बैठे लैपटॉप लेकर कि एक आधे घंटे में निपटा के खाना वाना खा लेंगे. मगर आधा एक घंटा बढ़ते बढ़ते शाम के पांच बज गए...न खाया था कुछ पिया था...जिद्दी हूँ एक नंबर की...जब तक करुँगी नहीं कुछ और काम में मन ही न लगे. कुछ दोस्तों से पूछा भी पर जावास्क्रिप्ट नहीं आता था उन्हें.

मैं किसी टोपिक के पीछे पड़ती हूँ तो फिर कुछ बाकी नहीं छोड़ती...कल जावा स्क्रिप्ट पढ़ भी ली...पूरा का पूरा कोड पढ़ के देखा...सिंटेक्स एरर इतने सालों बाद स्क्रीन पर दिखा पर डिबग नहीं हो पाया मुझसे. फिर मुझे लग रहा था कि कितना सिंपल तो है...पूरा कोड दिख रहा है तो हो क्यूँ नहीं रहा. शाम होते चक्कर आने लगे...मूवी देखने का मूड था 'द आर्टिस्ट' शाम के छः बजे का शो था...वो भी मिस कर दिया. जब कुछ नहीं काम हो रहा था तो सोचा कि नहा लेते हैं...शैम्पू करने के बाद अक्सर मेरा मूड बदल जाता है. तो शैम्पू किया...फिर एक बहुत अजीज दोस्त से बात की...उससे बात करके मूड अच्छा हुआ...फिर बाइक उठा के घूमने निकल गयी. रात को छोटे भाई को मेल लिखी कि दिक्कत हो रही है...थोड़ा देख दो.

और सुबह देखती हूँ जिमी का मेल आया हुआ है...प्यारा सा मेल और उसके टेस्ट ब्लॉग का लिंक जहाँ साउंड फ़ाइल प्ले हो रही थी...मारे ख़ुशी के आँखों में आंसू आ गए...गर्व से सर तन गया कि वाह...मेरा छोटा सा भाई इतना होशियार हो गया :) बहुत अच्छा लगा बहुत बहुत.

ये तो हुआ फिल्म का सेंटी हिस्सा...अब मुद्दे पर आते हैं :)

2. create a new page
1. आपको एक फ़ाइल होस्टिंग साईट की जरूरत पड़ेगी...चूँकि आप ब्लोगर इस्तेमाल करते हैं तो सबसे आसान होगा गूगल साइट्स पर अपनी वेबसाईट बनाना. इसलिए लिए यहाँ जाएँ-  https://sites.google.com/
2. जब आपकी वेबसाईट बन जाए तो इसमें एक नया पेज बनाएं...जैसे कि मैंने बनाया है ऑडियो...पेज के राईट साइड के ऊपर कोर्नर में ये जो पेज में प्लस का बटन दिख रहा है उसको दबाने से नया पेज बन जाता है. मैंने इसे नाम दिया है audio.
आपको जरूरत पड़ेगी तीन फाइलों की. एक जावास्क्रिप्ट (.js)की फ़ाइल है, एक फ्लैश प्लेयर(.swf) है और एक mp3 जो कि आपका म्यूजिक है जिसे प्ले करने के लिए हम इतना ड्रामा कर रहे हैं. आपका पेज कुछ ऐसा दिखेगा... https://sites.google.com/site/pujaupadhyaykislay/audio इसकी हमें आगे जरूरत पड़ेगी. 

3. जावास्क्रिप्ट की फ़ाइल और फ्लैश प्लेयर मैंने अपनी साईट पर अपलोड कर दिया है...आप वहां से डाउनलोड कर लीजिये. यहाँ https://sites.google.com/site/pujaupadhyaykislay/audio

दूसरा तरीका है इन्हें वर्डप्रेस के साईट से डाउनलोड करना http://wpaudioplayer.com/download/ यहाँ से Standalone पर क्लिक कीजिये...जिप फ़ाइल को अनलोक कीजिए. फोल्डर में पहली और आखिरी फाइल की जरूरत है आपको. 'audio-player' and 'player'.
3. download/upload files

4. अपने वेबपेज पर ऐड फाइल्स पर क्लिक कीजिये और audio-player.swf और player.js अपलोड कर दीजिये. ये कुछ ऐसा दिखेगा. अब अपनी mp3 फ़ाइल भी यहाँ अपलोड कर लीजिये.

५. अब हमें जरूरत है ब्लॉग के html में एक छोटा सा कोड डालने की...इसलिए लिए ब्लॉग डैशबोर्ड में जायें और टेम्पलेट सेलेक्ट करें. पहले अपने ब्लॉग टेम्पलेट का बैकप ले लीजिये...इसके लिए टॉप राईट कोर्नर में जो backup/restore button है उसे क्लिक करें. फिर एडिट html पर क्लिक करें.

6.  cntrl+f से head ढूँढिये...उसके ठीक पहले ये एक लाइन का कोड चिपकाना है.

<script language='JavaScript' src='https://sites.google.com/site/pujaupadhyaykislay/audio/audio-player.js'/>

इस कोड में जो हिस्सा ब्लू में है...उसकी जगह आप अपनी साईट का url डालिए. (go to no. 2). Replace only the part highlighted in blue...ऑडियो के बाद का हिस्सा /audio-player.js'/> को वैसा ही रहने दीजिये. 

अब टेम्पलेट सेव कर लीजिये. 

7. html का दूसरा कोड...इसमें आपको तीन लिंक बदलने हैं...

<div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on">
<br />
<div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on">
<object data="https://sites.google.com/site/pujaupadhyaykislay/audio/player.swf" height="24" id="audioplayer1" type="application/x-shockwave-flash" width="290">
<param name="movie" value="https://sites.google.com/site/pujaupadhyaykislay/audio/player.swf">
<param name="FlashVars" value="playerID=audioplayer1&soundFile=https://sites.google.com/site/pujaupadhyaykislay/audio/Enya-OnlyTime.mp3">
<param name="quality" value="high">
<param name="menu" value="false">
<param name="wmode" value="transparent">
</object> 

सिर्फ वो हिस्सा रिप्लेस कीजिये जो नीले रंग में बोल्ड है...बाकी एक्सटेंशन वैसे ही रहने दीजिये. /player.swf

mp3 की लिंक की जगह आपके गाने का जो नाम  है वो लिखिए...कृपया ध्यान से नोट कीजिये ये वही होना चाहिए जो आपकी फ़ाइल का नाम है. जैसे मेरे गाने का नाम था 'Enya-OnlyTime'
लिंक: https://sites.google.com/site/pujaupadhyaykislay/audio/Enya-OnlyTime.mp3 

मान लीजिये आपके गाने का नाम है 'piya basanti' तो जब आप फाइल अपलोड कर रहे हैं उसके पहले ही फाइल के नाम से स्पेस डिलीट कर दीजिये...'piyabasanti' वैसे तो दिक्कत नहीं आ रही है...पर कभी कभी स्पेस के कारण फ़ाइल नहीं दिखा रहा है. 
link: https://sites.google.com/site/yoursitename/audio/piyabasanti.mp3

8. अब नयी पोस्ट लिखिए...जो भी आप लिखते हो, अच्छा बुरा, प्यारा जो भी...लिख लीजिये...अब कंपोज के बगल में जो लिंक है...html उसको क्लिक कीजिये...कीड़े मकोड़े जैसी बहुत सी लाइंस आ जायेंगी :) इसमें सबसे नीचे स्क्रोल कीजिये और वहां ये ऊपर वाला कोड चिपका दीजिये. इससे प्लेयर पोस्ट के नीचे आएगा. अगर प्लेयर कहीं और प्लेस करना है तो कर्सर को वहां पर रखिये जहाँ प्लेयर चाहिए और html पर क्लिक कीजिये...और उधर ही कोड चिपका दीजिये. 

9. अब कहिये...पूजा तुम सबसे अच्छी हो. :) :) मुस्कुराइए. 

10. Publish :)



05 March, 2012

हिज्र का मौसम. दसविदानिया.

उसमें मेरी कोई गलती नहीं थी...पर वैसा पागलपन, वैसी शिद्दत, वैसी बेकरारी...वो जो मेरे अन्दर एक लड़की जी उठी थी जाने कैसे तुम्हारे प्यार की एक छुअन से...वो लड़की जो जाने कितने पर्दों में मैंने छुपा के रखी थी तुमने उसकी आँखों में आँखें डाल बस एक बार कहा की तुम उससे प्यार करते हो और वो तुम्हारी हो गयी थी...मन को जितना बाँधा मन उतना ही भागता गया तुम्हारे पीछे...पर तुम कोई पास तो थे नहीं...तो दौड़ते दौड़ते लड़की के कोमल पांवों में छाले पड़ गए...उसका दुपट्टा कंटीली झाड़ियों में लग के तार तार हो गया...अँधेरे में तुम्हें तलाशने के लिए उसने एक दिया जलाया तो सही पर उसकी आंच से उसकी आँखों के सारे आंसू भाप हो गए...मैंने उस लड़की को वैसे नहीं रचा था...उसे तुमने रचा था.

जो लोग कहते हैं की रो लेने से आराम मिलता है झूठ कहते हैं...कुछ नहीं होता रोने से अगर रोने से तुम उठ के आंसू पोछने नहीं आते हो...आराम रोने से नहीं, उसके बाद तुम्हारी बांहों में होने से होता है...पर जाने दो...तुम नहीं समझोगे...ये कहते हुए लड़की रोज खुद को समझाती थी और दिन भर फर्श पर लेटी जाने क्या सोचती रहती थी...उसे खुद को समझाना आता भी नहीं था. शाम होते तुम्हारी याद के काले बादल घिरते थे और उसका कमरा सील जाता था...तुम्हारा नाम उसकी विंड चाइम पुकारती थी, हलके से. बस...बाकी लड़की ने सख्त हिदायत दे रखी थी की तुम्हारा कोई नाम न ले.

लड़की को यूँ तो धूप बहुत पसंद थी...पर तुम तो जानते ही हो...धूप में अगर गीले कपड़े डाल दो तो उनका रंग उतर जाता है...वैसे ही कमरे में धूप आती थी तो लड़की की आँखों का रंग उड़ा कर ले जाती थी. हर रोज़ एक शेड उतरता जाता था उसकी आँखों का...वो थी भी ऐसी पागल कि धूप की ओर पीठ नहीं फेरती, आँखें खोले खिड़की के बाहर देखती रहती जहाँ इकलौता अमलतास वसंत के आने पर उसका हाथ पकड़ बुलाना चाहता था. अमलतास ने कितना चाहा उसके फूलों का कुछ रंग ही सही लड़की की आँखों में बचा रहे मगर ऐसा हुआ नहीं. कुछ दिनों में लड़की की आँखों में कोई रंग नहीं बचा...शायद तुम उसे देखो तो पहचान भी न पाओ.

लड़की नर्म मिटटी सी हो गयी थी...बारिश के बाद जिसमें धान की रोपनी होती है...मगर पिछले कुछ दिनों में बारिश और कड़ी धूप आती जाती रही तो लड़की किले की दीवार सी अभेद्य हो गयी. सिर्फ कठोर ही नहीं हुयी वो...वैसा होता तो फिर भी कुछ उपाय था...लड़की के अन्दर जो हर खूबसूरत चीज़ को जीवन देने की क्षमता थी वो ख़त्म हो गयी और उसकी प्रकृति बदल गयी...पहले उसे हर चीज़ को सकेरना आता था, सहेजना आता था...अब उसे बस आत्मरक्षा समझ आती है...सिर्फ इंस्टिंक्ट बची है उसमें...जो बाकी भावनाएं थी...अब नहीं रहीं...परत दर परत वो जो खुलती थी तो नए रंग उभरते थे...अब बस एक फीका, बदरंग सा लाल रंग है...उम्र के थपेड़ों से चोट खाया हुआ.

लड़की का पागलपन कर्ण के कवच कुंडल की तरह था...वो उनके साथ ही पैदा हुयी थी...हमेशा से वैसी थी...उसे किसी और तरह होना नहीं आता था. मगर उसे ये नहीं मालूम था कि ऐसा पागलपन उसके खुद के लिए ऐसा घातक होगा कि आत्मा भी चोटिल हो जाये. लड़की खुद भी नहीं जानती थी कि वो अपनाप को कितना दुःख पहुंचा सकती है...उसे कहाँ मालूम था कि प्यार ऐसे भी आता है जिंदगी में...दर्द में जलना...जलना जलना...ऐसी आग जिसका कहीं कोई इलाज नहीं था...ये ताप उसका खुद का था...ये दावानल उसके अन्दर उठा था...वहां आग बुझाने कोई जा नहीं सकता था...तुम भी नहीं, तुम तो उसका कन्धा छूते ही झुलस जाते...और वो पगली ये जानती थी, इसलिए तुम्हें उसने बुलाया भी नहीं.

ओ रे इश्क माफ़ कर हमको...उम्र हुयी...अब तेरी उष्णता नहीं सही जाती...रहम कर इस बेदिल मौसम पर...पूरे मोहल्ले में वसंत आया है और मेरा महबूब बहुत दूर देश में रहता है. वो जो लड़की थी, वो कोई और थी...बहुत रो कर गयी है दुनिया से...और हम...मर कर दुबारा जिए हैं...और कुछ भी मांग लो...पर वैसा प्यार हमसे फिर तो न होगा. अबकी बार अंतिम विदा...अब जाके आना न होगा.





लड़की अब भी तुमसे बहुत प्यार करती है...बस पागलपन कम हो गया है उसका...दुनिया की निगाह से देखो तो लगेगा ठीक ही तो है...ऐसा पागलपन जिससे उसे दुःख हो...कम हो गया तो अच्छी बात है न...पर जानते हो...मुझसे भी पूछोगे न तो वही कहूँगी जो तुम्हारा दिल कहता है...मैं भी उस लड़की से बहुत प्यार करती थी जो तुमसे पागलों की तरह प्यार करती थी. 




04 March, 2012

पान सिंह तोमर- जैसी कहानी होनी चाहिए

पान सिंह तोमर...इसके प्रोमो देखे थे तब ही से सोच रखी कि फिल्म तो देखनी ही है...पर सोच रही थी अकेले देखने जाउंगी कुणाल या फिर बाकी जिन दोस्तों के साथ फिल्में देखती हूँ शायद उन्हें पसंद न आये...ये पलटन क्या...अधिकतर लोगों का फिल्मों के प्रति आजकल नजरिया है कि फिल्में हलकी-फुलकी होनी चाहिए...जिसमें दिमाग न लगाना पड़े. हफ्ते भर ऑफिस में इतना काम रहता है कि वीकेंड पर कहीं दिमाग लगाने का मूड नहीं रहता. ब्रेनलेस कॉमेडी हिट हो जाती है और अच्छी फिल्में पिछड़ जाती हैं. अफ़सोस होता है काफी...मगर उस पर फिर कभी.


पान सिंह तोमर एक बेहतरीन फिल्म है...इसे देख कर प्रेमचंद की याद आती है...सरल किस्सागो सी कहानी खुलती जाती है...बहुत सारे प्लोट्स, लेयर्स नहीं...सीधी सादी कहानी...और सादगी कैसे आपको गहरे झकझोर सकती है इसके लिए ये फिल्म देखनी जरूरी है. बहुत दिन बाद किसी फिल्म को देखते हुए आँख से आंसू टपक रहे थे...आँखें भर आना हुआ है पहले भी मगर ऐसे गहरे दर्द होना...उसके लिए एक लाजवाब निर्देशक की जरूरत होती है. तिग्मांशु धुलिया किस्से कहने में अपने सारे समकालिक निर्देशकों से अलग नज़र आते हैं. सीधी कहानी कहना सबसे मुश्किल विधा है ऐसा मुझे लगता है. फिल्म का सहज हास्य भी इसे बाकी फिल्मों से अलग करता है.

एक अच्छी फिल्म के सभी मानकों पर पान सिंह तोमर खरी उतरती है, पटकथा, निर्देशन, एक्टिंग, एडिटिंग और लोकेशन.  बेहतरीन पटकथा, एकदम कसी हुयी...कहीं भी फिल्म ढीली नहीं पड़ती, हर किरदार की तयशुदा जगह है, यहाँ कोई भी सिर्फ डेकोरेशन के लिए नहीं है...चाहे वो पान सिंह की पत्नी बनी माही गिल हो या कि उसका बेटा. डायलोग में आंचलिक पुट दिखावटी नहीं बल्कि स्क्रिप्ट में गुंथा हुआ था तो बेहद प्रभावशाली लगा है. 


कास्टिंग...अद्भुत...इरफ़ान एक बेहतरीन कलाकार हैं...चाहे डायलोग डिलीवरी हो या कि बॉडी लैंग्वेज. कहीं पढ़ा था कि एक धावक के जैसी फिजिक के लिए इरफ़ान ने बहुत मेहनत और ट्रेनिंग की थी...फिल्म में उनके दौड़ने के सारे सीन...चाहे वो पैरों की कसी हुए मांसपेशियां हों कि बाधा पर घोड़ों के साथ कूदने का दृश्य...सब एकदम स्वाभाविक लगता है. पान सिंह एक खरा चरित्र है...जैसे हमारे गाँव में कुछ लोग होते थे...मन से सीधे...कभी कभी गंवार...उसे बात बनानी नहीं आती...सच को सच कहता है. फिल्म का सीन जब अपने वरिष्ठ अधिकारी से बात कर रहा है तो संवाद अदायगी कमाल की है...'देश में तो आर्मी के अलावा सब चोर हैं' या फिर शुरुआत का पहला सीन जो ट्रेलर में भी इस्तेमाल किया गया है 'बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत तो पार्लियामेंट में पाए जाते हैं'. एक्टिंग के बारे में एक शब्द उभरता है 'टाईट एक्टिंग किया है'.

तिग्मांशु को क्रेडिट जाता है कि ऐसी अलग सी कहानी उन्होंने उठाई तो...देश में क्रिकेट के अलावा सारे स्पोर्ट्स की बुरी स्थिति है...ओलम्पिक में जीतने वाले हमारे एथलीट्स को किसी तरह का कोई संरक्षण नहीं है...फिल्म देख कर इसका सच तीर की तरह चुभता है कि जब आप जानते हो कि बागी सिस्टम बनाता है. फिल्म में निर्देशक न्यूट्रल है...वो कहीं किसी को अच्छा बुरा नहीं कहता...खाके नहीं खींचता. फिल्म कहानी कहती है...पान सिंह तोमर की...कैसे वो पहले फौज में थे, कैसे खेल में पहुंचे और कैसे आखिर में बागी हो गए...फिल्म किस्सागोई की परंपरा को एक कड़क सैल्यूट है.

मैं रिव्यू इसलिए लिख रही हूँ कि ऐसी फिल्में देखी जानी चाहिए ताकि ऐसी और फिल्में बनें...साल में कम से कम कुछ तो ऐसी फिल्में आयें कि देख कर लगे कि फिल्म बनाने वाले लोग सोचते भी हैं. वीकेंड है...आपके पास फुर्सत है...तो ये फिल्म जरूर देख कर आइये...निराश नहीं होएंगे.


मेरी ओर से फिल्म को ४/५ स्टार्स.

03 March, 2012

फिगरिंग मायसेल्फ आउट

लिखो. काटो. लिखो. काटो.
लिखना जितना जरूरी है काटना भी उतना ही जरूरी है...लिख के मिटाओ मत...पेन्सिल से मत लिखो कि पेन्सिल की कोई याद बाकी नहीं रहती...इरेजर बड़ी सफाई से मिटाता है...जैसे कि गालों से पोछती हूँ आंसू...तुम्हें सामने देख कर...नहीं सामने कहाँ देखती हूँ...इन्टरनेट पर देख कर ही...तुम जब तस्वीरों में हँसते दिखते हो...बड़े भले से लगते हो...मैं अपनी बेवकूफी पर हंसने लगती हूँ. बहुत मिस करती हूँ दिल्ली का वक़्त जब सारे दोस्त साथ में थे...

कल दो अद्भुत चीज़ें देखीं...Lust for life...Van Gogh की जिंदगी पर बनी फिल्म देखी और गुरुदत्त पर एक किताब पढ़ी...गुरुदत्त जब २८ साल के थे उन्होंने प्यासा का निर्माण किया था...अबरार अल्वी २६ के...सोच रही हूँ उम्र के सींखचों में लोगों को बांटना कितना सही है...क्या उन्हें मालूम था कि जिंदगी बहुत थोड़ी है...क्या उन्होंने शिद्धत से जिंदगी जी थी. अजीब हो रखी है जिंदगी भी...गुरुदत्त की चिठ्ठियाँ पढ़ती हूँ, लगता ही नहीं है कि इस शख्स को गए इतने साल हो गए...लगता है ये सारे ख़त उसने मुझे ही लिखे हैं...कुछ हिंदी में, कुछ इंग्लिश में और कुछ बंगला में...ताकि मेरी बांगला थोड़ी अच्छी हो सके. प्रिंट हुए पन्नों से एक पुरानी महक महसूस होती है. इस बार दिल्ली गयी थी तो स्मृति ने एक चिट्ठी दिखाई जो मैंने उसे ९९ में लिखी थी...उसने मेरी कितनी सारी चिट्ठियां सम्हाल के रखी हैं...मेरे हिस्से तो बस इंतज़ार और उसे ढूंढना आया...कितने सालों उसे तलाशती रही...तब जबकि उसे लगता था कि मैं उसे भूल गयी हूँ...कैसा इत्तिफाक था न...फ़िल्मी कि दुनिया के दो हिस्सों में हम दोनों अलग अलग तरह से एक दूसरे को याद करना और सहेजना कर रहे थे. 


कल की किताब का नाम था 'Ten years with Guru Dutt...Abrar Alvi's journey' लेखक का नाम सत्य सरन है...मुझे सारे वक़्त समझ नहीं आया कि किताब इंग्लिश में क्यूँ थी...हिंदी में क्यूँ नहीं. बैंगलोर में होने के कारन बहुत सी चीज़ें मिस हो जाती हैं...उसमें सबसे ज्यादा खोया है मेरा किताबें ढूंढना...दिल्ली में सीपी में किताबें खरीदने का अपना मज़ा था...अनगिन किताबों को देखना, छूना, उनकी खुशबू महसूसना और फिर वो किताब खरीदना जिसने हाथ पकड़ कर रोका हो. गुरुदत्त पर ये किताब बहुत अच्छी नहीं थी...पर कहानियां बेहद दिलचस्प थीं...अबरार अल्वी की नज़र से गुरुदत्त को देखना बहुत अच्छा लगा. गुरुदत्त मुझे बहुत फैसीनेट करते हैं...उनपर लिखा हुआ कुछ भी देखती हूँ तो खरीद लेती हूँ अगर पास में पैसे रहे तो. गुरुदत्त की चिट्ठियों की किताब एक दिन ऐसे ही दिखी थी...थोड़ी महँगी थी...मंथ एंड चल रहा था...सोची कि सैलरी आने पर खरीद लूंगी...फिर वो किताब जो गायब हुयी तो लगभग दो साल तक लगातार हर जगह ढूँढने के बाद मिली.


गुरुदत्त भी बहुत सारे रीटेक लेते थे...प्यासा के बारे में पढ़ते हुए वोंग कर वाई याद आये...उनकी भी 'इन द मूड फॉर लव' ऐसे ही बिना स्क्रिप्ट के बनी थी...फिल्म किरदारों के साथ आगे बढती थी...सोचती हूँ...किसी की भी जिंदगी के रशेस ले कर कोई अच्छा डाइरेक्टर एक बेहतरीन फिल्म बना सकता है. किसी भी से थोड़ा पर्सनल उतरती हूँ...अपनी जिंदगी के पन्ने पलटती हूँ...कई बार लगता है कि ऊपर वाला एक अच्छा निर्देशक है पर एडिटर होपलेस है...उसे समझ नहीं आता कि रोती हुयी आँखें स्क्रीन पर बहुत देर नहीं रहनी चाहिए और ऐसी ही कुछ माइनर मिस्टेक्स पर हम मिल कर काम करेंगे तो शायद कुछ अच्छा रच सकेंगे.


मेरा एक स्क्रिप्ट पर काम करने का मन हो रहा है...पर फिर मुझे रोज एक दोस्त की जरूरत पड़ने लगती है जो मेरा दिन भर का सोचा हुआ सुने...दिल्ली के IIMC के दिन याद आते हैं...पार्थसारथी पर के...कुछ शामें...चाय के कुल्हड़ में डूबे...घास पर अँधेरा घिरने के बाद भी देर तलक बैठे ... अपने-अपने शहरों में गुम कुछ दोस्त...सोचने लगती हूँ कि दोस्तों का कितना बड़ा हिस्सा था मेरे 'मैं' में...कि उनके बिना कितनी खाली, कितनी तनहा हो गयी हूँ. जाने तुम लोगों को याद है कि पर राज, शाम, सोनू, बोस्की, इम्बी...तुम लोग कमबख्त बहुत याद आते हो. विवेक...कभी कभी लगता है थैंक यू बोल के तेरे से थप्पड़ खा लूं...बहुत बार सम्हाला है तूने यार. 


मैं जब मूड में होती हूँ तो एक जगह स्थिर बैठ नहीं सकती फिर मुझे बाहर निकलना पड़ता है...बाइक या कार से...वरना घर में पेस करती रहती हूँ और बहुत तेज़ बोलती हूँ...सारे शब्द एक दूसरे में खोये हुए से. हाथ हवा में घूम घूम कर वो बनाते रहते हैं जो उतनी तेज़ी में मेरे शब्द मिस कर जाते हैं.


दूसरा एक मेजर पंगा है...आई नो किसी और को ये नहीं होता...I need a muse...I need to be madly in love to work on something...फिलहाल कोई आइडिया ऐसा नहीं है कि रातों की नींद उड़ जाए...दिन को सो न पाऊं...हाँ जिस तरह का बिल्ड अप है शायद कोई उड़ता ख्याल आ ठहरे...तब तक इस इन्सिपिड थौट का कुछ करती हूँ. कुछ है जो सी स्टोर्म की तरह मन में भंवरें बना रहा है...


बहुत कुछ है...बहुत कुछ बिखरा हुआ इस खूबसूरत जिंदगी में...लेकिन फ़िलहाल...दोस्त, तेरी याद आ रही है...बंगलौर बहुत दूर है मगर यहाँ सबसे अच्छे कैफे हैं जहाँ धूप का टुकड़ा होता है...खिलते फूल होते हैं...खुनकी लिए हवाएं होती हैं और मैं होती हूँ न...मुस्कुराती, गुनगुनाती...सुन न...एक असाइंमेंट सेट कर न इस शहर का...तेरे से मिलने का मन कर रहा है. बहुत दिन हुए दोस्त!

29 February, 2012

जाने दे यार, शी इज नॉट योर टाईप


जिद्दी लड़की ने 
बालों को दुपट्टे में लपेट कर बाँधा 
और दिन भर की पूरे घर की साफ़ सफाई

पंखों पर के जाले हटाये
डांट के भगाई किताबों पर की सारी धूल
पोछा लगाया सारे कोनों में 
तह कर के रखे अलमारियों में कपड़े 

फेंकने को थीं 
बासी कविताएं
पुरानी कलमें, सूखी दवातें 
मुरझाये फूल, चोकलेट रैपर, बुकमार्क
उसकी ब्लैक एंड वाईट तस्वीर 
बहुत सारी कॉफी शॉप की बिल्स 
पेपर नैपकिंस पर लिखी आधी अधूरी पंक्तियाँ 
इधर उधर पड़ी डायरियों में उसका सिग्नेचर 

कमोबेश हर चादर में अटकी हुयी मिलती थी
उसकी कोई छूटी हुयी अंगडाई 
रूमाल में उसकी उँगलियों के निशान 
वाशिंग पावडर से तेज थी
उसके आफ्टरशेव की खुशबू 

शू रैक में रह गयीं थी 
उसकी फेवरिट रेड चप्पलें 
बाथरूम में तौलिया, टूथब्रश
भाप उठते आईने में उसका अक्स
भीगे बालों को झटकता हुआ

शाम होते वो बेहद थक गयी 
कॉफी के कप पर ठहरे थे 
वोही संगदिल बोसे 
संगमरमर के चमकीले फर्श पर
और भी साफ़ दिखने लगी थीं 
काफ़िर आँखें 

तनहा और उदास लड़की ने 
आखिर जला ही ली 
उसकी छूटी हुयी आखिरी सिगरेट 

धुएं के टूटे छल्लों में 
बनता रहा एक ही सवाल 
इतने गुस्से में गया है
जाने कब वापस आएगा!

---
हालांकि इतना वक़्त काटने के बजाये जान दी जा सकती थी...और इंतज़ार का पासा उसकी तरफ फेंका जा सकता था...रेतघड़ी को उलट कर 'योर टर्न' कहा जा सकता था. 'आई हेट यू' जैसा कोई मेसेज किया जा सकता था...चुप रहने की कसम को निभाया जा सकता था...मगर क्या है न कि वो अपने सीने से लगा कर माथे पर थपकियाँ देते हुए 'शश्शश्श्श....' जैसा कुछ नहीं कह सकता...और लड़की इतनी बुद्धू है कि उसे बस इतना चाहिए पर वो सारे झगड़ों के बाद भी उसे बताती नहीं...हाँ आजकल उसने एक नया शिगूफा पाला है...
बेआवाज़ रोने का... 

24 February, 2012

तुम. मेरे. हो.


तुम्हारे होने से
रेत में खिलती है
बोगनविलिया

तुम्हारे साथ ही
आता है वसंत
और महुआ भी 

तुम्हारी जेब में
मेरी खुशियों की
टाफियां भरी हैं

तुम खोलो मुट्ठी
तुम्हारी लकीरों में
है मेरी मुस्कान 

तुम कहते हो
तुम अच्छी हो
विस्की से भी 

मैं चाहती हूँ
रो दूं अब
काँधे पर. बस 
---

बौराया वसंत मुझे जाने कहाँ कहाँ ढूँढता है...सूखे पत्तों की पीछे झाँकने लगे हैं नए पत्ते...धीमा हो गया है सड़क पर गिरे पत्तों का शोर...हवा तुम्हारा नाम किसी कोटर में भूल आई है...मेरी बाइक में लग गए हैं पंख और मेरा शहर अपने रकीब को सलाम भेजता है...


अब आ भी जाओ कि इस शहर में इससे खूबसूरत मौसम नहीं आता!

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