लड़की क्या थी पाँव में घुँघरू बांधे हवाएं थीं...सुरमई शाम को आसमान से उतरती चांदनी का गीत थी...बारिश के बाद भीगे गुलमोहर से टप-टप टपकती संतूर का राग थी...कहीं रूकती नहीं...पैर हमेशा थिरकते रहते उसके. गिरती-पड़ती उठ के खिलखिलाती...कैनवास उठा के रंग भरती...पानी से खेलती...
जिंदगी जैसी थी वो...कपड़े भी सुखाती रहती तो उसमें ऐसी लय थी कि उसे देखना अद्भुत लगता था...जैसे जादू की छड़ी थी लड़की, जिधर घूमती आँखों में सितारे चमक उठते...वो एक थिरकन थी...सर से पैर तक नृत्य की कोई मुद्रा जिसे देखते हुए कभी दिल न भरे...और वो कौन सा गीत गुनगुनाती रहती थी हमेशा...उसके होठ एक दूसरे पर टिके बहुत कम रहते...हर कुछ अंतराल पर अलग होते रहते...कभी गाती, कभी बोलती कुछ...कभी किसी को यूँ ही आवाज़ दे कर बुलाती...कभी खुद से बातें करती.
लड़की सामने रहे तो समझ नहीं आये कि कहाँ देखूं...आँखें चंचल...काली...और जिंदगी से लबरेज़...चेहरा चमकता हुआ...गोरे रंग पर गुलाबी...कि जैसे पूजा के लिए कांसे की परात में रखे दूध को किसी ने हलके सिन्दूर के हाथों छू दिया हो...इतनी खूबसूरत कि छूने के पहले धुले हाथ तौलिये से सुखा लिए जाएँ.
यूँ उसका चेहरा देखो तो कुछ भी सुन्दर नहीं था...न हिरनी की तरह बड़ी आँखें थी...न सुतवां नाक थी...पर चेहरे पर पानी इतना था कि आँखें हटती नहीं थीं. चंचल इतनी थी कि एक मिनट ठहरती ही नहीं नहीं...उसे देख कर सोचा करता था कि उसकी फोटो खींचूंगा तो ब्लर आएगी...उसे स्थिर रहना आता ही नहीं था...मान लो स्पोर्ट्स मोड में ठहर के आ भी गयी एक पल तो उसके चेहरे पर जो इश्क में डूबा अहसास हवाओं की तरह गुज़रता है उसे कैसे कैद करूँगा. इसलिए जितनी देर वो सामने रहती थी...मैं सामने ही रखता था उसे.
उसे हर चीज़ से प्यार था...कांच की चूड़ियों को धूप में घुमा घुमा के देखती कि उनसे आई धूप किस रंग की है...कभी खनखना के देखती कि चूड़ियों का गीत उसके मन के राग से मेल खाता है कि नहीं...दुपट्टा तो हमेशा हवा में लहराते ही चलती...उसका पारदर्शी दुपट्टा कभी गुलाबी, कभी नीला, कभी वासंती...कभी ऊँगली में लिपटा तो कभी हवाओं से गुफ्तगू करता हुआ...जिस दिन थोड़ी भी हवा चले उसका दुपट्टा उन्ही के संग कभी दादरा तो कभी कहरवा में ताल देता हुआ होता. उसे कितनी बार अकेले...बिना किसी धुन के आँगन में उन्मुक्त नाचते देखा...हाय...दिल पर क्या गुज़रती थी...इतना खूबसूरत कोई इतना खुल के कैसे नाच सकता है! उसे सब देखते थे...बार बार देखते थे...हवाएं...आसमान...बादल...और बारिश उफ़...बारिश तो उसे बांहों में ही भर लेती थी...वो भी मेरे सामने...मत पूछो दिल में क्या आग लगती थी!
सामने होती तो भी यकीन नहीं होता कि वो सच में है...सालों साल उसे देखने के बावजूद कभी हो नहीं पाया कि एक बार उसे छू कर देख सकूँ...आज बहुत साल बाद उसके शहर में आना हुआ है...बच्चों के स्कूल में एक फोटोग्राफी असैन्मेंट के लिए गया हूँ...मन तो शहर के उस पुराने घर में ही अटका हुआ है कि जिसके छज्जे पर से जिंदगी सी खूबसूरत उस ख्वाबों की लड़की को अपने कैमरे में कैद करने कि ख्वाहिश लिए जाना पड़ा था.
आज सामने देखता हूँ तो एक खुशबू में भीगा दुपट्टा दिखता है...इतने साल हो गए...उसके गाल का डिम्पल गहरा गया है...पर थिरकन वही है...एक नन्ही परी जैसी बच्ची को गोद में उठा कर गोल चक्कर काट रही है...बच्ची किलकारियां मार रही है...मुझे अब कैमरा अच्छे से इस्तेमाल करना आ गया है...इस एक लम्हा उसकी आँखों पर कैमरा फोकस करता हूँ...इतने सालों बाद इश्क से लबरेज़, जिंदगी में डूबे चेहरे एक फ्रेम में आये हैं...ये हैं जिंदगी की सबसे खूबसूरत चीज़...मोशन ब्लर.
जिंदगी जैसी थी वो...कपड़े भी सुखाती रहती तो उसमें ऐसी लय थी कि उसे देखना अद्भुत लगता था...जैसे जादू की छड़ी थी लड़की, जिधर घूमती आँखों में सितारे चमक उठते...वो एक थिरकन थी...सर से पैर तक नृत्य की कोई मुद्रा जिसे देखते हुए कभी दिल न भरे...और वो कौन सा गीत गुनगुनाती रहती थी हमेशा...उसके होठ एक दूसरे पर टिके बहुत कम रहते...हर कुछ अंतराल पर अलग होते रहते...कभी गाती, कभी बोलती कुछ...कभी किसी को यूँ ही आवाज़ दे कर बुलाती...कभी खुद से बातें करती.
लड़की सामने रहे तो समझ नहीं आये कि कहाँ देखूं...आँखें चंचल...काली...और जिंदगी से लबरेज़...चेहरा चमकता हुआ...गोरे रंग पर गुलाबी...कि जैसे पूजा के लिए कांसे की परात में रखे दूध को किसी ने हलके सिन्दूर के हाथों छू दिया हो...इतनी खूबसूरत कि छूने के पहले धुले हाथ तौलिये से सुखा लिए जाएँ.
यूँ उसका चेहरा देखो तो कुछ भी सुन्दर नहीं था...न हिरनी की तरह बड़ी आँखें थी...न सुतवां नाक थी...पर चेहरे पर पानी इतना था कि आँखें हटती नहीं थीं. चंचल इतनी थी कि एक मिनट ठहरती ही नहीं नहीं...उसे देख कर सोचा करता था कि उसकी फोटो खींचूंगा तो ब्लर आएगी...उसे स्थिर रहना आता ही नहीं था...मान लो स्पोर्ट्स मोड में ठहर के आ भी गयी एक पल तो उसके चेहरे पर जो इश्क में डूबा अहसास हवाओं की तरह गुज़रता है उसे कैसे कैद करूँगा. इसलिए जितनी देर वो सामने रहती थी...मैं सामने ही रखता था उसे.
उसे हर चीज़ से प्यार था...कांच की चूड़ियों को धूप में घुमा घुमा के देखती कि उनसे आई धूप किस रंग की है...कभी खनखना के देखती कि चूड़ियों का गीत उसके मन के राग से मेल खाता है कि नहीं...दुपट्टा तो हमेशा हवा में लहराते ही चलती...उसका पारदर्शी दुपट्टा कभी गुलाबी, कभी नीला, कभी वासंती...कभी ऊँगली में लिपटा तो कभी हवाओं से गुफ्तगू करता हुआ...जिस दिन थोड़ी भी हवा चले उसका दुपट्टा उन्ही के संग कभी दादरा तो कभी कहरवा में ताल देता हुआ होता. उसे कितनी बार अकेले...बिना किसी धुन के आँगन में उन्मुक्त नाचते देखा...हाय...दिल पर क्या गुज़रती थी...इतना खूबसूरत कोई इतना खुल के कैसे नाच सकता है! उसे सब देखते थे...बार बार देखते थे...हवाएं...आसमान...बादल...और बारिश उफ़...बारिश तो उसे बांहों में ही भर लेती थी...वो भी मेरे सामने...मत पूछो दिल में क्या आग लगती थी!
सामने होती तो भी यकीन नहीं होता कि वो सच में है...सालों साल उसे देखने के बावजूद कभी हो नहीं पाया कि एक बार उसे छू कर देख सकूँ...आज बहुत साल बाद उसके शहर में आना हुआ है...बच्चों के स्कूल में एक फोटोग्राफी असैन्मेंट के लिए गया हूँ...मन तो शहर के उस पुराने घर में ही अटका हुआ है कि जिसके छज्जे पर से जिंदगी सी खूबसूरत उस ख्वाबों की लड़की को अपने कैमरे में कैद करने कि ख्वाहिश लिए जाना पड़ा था.
आज सामने देखता हूँ तो एक खुशबू में भीगा दुपट्टा दिखता है...इतने साल हो गए...उसके गाल का डिम्पल गहरा गया है...पर थिरकन वही है...एक नन्ही परी जैसी बच्ची को गोद में उठा कर गोल चक्कर काट रही है...बच्ची किलकारियां मार रही है...मुझे अब कैमरा अच्छे से इस्तेमाल करना आ गया है...इस एक लम्हा उसकी आँखों पर कैमरा फोकस करता हूँ...इतने सालों बाद इश्क से लबरेज़, जिंदगी में डूबे चेहरे एक फ्रेम में आये हैं...ये हैं जिंदगी की सबसे खूबसूरत चीज़...मोशन ब्लर.




