09 December, 2011

मौन की भाषा में 'आई लव यू' कहना...

कैसा होता होगा तुम्हें मौन की भाषा में 'आई लव यू' कहना...जब कि बहुत तेज़ बारिश हो रही हो और हम किसी जंगल के पास वाले कैफे में बैठे हों...बहुत सी बातें हो हमारे दरमियाँ जिसमें ये भी बात शामिल हो कि जनवरी की सर्द सुबहों में ये आसमान तक के ऊंचे पेड़ बर्फ से ढक जाते हैं.

एक सुबह चलना शुरू करते हुए जंगल ख़त्म न हो पर दिन अपनी गठरी उठा कर वापस जाता रहे...उस वक़्त कहीं दूर रौशनी दिखे और हम वहां जा के शाम गुजारने के बारे में सोचें. किसी ठंढे और शुष्क देश में ऐसा जंगल हो जिसमें आवाजें रास्ता भूल जाया करें. कैफे में गर्म भाप उठाती गर्म चोकोलेट मिलती है...कैफे का मालिक एक मझोले से कद का मुस्कुराती आँखों वाला बूढ़ा है...वो मुझसे पूछता है कि क्या मैं चोकलेट में व्हिस्की भी पसंद करुँगी...मेरे हाँ में सर हिलाने पर वो तुम्हारा ड्रिंक पूछता है...तुम उसे क्या लाने को कहते हो मुझे याद नहीं आता. शायद तुम हर बार की तरह इस बार भी किसी अजनबी से कहते हो कि अपनी पसंदीदा शराब लाये. लोग जिस चीज़ को खुद पसंद करते हैं, उसे सर्व करते हुए उसमें उनकी पसंद का स्वाद भी 'घुल जाता है.

उस अनजान देश में...जहाँ मैं तुम्हारे अलावा किसी को नहीं जानती...जहाँ शायद कोई भी किसी को नहीं जानता, वो बूढ़ा हमें बेहद आत्मीय लगता है. बाहर बेतरह बारिशें गिरने लगी हैं और ऐसा लगता है कि आज रात यहाँ से कोई और राह नहीं जन्मेगी. बारिश का शोर हर आवाज़ को डुबो देता है और मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे मैं सामने कुर्सी पर नहीं, तुम्हारे पास बैठी हूँ, तुम्हारी बाहों के घेरे में...जहाँ तुम्हारी धड़कनों के अलावा कोई भी आवाज़ नहीं है और वक़्त की इकाई तुम्हारी आती जाती सांसें हैं.

जब कोई आवाजें नहीं होती हैं तो मन दूसरी इन्द्रियों की ओर भटकता है और कुछ खुशबुयें जेहन में तैरने लगती हैं...तुम्हारी खुशबू से एक बहुत पुराना वक़्त याद आता है...बेहद गर्म लू चलने के मौसम होते थे...जून के महीने में अपने कमरे सोयी रहूँ और पहली बारिश की खुशबू से नींद खुले...तुम्हारे इर्द गिर्द वैसा ही महसूस होता है जैसे अब रोपनी होने वाली है और धान के खेत पानी से पट गए हैं. गहरी सांस लेती हूँ अपने मन को संयत करने के लिए जिसमें तुम्हारा प्यार दबे पाँव उगने लगा है.

मुझे आज शाम ही मालूम पड़ा है कि नीला रंग तुम्हें भी बेहद पसंद है...मैं अनजाने अपने दुपट्टे के छोर को उँगलियों में बाँधने लगी हूँ पर मन कहीं बंधता नहीं...सवाल पूछता है कि आज नीले रंग के सूट में तुमसे मिलने क्यूँ आई...मन का मिलना भी कुछ होता है क्या. सोचने लगती हूँ कि मैं तुम्हें अच्छी लग रही होउंगी क्या...वैसे ही जैसे तुम मुझे अच्छे लगने लगे थे, जब पहली बार तुम्हें जाना था तब से. आई तो थी यहाँ लेखक से मिलने, ये कब सोचा था कि उस शख्स से प्यार भी हो सकता है. सोचा ये भी तो कहाँ था कि तुम फ़िल्मी परदे के किसी राजकुमार से दिखोगे...या कि तुम्हारी आँखें मेरी आँखों से यूँ उलझने लगेंगी.

मैं अब भी ठुड्डी पर हाथ टिका तुमसे बातें कर रही हूँ बस मन का पैरलल ट्रैक थोड़ा परेशान कर रहा है. तुमसे पूछती हूँ कि तुम्हें उँगलियों की भाषा आती है क्या...और सुकून होता है कि नहीं आती...तो फिर मैं तुम्हारे पास बैठती हूँ और तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेती हूँ...हथेली के पीछे वाले हिस्से पर उँगलियों से लिखती हूँ 'I' और पूछती हूँ कि ये पढ़ पाए...तुम न में सर हिलाते हो...फिर मैं बहुत सोच कर आगे के चार अक्षर लिखती हूँ L-O-V-E...तुम्हें गुदगुदी लगती है और तुम हाथ छुड़ा कर हंसने लगते हो. मुझे लगता है कि जैसे मैं घर में बच्चों को लूडो खेलने के नियम सिखा रही हूँ, जानते हुए कि वो अपने नियम बना के खेलेंगे...आखिरी शब्द है...और सबसे जरूरी भी...तीन अक्षर...Y-O-U. तुम्हारे फिर इनकार में सर हिलाने के बावजूद मुझे डर लग जाता है कि तुम समझ गए हो.










तुमसे वो पहली और आखिरी बार मिलना था...वैसे हसीन इत्तिफाक फिर कभी जिंदगी में होंगे या नहीं मालूम नहीं...मैं अपनी रूह के दरवाजे बंद करती हूँ कि तुम्हारी इस एक मुलाकात के उजाले में जिंदगी की उदास और याद की तनहा शामें काटनी हैं मुझे. यकीन की मिटटी पर तुम्हारे हाथ के रोपे गुलाब में फूल आये हैं...इस खुशबू से मेरी जिंदगी खुशनुमा है कि मैंने तुमसे कह दिया है कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ. 

08 December, 2011

भूल तो नहीं जाओगी?

भूल जाउंगी तुम्हें...

जैसे लड़की भूलती है
सरस्वती पूजा के मंडप पर
रखना
आम के बौर 

जैसे मंदिर भूल जाए
सुबह सुबह की घंटी
और लड़की के कंठ में फूटता
अलौकिक प्रेम का कोई स्वर 

जैसे लड़की फिर से भूल जाए
गुरुवार को ओढ़ना 
अपना वासंती दुपट्टा
तुम्हारे प्यार में रंगने पर भी 

जैसे शिवरात्रि भूल जाए
भांग के नशे में
किसी लड़की का तुम्हें मांगना
व्रत न रखने के बाद भी 

जैसे सावन भूल जाए 
रचना तुम्हारे नाम की मेहंदी 
और झूले के 
आसमान तक की पींगें

जैसे शंख भूल जाए
पूजा ख़त्म होने का अंतिम नाद
आये हुए देवता
यज्ञभूमि में बस जायें 

जैसे आत्मा भूल जाए
जिस्म के किसी बंधन को
तुमसे मांग बैठे
तुम्हें पूरा का पूरा 


जैसे कौड़ियाँ भूल जायें 
गिनती हमारे साथ के सालों की
और तुम हमेशा के लिए 
हो जाओ मेरे 

07 December, 2011

होना तो ये चाहिए था कि इतने में तुम्हारी याद की आमद कमसे कम कल सुबह तक मुल्तवी हो जाए...

यूँ कहने को तो वो सारा सामान मौजूद था कि जिससे तुम्हारी याद न आये...कहा यूँ भी जा सकता है कि तुम बिन जीने का सारा सामान मौजूद था...एक मेरे जैसे ही स्माल साइज़ में व्हिस्की (JD- यही कहते हो न तुम जैक डैनयल्स को ?), दो अदद बोतल बीयर, चार-पांच फ्लेवर्स में बकार्डी ब्रीजर...औरेंज, ब्लैकबेरी, लाइम और जमैकन पैशन...रंग बिरंगी बोतलों में बंद जिंदगी के रंगों से फ्लेवर्स या कि तुम्हारी याद के रंगों के...मार्लबोरो लाइट्स...पसंदीदा लाइटर...अपनी कार और खुली सडकें...हाँ रॉकस्टार के गाने भी, सीडी में पहला गाना ही था...मेरी बेबसी का बयान है, बस चल रहा न इस घड़ी...होना तो ये चाहिए था कि इतने में तुम्हारी याद की आमद कमसे कम कल सुबह तक मुल्तवी हो जाए. बड़ी मेहनत से एक साथ ये सारी चीज़ें जुगाड़ी थीं...तुम्हारे आने के पहले इतनी तनहा तो कभी नहीं थी मैं.

तो कायदे से होना ये चाहिए था कि तुम्हारी आवाजों के चंद कतरे कतार में लगा दूं और बाकी खालीपन को शराब और सिगरेट के नशे में डुबो दूं...प्यार होता है तो सबसे पहले खाना बंद हो जाता है मेरा...सुबह से एक कौर भी निगल नहीं पायी हूँ...पानी भी गले से नहीं उतरता...ड्राइव करते हुए आज पहली बार सिगरेट पी...ओह्ह्ह क्या कहूँ तुमसे प्यार करना क्या होता जा रहा है मेरे लिए...एक खोज, एक तलाश की तरह है कि जिसमें मैं अपने अंधेर कुएं में सीढ़ियाँ लगा कर उतरने लगी हूँ.

पर तुम्हारी ये आवाज़ के कतरे भी दुष्ट हैं, तुम्हारी तरह. सच्ची में, कमबख्त बड़े मनमौजी हैं...एक तो नशे के कारण थोडा बैलंस वैसे भी गड़बड़ाया है उसपर ये कतरे पूरे घर में उधम मचाते घूम रहे हैं...किसी दिन तुम्हारे प्यार में घर जला बैठूंगी मैं...अपनी हालत नहीं सम्हलती उसपर सिगरेट की मनमर्जी...उँगलियों से यूँ लिपटी है कमज़र्फ कि जैसे तुम्हारा हाथ थाम किसी न ख़त्म होने वाली सड़क पर चल रही हूँ.

पैग बना रही हूँ...बर्फ के टुकड़े खाली ग्लास में डालती हूँ तो बड़ी महीन सी आवाज़ आती है...जैसे शाम बात करते हुए तुमने अचानक से कहा था 'कितनी ख़ामोशी बिखर गयी है न!'...ये कैसी ख़ामोशी है कि चुभती नहीं...पिघलती है, कतरा कतरा...जैसे मैं पिघल रही हूँ...जैसे बर्फ पिघल रही है व्हिस्की में डूबते उतराते हुए. ग्लास पहले गालों से सटाती हूँ...पानी की ठंढी बूँदें चूम लेती हैं...कि जैसे पहाड़ों से उतर कर तुम आते हो और शरारत से अपनी ठंढी हथेलियों में मेरा चेहरा भर लेते हो...खून बहुत तेजी से दौड़ता है रगों में और कपोल दहक उठते हैं तुम्हारे होठों की छुअन से. उसपर तुम छेड़ देते हो कि तुम्हें शर्माना भी आता है!

तुमने किया क्या है मेरे साथ? मुझे लगता था कि जितनी पागल मैं आलरेडी हूँ, उससे आगे कुछ नहीं हो सकता  पर जैसे हर शाम कई नए आयाम खुल जाते हैं मेरे खुद के...जिंदगी उफ़ जिंदगी...इश्क का ऐसा रंग बचा भी है मुझे कब मालूम होना था. हर शाम ग्लास में एक आखिरी घूँट छोड़ देती हूँ...तुम कहोगे कि शराब की ऐसी बर्बादी नहीं करते...पर जानां, तुम नहीं समझोगे हर शाम उम्मीद करना क्या होता है...कि आखिरी घूँट तक शायद तुम आ जाओ इस इंतज़ार में रात कट जाती है.



इस सलीकेदार दुनिया में तुम्हें इसी पागल से प्यार होना था...अब? क्या करोगे? जाने दो इतनी बातें कि इनमें उलझ गए तो जिंदगी ख़त्म हो जायेगी और तुम्हें पता भी न चलेगा...जहाँ हो अपना ग्लास उठाओ...आज अलग अलग शहर में, एक आसमान के नीचे बैठ चलो इश्क के नाम अपने जाम टकराते हैं, चाँद गवाही देगा कि जिस लम्हे तुमने अपना जाम उठाया था, उसी लम्हे मैंने भी...चीयर्स!

06 December, 2011

उसकी आँखों का इंतज़ार अब भी कच्चा ही था...

फिर उसने कच्ची इमली दांतों से काट कर उसका खट्टापन ख़त्म होने के पहले आँखें मींचे मीचे मीचे ही पक्का वादा किया की वो आज के बाद उसे भूल जायेगी, एकदम से पक्का भूल जायेगी. यह कहते हुए उसकी आँखें बंद थीं और खट्टापन इतना था कि हमेशा की तरह उसे कुछ और सूझ नहीं रहा था...भिंची हुयी आँखों से कुछ दिख भी नहीं रहा था...और वादा उस छोटे से पल में ही मांग लिया गया था...गोया कि लड़के को पता था की आँखें खुलते ही लड़की उसकी कोई बात नहीं मानने वाली...और लड़की ने आँखें ऐसे भींची थीं जैसे सब सपना हो और आँखे खोलते ही पहले जैसी हो जायेंगे चीज़ें.

लड़की को चिंता इस बात की ज्यादा थी कि उसके चले जाने के बाद टिकोले के मौसम में सबसे पहले टिकोले कौन ला के देगा...लड़का जानता नहीं था कि उसका सबसे बड़ा कॉम्पिटिशन बाकी लड़के नहीं, टिकोले और इमलियाँ हैं...वो शायद लड़की से इतना बड़ा वादा करवाता भी नहीं. कौन सा हमेशा के लिए जा रहा था...डिफेन्स अकेडमी में भी छुट्टियाँ होती थी, वो भी बाकी कॉलेज के लड़कों की तरह घर आता. पर लड़के के मन में जाने क्या हुआ कि उसने बंद आँखों वाली लड़की से वादा मांग लिया. वैसे भी जब वो इमली या टिकोले खा रही होती थी उससे कुछ भी मांग लो मिल जाता था...उसकी धानी चूनर में जड़ा शीशा हो कि शहर से आई नयी कलम.

लड़की का नाम भी ऐसा था कि कहीं भूलती नहीं थी...जुगनू...किताबों में से उजाले की तरह झाँकने लगती थी. ऐसे में वो पढ़ाई कैसे करता. उसने पहले तो सोचा था कि जुगनू को कहेगा उसे चिट्ठियां लिखती रहे पर जुगनू का कभी पढ़ाई में मन लगे तब तो, सारे वक़्त इधर उधर दौड़ती मिलती थी...कच्चे अमरुद हों, आम के बौर आये हों, पेड़ में नयी नारंगी फली हो या कि अनार का लाल फल झाँक रहा हो उसे तो सब पेड़ों के सारे फल  याद रहते थे. इसके साथ उसे ये भी तो याद रहता था कि कब गाँव से कुछेक किलोमीटर वाली पक्की सड़क पर फ़ौज का ट्रक जाता था...उसे शायद याद नहीं रहता था, बस उसे पता चल जाता था...और फिर जुगनू उसका हाथ पकड़े मेड़ पर दौड़ती चलती थी...उसे बस ट्रक को देख कर हाथ हिलाना होता था.

वैसे तो पूरे गाँव को यकीं था कि जुगनू का फौजी भाई एक दिन लौट आएगा कहीं से पर सबसे ज्यादा यकीन जुगनू को था की भैय्या वापस आएगा. आश्चर्य ये था कि जुगनू को हर फौजी उसका भाई या भाई का दोस्त लगता था और वो पूरे मन से हर साल अनगिन राखियाँ भेजती थी, बहुत सारे पतों पर...जिन जिन पतों पर उसके भाई की पोस्टिंग थी, उन सभी पतों पर.

लड़का जानता था कि जुगनू इंतज़ार कर सकती है...पर वो नहीं चाहता था कि उसके खो जाने पर जुगनू की चिट्ठियां कोई और पढ़े...उसने जुगनू को तब भी देखा है जब कोई और नहीं देखता. गाँव में तो कोई यकीन ही न करे कि जुगनू रोती भी है, सब उसे बस हमेशा उधम मचाते और पेड़ों से भगाते ही रहते हैं...इसके अलावा भी कोई जुगनू है जो कितनी बार पेड़ की फुनगी के पास कहीं देखती है की जितनी दूर तक दिख रहा है वहां पर उसके भैय्या की वर्दी दिखाई पड़ी या नहीं...सिर्फ लड़के ने जुगनू का इंतज़ार देखा है. उसकी अधीरता...उसका हर शाम उदास होना देखा है.

जिस दिन जुगनू को बताया कि वो डिफेन्स अकैडमी जा रहा है, जुगनू की आँखें चमक उठी थीं...उसे जाने कैसे तो लगा था कि लड़का पक्का भैय्या को कहीं से ढूंढ लाएगा...या कोई अन्दर की बात बताएगा जो उसे कोई नहीं बताता...कुछ समझाएगा जो बाकी लोगों को समझ नहीं आता. लड़का घबराता था...जुगनू का दिल जाने कैसा तो होगा...उसे अकेले छोड़ने पर परेशान भी हो रहा था...पर फिर उसने जुगनू से वादा ले लिया था कि वो उसे भूल जायेगी, उसे ढूंढेगी नहीं, उसे चिट्ठियां भी नहीं लिखेगी.

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बहुत साल हुए जब जुगनू उसे दिखी...उसकी आँखों का इंतज़ार अब भी कच्चा ही था...आर्मी में डॉक्टर थी वो. जाने कैसे समय में इतना पढ़ लिया उसने कि AFMC की उतनी कठिन परीक्षा पास कर डॉक्टर बन गयी. लड़का मानता ही नहीं कि वो जुगनू है...शाम के धुंधलके में उस बहुमंजिली बिल्डिंग की छत पर एक आकृति दिखी थी उसे...कुछ बहुत जाना पहचाना था उसमें तो वो कुछ देर रुक गया. सिगरेट जलने की गंध से पलटा था तो जुगनू की आँखें नज़र आई थीं, लाइटर की रौशनी में.

दो आँखों में दो इंतज़ार पल रहे थे...दोनों इंतज़ार उतने ही सच्चे थे...लड़के ने आगे बढ़ कर जुगनू का एक इंतज़ार तो ख़त्म कर दिया...उस बात को भी बहुत साल हुए...दोनों के इर्द गिर्द एक घर उग आया...घर में खुशियाँ, गीत, डांस, पार्टियाँ सब आने लगी बारी बारी से. दुनिया का हिसाब किताब चलता रहा...सियासत न बदली थी, न बदली.

बहुत साल हुए...जितने में सब ख़त्म हो जाने लगा था...हाँ लेकिन दूसरा इंतज़ार अब भी दोनों बाँट कर करते हैं...

या फिर कहरवा - धा-गे-न-ति-नक-धिन...

तुम वहाँ से लौटा लाओ मुझे जहाँ से दुनिया ख़त्म होती है...उस परती जमीन पर पैर धरने से रोको कि वहाँ सदियों सदियों कुछ भी नहीं उगा है...वहाँ की धरती दरकी हुयी है और दरारें खूबसूरत पैरों में बिवाइयाँ डाल देती हैं...वहाँ बहुत धूल है और पानी का नामो निशान नहीं...ऐसी जमीन पर खो गयी तो कहीं नहीं जा पाऊँगी फिर...उजाड़ देश में जाके सारी नदियाँ सूख जाती हैं...मुझे लौटा लाओ जमीन के उस आखिरी छोर से कि मैं सरस्वती नहीं होना चाहती...मैं अभिशप्त जमीन के नीचे नहीं बह सकती...मुझे लौटा लो, मेरा हाथ पकड़ो...वो बहुत खतरनाक रास्ता है...वहाँ से लौटना नहीं होता.

मेरी बाहें थामो कि आज भी पहाड़ों की गहराई मुझे आमंत्रण देती है...मुझे पल भर को भी अकेला मत छोड़ो कि तुम नहीं जानते कि इन आसमान तक ऊँचे पहाड़ों के शिखरों को देखते हुए कब मैं इन सा हो जाना चाहूंगी...तुम सेकण्ड के उस हजारवें हिस्से में बस मेरे दुपट्टे का आखिरी छोर पकड़ पाओगे कि तुम भी गुरुत्वाकर्षण के नियम को अच्छी तरह समझते हो...तुम्हें पता होता कि नीचे जाने की रफ़्तार क्या होगी...बहुत उंचाई से जब नदी गिरती है तो प्रपात हो जाती है...पर तुम भी जानते हो कि मैं नदी नहीं हूँ पर पहाड़ों से गिरना वैसे ही चाहती हूँ...मैं वहाँ से गिरूंगी तो मिटटी में लुप्त हो जाउंगी...फिर सदियों में कहीं सोता फूटेगा पर अभी का मेरा पहाड़ी नदी का अल्हड़पन नहीं रहेगा उसमें...

न ना, मेरी कान्गुरिया ऊँगली को अपनी तर्जनी में फँसाये रहो कि उतना भर ही बंधन होता है जिंदगी से बंधा हुआ...मुझे छुओ कि मुझे अहसास हो कि मेरा होना भी कुछ है...सड़क पार करते हुए कभी भी मेरा हाथ मत छोड़ो कि मुझे हमेशा से तेज़ रफ़्तार दौड़ती चीज़ें आकर्षित करती हैं. कभी देखा है मंत्रमुग्ध सी गुजरती ट्रेन को...पटरियों पर कैसी धड़-धड़ गुजरती है कि जैसे एक्सपर्ट कुक किचन में सब्जियां काटता है...खट-खट-खट...क्या लाजवाब रिदम होती है...जैसे तबले पर तीन ताल बज रहा हो...या फिर कहरवा - धा-गे-न-ति-नक-धिन...धा-गे-न-ति-नक-धिन. देखा है कैसे उँगलियाँ तबले पर के कसे हुए चमड़े पर पड़ती हैं...क्षण का कौन सा वां हिस्सा होता है वो? फ्रैक्शन ऑफ़ अ सेकण्ड...कैसा...कैसा होता है कि एकदम वही आवाज़ आती है...देखो न मेरी आँखों में वैसी ही हैं...सफ़ेद और फिर बीच में काली. पलक झपकने में भी एक ताल होता है, एकदम ख़ामोशी में सुनोगे तो सुनाई देगा...

मेरी आवाज़ तुम्हें तरसती है कि जैसे कैमरा की आँख पल पल घटती जिंदगी में से किसी क्षण को...कहाँ बाँध लूं, कहाँ समेट लूं...कैसे कैसे सहेज लूँ इस छोटी सी जिंदगी में तुम्हें...और कितना सहेज लूँ कि हमारे यहाँ तो कहते हैं कि मरने के बाद भी सब ख़त्म नहीं होता...उसके बाद कुछ और ही शुरू होता है...फिर हम ये झगड़ा क्यूँ करते हैं कि ये मेरा कौन सा जन्म है और तुम्हारा कौन सा...तुम्हें भी एक जिंदगी काफी नहीं लगती न?

तुम मुझे वहाँ से लौटा लाओ जहाँ दुनिया ख़त्म होती है...

लौट आने को बस सादा कागज़ होता है...कभी कभी वो भी नहीं

स्ट्रगलिंग राइटर को देखा है? किसी शहर में उसके लिए कभी कोई जगह नहीं रहती...लेखक स्वाभाव से आवारा होता है इसलिए उसे हमेशा लौट आने के लिए एक जगह चाहिए होती है, एक कोना, एक कमरा, एक बिस्तर जिसे वो घर कह सके. अगर उसके पास लौट आने को आसरा नहीं होगा तो उसकी यात्राएं अनंत तक फैलती जायेंगी और एक वक़्त ऐसा भी आएगा कि जब उसके पास लौट आने की इच्छा ही नहीं बची होगी.

राइटर मकान मालिक से इल्तिजायें करता है, आंटी प्लीज थोड़ी सी जगह चाहिए रहने के लिए...बरसाती में रह लूँगा...आपको कभी कोई तकलीफ नहीं होगी...न सही ये बरामदा ही घेर कर वो कोने वाली जगह मुझे दे दो...एक गद्दा और कुछ किताबें...बस इससे ज्यादा कुछ नहीं है मेरे पास. प्लीज आंटी...घर पर आपकी भी हेल्प कर दिया करूँगा...प्लीज आंटी प्लीज...थोड़ी सी तो जगह की बात है, आप इतने बड़े घर में अकेले बोर भी हो जायेंगी...मुझे गिटार बजाना आता है, बहुत अच्छे से...आपकी पसंद के गाने बजाऊंगा. मदर प्रोमिस.

रिश्ते भी कभी कभी ऐसे हो जाते हैं...कहने में दर्द होता है मगर हम जानते हैं कि रिश्ते में हाशिया भर को ही मिले, हमें जीने के लिए चाहिए होता है. आजादी की कीमत तभी है जब कहीं न कहीं, छोटा सा ही सही, बंधन हो. There is nothing like absolute freedom. पूरी तरह से बंधनमुक्त होने पर हम अपनी आजादी तक एन्जॉय नहीं कर पाते...मन जो होता है न, वही मांगता है जो उसे नहीं मिलता...तो जब आपको बंधन नहीं मिलते आप बंधन की ओर भागते हो. कहीं कोई एक हो, जो आपको बाँध के रख सके...अपनी मर्जी से मोड़ सके, तोड़ सके...दुःख पहुंचा सके.

हम लाख खुद को तटस्थ करना चाहें, मन का एक कोना हमेशा छीजता रहता है...मन तब तक खुला है जब तक कोई कहे कि तुम्हारी सीमा आसमान है...किसी के कहे बिना इस कथ्य का होना भी नहीं होता...वैसा ही है जैसे हनुमान जी के पास बहुत सी शक्तियां थी, पर जब तक उनको कोई याद नहीं दिलाता उन्हें पता ही नहीं था कि वो क्या क्या कर सकते हैं.

बड़े साइंटिस्ट लोग रिसर्च कर के कह रहे हैं कि हमें जो दिखता है  इसलिए नहीं कि वो है...उसका होना इसलिए है की उसे देखने वाला कोई है...उस तरह से सच तो फिर कुछ भी नहीं रहा...उस तरह से तो फिर जो मैंने देखा वो सच...तो सबका सच अलग अलग होगा...और होता भी तो है. उफ्फ्फ!

हाशिया...गुम हो जाएगा ये भी धीरे धीरे...कागज़ ख़त्म हो रहा है, कलमें और दवात भी...और इसी के साथ एक पूरी प्रोसेस लुप्त हो रही है. लिखना सिर्फ शब्दों को सकेर देना नहीं है...लिखने में आता है जबान पे घुलता सियाही का स्वाद...आँखों से शब्दों को पीना...और सफ़ेद कागज़ का आमंत्रण...कुछ लिखने का, कुछ गढ़ने का...कुछ बनने का. एक ऐसी दुनिया रचने का जिसमें सब कुछ लेखक ही है पर एक परदे के पीछे. एक नाम लिखते ही किरदार जन्म ले लेता है और उसके साथ ही जन्मता है एक पूरा संसार...लेखक इसलिए तो भगवान् से कम नहीं होता.

राइटर के पास लौट आने को बस सादा कागज़ होता है...कभी कभी वो भी नहीं क्यूंकि उसमें तुम्हारा चेहरा उग आता है...तुम...तुम...तुम...जिस दिन मैं इस 'तुम' की परिभाषा लिख लूंगी, उस दिन मेरी कहानी पूरी हो जायेगी.

ओह! मेरी उँगलियाँ ठंढ से अकड़ रही हैं, अभी तो शुरूआती दिसंबर है...पूरा जाड़ा आना बाकी है. तुम्हारे पास लाइटर है न, जरा मेरी उँगलियाँ सेक लेने दो...एक आखिरी चिट्ठी लिखनी है तुम्हें. 

05 December, 2011

मुझे/तुम्हें वहीं ठहर जाना था

कसम से तुम्हारी बहुत याद आती है, जितना तुम समझते हो और जितना मैं तुमसे छिपाती हूँ उससे कहीं ज्यादा. मैं अक्सर तुम्हारे चेहरे की लकीरों को तुम्हारे सफहों से मिला कर देखती हूँ कि तुम मुझसे कितने शब्दों का झूठ बोल रहे हो...तुम्हें अभी तमीज से झूठ बोलना नहीं आया. तुम उदास होते हो तो तुम्हारे शब्द डगर-मगर चलते हैं. तुम जब नशा करते हो तो तुम्हारे लिखने में हिज्जे की गलतियाँ बढ़ जाती हैं...मैं तुम्हारे ख़त खोल कर पढ़ती हूँ तो शाम खिलखिलाने लगती है.

वो दिन बहुत अच्छे हुआ करते थे जब ये अजनबीपन की बाड़ हमारे बीच नहीं उगी थी...इसके जंग लगे लोहे के कांटे हमारी बातों के तार नहीं काटा करते थे उन दिनों. ठंढ के मौसम में गर्म कप कॉफ़ी के इर्द गिर्द तुम्हारे किस्से और तुम्हारी दिल खोल कर हंसी गयी हँसी भी हुआ करती थी. लैम्पोस्ट पर लम्बी होती परछाईयाँ शाम के साथ हमारे किस्सों का भी इंतज़ार किया करती थी. तुम्हें भी मालूम होता था कि मेरे आने का वक़्त कौन सा है. किसी को यूँ आदत लगा देना बहुत बुरी बात है, मैं यूँ तो वक़्त की एकदम पाबंद नहीं हूँ पर कुछ लोगों के साथ इत्तिफाक ऐसा रहा कि उन्हें मेरा इंतज़ार रहने लगा एक ख़ास वक़्त पर. मुझे बेहद अफ़सोस है कि मैंने घड़ी की बेजान सुइयों के साथ तुम्हारी मुस्कराहट का रिश्ता बाँध दिया और मोबाईल की घंटी का अलार्म.

वक़्त के साथ परेशानी ये है कि ये हर शाम वहीं ठहर जाता है...मैं घड़ी को इग्नोर करने की पुरजोर कोशिश करती हूँ पर यकीन मानो मेरे दोस्त(?) मुझे भी उस वक़्त तुम्हारी याद आती है. कभी कभी छटपटा जाती हूँ पूछने के लिए...कि तुम ठीक तो हो...तुम्हारा कहना सही है, तुम्हारी फ़िक्र बहुत लोगों को होती है...इसी बात से इस बात की भी तसल्ली कर लेती हूँ कि जो लोग तुम्हारा हाल पूछते होंगे वो वाकई तुम्हारा ध्यान रखेंगे, मेरी तरह दूर देश में बैठ कर ताना शाही नहीं चलाएंगे. मुझे माफ़ कर दो कि मैंने बहुत सी शर्तें लगायीं...बहुत से बंधन बांधे... तुम कहीं बहुत दूर आसमानों के देश के हो, मुझे जमीनी मिटटी वाली से क्या बातें करोगे. मैं खामखा तुम्हें किसी कारवां की खूबसूरत बंजारन से शादी कर लेने को विवश कर दूँगी कि इसी बहाने तुम कहीं आस पास रहोगे.

तुम आसमानों के लिए बने हो मेरे दोस्त...अच्छा हुआ जो हमारी दोस्ती टूट गयी. इसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके लिए दो लम्हा भी रुका जाए...कई बार तो मुझे अफ़सोस होता है तुम्हारा वक़्त जाया करने के लिए. तुम्हारी जिंदगी में बेहतर लोग आ सकते थे...बेहतर किताबें हो सकती थीं, बेहतर रचनायें लिखी जा सकती थीं. तुम उस वक़्त का जाहिर तौर से कोई बेहतर इस्तेमाल कर सकते थे...तुम्हारे दोस्त कुछ बेहतर लोग होने चाहिए...मैं नहीं...मैं बिलकुल नहीं. तुम कोई डिफेक्टिव पीस नहीं हो कि जिसे सुधारा जाए...मैं तुम्हें बदलते बदलते तोड़ दूँगी, मैं अजीब विध्वंसक प्रवृत्ति की हूँ.

तुम्हें पता है लोग कब कहते हैं की 'मुझसे दूर रहो'?
जब उन्हें खुद पर विश्वास नहीं होता...जब वो इतने कमजोर पड़ चुके होते हैं कि खुद तुमसे दूर नहीं जा सकते...तब वे चाहते हैं कि तुम उनसे दूर चले जाओ.


आज बशीर बद्र का एक शेर याद आया तुम्हारी याद के साथ...
मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है 


मैं तुम्हारे बिना जीना सीख रही हूँ, थोड़ी मुश्किल है...पर जानते हो न, बहुत जिद्दी हूँ...ये भी कर लूंगी. 

हाँ, एक बात भूल गयी...

तुम मुझसे दूर ही रहो!


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