21 January, 2012

जिंदगी के सबसे खूबसूरत लम्हों की तसवीरें नहीं होतीं...


क्या कहूँ...आज के दिन का वाकई कुछ याद नहीं है...सिवाए इसके कि जितनी तुमने बाँहें खोली थीं उनमें पूरा आसमान आ जाता...
रिश्ते पर जाती हूँ तो बस इतना है कि मैं बहुत खुश थी...और तुम भी. बस. 

बहुत देर से कोरा पन्ना खुला हुआ है...जानती हूँ कि कुछ नहीं लिख सकूंगी...कुछ भी नहीं...तुम्हें इतने सालों बाद देखना...तुम्हें छूना...तुम्हारे गले लगना...

बस...आने वाले कई सालों के लिए इसे यहाँ सहेज के रख रही हूँ...कि आज इक्कीस जनवरी २०१२ की रात मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी...तुम्हारे कारण...दिल में धूप उतरी थी...सब कुछ अच्छा था...कहीं कोई दर्द नहीं था...एक लम्हा...सुकून था. 

La vie, Je t'aime!

Life, I love you!

जिंदगी...मुझे तुझसे मुहब्बत है!

20 January, 2012

रात के ठीक साढ़े ग्यारह बजे...

हजारों किलोटन का एक हवाई जहाज़ है...उसकी सारी धमनियां बिछा कर एक रनवे बना दिया गया है...कहीं का पढ़ा हुआ बेफुजूल का कुछ याद आता है कि शरीर की सारी धमनियों को निकाल कर, जोड़ कर एक सीध में लपेटा जाए तो पूरी धरती के चारों ओर कुछ सात बार फिर जायेंगी...या ऐसा ही कुछ. उसे ठीक याद नहीं है. उसे याद आती है उस लड़की की परिधि...उसके इर्द गिर्द कस के लपेटा गया दुपट्टा...जब कि वो मोहल्ले की छत पर कित कित खेल रही होती थी. 

विमान बहुत तेज़ी से रनवे पर दौड़ रहा है और उसके भार से उसके फेफड़े सांस नहीं खींच पा रहे हैं...ऐसा लगता है किसी ने उसे भींच कर सीने से लगाया हो...और वो वहीं मर जाना चाहता है...विमान रुकने का नाम ही नहीं लेता...पहियों के घर्षण से उसके मुलायम हाथ लावे की तरह दहकने लगे हैं...उसे लगता है कि वो इन हाथों में कैसे उसका चेहरा भरेगा...उसके गाल झुलस जायेंगे...फूल से नाज़ुक उसके गाल...वो चाहता है कि हवाईजहाज़ कहीं रुके...कहीं तो भी रुके कि सीने में अटकी हुयी सांस वापस खींच सके...इतने में उसे याद आता है कि कुछ देर पहले कंट्रोल रूम से एक फोन आया था उसे...उस तरफ लड़की का महीन कंठ था...मिन्नतों में भीगा हुआ...वो उड़ते उड़ते थक गयी है...थोड़ी देर उतरना चाहती है...थोड़ा इंधन भरना चाहती है...बस एक स्टॉपओवर...चंद लम्हों का. उसे  ये भी याद आता है कि उसने विमान उतारने की इज़ाज़त नहीं दी है और इसलिए विमान शहर के चक्कर काट रहा है. वो कशमकश में है...दुश्मन मुल्क का विमान उतरने दिया तो आगे चल कर बहुत से दुष्परिणाम होंगे...उसकी नौकरी भी जा सकती है...मगर फिर वो महीन आवाज़...मे डे(May Day) बरमूडा ट्राईएंगल में डूबते हुए लोगों की आखिरी आवाजों जैसी...अगर उसने ना कहा तो क्या ये आवाज़ उसे कभी सुकून से सोने देगी...इस पूरी जिंदगी के बाकी बचे दिन?

कॉफ़ी का मग लेकर वो फ्लास्क के पास गया है...अन्यमनस्क सा कॉफ़ी कप में भरता जाता है...धुंध में बिसरते शहर के सामने एक विमान घूम रहा है...उसकी लाइटें जल-बुझ रही हैं...लड़के को फिर से किसी की बुझती सांसें याद आती हैं...बाहर का तापमान दस डिग्री सेल्सियस है...विमान जिस उंचाई पर उड़ रहा है वहां तापमान कुछ माइनस १० डिग्री के आसपास ही होगा...वो सम की तलाश करने लगता है...कहीं जीरो पॉइंट...जहाँ उसे कुछ पल सुकून मिले. 

उसके पास सोचने को ज्यादा वक़्त नहीं है...जितने में कॉफ़ी की भाप उसके चश्मे पर जमे उसे साफ़ साफ़ निर्णय लेना है...और ठोस कारण देने हैं...कि क्यूँ दुश्मन मुल्क के विमान को उतरने की इज़ाज़त दी गयी...आवाज़ के कतरे की मूक प्रार्थना किसी नियमावली में नहीं गिनी जाती है...उसकी सदयता उसके खिलाफ बहुत आराम से इस्तेमाल की जा सकती थी...और वो वाकई नहीं जानता था कि आखिर किस कारण से ये भटका हुआ विमान मिटटी पर उतरने की इज़ाज़त चाहता था. दिल और दिमाग की जद्दोजहद में आखिर दिमाग ने बाज़ी जीती और उसने विमान को उतरने की इज़ाज़त नहीं दी...दूसरे पास के एयरपोर्ट के को-ऑर्डिनेट बताये उसे...हौसला अफजाही की...झूठ बोला कि विमान उतारने की जगह नहीं है. विमान की पाइलट लड़की ने जब सब डिटेल्स समझ लिए तो वो विमान आँखों से ओझल हो गया.

अगले दिन लड़का जब लॉग देख रहा था तो उसमें किसी विमान का कोई जिक्र नहीं था...उसने बारहा अपने कई और साथियों से पूछा कि उन्होंने  वो विमान देखा था...मगर किसी ने हामी नहीं भरी. 

घटना को बहुत साल हो गए...पर अब भी जब दिल्ली में कोहरा छाता है और रात के साढ़े ग्यारह बजते हैं...लड़का उस विमान का इंतज़ार करता है...वो किसी याद का छूटा हुआ प्रतिबिम्ब था...किसी और जन्म के इश्क की अनुगूंज...कि कौन थी वो लड़की...कि किसकी डूबती आवाज़ ने उसे पुकार कर कहा था...मैं उड़ते उड़ते थक गयी हूँ...मुझे अपनी बाँहों में एक लम्हा ठहर जाने दो...


लड़के का दिल खामोश है...कोई जिद नहीं करता... कुछ नहीं मांगता...कि कोई आवाज़ नहीं आती...कोई धड़कन नहीं उठती...



कि उसका दिल रूठा हुआ है आज भी...
कि उसे आज भी उसे जाने किस 'हाँ' का इंतज़ार है!

18 January, 2012

जान तुम्हारी सारी बातें, सुनती है वो चाँद की नानी

जान तुम्हारी सारी बातें
सुनती है वो चाँद की नानी
रात में मुझको चिट्ठी लिखना
सांझ ढले तक बातें कहना

जरा जरा सा हाथ पकड़ कर
इस पतले से पुल पर चलना
मैं थामूं तुम मुझे पकड़ना
इन्द्रधनुष का झूला बुनना 

रात इकहरी, उड़ी टिटहरी
फुग्गा, पानी, धान के खेत
बगरो बुड़बक, कुईयाँ रानी 
अनगढ़ बातें तुमसे कहना 

कितने तुम अच्छे लगते हो
कहते कहते माथा धुनना 
प्यार में फिर हो पागल जैसे
तुमसे कहना, तुमसे सुनना 

लड़की ने गहरा गुलाबी कुरता डाल रखा था और उसपर एकदम नर्म पीले रंग की शॉल...शाम चार बजे की धूप में उसके बाल लगभग सूख गए थे...कंधे तक बेतरतीबी से अनसुलझे बाल...धूप में चमकता गोरा रंग...चेहरे पर हल्की धूप पड़ रही थी और वो सूरज की ओर आधा चेहरा किए खून के गरम होने को महसूस कर रही थी...लग रहा था महबूब की हथेली को एक हाथ से थामे गालिब को पढ़ रही है। 

शाम के रंग एक एक कर के हाज़िरी देने लगे थे...गुलाबी तो उसे कुर्ते को छोड़ कर ही जाने वाला था की उसने मिन्नतें करके रोका की सफ़ेद कुर्ते पर इश्क़ रंग चढ़ गया तो रात की सारी नींदें उससे झगड़ा कर बैठेंगी। लोहे की सीढ़ियों पर थोड़ी ही जगह थी जहां लड़की थोड़ा सा दीवार से टिक के बैठी थी और लड़का कॉपी पर झुका हुआ कुछ लिख रहा था। आप गौर से देखोगे तो पाओगे की पूरी कॉपी में बस एक नाम लिखा हुआ था और कोरे कागज़ पर तस्वीरें थीं...उनमें एक बड़ा दिलफ़रेब सा कच्चापन था...आम के बौर जैसा। सरस्वती पूजा आने में ज्यादा वक़्त रह भी नहीं गया था...बेर के पेड़ों से फल गिरने लगे थे। कहते हैं कि विद्यार्थियों को वसंत पंचमी के पहले बेर नहीं खाने चाहिए...वो पूजा में चढ़ने के बाद ही प्रसाद के रूप में खाने चाहिए। 

लड़का ये सब नहीं सोच रहा था...लड़की के बालों से ऐसी खुशबू आ रही थी कि उसका कुछ लिखने को दिल नहीं  कर रहा था...दोपहर का बचा हुआ ये जरा सा टुकड़ा वो अपने जींस की जेब में भर कर वहाँ से चले जाना चाहता था...पर लड़की की जिद थी कि जब तक बाल नहीं सूखेंगे वो छत से उतरेगी नहीं। उसने थक कर अपनी कॉपी बंद कर दी...लड़की ने भी गालिब को बंद किया और उसकी कॉपी उठा कर देखने लगी। उसका दिल तो किया कि कुछ शेर जो बहुत पसंद आए हैं वो लिख दे...पर ये बहुत परफेक्ट हो जाता। उसे परफेक्शन पसंद नहीं था...प्यार की सारी खूबसूरती उसके कच्चेपन, उसकी मासूमियत, उसके अनगढ़पन में आती थी उसे। बाल धोने के बाद की टेढ़ी-मेढ़ी मांग जैसी। 

इसलिए उसने कॉपी पर ये कविता लिख दी...ये एकदम अच्छी कविता नहीं है...इसमें कुछ भी सही नहीं है...पर इसमें खुशबू है...जिस एक दोपहर के टुकड़े दोनों एक दूसरे के साथ थे, उस दोपहर की।  इसमें वो तीन शब्द नहीं लिखे हुये हैं...पर मुझे दिखते हैं...तुम्हें दिखते हैं मेरी जान?

17 January, 2012

मैं तुमसे नफरत करती हूँ...ओ कवि!

वे दिन बहुत खूबसूरत थे
जो कि बेक़रार थे 
सुलगते होठों को चूमने में गुजरी वो शामें
थीं सबसे खूबसूरत 
झुलसते जिस्म को सहलाते हुए
बर्फ से ठंढे पानी से नहाया करती थी
दिल्ली की जनवरी वाली ठंढ में
ठीक आधी रात को 
और तवे को उतार लेती थी बिना चिमटे के
उँगलियों पर फफोले पड़ते थे
जुबान पर चढ़ता था बुखार
तुम्हारे नाम का

खटकता था तुम्हारा नाम 
किसी और के होठों पर
जैसे कोई भद्दी गाली 
मन को बेध जाती थी 
सच में तुम्हारा प्यार बहुत बेरहम था
कि उसने मेरे कई टुकड़े किये

तुम्हारे नाम की कांटेदार बाड़
दिल को ठीक से धड़कने नहीं देती थी
सीने के ठीक बीचो बीच चुभती थी
हर धड़कन


कातिल अगर रहमदिल हो
तो तकलीफ बारहा बढ़ जाती है
या कि कातिल अगर नया हो तो भी

तुम मुझे रेत कर मारते थे
फिर तुम्हें दया आ जाती थी 
तुम मुझे मरता हुआ छोड़ जाते थे
सांस लेने के लिए
फिर तुम्हें मेरे दर्द पर दया आ जाती थी
और फिर से चाकू मेरी गर्दन पर चलने लगता था 
इस तरह कितने ही किस्तों में तुमने मेरी जान ली 

इश्क मेरे जिस्म पर त्वचा की तरह था
सुरक्षा परत...तुम्हारी बांहों में होने के छल जैसा
इश्क का जाना
जैसे जीते जी खाल उतार ले गयी हो
वो आवाज़...मेरी चीखें...खून...मैं 
सब अलग अलग...टुकड़ों में 
जैसे कि तुम तितलियाँ रखते थे किताबों में
जिन्दा तितलियाँ...
बचपन की क्रूरता की निशानी 
वैसे ही तुम रखोगे मुझे
अपनी हथेलियों में बंद करके
मेरा चेहरा तुम्हें तितली के परों जैसा लगता है
और तुम मुझे किसी किताब में चिन देना चाहते हो 
तुम मुझे अपनी कविताओं में दफनाना चाहते हो
तुम मुझे अपने शब्दों में जला देना चाहते हो

और फिर मेरी आत्मा से प्यार करने के दंभ में
गर्वित और उदास जीवन जीना चाहते हो. 

मैं तुमसे नफरत करती हूँ ओ कवि!

14 January, 2012

हैप्पी बर्थडे बिलाई

आज सुबह छह बजे नींद खुल गयी...अक्सर सुबह ही उठ रही हूँ वैसे...इस समय लिखना, पढना अच्छा लगता है. सुबह के इस पहर थोड़ा शहर का शोर रहता है पर आज जाने क्यूँ सारी आवाजें वही हैं जो देवघर में होती थीं...बहुत सा पंछियों की चहचहाहट...कव्वे, कबूतर शायद गौरईया भी...पड़ोसियों के घर से आते आवाजों के टूटे टुकड़े...अचरज इस बात पर हो रहा है कि कव्वा भी आज कर्कश बोली नहीं बोल रहा...या कि शायद मेरा ही मन बहुत अच्छा है.

बहुत साल पहले का एक छूटा हुआ दिन याद आ रहा है...मकर संक्रांति और मेरे भाई का जन्मदिन एक ही दिन होता है १४ जनवरी को. आजकल तो मकर संक्रांति भी कई बार सुनते हैं कि १५ को होने वाला है पर जितने साल हम देवघर में रहे...या कि कहें हम अपने घर में रहे, हमारे लिए मकर संक्रांति १४ को ही हर साल होता था. इस ख़ास दिन के कुछ एलिमेंट थे जो कभी किसी साल नहीं बदलते.

मेरे घर...गाँव के तरफ खुशबू वाले धान की खेती होती है...मेरे घर भी थोड़े से खेत में ये धान की रोपनी हर साल जरूर होती थी...घर भर के खाने के लिए. अभी बैठी हूँ तो नाम नहीं याद आ रहा...महीन महीन चूड़ा एकदम गम गम करता है. १४ के एक दो दिन पहले गाँव से कोई न कोई आ के चूड़ा दे ही जाता था हमेशा...चूड़ा के साथ दादी हमेशा कतरी भेजती थी जो मुझे बहुत बहुत पसंद था. कतरी एक चीनी की बनी हुयी बताशे जैसी चीज़ होती है...एकदम सफ़ेद और मुंह में जाते घुल जाने वाली. कभी कभार तिल के लड्डू भी आते थे.

अधिकतर नानाजी या कभी कभार छोटे मामाजी पटना से आते थे...खूब सारा लडुआ लेकर...मम्मी ने कभी लडुआ बनाना नहीं सीखा. लडुआ दो तरह का होता था...मूढ़ी का और भूजा हुआ चूड़ा का...पहले हम मूढ़ी वाले को ही ख़तम करते थे क्यूंकि चूड़ा वाला थोड़ा टाईट होता था उसको खाने में मेहनत बेसी लगता था. नानाजी हमेशा जिमी के लिए स्वेटर भी ले के आते थे और नया कपड़ा भी. जिमी के लिए एक स्वेटर मम्मी हमेशा बनाती ही थी उसके बर्थडे पर...वो भी एक आयोजन होता था जिसमें सब जुट कर पूरा करते थे. कई बार तो दोपहर तक स्वेटर की सिलाई हो रही होती थी. हमको हमेशा अफ़सोस होता था कि मेरा बर्थडे जून में काहे पड़ता है, हर साल हमको दो ठो स्वेटर का नुकसान हो जाता था.

तिलकुट के लिए देवघर का एक खास दुकान है जहाँ का तिलकुट में चिन्नी कम होता है...तो एक तो वो हल्का होता है उसपर ज्यादा खा सकते हैं...जल्दी मन नहीं भरता. उ तिलकुट वाला के यहाँ पहले से बुकिंग करना होता है तिलसकरात के टाइम पर काहे कि उसके यहाँ इतना भीड़ रहता है कि आपको एक्को ठो तिलकुट खाने नहीं मिलेगा. वहां से तिलकुट विद्या अंकल बुक करते थे...कोई जा के ले आता था.

सकरात में दही कुसुमाहा से आता था...कुसुमाहा देवघर से १६ किलोमीटर दूर एक गाँव है जहाँ पापा के बेस्ट फ्रेंड पत्रलेख अंकल उस समय मुखिया थे...उनके घर में बहुत सारी अच्छी गाय है...तो वहां का दही एकदम बढ़िया जमा हुआ...खूब गाढ़ा दूध का होता था...ई दही एक कुढ़िया में एक दिन पहले कोई पहुंचा जाता था...और दही के साथ अक्सर रबड़ी या खोवा भी आता था. इसके साथ कभी कभी भूरा आता था जो हमको बहुत पसंद था...भूरा गुड का चूरा जैसा होता है पर खाने में बहुत सोन्हा लगता है. १४ को हमारे घर में कोबी भात का प्रोग्राम रहता था...उसके लिए खेत से कोबी लाने पापा के साथ विद्या अंकल खुद कुसुमाहा जाते थे...१४ की भोर को.

ये तो था १४ को जब चीज़ों का इन्तेजाम...सुबह उठते...मंदिर जाते...नया नया कपड़ा पहन के जिम्मी सबको प्रणाम करता. तिल तिल बौ देबो? ये सवाल तीन पार पूछा जाता जिसका कि अर्थ होता कि जब तब शरीर में तिल भर भी सामर्थ्य रहेगा इस तिल का कर्जा चुकायेंगे...या ऐसा ही कुछ. फिर दही चूड़ा खाते घर में सब कोई और शाम का पार्टी का तैय्यारी शुरू हो जाता.

तिलसकरात एक बहुत बड़ा उत्सव होता जिम्मी के बर्थडे के कारण...होली या दीवाली जैसा जिसमें पापा के सब दोस्त, मोहल्ले वाले, पापा के कलीग, घर के लोग...सब आते. शाम को बड़ा का केक बनाती मम्मी...कुछ साथ आठ केक एक साथ मिला के, काट के, आइसिंग कर के. घर की सजावट का जिम्मा छोटे मामाजी का रहता. सब बच्चा लोग को पकड़ के बैलून फुलवाना...फिर पंखा से उसको बांधना...पीछे हाथ से लिख के बनाये गए हैप्पी बर्थडे के पोस्टर को टांगना. ऐसे शाम पांच बजे टाइप सब कोई तैयार हो जाते थे.

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आज सुबह से उन्ही दिनों में खोयी हूँ...यहाँ बंगलौर में कुल जमा दो लोग हैं...घर से चूड़ा आया हुआ है...अभी जाउंगी दही खरीदने...दही चूड़ा खा के निपटाउंगी. जिमी के लिए कल शर्ट खरीद के लाये हैं...उसको कुरियर करेंगे...सोच रहे हैं और क्या खरीदें उसके लिए.

सारे चेहरे याद आ रहे हैं...सब पुराने दोस्त...लक्की भैया, रोजी दीदी, नीलू, छोटू-नीशू, लाली, रोली, मिक्की, राहुल, बाबु मामाजी, छोटू मामाजी, सीमा मौसी, इन्द्रनील, नीति, आकाश, नीतू दीदी, शन्नो, मिन्नी, मनीष, आभा, सोनी...कितने लोग थे न उस समय...कितनी मुस्कुराहटें. अपने लिए दो फोटो लगा रहे हैं...हालाँकि ये वाला पटना का है...पर मेरे पास यही है.


यहाँ से तुमको ढेर सारा आशीर्वाद जिमी...खूब खूब खुश रहो...आज तुमको और पापा को बहुत बहुत मिस कर रहे हैं हम. 

13 January, 2012

न दिया करो उधार के बोसे...इनका सूद चुकाते जिंदगी बीत जाती है

'बहुत खुश हूँ मैं आज...खुश...खुश...खुश...खुश...बहुत बहुत खुश...आज जो चाहे मांग लो!' प्रणय बीच सड़क पर ठिठका खड़ा था और वो उसके कंधे पर एक हाथ रखे उसके उसे धुरी बना कर उसके इर्द गिर्द दो बार घूम गयी और फिर उसके बायें कंधे पर एक हाथ रख कर झूलते हुए उसकी आँखों में आँखें डाल मुस्कुरा उठी.

'अच्छा, कितनी खुश?'
कहते हुए प्रणय ने उसके माथे पर झूल आई लटों को हटाया..पर लड़की ने सर को झटका दिया और शैम्पू किये बाल फिर से उसके कंधे पर बेतरतीब गिर उठे और खुशबू बिखर गयी.

'इतनी कि अपना खून माफ़ कर दूं...'
लड़की फिर से उसकी धुरी बना के उसके इर्द गिर्द घूमने लगी थी, जैसे केजी के बच्चे किसी खम्बे को पकड़ पर उसके इर्द गिर्द घूमते हैं...लगातार.

प्रणय ने फिर उसकी दोनों कलाइयाँ अपने एक हाथ में बाँधीं और दुसरे हाथ से उसके चेहरे पर से बिखरे हुए बाल हटाये और पूछा...'हाँ, अच्छा...तब तो सच में वो दोगी जो मांग लूं?

लड़की खिलखिला के हंस उठी...'पहले हाथ छोड़ो मेरा...मैं आज रुक नहीं सकती...और मेरे हाथ पकड़ लोगे तो मैं बात नहीं कर पाउंगी...तुम जानते हो न...अच्छा जाने दो...हाथ छोड़ो ना...अच्छा ...बोलो...तुम्हें क्या चाहिए?'

'कैन आई किस यू?'

लड़की एकदम स्थिर हो गयी...गालों से लेकर कपोल तक दहक गए...होठ सुर्ख हो गए...एकदम से चेहरे पर का भाव बदल गया...अब तक जो शरारत टपक रही थी वहां आँखें झुक गयीं और आवाज़ अटकने लगी...

'जान ले लो मेरी...कुछ भी क्या...छोड़ो मुझे, जाने दो!' मगर उसने फिर हाथ छुड़ाने की कोशिशें बंद कर दी थीं...और एकदम स्थिर खड़ी थी.

'झूठी हो एक नंबर की, अभी तो बड़ा बड़ा भाषण दे रही थी, खून माफ़ कर देंगे...जाने क्या क्या!' प्रणय ने छेड़ा उसे...उसके हाथ अब भी उसकी कलाइयाँ बांधे हुए थे...और दूसरा हाथ से उसने उसकी ठुड्डी पकड़ रखी थी ताकि उसका चेहरा देख सके.

'उहूँ...'

'अच्छा चलो, हाथ छोड़ रहा हूँ...देखो भागना मत...वरना बहुत दौड़ाउंगा और जबरदस्ती किस भी करूँगा...तुम सीधे कोई बात के लिए कब हाँ करती हो...ठीक?' लड़की ने हाँ में सर हिलाया था तो प्रणय से कलाइयाँ ढीली की थीं...लड़की वैसे ही खड़ी रही...कितनी देर तक...भूले हुए कि प्रणय ने उसका हाथ नहीं पकड़ रखा है अब. प्रणय उहापोह में था कि इसे हुआ क्या...एक लम्हे उसका दिल कर भी रहा था उसे चूम ले...कल जा भी तो रही है...जाने कब आएगी वापस...आएगी तो प्यार रहेगा भी कि नहीं...लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन यू नो...मगर पिंक कलर के कपड़ों में वो गुड़िया जैसी लग रही थी...सेब जैसे लाल गालों वाली... इतनी मासूम...इतनी उदास और इतनी नाज़ुक कि उसे लगा कि टूट जायेगी. उसे ऐसे देखने की आदत नहीं थी...वो हमेशा मुस्कुराती, गुनगुनाती, चिढ़ाती, झगड़ा करती ही अच्छी लगती थी. उसे अपराधबोध भी होने लगा कि उसने जाते वक़्त उसे क्या कह दिया...क्या यही चेहरा याद रखना होगा...आँख में अबडब आंसू भी लग रहे थे.

फिर एकदम अचानक लड़की उसके सीने से लग के सिसक पड़ी...प्रणय ने उसे कभी भी रोते देखा ही नहीं था...उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करे...माथे पर थपकियाँ दे रहा था...पीठ सहला रहा था...बता रहा था कि मत रो...किसलिए मत रो उसे मालूम नहीं...ये भी नहीं कह पा रहा था कि वापस तो आओगी ही...मैं मिलने आऊंगा...कुछ भी नहीं...बस वो रो रही थी और प्रणय को चुप कराना नहीं आता था. बहुत देर सिसकती रही वो, उसके नाखून कंधे में चुभ रहे थे...शर्ट गीली हो रही थी...फिर उसने खुद ही खुद को अलग किया.

'तुम्हें मालूम नहीं है मैं तुम्हें कितना मिस करुँगी...तुम्हें ये मालूम है क्या कि मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ?'

फिर उसने लड़की ने हाथ के इशारे से इधर आओ कहा...प्रणय को लगा अब फिर कोई सेक्रेट बताएगी और फिर ठठा के हँसेगी लड़की...पर लड़की ने अंगूठे और तर्जनी से उसकी ठुड्डी पकड़ी और दायें गाल पर किस करते हुए कहा...'दूसरा वाला उधार रहा, आ के ले लेना मुझसे कभी'.
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उधर लड़की भी सालों साल सोचती रही कि अगर वो उससे प्यार करता था तो सवाल क्यूँ पूछा...सीधे किस क्यूँ नहीं किया? सोचना ये भी था कि वो कभी आया क्यूँ नहीं लौट के...

पर जिंदगी जो होती है न...कहती है कुछ उधार बाकी रहने चाहिए...इससे लोग आपको कभी भूलते नहीं...प्रणय सोचता है यूँ भी उसे भूलना कौन सा मुमकिन था.


जाने क्यूँ हर साल के अंत में सर के सफ़ेद बाल गिनते हुए डायरी में लिखे इस सालों पुराने पन्ने को पढ़ ही लेता था...


कल ख्वाब में 
मेरे कांधे पर सर रख कर
सिसकते हुए 
उसने कहा
हम आज आखिरी बार बिछड़ रहे हैं

सुबह
मेरे बाएँ कांधे पर उभर आया था
उसके डिम्पल जितना बड़ा दाग
ठीक उसकी आँखों के रंग जितना...सियाह! 

उसे चाँद ने सबसे छुपा के गढ़ा था...

वो चाँद की एक ऐसी कला थी जिसे चाँद ने सबसे छुपा के गढ़ा था...अपनी बाकी कलाओं से भी...चांदनी से भी...लड़की नहीं थी वो...सवा सोलह की उम्र थी उसकी...सवा सोलह चाँद रातों जितनी.

उसे छुए बिना भी मालूम था  कि वो चन्दन के अबटन से नहाती होगी...चाँद पार की झीलों में...जबकि उसकी माँ उसकी आँखों में बिना काजल पारे उसे कहीं जाने नहीं देती होगी...माथे पर चाँद का ही नजरबट्टू लगाती थी...श्यामपक्ष के चाँद का. एक ही बार उसे करीब से देखा है...भोर के पहले पहर जंगल की किनारी पर चंपा के बाग़ में...मटमैले चंपा के फूल जमीन से उठा कर अपने आँचल में भरते हुए...चम्पई रंग की ही साड़ी में...चेहरे पर चाँद के परावर्तित प्रकाश से चमकती आँखें...सात पर्दों में छुपी...सिर्फ पलकों की पहरेदारी नहीं थी...उसकी आत्मा में झाँकने के लिए हर परदे के रक्षक से मिन्नतें करनी होंगी. 

कवि क्या किसी ने भी उसकी आवाज़ कभी नहीं सुनी थी...बातों का जवाब वो पलकें झपका के ही देती थी...हाँ भ्रम जरूर होता था...पूर्णिमा की उजास भरी रातों में जब चांदनी उतरती थी तो उसके एक पैर की पायल का घुँघरू मौन रहने की आज्ञा की अवहेलना कर देता था...कवि को लगता था की बेटी के लिए आत्मजा कितना सही शब्द है, वो चाँद की आत्मा से ही जन्मी थी. कई और भी बार कवि को उसकी आवाज़ के भ्रम ने मृग मरीचिका सा ही नींद की तलाश में रातों को घर से बाहर भेजा है. जेठ की दुपहर की ठहरी बेला में उस छोटे शहर के छोटे से कालीबाड़ी में मंदिर की सबसे छोटी घंटी...टुन...से बोलती है तो कवि के शब्द खो जाते हैं, उसे लगता है कि चाँद की बेटी ने कवि का नाम लिया है. 

मंदिर के गर्भगृह में जलते अखंड दिए की लौ के जैसा ठहराव था उसमें और वैसी ही शांत, निर्मल ज्योति...उस लौ को छू के पूजा के पूर्ण होने का भाव...शुद्ध हो जाने जैसा...ऐसी अग्नि जिसमें सब विषाद जल जाते हों. कवि ने एक बार उसे सूर्य को अर्घ्य देते हुए देखा था...उसकी पूर्णतयः अनावृत्त पीठ ने भी कवि में कोई कामुक उद्वेलन उत्पन्न नहीं किया...वो उसे निर्निमेष देखता रहा सिर्फ अपने होने को क्षण क्षण पीते हुए. 

पारिजात के फूलों सी मद्धम भीनी गंध थी उसकी...मगर उसमें से खुशबू ऐसी उगती थी कि जिस पगडण्डी से वो गुजरी होती थी उसके पांवों की धूल में पारिजात के नन्हे पौधे उग आते थे...श्वेत फूल फिर दस दिशाओं को चम्पई मलमल में पलाश के फूलों से रंग कर संदेशा भेज देते थे कि कुछ दिन चाँद की बेटी उनके प्रदेश में रहेगी.








कवि ने एक बार कुछ पारिजात के फूल तोड़ लिए थे...एक फूल को सियाही में डुबा कर चाँद की बेटी का नाम लिखा था काष्ठ के उस टुकड़े पर जिसपर वो रचनात्मक कार्य करता था...उसका नाम अंतस पर तब से चिरकाल के लिए अंकित हो गया है 'आहना'. 

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