25 December, 2011

तुम्हारी याद मेरे बाएँ कंधे पर बैठी एक सतरंगी पंखों वाली तितली है...

यूँ मेरी माँ को गए बहुत साल बीत गए पर मुझे अब भी उसकी बेतरह याद आती है...मेरे हर शब्द में जो तलाश है वो उसी की है. मैं अतीत के लम्हों को करीने से अपनी एल्बम में सजा रही थी जब तितली बहुत हलके से मेरे कंधे पर बैठ गयी...मैंने स्लीवलेस टॉप पहना था तो कंधे पर हलकी सी गुदगुदी हुयी...

बाँयां कन्धा...हालाँकि माँ को गुज़रे बहुत साल बीते और मेरे बचपन का मुझे कुछ भी याद नहीं है...इतने सालों में किसी ने याद नहीं दिलाया...मेरे पास तसवीरें भी नहीं हैं कि जिन्हें देख कर मैं यकीन कर सकूँ दुबारा कि माँ मुझसे बहुत प्यार करती थी...पर बाकी औरतों को देखती हूँ, अपने बच्चे को बायें कंधे पर रखे हुए हलके हाथों से थपकी देते हुए तो मुझे लगता है कि जब मैं भी कुछ ही महीनों की रही होउंगी तो ऐसे ही माँ मुझे भी थपकियाँ देकर सुलाती होगी. उस वक़्त तक मैंने कोई बदमाशियां करनी नहीं सीखी होंगी कि मेरे अपने मुझसे हमेशा के लिए खफा हो जाएँ. नन्ही सी मैं, किसी गुलाबी रंग के स्वेटर में, नानी के हाथ के बुने हर फंदे की गर्माहट में लिपटी हुयी...अपनी पहली ठंढ में इस महीने कोई छः महीनो की रही होउंगी...उस वक़्त क्या किया होगा, बहुत तो कभी माँ की ऊँगली काट ली होगी, छोटे छोटे दांत आये होगे...और दांत सल्सलाता होगा तो.

ऐसी बहुत सी शामें होंगी जब मम्मी ने मुझे अपने बांयें कंधे पर थपकियाँ देकर सुलाया होगा...राजकुमार की कहानियां सुनाई होंगी...पर मुझे उनमें से एक भी याद क्यों नहीं आती है आज...आज मन जब ऐसा भरा भरा सा है कोई लोरी क्यूँ नहीं याद के देश से उड़ती आती है मेरे ज़ख्मों पर फाहा रखने. क्यूँ ऐसा महसूस होता है कि कभी मुझसे किसी ने प्यार किया ही नहीं...ये कैसी भटकन है कि तड़पती रहती हूँ...सर पर हाथ रखने कोई नहीं आता...ये दुनिया इतनी फरेबी भी तो नहीं.

जैसे परत परत उधेड़ दे कोई मुझे और मैं पाऊं कि सारे परदे उतरने के बाद मुझमें कुछ है ही नहीं...अन्दर से एकदम खाली...खोलने वाला भी परेशान हो जाए कि किस तलाश में मुझे खोलने की कोशिश की...माँ की हर याद एक ऐसा ही संदूक में संदूक है, सारे खुलते जाते हैं...बहुत मेहनत से...पुराने संदूक...किसी का ताला अटका हुआ है तो किसी के कब्जे नहीं खुलते...दिनों दिन लगा के खोलती जाती हूँ और जिंदगी की शाम आई होती है तो पाती हूँ कि उसमें मेरे लिए कुछ नहीं है...कुछ भी नहीं...कोई दुआ नहीं, कोई याद नहीं, कोई लोरी नहीं, कोई बुना हुआ स्वेटर नहीं.

मुझे देखोगे तो ऊपर से बहुत हंसती सी दिखती हूँ...मेरी आँखें छू कर मत देखना...फिर मुझपर तुम कभी ऐतबार न कर सकोगे...आज भी कहोगे कि मैंने तुम्हें कौन सा अपना माना वरना बताती नहीं...सोये ही तो हो, उठा देती...मुझे इस भरी दुनिया में किसी पर हक महसूस नहीं होता है...और मैं बहुत हँस के कहती हूँ कि कोई मुझे प्यार नहीं करता...पर वाकई उस समय मैं अन्दर से बिखर रही होती हूँ ऐसे कि कोई बाँध भी ना सके. मेरी बातों पर यकीन मत करो...मुझे झूठ बोलना बहुत अच्छे से आता है...

हँसना झूठ होता है पर रोना झूठ नहीं होता...जाने तुम्हें किसी ने बताया या नहीं...पर तुम जानते हो न मुझे...कितनी स्ट्रोंग हूँ मैं...कभी रोई तुम्हारे सामने? नहीं न...मम्मी...माँ...मी...तुम बहुत याद आती हो. कभी मिलने आ जाया करो...मेरी एकदम याद नहीं आती तुम्हें...तुम सच्ची सच्ची बताओ...तुम मुझसे प्यार करती थी कि नहीं?

कैद-ऐ-हयात-ओ-बंद-ऐ-गम अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों?

कोई है जो बता दे कितनी जिंदगी और जीनी है...

22 December, 2011

बस एक लड़की थी...जो लिफाफे की दीवारों में जिन्दा चिन दी गयी थी

मगर वो इतनी बुरी थी कि उसने मुझसे सिर्फ ख़त लिखने की इजाज़त ली पर ख़त के साथ अपनी उदास बेचैनियाँ  भी पिन करके भेज दीं..वो ख़त क्या था एक सुलगते लम्हे का दरवाजा था जिसमें हाथ बढ़ा कर मैं उसे अपनी बांहों में भर सकता था...भरना चाहता था.

कुछ हर्फ़ कागज़ पर थे, कुछ हाशिये पर...कुछ आंसुओं के कतरे थे...कुछ रात की खामोशियों में सुने गए गीतों के मुखड़े...सन्नाटों के पेड़ से तोड़े कुछ फूल भी थे. मुस्कुराहटों के बीज थे जो इस गुज़ारिश के साथ भेजे गए थे कि इन्हें ऐसी जगह रोपना जहाँ धूप भी आती हो और छाँव भी मिलती हो...मन के आँगन में तब से एक क्यारी खोद रहा हूँ जहाँ उन्हें सही मौसम, हवा पानी मिल सके.

एक आखिरी कश तक पी गयी सिगरेट का बुझा हुआ टुकड़ा था जिसे देख कर आँखों में धुआं इस कदर गहराने लगा कि किसी की शक्ल साफ़ नहीं रही...इस परदे के पार किसी का कोई वजूद बचा ही नहीं. मैं देर तक इस ख्याल में खोया रहा कि उसने दिन के किस पहर और किन लोगों के सामने इस सिगरेट को अपने होठों से लगाया होगा...क्या बालकनी में कॉफ़ी पीते हुए सिगरेट पी जैसा कि वो हमेशा लिखा करती है या कि सड़क पर टहलते हुए लोगों की घूरती निगाहों को इग्नोर करते हुए किसी अजीज़ से फोन पर बात करते हुए पी. कोई होगा फोन के उस तरफ जो कि उससे जिरह कर सके कि सिगरेट न पिया कर...बहुत बुरी चीज़ होती है.

उसके हर्फ़ भी उसकी तरह शरीर थे, रोते रोते खिलखिला उठते थे...उनके बारे में कुछ भी कहना बहुत मुश्किल था...जितनी बार उसका ख़त पढ़ता हर्फों के रंग बदल जाते थे...समझ नहीं आता था कि लड़की में कितनी परतें हैं और इन सारी परतों को उसने कागज़ में क्यूँ उतारा है...मैं उसके 'प्रिय____' की ऊँगली पकड़ कर सफ़र शुरू तो करता था पर वो हर्फ़ भी अक्सर साथ छोड़ जाता था. मैं उसकी असीम तन्हाइयों को अपनी बांहों के विस्तार में भरने की कोशिश करता मगर हर बार लगता कुछ छूट जा रहा है...वो इतना सच थी कि पन्नों से मेरी आँखों में झांक रही थी और इतना झूठ कि यकीन की सरहद तक ख्याल नहीं जाता कि इस पन्ने पर वही जज़्ब हुआ है जो उसने किसी दिन दोपहर को खिड़की खोल कर खुली धूप में लिखा है.




वहाँ कोई सवाल न था...बस एक लड़की थी...जो लिफाफे की दीवारों में जिन्दा चिन दी गयी थी...वो ख़त से जब निकल कर मेरी बाँहों में आई तो आखिरी सांसें गिन रही थी. मैंने उसका चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में भरा हुआ था जब उसने पहली और आखिरी बार मुझे 'आई लव यू' कहा...और मैं उसे अब कभी यकीन न दिला पाऊंगा कि मैं उससे कितना प्यार करता हूँ. 

21 December, 2011

कभी मिलोगे मुझसे?

मैंने जिंदगी से ज्यादा बेरहम निर्देशक अपनी जिंदगी में नहीं देखा...मुझे इसपर बिलकुल भी भरोसा नहीं. दूर देश में बैठे हुए सबसे वाजिब डर यही है कि तुमसे मिले बिना मर जायेंगे. एक बेहद लम्बा इंतज़ार होगा जिसे हम अपना दिल बहलाने के लिए छोटे छोटे टुकड़े में बाँट कर जियेंगे...यूँ ऐसा जान कर नहीं करेंगे पर जीना बहुत मुश्किल हो जाएगा अगर ये जान जायें कि इंतज़ार सांस के आखिरी कतरे तक है.

हो ये भी सकता है कि कई कई बार हम मिलते मिलते रह जायें...कि कोई ऐसा देश हो जो मेरे तुम्हारे देश के बीच हो...जिसमें अचानक से मुझे कोई काम आ जाए और तुम्हें भी...तुम्हें धुएं से अलेर्जी है और मुझे नया नया सिगरेट पीने का शौक़...तो जिस ट्रेन में हमारी बर्थ आमने सामने है...उसमें मैं अपनी सीट पर कभी रहूंगी ही नहीं...कि मुझे तो सिगरेट फूंकने बाहर जाना होगा. जब मैं लौटूं तो तुम किसी अखबार के पीछे कोई कहानी पढ़ रहे हो...और जिंदगी, हाँ हाँ वही डाइरेक्टर जो सीन में दीखता नहीं पर होता जब जगह है...जिंदगी अपनी इस लाजवाब कहानी की बुनावट पर खुश जो जाए. सोचो कि उसी ट्रेन में, तुम्हारी ही याद में सिगरेट दर सिगरेट फूंकती जाऊं और सपने में भी ना सोचूं कि जो शख्स सामने है बर्थ पर तुम ही हो. जिंदगी के इन खुशगवार मौकों पर हमें यकीन नहीं होता न...तो कह ये भी सकते हैं कि जिंदगी जितनी बुरी डायरेक्टर है...हम कोई उससे कम बुरे एक्टर भी नहीं हैं. हमेशा स्क्रिप्ट का एक एक शब्द पढ़ते चलते हैं...थोड़ी देर नज़र उठा कर अपने आसपास देखें तो पायेंगे कि हमारी गलती से कई हसीन मंज़र छूट गए हैं हमारे देखे बिना.

कोई बड़ी बात न होगी कि उस शहर की सड़कों पर हम पास पास से गुजरें पर एक दूसरे को देख ना पाएं...तब जबकि मेरी भी आदत बन चुकी हो इतने सालों में कि हर चेहरे में तुम्हें ढूंढ लेती हूँ पर जब तुम सामने हो तो तुम्हें पहचान ना पाऊं कि अगेन, जिंदगी पर भरोसा न हो कि वो तुम्हें वाकई मेरे इतने करीब ले आएगी. उस अनजान शहर में जहाँ हमें नहीं मिलना था...जहाँ हमें उम्मीद भी नहीं थी मिलने की...मैं अपने उन सारे दोस्तों को फोन करती हूँ जिनके बारे में जानती हूँ कि उन्होंने मुझे इश्क हो जाने की दुआएं दी होंगी...सिगरेट के अनगिन कश लगते हुए फ़ोन पर बिलखती हूँ...कि अपनी दुआएं वापस मांग लो...इश्क मेरी जान ले लेगा. एक सांस भी बिना धुएं के अन्दर नहीं जाती...एक एक करके सारे दोस्तों को फोन कर रही हूँ...सिगरेट का पैकेट ख़त्म होता है, नया खुलता है, शाम ढलती है...कुछ दिखता नहीं है धुएं की इस चादर के पार...मैंने अपनेआप को एक अदृश्य कमरे में बंद कर लिया है और उम्मीद करती हूँ कि तुम्हारी याद यहाँ नहीं आयगी...इस बीच शहर सो गया है और बर्फ पड़नी शुरू हो गयी है. स्कॉच का पैग रखा है...प्यास लगी है...रोने से शरीर में नमक और पानी की कमी हो जाती है, उसपर अल्कोहल से डिहाईडरेशन भी हो रहा है.

अगली बदहवास सुबह सर दर्द कम करने के लिए कॉफ़ी पीने सामने के खूबसूरत से कॉफ़ी शॉप पर गयी हूँ...तुम्हारे लिखे कुछ मेल के प्रिंट हैं...कॉफ़ी का इंतज़ार करती हुयी पढ़ रही हूँ...चश्मा उतार रखा है टेबल पर. इस अनजान शहर में किसी चेहरे को देखने की इच्छा नहीं है...कोई भी अपना नहीं आता यहाँ...सामने देखती हूँ...सब धुंधला है...दूर की नज़र कमजोर है न...कोई सामने आता हुआ दिखता है...सफ़ेद कुरते जींस में...तुम्हारी यादों के बावजूद मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आते हैं जब मेरा सबसे पसंदीदा हुआ करता था कुरते और नीली जींस का ये कॉम्बिनेशन. ऐसा महसूस होता है कि कोई मेरी ओर देख कर मुस्कुराया है. मैं चश्मा पहनने के लिए उठाती हूँ कि सवाल आता है...आपके साथ एक कॉफ़ी पी सकता हूँ...तुम जिस लम्हे दिखते हो धुंधले से साफ़ ठीक उसी लम्हे तुम्हारी आवाज़ तुम्हारे होने का सबूत दे देती है.

एक लम्हा...अपनी बाँहें उठा चुकी हूँ तुम्हें गले लगाने के लिए फिर कुछ अपनी उम्र का ख्याल आ जाता है कुछ शर्म...तुम्हारी आँखों में झाँक लेती हूँ...अपने जैसा कुछ दिखता है...कंधे पे हाथ रखा है और सेकण्ड के अगले हिस्से में मैं हाथ मिलाती हूँ तुमसे. तुमने बेहद नरमी से मेरा हाथ पकड़ा है...मैं देखती हूँ कि तुम्हारे हाथ बिलकुल वैसे हैं जैसे मैंने सोचे थे. किसी आर्टिस्ट की तरह खूबसूरत, जैसे किसी वायलिन वादक के होते हैं...आमने सामने की कुर्सियों पर बैठे हैं. कहने को कुछ है नहीं...बहुत सारा शोर है चारों तरफ...कैफे में कोई तो गाना बज रहा था...ठीक इसी लम्हे ख़त्म होता है...अचानक से जैसे बहुत कुछ ठहर गया है...मुझे छटपटाहट होती है कुछ करने की...तुम्हारे माथे पर एक आवारा लट झूल रही है...मैं उँगलियों से उसे उठा कर ऊपर कर देती हूँ...कैफे में नया गाना शुरू होता है...ला वि एन रोज...फ्रेंच गाना है...जिसका अर्थ होता है, जिंदगी को गुलाबी चश्मे से देखना...मेरा बहुत पसंदीदा है...तुम जानते हो कि मुझे बेहद पसंद है...तुम भी कहीं खोये हुए हो.

ये कितनी अजीब बात है कि जितनी देर हम वहाँ हैं हमने एक शब्द भी नहीं कहा एक दूसरे को...यकीन नहीं होता कि कुछ शब्द ही थे जो हमें खींच के पास लाये थे...कुछ अजीब से ख्याल आ रहे थे जैसे कि क्यूँ नहीं तुम मेरा हाथ यूँ पकड़ते हो कि नील पड़ जाएं...कि किसी लम्हे मुझे कहना पड़े...हाथ छोड़ो, दुःख रहा है...कि मैं सोच रही हूँ कि मैंने कितनी सिगरेट पी है...और तुम्हें सिगरेट के धुएं से अलेर्जी है...या कि तुमने सफ़ेद कुरता जो पहना है, क्या मैंने कभी तुम्हें कहा था कि मेरी पसंदीदा ड्रेस रही है कोलेज के ज़माने से और आज मैंने इत्तिफाकन सफ़ेद कुरता और नीली जींस नहीं पहनी है...ये लगभग मेरा रोज का पहनावा है. कि तुम सामने बैठे हो और जिंदगी से शिकायत कर रही हूँ कि तुम पास नहीं बैठे हो!

इसके आगे की कहानी नहीं लिख सकती...मुझे नहीं मालूम जिंदगी ने कैसा किस्सा लिखा है...पर उसकी स्क्रिप्टराइटर होने के बावजूद मेरे पास ऐसे कोई शब्द नहीं हैं जो लिख सकें कि किन रास्तों पर चल कर तुमसे अलग हुयी मैं...कि तुमसे मिलने के बाद वापस कैसे आई...कि तुम्हारे जाने के बाद भी जीना कैसे बचता है...इश्क में बस एक बार मिलना होना चाहिए...उसके बाद उसकी याद आने के पहले एक पुरसुकून नींद होनी चाहिए...ऐसे नींद जिससे उठना न हो. 

20 December, 2011

हे नटराज!

ऐसी कैसे हूँ कि एकदम डर नहीं लगता...किसी भी चीज़ से...जिंदगी से नहीं...मौत से नहीं...बिखर जाने टूट जाने से नहीं...ऐसे कैसे कण कण से उजास फूट रहा है मेरे. आज क्या मिल गया है मुझे?

शिव तांडव स्त्रोत्र सुना...डमरू बजता है तो लगता है पूरे जिस्म के टुकड़े टुकड़े हो रहे हैं...एकदम टूट जाने वाले...जैसे कि फिर महीन बालू की तरह रह जाउंगी मैं...और फिर इसी से सब कुछ रच डालूंगी. कुछ रचने में खुद को बहुत तोड़ना भी जरूरी हो जाता है. मुझे क्यूँ टूटने से डर नहीं लगता...कि हर बार टूटने के बाद हम खुद को जोड़ कैसे लेते हैं.

स्त्रोत्र सुनते हुए लग रहा है कि हम इश्वर से अलग नहीं हैं, वाकई हम उसका ही एक हिस्सा हैं, हमें काट कर निकाला गया है इश्वर से ही...कि हमारी आत्मा उस परमपिता का ही अंश है. कि शिव की तीसरी आँख है मुझमें वहीं कहीं भवों के बीच...इस तीसरी आँख की ज्वाला से खुद को जलाने के बाद फिर से बना भी लूंगी ये भी यकीन है मुझे. सर से पैर तक थरथरा रही हूँ...रेजोनेंस जिसमें कि आप किसी आवाज़ से ट्यून हो जाते हो...वैसे ही. समझ नहीं आ रहा  कि श्लोक बाहर बज रहा है या मेरे मन के अन्दर से...जैसे कोई सदियों पुरानी आवाज़ है जो मेरे पूरे होने से फूट रही है.

ऐसा होता है क्या कि शब्दों में चित्र छुपे हों? लंका की दीवारें दिखने लगती हैं...वहाँ तपस्या करता रावण...भक्त की तपस्या पर बार बार रीझते भोले शिव शंकर...और इस तांडव नृत्य का सब दृश्य खुल जाता है...सती का पार्थिव शरीर और पीड़ा के वे क्षण...मुझे भी महसूस होते हैं...और फिर क्रोध...सब कुछ जला देने वाला क्रोध. प्रलय लाने वाला क्रोध.

बचपन में एक बांगला तांडव नृत्य सिखाया गया था मुझे...छोटी सी थी और शिव बने हुए जटाजूट बांधे बहुत अच्छी लगती थी...वो नृत्य मुझे बेहद पसंद था...और बाकी लोगों को भी पसंद आता था शायद, कई बार उस स्कूल में रहते हुए वो नृत्य किया. आज फिर से उसके स्टेप्स याद करने की कोशिश कर रही थी पर याद नहीं आ रहा था...याद आती है तो पैरों की थाप से जो ध्वनि निकलती है जैसे तबले पर कोई 'सम' बजाये...गीत उठाने के लिए. बहुत बहुत देर तक पैर थिरकते रहे...एक एक शब्द, एक एक श्लोक जैसे आत्मा के तार छेड़ रहा हो. गोल गोल घूमते हुए सब कुछ धीमा लगता है और फिर दुनिया ऊपर नीचे...वैसा ही जैसे मेरे मन की हालत हो रखी है. भरतनाट्यम के बहुत पहले सीखे हुए कुछ स्टेप्स भी याद आये...बहुत कुछ गड्डमड्ड था...बस एक थिरकन थी जो मुझे बहाए जा रही थी.

देवघर से हूँ तो शंकर भगवान् हमारी हर चीज़ का हिस्सा हैं...इधर कुछ सालों से उनसे नाराज़ थी...आज लगता है वो गुस्सा, वो शिकायतें सारी बह गयीं...भोले बाबा फिर से मेरे उतने ही अपने हो गए जैसे उस समय हुए थे जब चार पांच की कच्ची उम्र में पहली बार देवघर के मंदिर के गर्भगृह में कदम रखा था. मन एकदम सहज है...जैसे शिवलिंग को छू लिया हो!

सुख जीवन में बहुत कम आता है...आज के दिन मन शांत होने और इस सुख की अवस्था के लिए सभी देवी देवताओं की जय!

19 December, 2011

पागल लड़के, तुझे मालूम भी है...मुझे तुमसे प्यार हो गया है!

सुनो, तुम मुझे इतने सुरूर में दिल्ली के मौसम का हाल न बाताया करो...तुमसे ही प्यार न हो जाए मुझे. दिल्ली से तो जानते हो न किस तरह का इश्क हो रखा है. तुम क्यूँ उस कड़ी में अपने नाम की बोगी जोड़ रहे हो...शंटिंग में जाने वाली है गाड़ी...इसकी कोई मंजिल नहीं है फिलहाल. वहां रात के अँधेरे में मेरी बातें सुनने के अलावा कोई चारा भी नहीं होगा. कैसे रात काटोगे? बताओ भला...नींद भी आएगी?

कोहरा ऐसे मत सुनाओ मुझे...जानते हो न की दिल्ली की ठंढ मेरी कमजोरी है...ना न वैसी नहीं कि हड्डियों में या जोड़ों में दर्द उठ जाए...वैसी कि हाल सुनूं फ़ोन पर और सिसकारी निकल जाए. सिगरेट की तलब तो समझते हो...जैसे कोई लम्बी मीटिंग दो -चार की जगह छह घंटे चल जाए जिसमें सुबह से खाना न खाने के कारण पेट में चूहे कूद रहे हों और पानी पर चल रहे हो...मीटिंग ख़त्म होते ही बाहर निकलते हो और सिगरेट का एक लम्बा कश खींचते हो...कैसा महसूस होता है? जानते हो उस भाव को...मैंने तुम्हारे चेहरे पर कई बार उसे पढ़ा है...सुबह नाश्ता करके निकला करो घर से...कोई समझाता नहीं है ये सब तुम्हें. अपनी माँ से बात कराओ मेरी, मैं कहती हूँ कि बेटा एकदम बिगड़ा हुआ है आपका...न न बाबा, माँ से तुम्हारी सिगरेट और दारू की शिकायत थोड़े करूंगी...पर ये खाने के लिए रोज रोज बोलना तो करेगी माँ...मेरा कौन सा हक है तुमपर.

तुम मेरी दिल्ली की यादों में ऐसे कैसे घुसपैठ करते जा रहे हो...इतनी कम तस्वीरों में कोई कैसे याद आता है बताओ भी भला...तुम्हें क्यूँ फर्क पड़ता है कि मैं दिल्ली से कितना प्यार करती हूँ...बारिश होती है तो बारिश सुनाने लगते हो, कोहरा छाता है तो कोहरा दिखाने लगते हो...तुम जानते भी हो कि तुम्हारी आँखों से इतनी बार देखा है पुराने किले के उस रास्ते को कि अब लगता है कि हर शाम तुम्हारे साथ मैं भी उसी रास्ते चलती हूँ उसी वक़्त. तुम्हारा पार्क, तुम्हारे लैम्पोस्ट्स, तुम्हारी वो बेंच...सबका हिस्सा हो गयी हूँ. तुम्हें कभी दिखी है परछाई सी तुम्हारे साथ चलते हुए उस रास्ते पर...वो मेरी प्रोजेक्शन है...मैं यहाँ होकर भी तुम्हारे साथ होती हूँ उन लम्हों में.

तुम तो जानते हो मुझे...जैसे कि कोई नहीं जानता...जैसे कि कोई नहीं समझता...तुमसे कौन सा रिश्ता है समझ नहीं आता...पर कुछ तो है कि तुम कहीं जाओगे नहीं इतना पता है. बस इतना प्यार मत करो मुझसे...बड़ी कमजोर सी हूँ, बहुत जल्दी प्यार हो जाता है मुझे. तुमसे प्यार हो गया न तो बाद में मुझसे झगड़ा करोगे...मुझे तुमसे झगड़ा करना एकदम अच्छा नहीं लगता. किसी बात में मेरा मन नहीं लगता फिर...न लिखने में न पढने में...न कुछ शेयर करने में. सारा ध्यान इसी बात पर कि तुमसे मुंह फुला के बैठना है...तुम तो जानते ही हो मुझे ज्यादा देर गुस्सा भी होना नहीं आता. मुझे जल्दी मना क्यों नहीं लेते हो तुम...भला इतनी देर किसी को गुस्सा थोड़े होने देते हैं. तुम एकदम दुष्ट और बदमाश हो!





अबरी आये न हम दिल्ली तो तुमरा कम्बल कुटाई कर डालेंगे...मन कर रहा है तुमसे खूब खूब सारा झगड़ा करने का...पागल लड़के, तुझे मालूम भी है...मुझे तुमसे प्यार हो गया है!

जैसे तुमसे प्यार करना...

हम अनंत के पीछे क्यूँ भागते हैं...भूत और भविष्य की कितनी अनिश्चितताएं हैं उसमें. बीते हुए कालखंड में से कौन सा लम्हा हमारे पीछे अभिमंत्रित सा हर अनुष्ठान में मौजूद रहेगा मालूम नहीं. वर्त्तमान जीते हुए हम कहाँ जान पाते हैं कि इसमें से कौन सा लम्हा यादों के लिए सहेजा जाएगा और कौन भूलने की अंतहीन गलियों में विलुप्त हो जाएगा. वर्तमान को जीते हुए भी हम कहाँ जानते हैं कि हमारा अतीत कैसा होने वाला है...फिर हम यादों को इतने करीने से लगाने के लिए इतने जतन क्यूँ करते हैं. आप कितना भी अच्छा कैटालोग कर लो, ये जानना नामुमकिन ही है कि जब बीते ज़ख्म उधेड़े जायेंगे तो दर्द कहाँ से उभरेगा.

याद की शक्ल कभी पहचानी नहीं होती...किस लम्हे में किसकी याद आये इसका भी कोई गणितीय फ़ॉर्मूला नहीं है...तो फिर क्यूँ मैं तुमसे जुड़ी रहना चाहती हों...हिचकियों से, शाम के रंग से, हर्फों से या कि एकदम ही सच कहूँ तो मन से...मेरा मन तुमसे इतने लम्बे अंतराल का बंधन क्यूँ मांगता है.
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तुम उन दरवाजों को क्यूँ खटखटाती हो जिसमें बाहर से ताला लगा हो...तुम्हें दिख रहा है कि वहां कोई नहीं है, वहां कभी कोई नहीं आएगा...वहाँ से वो जा चुका है फिर भी नहीं मानती...प्यार की मासूमियत के दिन ढल चुके हैं री लड़की पर तुमसे कौन प्यार करेगा कि तुम्हें तो खेलना भी नहीं आता...कितना भी तुम्हें इस खेल के नियम बता दूं तुम हमेशा भूल जाती हो और गलत इंसान से प्यार कर बैठती हो. मगर ओ काली आँखों वाली लड़की सच बताओ क्या तुमने खामोश रातों में बैठ कर वाकई कभी नहीं सोचा है कि शायद तुम ही गलत लड़की हो. तुम वो हो ही नहीं जिससे किसी को भी प्यार हो!

तुझे किसी ने बताया नहीं कि देवताओं के प्रेम निवेदन हमेशा अस्वीकृत कर देने चाहिए? तुझे क्यूँ लगता है कि किसी को तुझसे प्यार होगा...रूप की क्या कमी है स्वर्ग में...रम्भा, मेनका, उर्वशी...एक से एक अप्सराएं हैं...उन्हें नृत्य भी आता है और संगीत विधा भी. स्त्री के सारे गुण उनमें हैं...न वे कभी बूढी होयेंगी, न कभी उनका आकर्षण कम होगा...जो देवता ऐसी अप्सराओं के साथ रहते हैं उन्हें धरती की एक क्षणभंगुर नारी से क्यूँकर प्रेम होगा! ये आकर्षण है...जो उनके पास नहीं है उसका क्षणिक आकर्षण मात्र...तू इसमें अजर, अमर प्रेम की तलाश क्यूँ कर रही है.
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रात रात जागना...दिन दिन परेशां रहना...ये तो होना ही था...तुम्हें क्या लगता था इश्क बड़ी खूबसूरत चीज़ है...अब देखो...अब जियो...की सांस अटकी हुयी है न...अच्छा लगा अब? और किसी से कहोगी की टूट कर प्यार करो...

18 December, 2011

कॉफ़ी-बिस्किट, समोसे वगैरा वगैरा...

जरा सी, बस जरा सी आवाज़ की फाँक हाथ आई है...मज़ा भी उतने भर का है...आप कभी कॉफ़ी में डुबा कर बिस्किट खाते हैं? मैं खाती हूँ और इसका भी एक प्रोसेस है...बहुत दिन की प्रक्टिस के साथ ये परफेक्ट होता जाता है. वैसे तो कॉफ़ी अगर कैपचिनो मिल गयी तब तो आहा क्या मज़े वरना घर की खुद की बनायी हुयी कॉफ़ी भी चलती है. जो मुझे जानते हैं मेरे हाथ की कॉफ़ी के लिए कतल करने को तैयार है...अरे नहीं नहीं, किसी और का नहीं जी मेरा...मैं इतनी आलसी हूँ की मेरे से कॉफ़ी बनवाना अक्सर घर में कई सारे युद्ध एक साथ करवा देता है. उसपर सबको अलग अलग तरह की कॉफ़ी पसंद आती है. कुणाल को फेंट कर बनायी कॉफ़ी पसंद है...मुझे दालचीनी वाली कॉफ़ी...तो अगर मैं इस बात पर मान गयी हूँ कि कॉफ़ी बना ही दूँगी तो अगला युद्ध होता है कि किसके पसंद की कॉफ़ी बनेगी. वैसे तो कुणाल के पसंद की ही बनती है क्यों कि उसका लोजिक है कि मैं अपने पसंद की कॉफ़ी अकेले में बना के पीती ही हूँ...

कॉफ़ी...चोकलेट के बाद की मेरी सबसे पसंदीदा चीज़...उसमें दालचीनी के एक आध टुकड़े जादू जगा देते हैं...ये मिलीजुली खुशबू मुझे ऐसा लगता है कि मेरी खुद की है...यू नो...अगर मेरा सत्व निकला जाए तो वैसी ही कोई खुशबू आएगी. उसमें थोड़ा नशा है, थोड़ा  नींद से जागने का खोया सा अहसास...थोड़ा जिंदगी को स्लो करने का रिमोट और थोड़ा जीने का जज्बा...बंगलौर की हलकी ठंढ के दिनों में बालकनी का एक टुकड़ा आसमान कॉफ़ी के भरोसे ही पूरा लगता है. मेरी बालकनी में धूप नहीं आती...धूप के टुकड़े चारो तरफ बिखरे हुए रहते हैं...पड़ोसी की छत पर, दुपट्टे में टंके कांच से रेफ्लेक्ट होते हुए मेरी आँखों में भी पड़ते हैं कभी. बालकनी के रेलिंग इतनी ही चौड़ी है कि जिसपर एक कॉफ़ी कप रखा जा सके...ख्यालों में खोये हुए. मैं कभी कभी उस चार मंजिल से नीचे देखती हूँ और सोचती हूँ कि कप गिरा तो!

कॉफ़ी में बिस्किट डुबाने का एक पूरा रिचुअल है...जब कैफे कॉफ़ी डे के ऑफिस में काम करती थी...सबने आदत पकड़ ली थी. मेरी ऑफिस की दराज, घर के डब्बों में हमेशा मारी(Marie) बिस्किट रहते हैं. पहले एक बिस्किट लीजिये...उसके डायमीटर पर तर्जनी से एक अदृश्य सीधी रेखा खींचिए, जैसे कि बिस्किट को निर्देश दे रहे हों कि यहीं से टूटना है तुम्हें...फिर बिस्किट के दो विपरीत तरफ उँगलियों से पकड़िये और दोनों अंगूठे बिस्किट के मध्य  में रखिये...बिस्किट तोड़ते हुए प्रेशर का बराबर का डिस्ट्रीब्युशन होना जरूरी है...तो आधा प्रेशर अंगूठों पर बीच में और बाकी प्रेशर बाकी उँगलियों से यूँ लगाइए कि बिस्किट अन्दर की ओर टूट जाए. अगर आपने सारे स्टेप्स ठीक से फोलो किये हैं तो बिस्किट एक दो खूबसूरत अर्ध चंद्राकर टुकड़ों में टूट जायेगा...फिर आप उसकी तुलना चाँद या अपने महबूब के चेहरे से कर सकते हैं. थोड़ी प्रैक्टिस के बाद आपको बिस्कुट को दो एकदम बराबर हिस्सों में बांटने का हुनर आ जाएगा. ध्यान रहे, ये हुनर बच्चों के बीच में मारकाट होने से कई बार बचाता है.

कहानी यहाँ नहीं ख़त्म होती...बिस्किट के टुकड़ों को उँगलियों से हल्का सा झटका दीजिये, ठीक वैसे ही जैसे सिगरेट को देते हैं, ऐश गिराने के लिए...इससे बिस्किट के क्रम्बस बाहर ही गिर जायेंगे और आपकी कॉफ़ी बिस्किट खाने के बाद भी पीने लायक रहेगी. ये मेरा खुद का अविष्कार है...मैंने कितने लोगों को इस विधि से फायदा उठाते देखा है. अगर बिस्किट के क्रम्बस कॉफ़ी में नहीं गिरे तो आपकी कॉफ़ी का जायका भी नहीं गया और आपको बिस्किट खाने में भी मज़ा आया.

बिस्किट को कॉफ़ी में कितनी देर रखा जा सकता है इस गणित को फिगर आउट करना भी उतना जी जरूरी है...यहाँ टाइम फॉर व्हिच बिस्किट कैन बी डिप्ड इस डायरेक्टली प्रपोरशनल टु टेम्प्रेचर ऑफ़ कॉफ़ी...बहुत गर्म कॉफ़ी है तो बस डिप करके निकाल लीजिये और जैसे जैसे कॉफ़ी ठंढी हो रही है बिस्किट थोड़ी देर और रखा जा सकता है कॉफ़ी में. वैसे यही फंडा लगभग समोसे और चटनी में भी इस्तेमाल किया जाता है...या फिर जलेबी राबड़ी में :) कुछ दिन की प्रैक्टिस से आप इस फन में इस कदर माहिर हो सकते हैं कि सब आपसे सीखने को आतुर हो जाएँ जैसे मेरे ऑफिस में हुए थे. मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं...आप चाहें तो और टिप्स के लिए मुझसे संपर्क भी कर सकते हैं.

बात शुरू हुयी थी आवाज़ की एक फांक से...तो हुआ ये कि आज शाम बालकनी में एक बेहद हसीन आवाज़ की फाँक मिली...जाने कैसे, बिना उम्मीद के...तो इस हैप्पी सरप्राइज से ऐसा लगा कि कॉफ़ी मिल गयी हो गरमा गरम...मुझे ये भी लगा कि बहुत सीरियस लेखन हो रहा है...और हम एकदम सीरियसली मानते हैं कि चिरकुटपना इज द स्पाइस ऑफ़ लाइफ...तो मस्त समोसे खाइए...बिस्किट तोड़ने की कला में माहिर होईये...और जिंदगी में इन फालतू कामों के अलावा मज़ा क्या है. आप कभी मुझसे मिले तो मुझसे कॉफ़ी बनवा की पीना मत भूलियेगा...ऐसे कॉफ़ी पूरी दुनिया में नहीं मिलती, बिस्किट के लाइव डेमो के साथ :)

आज का प्रोग्राम समाप्त हुआ...हम आपको पकाने के लिए फिर हाज़िर होएंगे...तब तक के लिए नमस्कार. :)

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