16 December, 2011

दिल्ली की छत, ब्लू लेबल और दो लड़कियां

कोई बीस साल पुरानी दोस्ती थी उनकी और उसमें वो आज दस साल बाद मिल रही थीं...दो औरतें या कि लड़कियां, जैसा भी आपको कहने में सुविधा हो...

दिल्ली की एक बेहद सर्द सी रात थी...लड़की का घर एक चार मंज़िला इमारत के ऊपर कुछ असबेसटोस की शीट्स लगा कर बनाए एक कमरेनुमा मकान में था. इसे बरसाती या दुछत्ती कहते हैं. दिल्ली में वैसे भी घर ढूँढना बहुत मुश्किल है...या तो बेर सराय, जिया सराय जैसे मुहल्लों में दीमक के घरों जैसे कमरे जो कहीं अंतहीन अंधेरी गलियों में खुलते हैं या तो पॉश इलाकों में ऐसी बरसाती जिसमें रहने की जगह तो सही है पर उसमें जीना अपने आप में एक बहुत बड़ी जंग होती जाये हर रोज़.

गर्मियों में चारों तरफ से सूरज उस कमरे को किसी प्रेशर कुकर की मानिंद गरम कर देता था...दीवारें, छत सब कुछ धीपता रहता था और उसमें जिस दिन उसे घर पर रहना हो जीना मुहाल हो जाता. एक बड़ा सा देजेर्ट कूलर बमुश्किल कोई राहत दे पाता था...ऐसे कमरे में जीना उसे हर लम्हा उससे प्यार करने की याद दिलाता था...जानलेवा गरमियाँ और जानलेवा सर्दियाँ. सब होने पर भी वो कमरा उसे नहीं छोड़ता था तो शायद इसलिए कि कमरे के आगे का थोड़ा सा छत का हिस्सा उसके नाम लिखा था. उसकी अपनी बालकनी जिसमें से आसमान अधूरा या टुकड़ों में नहीं पूरा दिखता था औंधे कटोरे जैसा. चाँद सितारों और डूबते सूरज को देखने का मोह उसे कहीं और जाने नहीं देता...उनींदी शिफ्ट्स के बीच वो किसी शाम सूरज से मिलने का वक़्त निकाल लेती तो कभी चाँद से डेट पर जाने का वादा भी निभा ले जाती...इन दोनों से उसी बेतरह इश्क़ करने के बावजूद उसे बेवफ़ाई जैसा कुछ महसूस नहीं होता...कभी भी. इस बारे में सूरज या चाँद ने भी कभी उसे ताने नहीं मारे.

उसे क्या मालूम था कि इसी घर की किस्मत में वो क़यामत की मुलाक़ात भी लिखी है...उसकी एक बचपन की दोस्त थी, कुछ तीस साल की जिंदगी में दस साल का कुल जमा रिश्ता था और फिर २० साल लम्बा अंतराल...किस्मत ने उन्हें जोड़ा था और आज दोनों इस छत पर दिसंबर की किसी सर्द रात मिल रहीं थी...मकान मालिक अलग रहता था इसलिए लड़की को बहुत सी आज़ादियाँ मिली हुयी थीं उस घर में...इसमें कभी भी आना जाना सबसे जरूरी थी. गैर जरूरी चीज़ों में था व्हिस्की में कोहरा मिला कर पीना और कोहरे और सिगरेट के धुएं को आपस में गुन्थ्ते देखना...इसके अलावा कुछ ऐय्याशियाँ भी थीं जैसे कि लोहे की उस  भारी कड़ाही में अपनी अलग बोरसी जलाना...थोड़े कोयले और लकड़ियों से.

यहाँ से चूँकि किस्से में दो लड़कियां आने वाली हैं तो उनके नाम का पहला अक्षर ले लेते हैं कि इस कहानी के सभी किरदार नकली हैं...किसी का पूरा नाम लिख दिया तो उस नाम की कितनी लड़कियां उस नाम से खुद को जोड़ के देख लेंगी और इसमें लेखक की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी. जिसका घर है वो बेहद खूबसूरत है उसकी आँखें गहरी काली हैं और घने बाल कमर तक झूल रहे हैं...खुले बालों में कुछ पानी की बूँदें भी ठहरी हुयी दिखती हैं. चलो मान लेते हैं कि इस लड़की का नाम पी है...पी से पिया होता है, पिहू होता है, पियाली भी होता है...आप चाहो तो मान लो उसका नाम पियाली है...दूसरी का नाम स रखते हैं...सा से सारिका, सरगम, सांझ भी होता है तो आप मान लो उसका नाम सरगम है...उसकी आँखों में बड़ी वार्मथ है...गर्माहट समझते हैं आप...कॉफ़ी के कप वाली नहीं...व्हिस्की वाली...उसकी आँखें गहरे भूरे रंग की हैं, जिसमें आग का लपकना दिख जाता है कभी कभी. 

दोनों ने एक दूसरे को बहुत दिनों बाद देखा है दिल भरा हुआ है. स को पी का घर बहुत पसंद आया है. घर के हर हिस्से से पी की खुशबू आती है, चाहे वो बिखरी हुयी किताबें हों...सिगरेट के करीने से लगे खाली डब्बे हों कि उसका व्हिस्की ग्लास का कलेक्शन. कितना हसीन है कि जाड़ों की सर्द रात में खुले आसमान के तले बैठी हुयी हैं. कोहरा गिर रहा है...बहुत देर तक ख़ामोशी भी रही...और फिर पी ने ही कहना शुरू किया. पता है स मुझे लगता है शराब का आविष्कार किसी ईर्ष्यालु मर्द ने हम औरतों को देख कर किया होगा...आगे की थ्योरी है कि मर्द समझ ही नहीं सकते कि औरतें बिना पिए ही अपने दिल के सारे राज़ एक दूसरे के सामने कैसे कह देती हैं...मर्दों ने कई बार चाहा कि वो भी अपनी भावनाओं का इज़हार कर सकें पर उन्हें कहना ही नहीं आ पाया...फिर एक दिन एक बेहद इंटेलेक्चुअल मर्द ने शराब का अविष्कार किया कि इसे पी कर वो अपनी हर बात कह सकें. थ्योरी सही थी लेकिन कुछ मर्दों ने कहा कि उनके साथ ऐसा कुछ नहीं होता...कि वो पी कर भी वैसी ही हालत में रहते हैं जैसा कि बिना पिए...तो मर्दों की उस सभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ कि ऐसे मर्दों को बाकी मर्दों की भलाई के लिए स्वांग रचाना होगा. तब से ये उनका अपना सीक्रेट है जो किसी औरत को नहीं बताया जाएगा. 

स कहीं जादू में खोयी हुयी थी...उसे अपना पहला प्यार याद आ रहा था...वो भी कुछ ऐसी ही बहकी बहकी बातें किया करता था जो उसे कभी समझ नहीं आती थी. 'पी, तुझे कैसे पता ये थ्योरी?'. अब पी का दूसरा सबसे फेवरिट सेंटेंस था 'मुझे दारु पीने वाले मर्द बड़े पसंद हैं'. उसके पीछे की थ्योरी भी...जो लोग दारू पीते हैं वो बड़े खतरनाक टाइप के कांफिडेंट लोग होते हैं...और उससे बड़ी बात कि बड़े सच्चे होते हैं. उन्हें इस चीज़ से डर नहीं लगता कि जब वो आउट होंगे कोई उनके मन के अन्दर झाँक के देख लेगा...वो जैसे होते हैं खुद को बेहद प्यार करते हैं...या कमसे कम पसंद तो करते ही हैं. तुझे कभी हुआ है ऐसे लड़के से प्यार जिसे अपनी ड्रिंक बेहद पसंद हो? यार पीकर वो ऐसी अच्छी अच्छी बातें करता है कि बिना पिए कभी भी न करे. कभी कभार तो मुझे लगता है उन्हें हमेशा थोड़े नशे में ही होना चाहिए...ज्यादा अच्छे लगते हैं. ऐसे मर्द कितने रूखे से जीव होते हैं...किसी चीज़ में ज्यादा सोचना नहीं...अपना खाना वक़्त पे मिल जाए...ऑफिस दिन भर ठीक ठाक बीत जाए बस...इसी में खुश. पर उन्हें उसकी पसंद की शराब मिल जाए फिर देखो कैसे मौसम में रंग घुलता है...कैसे इश्क परवान चढ़ता है और अगर दर्द देखना है तो तब देखो कि कैसे इश्क में फ़ना होते हैं लोग. बिना किसी से कहे किस तरह टूटे हुए होते हैं. ये एक ऐसा वक़्त होता है जब वो सच में वल्नरेबल होते हैं. मुझे उनपर जितना तरस आता है उतना ही प्यार भी आता है. 

पी को सदियों से ऐसा कोई नहीं मिला था जिससे वो सारी बातें कर सके...लड़कियां उसकी दोस्त बनती नहीं थीं और लड़को को उससे प्यार हो जाता था...जिंदगी बड़ी तनहा थी. आज जैसे उसने खुद को ही पा लिया था...स की भी बातें थी बहुत...पर आज पी का मौसम था...बोले जा रही थी. स तू मुझसे ज्यादा मत मिला कर, मुझसे बात भी मत कर...मैं वैसी लड़की हूँ जिसे माएँ अपनी बड़ी होती बेटियों को बचा के रखती हैं कि बिगड़ न जाएँ...मैं हर चीज़ को करप्ट कर देती हूँ...ओक्सिजन हूँ ना...पर ये लोग जानते नहीं कि मैं न हूँ तो ये सांस भी न ले पाएं. सुलगती हुयी पी ने कश छोड़ा था तो धुआं भी एक पल ठहर कर उसके चेहरे का भाव देखने लगा था. स तो खैर वैसे भी आज कहानी ही सुनने आई थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये लड़की इतनी अकेली कैसे हो सकती है...उसने हमेशा पी को पढ़ा था...उसके शब्दों में, उसकी बातों में, उसकी अनगिन तस्वीरों में...हर जगह. पार्टियों की जान हुआ करती थी पी...उसके हिस्से वाकई इतनी तन्हाई है ये स को एकदम समझ नहीं आ रही थी. दो एकदम विपरीत स्वाभाव वाली लड़कियां एकदम एक सी तनहा कैसे हो सकती हैं. 


स चकित थी पी का चेहरा देख कर, उसमें कहीं कोई शिकवा, कोई गिला नहीं था. वो एक ऐसी लड़की का चेहरा था जिसने बेहद शिद्दत से जिंदगी को प्यार किया हो...बिना किसी अफ़सोस के. इश्क के कितने अनगिन किस्से थे पी के पास...और स के पास भी. आज इस बेहतरीन शाम के लिए ब्लू लेबल खोली गयी थी...और दो पैग बचे हुए थे अब...रात भी बर्फ पिघलने के रफ़्तार से ही ढल रही थी...सुबह के पहले की सबसे अँधेरी घड़ी थी. आग में थोड़ा धुआं धुआं सा था...रात भर रिपीट मोड में गा के शायद नुसरत साहब भी थक गए थे...ऐसे दो कद्रदान फिर जाने कब मिले, इसलिए उन्होंने शिकायत भी नहीं की थी...मार्लबोरो का नया पैकेट खोला जा रहा था...माहौल था कि जैसे कोई रेडियो का सिफारिशी प्रोग्राम ख़त्म होने को आ रहा हो...और आज की आखिरी फरमाइश झुमरीतलैय्या के फलाना साहब से...स ने सवाल पूछा...पी तू शादी किससे करेगी? पी ने व्हिस्की का ग्लास उठाया...उसमें आखिरी घूँट बाकी थी और पिघले हुए बर्फ के टुकड़े, बॉट्म्स अप मारा...आखिरी पैग बनाते हुए बोली...कोई होगा जो मेरे इस नीट व्हिस्की के लिए बर्फ के टुकड़े ला दिया करे फ्रिज से? जब भी मैं पीने बैठूं...ऐसा लड़का जिस दिन मिल जाएगा उससे शादी कर  लूंगी
-----
स का तो पता नहीं...बेचारी भली लड़की है, कहाँ से ऐसा लड़का ढूंढेगी...पर मैं, मैं तो लेखक हूँ ना...अपनी पी को ऐसे कैसे रहने दूं, उसे लिए ऐसा लड़का भी रचना पड़ेगा एक दिन. तब तक के लिए...अगर आप ऐसे किसी लड़के को जानते हैं तो बताएं. मैं पी से बात करुँगी. बस आज के एपिसोड में इतना काफी है. अगली बार कभी स की कहानी भी सुनाती हूँ. वैसे मैं लड़का होती तो मुझे पी से प्यार हो जाता? आपको हुआ क्या? 

ओ री सखी, जा महबूब के देश!

तुम किस देस के वासी हो? कहीं से तुम्हारा फोन नंबर मिलेगा? किसी से पूछूँ जो तुम्हें जानता हो...जो मेरे दरकते दिल पर हाथ रख के कहे, सखी री फ़िक्र न कर, तेरा महबूब इसी दुनिया में है...तो क्या हुआ अगर वो तुझसे बहुत बहुत दूर है...एक न एक दिन तू मिलेगी उससे...सखी जो बताये कि पुरवा पे उड़ कर मेरे दिल का हाल तुम तक पहुँच जाएगा...मेरी सखी जो कहे कि जान न दो, मर जाओगी तो प्यार कैसे करोगी उससे.

सखी जो कहे कि मेरी जान...मैं हूँ रे...मैं सम्हाल लूंगी तुझे, तू आगे बढ़, टूट कर प्यार कर...जब तेरा दिल टूटेगा तो मैं मरहम लिए आउंगी...मैं तेरे लिए हिज्र की किताबें और फिराक के गीत ढूंढ के दूँगी...मैं तेरे लिए वो आवाजें तलाश लाऊंगी जो तेरे टूटे हुए दिल को राहत दें...सखी री, तू कहाँ रे...कि तुम न होगी तो मैं कैसे प्यार में पडूँगी कि मैं तो जानती हूँ कि एक दिन महबूब नहीं रहेगा...वो चाँद सितारों के देश का मेरा महबूब है. पर तुम, तुम तो मेरी ही मिटटी की हो न...तुम तो रहोगी न मेरे पास...बोलो न..रहोगी न मेरे पास, हमेशा, हमेशा?

कहाँ हो री सखी...कि महबूब की गलियों में बड़ा छलावा है...कि मुझे सारे शहर एक से लगते हैं...तू कहाँ रे, तुझे तो उससे प्यार नहीं है...तुझे तो देख के पता चल पायेगा कि किस शहर में उसका बसेरा है. तू ढूंढ के ला दे न मुझे उसके मकान का पता कि इश्क में बावरी मेरी आँखें कुछ देख नहीं पा रही हैं...तू जायेगी तेरी आँखों में प्यार नहीं छलकेगा कि दुनिया उसकी दुश्मन हो जाए...मेरी कासिद बनोगी? उन तक पहुंचाना मेरे दिल का सारा हाल पर याद रखना री कि 'कहना गलत गलत'.

सखी रे...मुझे तो लगता भी नहीं कि कभी उनका दीदार होगा...तेरा गाँव महबूब के देश में ही है कहीं...तू मेरी आँखों से उसे देख आ...मुझे सारा हाल बयान कर देना कि मुझे लगे कि मैंने देख लिया है उसे...मैं तेरे रास्ते के लिए निमकी और ठेकुआ बाँध देती हूँ और थोड़ा सत्तू भी...इतने में तो तू उसके घर पहुँच जायेगी. उससे जा के कहना कि एक लड़की तेरे इश्क में पागल हुयी है...उसने मुझे भेजा है एक बार तुम्हें छू कर आने के लिए और कुछ मत कहना कि उसे मुझसे प्यार हो जाएगा तो कैसे जियेगा वो...चुप क़दमों से लौट आना...उसे कुछ जियादा मत बताना मेरे बारे में.

दुनिया इश्क से बहुत जलती है...तो देख लेना सखी, मेरे महबूब से अकेले मिलना...शाम के किसी वक़्त जब सूरज डूब चुका हो और चाँद के निकलने में देर हो थोड़ी...खुले आसमान के नीचे, जहाँ दीवारें न हों...ऐसी जगह मिलना.



ओ री सखी री...उसके देश से मेरे गाँव का सफ़र बहुत लम्बा है...पर तू ये सफ़र तय करना...और जब तेरी आँखों उसका हाल सुनकर मेरा जान देने को जी चाहे तो मेरे लिए कनेल के फलों को पीस कर जहर तैयार कर देना...जब मैं बिलकुल न जी पाऊं उसके बगैर तो मुझे चुप चाप मर जाने देना. मेरे लिए इतना करेगी न सखी?
बोल?

14 December, 2011

जिंदगी. बेरहम. जिंदगी.

तुम अपना प्यार सम्हालो बाबा...मुझसे  नहीं होगा...ऐसे तो मर जाउंगी...न खाया जाता है न पिया जाता है, कैसी कैसी तो तलब उठती है...कभी सिगरेट की तलब जागती है तो लगता है बड़के भैय्या जो ताक में नुका के रखे हैं उससे एक ठो निकाल के जला लें...तो कभी लगता है परबतिया के घर में जो ताड़ी उतर के आता है वही चढ़ा जाएँ. तुमरा प्यार एकदम्मे मेरा दिमाग ख़राब कर देगा...तुम्हारे शब्दों में कहें तो तुम्हारा प्यार मुझ अच्छी खासी लड़की को दीवानी बना डालेगा.

मत मिला करो अब मुझसे, फ़ोन भी मत किया करो और झूठ मत पूछा करो कि कैसी हूँ...अगली बार कह दूँगी 'मर रही हूँ जहाँ हो सब छोड़ कर आओ और मुझे बांहों में भर लो' तब क्या करोगे? आ पाओगे सब कुछ छोड़ कर बस एक बार मुझे बांहों में भरने के खातिर...और जो मान लो आ भी गए तो वापस कैसे जाओगे. शहर की गाड़ी तो दिन में एक्के बार आती है इधर गाँव में, रात बेरात परदेसी को कौन रुकने देगा अपने घर में.

नहीं करना मुझे तुमसे प्यार...ऐसे दिन भर सूली पर टंगे टंगे मर जाउंगी मैं...अभी पैर वापस खींचती हूँ...ये तुमने क्या कर दिया है मुझे...मुझे ऐसे जीना नहीं आता. मेरी सारी समझदारी, सारी होशियारी रखी रह जाती है. तुम कौन से देश में ये कैसा सम्मोहन रचते हो...होगे तुम बहुत बड़े जादूगर, मैं एक छोटे से गाँव की थोड़ी पढ़ी लिखी लड़की हूँ बाबा मुझे बहुत दुनिया की समझ नहीं है. मुझे बस इतना समझ आता है कि जब प्यार हो तो तुम्हें मेरे पास होना चाहिए.

ये कैसे जंगल में आग लगा कर छोड़ गए हो...वो देखो कैसे वनचंपा धू धू करके जल रही है, सुलगते चन्दन की चिता सी गंध तुम्हें विचलित नहीं करती? तुम ऐसे कैसे मुझे छोड़ जाते हो...तुम्हारा दिल कैसा पत्थर है कि नहीं पसीजता. कैसे जी लेते हो मेरे बगैर.

आज गाय के सानी में धतुरा था, मैंने देखा नहीं..कोई दिन धनिया की जगह धतूरे की चटनी पीस के खा लूंगी... किसी दिन बिच्छू चलता रहेगा देह पर और मैं उसके डंक को महसूस नहीं कर पाऊँगी कि तुम्हारे बिना ऐसे ही तो जल रही हूँ कि लगता है ऊँगली के पोर पोर से आग निकल रही हो...बीड़ी फूंकते हुए, कलेजा धूंकते हुए ऐसे ही जान दे दूँगी कि तुम्हें पता भी चल पायेगा!

मैं मर जाउंगी ओ रे बाबा! तुम्हें क्या बताऊँ...जाने दो मुझे, मुक्त करो...ये तिलिस्म में किसी और को बाँध लेना रे शहरी बाबू...बड़े निर्दयी हो तुम...मेरा जी जला के तुम्हारा मन नहीं भरता. अगली बार से मेरे लिए पलाश के फूल मत लाना...मेरा पूरा साल गुज़र जाता है फिर पलाश के इंतज़ार में. जो किसी साल तुम नहीं आये तो क्या करुँगी.

चले जाओ रे! तुम्हारे लाये पलाश सुखा के साड़ी रंगी थी...देखो पिछले मेले में वही पहने हुए तस्वीर खिंचाई थी...मेरे पास तुम्हारी यही एक चीज़ है. ये तस्वीर लो और चले जाओ. कभी वापस मत आना. अब बर्दाश्त नहीं होता मुझसे.









मत पूछो कि मुझे क्या चाहिए...तुम मेरा नाम लो बस उसी लम्हे...उसी लम्हे मर जाना चाहती हूँ. मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ...कसम से...मुझे और कुछ नहीं चाहिए...मैं मर जाना चाहती हूँ. बस. 

जब उँगलियों से उगा करती थी चिट्ठियाँ...

ये वही दिन थे
जब उँगलियों से उगा करती थी चिट्ठियाँ...
कि जब सब कुछ बन जाता था कागज
और हर चमकती चीज़ में
नज़र आती थीं तुम्हारी आँखें


ये वही दिन थे
जब मिनट में १० बार देख लेती थी घड़ी को
जिसमें किसी भी सेकण्ड
कुछ बीतता नहीं था
और मैं चाहती थी
कि जिंदगी गुज़र जाए जल्दी

ये वही दिन थे
दोपहर की बेरहम धूप में
फूट फूट के रोना होता था 
दिल की दीवारों से 
रिस रिस के आते दर्द को 
रोकने को बाँध नहीं बना था 

वही दिन 
कि जब फोन काट दिया जाता था
आखिरी रिंग के पहले वाली रिंग पर
कि बर्दाश्त नहीं होता
कि उसने पहली रिंग में फोन नहीं उठाया 

कि दिन भर 
प्रत्यंचा सी खिंची
लड़की टूटने लगती थी
थरथराने लगती थी 
घबराने लगती थी 

ये वही दिन थे
जब कि बहुत बहुत बहुत 
प्यार किया था तुमसे
और अपनी सारी समझदारियों के बावजूद 
प्यार बेतरह तोड़ता था मुझे

ये वही दिन थे
मैं चाहती थी
कि एक आखिरी बार सुन लूं
तुम्हारी आवाज़ में अपना नाम
और कि मर जाऊं
कि अब बिलकुल बर्दाश्त नहीं होता

तुम्हारे नाम चिट्ठी

हे इश्वर!

अखबारों में आया है कि आज तेरा एक कतरा मिला है तेरे जोगियों को...तेरी तलाश में कब से भटक रहे थे...तेरी तस्वीर भी आई है आज...बड़ी खूबसूरत है...पर यकीन करो, मेरे महबूब से खूबसूरत नहीं.

मेरा महबूब भी तुम सा ही है...उसके वजूद का एक कतरा मुझे मिल जाए इस तलाश में कपड़े रंग लिए जोगिया और मन में अलख जगा ली. सुबह उसके ख्यालों में भीगी उतरी है कि कहीं पहाड़ों पर बादल ने ढक लिया चाँद को जैसे...यूँ भी पहाड़ों में चाँद कम ही नज़र आता है जाड़े के इन दिनों...कोहरे में लिपटे जाड़े के इन दिनों.

ये भी क्या दिल की हालत है न कि तुम्हारी तस्वीर देख कर अपने महबूब की याद आई...बताओ जो ढूँढने से तुम भी मिल जाते हो तो मुझे वो क्यूँकर न मिल पायेगा. आज तो यकीन पक्का हुआ कि तुम हो दुनिया में...भले मेरी हाथों की पहुँच से दूर मगर कहीं तो कोई है जिसने तुम्हें देखा है...उन्ही आँखों से कि जिससे कोरा सच देखने में लोग अंधे हो जाते थे. तुम्हारा एक कतरा तोड़ के लाए हैं.

वैसा ही है न कुछ जैसे रावण शिव लिंग ले के चला था कैलाश से कि लंका में स्थापित करेगा और पूरे देवता उसका रास्ता रोकने को बहुत से तिकड़म भिड़ाने बैठ गए थे...और देखो न सफल हो ही गए. मगर जो मान लो ना होते तो मैं कहाँ से अपने महबूब की याद आने पर शंकर भगवान को उलाहना दे पाती कि हे भोला नाथ कखनS हरब दुःख मोर! मैं देखती हूँ कि आजकल मुझे याद तुम्हारी बहुत आती है...क्या तुमपर विश्वास फिर से होने लगा है? मेरे विश्वास पर बताओ साइंसजादों का ठप्पा कि तुम हो...जैसे कि मैं इसी बात से न जान गयी थी तुम्हारा होना कि दिल के इतने गहरा इतना इश्क है...

इश्क और ईश्वर देखो, शुरुआत एक सी होती है...इश्वर का मतलब कहीं वो तो नहीं जो इश्क होने का वर दे? हाँ मानती हूँ थोड़ा छोटी इ बड़ी ई का केस है इधर पर देखो न...अपना हिसाब ऐसे ही जुड़ता है. सुबह उठी तो मन खिला खिला सा था...सोचा कि क्यूँ तो महसूस हुआ कि जिंदगी में लाख दुःख हों, परेशानियाँ हों, कष्ट हों...मैं तुम्हें तब तक उलाहना नहीं देती तब तब प्यार है जिंदगी में.

आज सुबह बहुत दिन या कहो सालों बाद तुम्हारे प्लान पर भरोसा किया है...कि तुम्हारी स्कीम में कहीं कुछ सबके लिए होता है. अभी ही देखो, घर पर कितनी परेशानी है...पर शायद ऐसा ही वक़्त होता है जब मुझे तुम पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है. तुम मेरे इस भरोसे तो रक्खो या तोड़ दो...पर लगता तो है तुम कुछ गलत नहीं करोगे.

आज सुबह मन बहुत साफ़ है...जैसे बचपन में हुआ करता था...कोई दर्द नहीं, कोई ज़ख्म नहीं, कोई कसक नहीं. सोच रही हूँ कि वो जो अखबार में जो तस्वीर छपी है...उसमें कोई जादू भी है क्या? कि अपने महबूब की बांहों में होना ऐसा ही होगा क्या? कि हे ईश्वर तेरा ये कौन सा रूप है जिससे मैं प्यार करती हूँ? नन्हे पैरों से कालिया सर्प के फन पर नाचते हे मेरे कृष्ण...वो समय कब आएगा जब मैं तुम्हें सामने देख सकूंगी!

तुम्हारे प्यार में पागल,
पूजा 

12 December, 2011

दुनिया का सबसे झूठा वाक्य

दुनिया का सबसे ज्यादा झूठ बोलने वाला वाक्य ढूंढ रही थी...दुनिया यानि मेरी या मेरे जैसे और लोगों की दुनिया का सबसेट...आखिर दुनिया उतनी ही तो है न जितनी हम जानते हैं...बाकी दुनिया तो हम तक पहुँचती नहीं. कम्पीटीशन कड़ा है...बहुत से उम्मीदवारों को छांटने के बाद मुझे दो बहुत ही मजबूत उम्मीदवार दिखे...'मैं तुमसे प्यार नहीं करती' और 'मैं एकदम ठीक हूँ, मेरी चिंता मत करो'. एकदम अलग अलग समय और माहौल में बोले गए ये दो वाक्य अक्सर सबसे ज्यादा जो कहते दिखते हैं ठीक उससे उलट मतलब होता है इनका.

पहला वाला 'मैं तुमसे प्यार नहीं करती हूँ/आई डोंट लव यू' से तो बहुतों का पाला पड़ा होगा...गौर कीजिये कि ये वाक्य लड़कियों की ओर से कहा जा रहा है...ऐसा नहीं है कि लड़के ऐसा झूठ बोलते ही नहीं है पर अगर आप कोई रिसर्च करेंगे तो देखेंगे कि इस मामले में लड़कियां झूठ बोलने में लड़कों को काफी पीछे छोड़ती हैं. रिसर्च जाने दीजिये, अगर आप इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं और लड़की/महिला हैं तो आप जानती हैं उम्र के कितने पड़ाव पर कितनी सहेलियों के किस्से जब उन्हें किसी लड़के ने हिम्मत करके प्रपोज कर दिया था. याद कीजिए...हॉस्टल का कमरा हो कि शाम को मोहल्ले का पार्क जहाँ रोज की गपशप(गोसिप?) होती है.

लड़कियां वैसे भी लड़कों से ज्यादा बातें करती हैं...मुझे अपने हॉस्टल का कमरा याद आता है...जहाँ हर रात खाने के बाद तमीज का सेशन होता था जिसमें मेरे जैसे कुछ लोग होते थे जो अपनाप को बहुत समझदार समझते थे...ख़ास तौर से रिश्तों के मामले में. मुझे हमेशा लगता था कि मुझे दूर की चीज़ें भी महसूस होती हैं. ये लवगुरु टाईप का तमगा अर्न(earn...you have to earn a Bournville types) करना होता है. जब बहुत दिन तक आपकी दी हुयी मुफ्त की सलाह से लोगों का फायदा हो तो सम्मिलित रूप से लोग आपको ये महान उपाधि देते हैं. ये तब भी होता है जब कोई मुश्किल दौर से गुज़र रही हो और आप उसके मन को हूबहू समझ सकें और उसके मन मुताबिक कोई रास्ता निकल सकें. बहुत मुश्किल काम होता है ये...अपने फ्रीटाइम के इस उपयोग के कारण हमेशा से रिश्तों की कई गुत्थियाँ हमने अनुभव से सुलझाई हैं.

खैर...दिल्ली में तो काफी नोर्मल सी चीज़ थी पर पटना में प्यार वगैरह बड़ी आफत हुआ करती थी...किसी को जाने, देखे, मिले, समझे बिना लड़के प्रोपोज कर मारते थे और लड़कियां बेचारी मुश्किल में पड़ जाती थीं. सबको घर से धमकी आलरेडी मिली रहती थी लड़कों से ज्यादा बात वात मत करो टाइप्स...वैसे में कोई लड़का सीधे आ के बोल रहा है कि 'आई लव यू' तो अगर उसको पसंद भी करते हैं तो क्या कर सकते हैं. बेचारी लड़की दिल पर पत्थर रख के कहती थी 'मैं तुमसे प्यार नहीं करती हूँ'.

लड़की के ऐसा कहने के पीछे बहुत सारा लोजिक रहता था...लड़की सबसे पहले सोचती थी लड़के का टाइटिल क्या है...यानि कि हमारे कास्ट का है कि नहीं...पहला न तो वहीं से उपजता था...पटना में उस समय कास्ट का बहुत पंगा चलता था...तो अगर लड़का दूसरी जाति का है तो बिना सोचे समझे, प्यार को मौका दिए न कह दिया जाता था. अगर बमुश्किल लड़का आपकी जाति का निकला(जो कि कभी नहीं होता था...सब आपस में मैच ऑप्शन के टेबल की तरह इधर उधर हुए रहते थे) तो दूसरी परेशानी आती थी कि कोई जान लेगा तो क्या होगा. लड़के से मिलेंगे कैसे, कोचिंग बंद हो जायेगी...भाई रोज छोड़ने आएगा...मम्मी से डांट पड़ेगी...वगैरह. इन सबसे सबसे मुश्किल चीज़ होती थी कि मिलेंगे कहाँ...और दूसरा खतरा...किसी ने देख लिया तो. तो इन सब प्रक्टिकल कारणों से लड़कियां सीधे न कह लेती थीं. एक बार में झंझट ख़तम.

दुनिया का सबसे बड़ा झूठा वाक्य का दूसरा उम्मीदवार है 'मैं एकदम ठीक हूँ, मेरी चिंता मत करो'. ये वाक्य भी अधिकतर लड़कियां ही कहती हैं. इस वाक्य को कहने का एक और सिर्फ एक आशय होता है...कि मैं एकदम ठीक नहीं हूँ...थोड़ा मेरे और करीब आकर देखो कि मेरा दिल क्यूँ टूटा है...मैं क्यूँ बिखर रही हूँ...मुझे सम्हाल लो...मैं तुमसे इतना प्यार करती हूँ कि तुम्हें किसी तरह की परेशानी या दुःख न हो इसलिए कहती हूँ कि मैं ठीक हूँ. लड़की ऐसी अजीब शय होती है वो भी मुहब्बत में कि जान देने जा रही होगी और आप उससे पूछेंगे कि कैसी हो, मैं आ जाऊं तो कह देगी 'मैं एकदम ठीक हूँ, मेरी चिंता मत करो' इस वाक्य का हमेशा उल्टा मतलब होता है...डेंजर सिग्नल है एकदम ये वाला. इसको कभी भी इग्नोर नहीं करना चाहिए.


कैसा अजीब होता है न प्यार कि खुद मरे जा रहे हैं उसकी चिंता नहीं है मगर महबूब अगर पूछे कि कैसी हो तो एक शब्द नहीं निकलेगा कि आ जाओ, मर रही हूँ. ये कैसी फितरत है...प्यार का ये कौन सा पहलू है मुझे आज तक समझ नहीं आता. कि जब आपको उसकी सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है उस वक़्त आप चाहोगे कि वो खुद समझ जाए...बिना कहे हुए. इसलिए ये वाक्य बहुत खतरनाक है...इसका मतलब है कि आप जाओ, जहाँ भी है वो और उसे बाँहों में भर लो...लड़की बस इतना ही चाहती है.

कैसा होता है ये चाहना कि आप खुद कहो कि हाँ, अब चले जाओ, मैं ठीक हूँ जबकि दिल कहता है कि अभी कुछ देर और ठहर जाओ, दिल के टाँके कच्चे हैं...ज़ख्म थोड़ा भर जाने दो. उसपर जिंदगी ऐसी बेरहम है कि हालात ऐसे पैदा करती है कि वक़्त हमेशा कम पड़ता है...सोचो आप किसी आवाज़ को एक बार सुनने को तरस रहे हो...पर जानते हो कि वो ऑफिस में होगा...आप मेसेज करते हो...उधर से रिप्लाय आता है कि बीजी हूँ, बाद में फ़ोन करूँ...तुम ठीक हो न? लड़की क्या करेगी...करना चाहिए कि फ़ोन कर ले...एक मिनट की आवाज़ सुन कर रख दे...पर वो करेगी नहीं...वो जवाब देगी...कि वो ठीक है...उसकी चिंता एकदम मत करो. उसका दिल चाहेगा कि कहे कि ऑफिस छोड़ के अभी घर आ जाओ...मैं बहुत परेशान हूँ पर वो करेगी क्या...मेसेज करेगी, खाने में क्या बनवा लूं?

इन दोनों वाक्यों के पीछे की पूरी कहानी जानना बेहद जरूरी है...ये वाक्य कभी भी फेस वैल्यू पर नहीं लिए जा सकते. इनके पीछे बहुत कुछ होता है...अक्सर रोती आँखें और खाली, सूना सा दिल होता है...खैर.

तुमसे कुछ कहना था आज...मैं तुमसे प्यार नहीं करती...और मैं ठीक हूँ...मेरी बिलकुल चिंता मत करो! :)

PS: स्माइली से धोखा मत खाइए...वो बस ध्यान भटकाने के लिए है, मैं देख रही थी कि ऊपर के भाषण का कोई असर हुआ भी है कि एक स्माइली से आप भटक जायेंगे

दिल्ली मेरी जान...उफ्फ्फ दिल्ली मेरी जान!

वो कहते हैं तुम्हारे जन्म को इतने साल हो गए, उतने साल हो गए...मगर दिल्ली मेरी जान...मेरे लिए तो तुम जन्मी थी उसी दिन जिस दिन पहली बार मैंने तुम्हारी मिटटी पर पैर रखा था...उसी लम्हे दिल में तुम्हारी नन्ही सी याद का चेहरा उगा था पहली बार...वही चेहरा जो कई सालों तक लौट लौट उगता रहा पार्थसारथी के चाँद में.

तुम मुझमें किसी अंकुर की तरह उगी जिससे मैंने तब से प्यार किया जबसे उसके पहले नन्हे हरियाले पत्तों ने मेरी ओर पहली बार मासूमियत से टुकुर टुकुर देखा...तुम्हारी जड़ें मेरे दिल को अपने गिरफ्त में यूँ लेती गयीं जैसे तुम्हारी सडकें मेरे पांवों को...दूर दूर पेड़ों के बीच जेऐनयु में चलती रही और तुम मेरे मन में किसी फिल्म की तरह दृश्य, रंग, गंध, स्वाद सब मिला कर इकठ्ठा होती गयी.

अब तो तुम्हारा इत्र सा बन गया है, जिसे मैं बस हल्का सा अपनी उँगलियों से गर्दन के पास लगाती हूँ और डूबती सी जाती हूँ...तुमसे इश्क कई जन्मों पुराना लगता है...उतना ही पुराना जितना आरके पुरम की वो बावली है जिसे देख कर मुझे लगा था कि किसी जन्म में मैं यहाँ पक्का अपने महबूब की गोद में सर रखे शामें इकठ्ठा किया करती थी. पत्थर की वो सीढियां जो कितनी गहरी थीं...कितनी ऊँची और बेतरतीब...उनपर नंगे पाँव उतरी थी और लम्हा लम्हा मैं बुत बनती जा रही थी...वो तो मेरे दोस्त थे कि मुझे उस तिलिस्म से खींच लाये वरना मैं वहीँ की हो कर रह जाती.

तुम्हें मैं जिस उम्र में मिली थी तुमसे इश्क न होने की कोई वजह नहीं थी...उस अल्हड लड़की को हर खूबसूरत चीज़ से प्यार था और तुम तो बिछड़े यार की तरह मिली थी मुझसे...बाँहें फैला कर. तुम्हारे साथ पहली बारिश का भीगना था...आसमान की ओर आँखें उठा कर तुम्हारी मिटटी और तुम्हारे आसमान से कहना कि मुझे तुमसे बेपनाह मुहब्बत है.

आईआईएमसी की लाल दीवारें मुहब्बत के रंग में लाल थी...वो बेहद बड़ी इमारत नहीं थी, छोटी सी पर उतनी छोटी कि जैसे वालेट में रखा महबूब का पासपोर्ट साइज़ फोटो...कि जिसे जब ख्वाइश हो निकल कर होठों से लगा लिया और फिर दुनिया की नज़र से छुपा पर वापस जींस की पीछे वाली जेब में, कि जहाँ किसी जेबकतरे का हाथ न पहुँच सके. उफ़ दिल्ली, तुम्हें कैसे सकेरती हूँ कि तुम्हारी कोई तस्वीर भी नहीं है जिसे आँखों से लगा कर सुकून आये.

दिल्ली मेरी जान...तुम मेरी तन्हाइयों का सुकून, मेरी शामों की बेकरारी और मेरी जिंदगी का सबसे खुशनुमा पन्ना हो...तुमसे मुझे दिल-ओ-जान से मुहब्बत है और तुम्हें क्या बताऊँ कि कैसी तड़प है तुम्हारी बांहों में फिर से लौट आने की.

दिल्ली तेरी गलियों का, वो इश्क़ याद आता है...
पुराने फोल्डर्स में देखती हूँ तो एक शाम का कतरा मिला है...पार्थसारथी का...अपने लिए सहेज कर यहाँ लगा रही हूँ...गौर से अगर देखोगी तो इस चेहरे को अपने इश्क में डूबा हुआ पाओगी...और हालाँकि ये लड़की बहुत खूबसूरत नहीं है...पर इश्क करते हुए लोग बड़े मासूम और भले से लगते हैं.

दिल्ली मेरी जान...उफ्फ्फ दिल्ली मेरी जान!

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...