05 December, 2011

मुझे/तुम्हें वहीं ठहर जाना था

कसम से तुम्हारी बहुत याद आती है, जितना तुम समझते हो और जितना मैं तुमसे छिपाती हूँ उससे कहीं ज्यादा. मैं अक्सर तुम्हारे चेहरे की लकीरों को तुम्हारे सफहों से मिला कर देखती हूँ कि तुम मुझसे कितने शब्दों का झूठ बोल रहे हो...तुम्हें अभी तमीज से झूठ बोलना नहीं आया. तुम उदास होते हो तो तुम्हारे शब्द डगर-मगर चलते हैं. तुम जब नशा करते हो तो तुम्हारे लिखने में हिज्जे की गलतियाँ बढ़ जाती हैं...मैं तुम्हारे ख़त खोल कर पढ़ती हूँ तो शाम खिलखिलाने लगती है.

वो दिन बहुत अच्छे हुआ करते थे जब ये अजनबीपन की बाड़ हमारे बीच नहीं उगी थी...इसके जंग लगे लोहे के कांटे हमारी बातों के तार नहीं काटा करते थे उन दिनों. ठंढ के मौसम में गर्म कप कॉफ़ी के इर्द गिर्द तुम्हारे किस्से और तुम्हारी दिल खोल कर हंसी गयी हँसी भी हुआ करती थी. लैम्पोस्ट पर लम्बी होती परछाईयाँ शाम के साथ हमारे किस्सों का भी इंतज़ार किया करती थी. तुम्हें भी मालूम होता था कि मेरे आने का वक़्त कौन सा है. किसी को यूँ आदत लगा देना बहुत बुरी बात है, मैं यूँ तो वक़्त की एकदम पाबंद नहीं हूँ पर कुछ लोगों के साथ इत्तिफाक ऐसा रहा कि उन्हें मेरा इंतज़ार रहने लगा एक ख़ास वक़्त पर. मुझे बेहद अफ़सोस है कि मैंने घड़ी की बेजान सुइयों के साथ तुम्हारी मुस्कराहट का रिश्ता बाँध दिया और मोबाईल की घंटी का अलार्म.

वक़्त के साथ परेशानी ये है कि ये हर शाम वहीं ठहर जाता है...मैं घड़ी को इग्नोर करने की पुरजोर कोशिश करती हूँ पर यकीन मानो मेरे दोस्त(?) मुझे भी उस वक़्त तुम्हारी याद आती है. कभी कभी छटपटा जाती हूँ पूछने के लिए...कि तुम ठीक तो हो...तुम्हारा कहना सही है, तुम्हारी फ़िक्र बहुत लोगों को होती है...इसी बात से इस बात की भी तसल्ली कर लेती हूँ कि जो लोग तुम्हारा हाल पूछते होंगे वो वाकई तुम्हारा ध्यान रखेंगे, मेरी तरह दूर देश में बैठ कर ताना शाही नहीं चलाएंगे. मुझे माफ़ कर दो कि मैंने बहुत सी शर्तें लगायीं...बहुत से बंधन बांधे... तुम कहीं बहुत दूर आसमानों के देश के हो, मुझे जमीनी मिटटी वाली से क्या बातें करोगे. मैं खामखा तुम्हें किसी कारवां की खूबसूरत बंजारन से शादी कर लेने को विवश कर दूँगी कि इसी बहाने तुम कहीं आस पास रहोगे.

तुम आसमानों के लिए बने हो मेरे दोस्त...अच्छा हुआ जो हमारी दोस्ती टूट गयी. इसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके लिए दो लम्हा भी रुका जाए...कई बार तो मुझे अफ़सोस होता है तुम्हारा वक़्त जाया करने के लिए. तुम्हारी जिंदगी में बेहतर लोग आ सकते थे...बेहतर किताबें हो सकती थीं, बेहतर रचनायें लिखी जा सकती थीं. तुम उस वक़्त का जाहिर तौर से कोई बेहतर इस्तेमाल कर सकते थे...तुम्हारे दोस्त कुछ बेहतर लोग होने चाहिए...मैं नहीं...मैं बिलकुल नहीं. तुम कोई डिफेक्टिव पीस नहीं हो कि जिसे सुधारा जाए...मैं तुम्हें बदलते बदलते तोड़ दूँगी, मैं अजीब विध्वंसक प्रवृत्ति की हूँ.

तुम्हें पता है लोग कब कहते हैं की 'मुझसे दूर रहो'?
जब उन्हें खुद पर विश्वास नहीं होता...जब वो इतने कमजोर पड़ चुके होते हैं कि खुद तुमसे दूर नहीं जा सकते...तब वे चाहते हैं कि तुम उनसे दूर चले जाओ.


आज बशीर बद्र का एक शेर याद आया तुम्हारी याद के साथ...
मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है 


मैं तुम्हारे बिना जीना सीख रही हूँ, थोड़ी मुश्किल है...पर जानते हो न, बहुत जिद्दी हूँ...ये भी कर लूंगी. 

हाँ, एक बात भूल गयी...

तुम मुझसे दूर ही रहो!


30 November, 2011

हाय! साकी को शर्माना भी ना आये

हसरत-ऐ-नाज़ उठाना भी न आये
वो रूठें तो मनाना भी ना आये 
क्यूँ इश्क में गिरफ्तार हुए बैठे हो
तुम्हारे हाथों में तो पैमाना भी न आये 

खुद की खुद्दारियों में उलझे हो 
तुम्हें तो खुद को मिटाना भी ना आये 

खुदा की बंदगी से मुख्तलिफ यूँ
वो बुला ले तो निभाना भी ना आये 

हम हैं तलबगार नाज़ुक-मिजाज़ी के
हाय! साकी को शर्माना भी ना आये 

वो जो पूछें गली में आने का सबब 
हमें देने को बहाना भी ना आये 

लौट तो जाएँ तेरे दीदार के बाद
जीते-जी तेरे दर से जाना भी ना आये 

जिस्म से रूह तक सब मिल्कियत तुम्हारी है 
हमें तो सजदे में सर झुकाना भी ना आये 

29 November, 2011

जिंदगी, रिवाईंड.

आपके साथ कभी हुआ है कि आप अन्दर से एकदम डरे हुए हैं...कहीं से दिमाग में एक ख्याल घुस आया है कि आपके किसी अजीज़ की तबियत ख़राब है...या कुछ अनहोनी होने वाली है...और आपको वो वक़्त याद आने लगता है जब आपको पिछली बार ऐसा कुछ  महसूस हुआ था...नाना या दादा के मरने से कुछ दिन पहले...कुछ एकदम बुरी आशंका जैसी.

ऐसे में मन करे कि माँ हो और उससे ये कहें और वो सुन कर समझा दे...कि कहीं कुछ नहीं होने वाला है, और उसके आश्वाषणों की चादर चले आप चैन से सो जायें. अचानक से ऐसा डर जैसे पानी में डूबने वाले हैं...मुझे पानी से बहुत डर लगता है...तैरना भी नहीं आता, पर डर एकदम अकारण वाला डर है. किसी को अचानक खो देने का डर...या शायद मन के अन्दर झांकूं तो अपने मर जाने का डर. कि शायद मेरे मर जाने के बाद भी बहुत दिनों तक लोगों को पता न चले...कि उनको जब पता चले तो जाने कैसे तो वो मुझसे झगड़ा कर लें कि हमसे पूछे बिना मर कैसे सकती हो तुम, अरे...एक बार बताना तो था.

मैं अपने मूड स्विंग्स से परेशान हो चुकी हूँ...सुबह हंसती हूँ, शाम रोती हूँ और डर और दर्द दिल में ऐसे गहरे बैठ जाता है कि लगता है कोई रास्ता ही नहीं है इस दर्द से बाहर. इस दर्द और डिप्रेशन/अवसाद में बंगलौर के मौसम का भी बहुत हाथ रहता है, मैं मानती हूँ. मुझे समझ ये नहीं आता कि मैं मौसम से हूँ या मौसम मुझसे.

जिंदगी ऐसी खाली लगती है कि लगता है अथाह समंदर है और मैं कभी किसी का तो कभी किसी का हाथ पकड़ कर दो पल पानी से ऊपर रहने की कोशिश करती हूँ पर मेरे वो दोस्त थक जाते हैं मेरा हाथ पकड़े हुए और हाथ झटक लेते हैं. मैं फिर से पानी के अन्दर, सांस लेने की कोशिश में फेफड़ों में टनों पानी खींचती हुयी और जाने कैसे तो फेफड़ों को पता भी चलने लगता है कि पानी का स्वाद खारा है. आँख का आंसू, समंदर का पानी, जुबान का स्वाद...सब घुलमिल जाता है और यूँ ही जिंदगी आँखों के सामने फ्लैश होने लगती है.

ऐसे में मैं घबरा जाती हूँ पर फिर भी हिम्मत रखने की कोशिश करती हूँ...याद टटोलती हूँ और धूप का एक टुकड़ा लेकर गालों पर रखती हूँ कि वहां का आंसू सूख जाए और तुम्हारी आवाज़ को याद करने की कोशिश करती हूँ कि जब तुमसे बात करती थी तो मुस्कुराया करती थी. तुम्हें शायद दया भी आये मेरी हालत पर तो मुझे बुरा नहीं लगता कि मैं किसी भी तरह तुम्हारे हाथ को एक लम्हे और पकड़ना चाहती हूँ...मैं पानी में डूबना नहीं चाहती.

यूँ देखा जाए तो मुझे शायद मौत से उतना डर नहीं लगता जितना पानी में डूब कर मरने से...आँखों को जिंदगी की फिल्म दिखेगी कैसे अगर सामने बस पानी ही पानी हो, खारा पानी. दिल की धड़कन एकदम जोर से बढ़ी हुयी है और सांस लेने में तकलीफ हो रही है. ऐसे में किसी इश्वर को आवाज़ देना चाहती हूँ कि मेरा हाथ पकड़े क्षण भर को ही सही...फिलहाल सब कुछ एक लम्हे के लिए है...ये लम्हा जी लूँ फिर अगला लम्हा जब सांस की जरूरत होगी शायद किसी और को याद करूँ.

एक एक घर उठा कर स्वेटर बुनती हूँ, मम्मी के साथ पटना के पाटलिपुत्रा वाले घर के आगे खुले बरांडे पर...मुझे अभी घर जोड़ना और घटाना नहीं आया है...सिर्फ बोर्डर आता है वो भी कई बार गलत कर देती हूँ. उसमें हिसाब से पहले एक घर सीधा फिर एक घर उल्टा बुनना पड़ता है...एक घर का भी गलत कर दूँ तो स्वेटर ख़राब हो जाएगा. गड़बड़ और ये है कि मुझे अभी तक घर पहचानना नहीं आता...ये काम बस मम्मी कर सकती है. जिंदगी वैसी ही उलझी हुयी ऊन जैसी है...मफलर बना रही हूँ...एक घर सीधा, एक घर उल्टा...काम करेगा, ठंढ से बचाएगा भी पर खूबसूरती नहीं आएगी इसमें...सफाई नहीं आएगी. कुछ नहीं आएगा. जिंदगी थोड़ी वार्निंग नहीं दे सकती थी...बंगलौर में ठंढ का मौसम बढ़ रहा है और मैं चार सालों से अपने लिए एक मफलर बुनने का सोच रही हूँ...पर मेरे सीधे-उलटे घर कौन देख देगा?

मम्मी का हाथ पकड़ने की कोशिश करती हूँ...वो दिखती है, एकदम साफ़...हंसती हुयी...मगर उसका हाथ पकड़ में नहीं आता...फिर से पानी में गोता खा गयी हूँ. उफ्फ्फ....सर्दी है बहुत. दांत बज रहे हैं.

आँखों के आगे अँधेरा छा रहा है...ठीक वैसे ही जैसे हाल में फिल्म दिखाने के पहले होता है...अब शायद जल्दी शुरू होने वाली है. जिंदगी, रिवाईंड. 

खाली दिमाग का घंटाघर!

यूँ ही राह चलते क्या तलाशते रहते हो जब किसी से यूँ ही नज़रें मिल जाती हैं...किसी को तो ढूंढते हो. वो क्या है जो आँखों के सामने रह रह के चमक उठता है. आखिर क्यूँ भीड़ में अनगिन लोगों के होते हुए, किसी एक पर नज़र ठहरती है. वो एक सेकंड के हजारवें हिस्से में किसी की आँखों में क्या नज़र आता है...पहचान, है न? एक बहुत पुरानी पहचान. किसी को देख कर न लगे कि पहली बार देखा हो. जैसे कि इस खाली सड़क पर, खूबसूरत मौसम में अकेले चलते हुए तुम्हें उसे एक पल को देखना था...इतना भर ही रिश्ता था और इतने भर में ही पूरा हो गया.

रिश्तों की मियाद कितनी होती है? कितना वक़्त होता है किसी की जिंदगी में पहली प्राथमिकता होने का...आप कभी भी ताउम्र किसी की प्राथमिकता नहीं बन सकते, और चीज़ें आएँगी, और लोग आयेंगे, और शहर मिलेंगे, बिसरेंगे, छूटेंगे...कितना बाँधोगे मुट्ठी में ये अहसास कि तुम्हारे इर्द गिर्द किसी की जिंदगी घूमती है.

कुछ लोग आपके होते हैं...क्या होते हैं मालूम नहीं. वो भी आपसे पूछेंगे कि उनका आपसे रिश्ता क्या है तो आप कभी बता नहीं पायेंगे, किसी एक रिश्ते में बाँध नहीं पाएंगे. प्यार कभी कभी ऐसा अमूर्त होता है कि पानी की तरह जिस बर्तन में डाल दो उसका आकार ले लेता है. उनकी जरूरत के हिसाब से आपका उनसे रिश्ता बदलते रहता है. प्योर लव या विशुद्ध प्यार जैसा कुछ होता है ये. इसमें दुनियादारी की मिलावट नहीं होती. ऐसा कोई न कोई तो होता है...जो एक्जैक्टली आपका क्या लगता है आप खुद भी नहीं जान पाते. जानते हैं तो बस इतना कि आप उसे खुश देखना चाहते हैं. बस. इंग्लिश में एक ऐसा वाक्य आता है दिमाग में ऐसे लोगों के बारे में...हिंदी में मैं परिभाषित या अनुवाद नहीं कर पाती...यु बिलोंग टु मी(You Belong To Me) खास खास इस वाक्य को समझा भी नहीं पाउंगी, पर ऐसा ही कुछ होता है.

वैसे लोग होते हैं न...जैसे आपसे कोई दस साल छोटी बहन या भाई, आप उसे अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल चीज़ें भी बताते रहते हो...ये जानते हुए कि उसे नहीं समझ आ रहा. पर वो बहुत समझदारी से आपकी हर समस्या को सुनेगी...सुनती रहेगी. पर कभी किसी एक दिन उसकी छोटी सी दुनिया की छोटी सी समझ से एक ऐसा वाक्य निकलेगा कि आपकी समस्या एकदम कपूर की तरह उड़ जायेगी. आप चकित रह जायेंगे कि ये इसने खुद बोला है या इसके माध्यम से किस्मत आपको कोई रास्ता दिखा रही है.

मुझे लगता है प्यार की सबसे पहली डेफिनेशन होती है कि आपके लिए किसी की ख़ुशी जरूरी हो जाए. इसके आगे आप कुछ सोचते ही नहीं, न अच्छा न बुरा, दुनिया एकदम लीनियर हो जाती है. सब कुछ सीधी लाइन में चलता है. Cause and Effect नहीं रहता, बस एक चीज़ होती है, उसके चेहरे पर हंसी...मुस्कराहट. इसके लिए आप कुछ भी करने को तैयार रहते हो...जिस भगवान से गुस्सा हुए बैठे हो, उससे भी हाथ जोड़ कर उसकी ख़ुशी मांग लेते हो. सड़े हुए जोक्स मरते हो, जहरीले पीजे सुनते हो...सब करते हो, बस उसे एक बार हँसते हुए सुनने के लिए.

मैंने बहुत कम पढ़ा और लिखा है...पर जितनी जिंदगी जी है उससे एक चीज़ ही दिखती है मुझे, प्यार. आज भी इसके लिए सब वाजिब है...सब सही है...सब जस्टिफाइड है...मुझे जाने क्यूँ कभी प्यार पर लिखने से मन नहीं भरता. कुछ लोग...नहीं मालूम मेरे क्या हैं, बस मेरे हैं...इस बात पर यकीन है.

डेस्टिनी/किस्मत कुछ तो होती है वरना कुछ लोगों से आप जिंदगी भर नहीं मिल पाते और आप जानते तक नहीं कि क्या खाली है...तो सवाल घूम कर वहीं आ जाता है...भरी भीड़ वाले कमरे/रेलवे स्टेशन/तेज चलती गाड़ी/ट्रेन/एयरपोर्ट...आपको किसी की आँखों में एक लम्हे कौन सी पहचान नज़र आ जाती है कि आपको कहीं और देखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है.

ये कौन से रिश्ते हैं जो समझ नहीं आते...ये कैसे रिश्ते हैं जो एक लम्हे में पूरी जिंदगी जी लेते हैं...या फिर ये वो लोग हैं जो आपके अगले जन्म में आपसे मिलेंगे...अभी तो बस मार्क किया है आपको.

जब दिमाग में कोई ख्याल नहीं चल रहा होता...क्या चलता है? जब आप किसी को नहीं ढूंढ रहे होते, क्या ढूंढते हो? जब आपको कोई काम नहीं है तो मेरा ब्लॉग क्यूँ पढ़ते हो ( ;) बस देख रही थी कि कोई पढ़ भी रहा है कि नहीं, बहुत ज्ञान दे रही हूँ ऊपर :) )
बर्न की पार्लियामेंट बिल्डिंग से
अगर कोई आगे चलता हुआ जा रहा है तो ऐसे सवाल क्यूँ आते हैं कि वो पलटे तो हम देख सके कि उसकी आँखों का रंग कैसा है. मैं सदियों सदियों जाने किसकी आँखें स्केच कर रही हूँ जो पूरी ही नहीं होती. ऐसा कोई भी तो नज़र नहीं आता जिसकी आँखें वैसी हैं जो मुझे पेंट करनी हैं...मैं किसे तलाश कर रही हूँ. आइना देखती हूँ तो कई बार लगता है...खुद की तलाश शायद इसी को कहते हैं. किताबें कहती हैं, सब कुछ तुम्हारे अन्दर है...सोचती हूँ, सोचती हूँ...अपने अन्दर उतर नहीं पाती...जाने कहाँ सीढ़ी है. ध्यान करने बैठती हूँ तो चाहने लगती हूँ कि तुम खुश रहो...सबके मुस्कुराते चेहरे सामने आने लगते हैं.

दिन भर सोच सोच के परेशान हो जाती हूँ...दिकिया के लिखने बैठ जाती हूँ...आजकल जाने क्या हो गया है...दिन भर लिखती ही रहती हूँ, लिखती ही रहती हूँ. क्या है जो ख़त्म नहीं होता? क्या लिखना है ऐसा...ऐसा क्या कहना है जो कहा नहीं गया है. चुप जो जाओ री लड़की!!

Q: What's cooking?
A:  Disaster
Q: Where did you get the recipe?
A: It's a girl called Puja...She is THE recipe for disaster!!!

26 November, 2011

लाल डब्बे की बाकी चिट्ठियां

चलो, कमसे कम मौसम तो अच्छा हुआ. अच्छा भी क्या ख़ाक हुआ, मूड का पागल हिसाब है. आज देर रात से बहुत बारिश हो रही है और हवाएं तो ऐसे चल रही हैं की जैसे घने जंगलों में रह रही हूँ कहीं. बारिश अच्छी लग रही है, बेहद अच्छी. जैसे बचपन की सखी हो, राजदार, सरमायेदार.

पिछले कुछ दिनों से मौसम अजीब सा हो रखा था, न धूप निकलती थी, न बारिश होती थी...बस जैसे इंतज़ार में रखा हो मौसम ने भी. स्टैंडबाय मोड पर...कि पहले मैं अपना मूड सेट करूँ...उसके हिसाब से मौसम आयेंगे. जैसे जैसे चेहरे पर मुस्कान आती गयी, मौसम भी दरियादिल होते गया...पहले तो मेरी सबसे पसंदीदा, फुहारों वाली बारिश...कि जैसे कह रहा हो, कहाँ थी मेरी जान, मैंने भी तुम्हारी मुस्कराहट को बड़ा मिस किया...और मैं शैतान मौसम से ठिठोली कर रही हूँ, झगड़ा कर रही हूँ कि तुम्हें कौन सी मेरी पड़ी थी, तुम तो खाली अपना सोचते हो, तुमको हमसे क्या मतलब...और ये मस्का भी पक्का कोई कारण से लगा रहे हो, सच्ची सच्ची बताओ क्या काम है मुझसे, कहाँ सिफारिश लगवा रहे हो मुझसे.

फ़िल्मी होना कोई हमसे सीखे, या फिर बंगलौर के मौसम से. तो जब मौसम ने देख लिया की हलकी बारिश से मेरा मूड ख़राब नहीं हो रहा, तब फुल फॉर्म में आ गया...और क्या जोरदार बारिश हुयी कि सब धुल गया. जैसे कंठ से पहला स्वर फूटा हो, शब्द पकड़ने लगी फिर से. हवाओं में श्लोक गूंजने लगे, अगरबत्ती में श्रुतियां महकने लगीं...कुछ आदिम गीत के बोल आँख की कोर में बस गए. तुम्हारे नाम का पैरेलल ट्रैक थोड़ा लाइन पर आया तो दुर्घटना की सम्भावना घटी. कोहरे वाले मौसम में तुम्हारे हाथ याद आये.

छप छप करती बारिश में लौट रही हूँ तो कुछ शब्द गीले बालों से टपक रहे हैं...कुछ शब्द गा रही हूँ तो हवाएं लिए भाग रही है...अंजुली बांधती हूँ तो तुम्हारा नाम खुलता है उसमें...कैसी तो लकीरें मिलती जा रही हैं तुम्हारी हथेली से...सब बारिश का किया धरा है, इसमें मेरा कोई दोष नहीं. कल को जो चाह कर भी मेरी जिंदगी से दूर जाना चाहोगे न तो बारिश जाने नहीं देगी, देख लेना. कुछ चीज़ें अभी भी तुमसे जिद करके बातें मनवाना जानती हैं. तुमने जाने कब आखिरी बार बारिश देखी थी...तुम्हें याद है?

चलो मेरे शहर का मौसम जाने दो...दिल्ली में कोहरा पड़ने लगा न...एक काम करो, थोड़ा सा लिफाफे में भर कर मुझे कूरियर कर दो...न ना, साधारण डाक से मत भेजना, आते आते सारा कोहरा बह जाएगा लिफ़ाफ़े से...और फिर लाल डब्बे की बाकी चिट्ठियां भी सील जायेंगी. सबसे फास्ट वाले कूरियर वाले को पकड़ना...मैं वो थोड़ा सा कोहरा अपनी आँखों में भर लूंगी...फिर शायद मुद्दतों बाद मुझे सपनों वाली नींद आएगी...नींद में सफ़ेद बादलों का देश भी होगा...और एक डाकिया होगा जो तुम तक मेरी बारिशें पहुंचाता है.

सुबह के इस पहर सब खामोश है, शहर अभी सोया हुआ है...सब के जागने में अभी थोड़ा वक़्त बाकी है. कहते हैं इस पहर में हर दर्द शांत हो जाता है...सभी को नींद आ जाती है. फिर बताओ भला, मैं क्यूँ दुनिया से अलग जागी हुयी हूँ? मुझे कोई दर्द नहीं है इसलिए? रात सोयी नहीं और अब इतनी देर हो गयी है तो सोच रही हूँ, सूरज का स्वागत कर ही लूं...कितना तो वक़्त हुआ उसे आते नहीं देखा...हमेशा जाते देखती हूँ. तुम्हारी तरह...तुम कब चले आये जिंदगी में पता ही नहीं चला.






भोर की पहली आवाजों के साथ जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल ज़ेहन में तैर जाती है...एक पंक्ति चमकती है...जैसे छठ पर्व में सूरज की पहली किरण उतरी हो और उसे अर्घ्य दे रही हूँ. 

'तुम्हारी बातों में कोई मसीहा बसता है...'

25 November, 2011

आवाज़ घर

रात एक आवाज़ घर है जिसमें याद की लौटती आवाजें रहती हैं. लम्हों के भटकते टुकड़े अपनी अभिशप्त प्रेमिकाओं को ढूंढते हुए पहुँचते हैं. आवाज़ घर में अनगिन दराजें हैं...और दराजों की इस बड़ी सी आलमारी पर कोई निशान नहीं है, कोई नंबर, कोई नाम नहीं. कोई नहीं जानता कि किस दराज से कौन सा रास्ता किधर को खुल जाएगा.

हर दराज़ में अधूरी आवाजें हैं और ये सब इस उम्मीद में यहाँ सकेरी गयी हैं कि एक दिन इन्हें इनका जवाब मिलेगा...इंतजार में इतने साल बीत गए हैं कि कुछ सवाल अब जवाब जैसे हो गए हैं. जैसे देखो, दराज का वो पूर्वी किनारा...हिमालय के जैसा है...उस दराज तक पहुँचने की कोई सीढ़ी नहीं है. पर तुम अगर एकदम मन से उसे खोलना चाहोगे न तो वो दराज नीचे होकर तुम्हारे हाथों तक आ जायेगी. जैसे कोई बेटी अपने पापा के कंधे पर चढ़ना चाहती हो तो उसके पापा उसके सामने एकदम झुक जाते हैं, घुटनों के बल...जहाँ प्यार होता है वहां आत्माभिमान नहीं होता. उस दराज में एक बहुत पुराना सवाल पड़ा है, जो कभी पूछा नहीं गया...इसलिए अब उसे जवाब का इंतज़ार भी नहीं है. सवाल था 'क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?'. जब सवाल के पूछे जाने की मियाद थी तब अगर पूछ लिया जाता तो इसे शान्ति मिल जाती और ये एक आम सवाल होकर हवा में उड़ जाता...मुक्त हो जाता. पर चूँकि पूछा नहीं गया और सालों दराज में पड़ा रहा तो उम्र की सलवटों ने इस किशोर सवाल को बूढ़ा और समझदार बना दिया है. पके बालों वाला ये सवाल साधना में रत था...इसमें अब ऐसी शक्ति आ गयी है कि तुम्हारे मन के अन्दर झाँक के देख लेता है. इसे वो भी पता है जो खुद तुम्हें भी नहीं पता. इस दराज को खोलोगे तो बहुत सोच समझ कर खोलना, क्यूंकि इससे मिलने के बाद तुम्हारी जिंदगी कभी पहले जैसी नहीं रह पायेगी.

ठीक तुम्हारे हाथ की ऊंचाई पर जो सुनहली सी दराज है न, वो मेरी सबसे पसंदीदा दराज है...पूछो कैसे, कि मैंने तो कोई नाम, नंबर नहीं लिखे हैं यहाँ...तो देखो, उस दराज का हैंडिल दिखा तुम्हें, कितना चमकदार है...तुम्हारी आँखों जैसा जब तुम मुझसे पहली बार मिले थे. दराज के हैंडिल पर जरा भी धूल नहीं दिखेगी तुम्हें...इसे मैं अक्सर खोलती रहती हूँ...कभी कभी तो एक ही दिन में कई बार. इस दराज में तुम्हारी हंसी बंद है...जब तुम बहुत पहले खुल कर हँसे थे न...मैंने चुपके से उसका एक टुकड़ा सकेर दिया था...और नहीं क्या, तुम्हें भले लगे कि मैं एकदम अव्यवस्थित रहती हूँ, पर आवाजों के इस घर में मुझे जो चाहिए होता है हमेशा मिल जाता है. बहुत चंचल है ये हंसी, इसे सम्हाल के खोलना वापस डब्बे में बंद नहीं होना चाहती ये...तुम्हारा हाथ पकड़ कर पूरे घर में खेलना चाहती है...इसकी उम्र बहुत कम होती है न, कुछ सेकंड भर. तो जितनी उर्जा, जितना जीवन है इसमें खुल के जी लेती है.

अरे अरे...ये क्या करने जा रहे हो, ये मेरी सिसकियों की दराज है...एक बार इसे खोल लिया तो सारा आवाज़ घर डूब जाएगा. फिर कोई और आवाज़ सुनाई नहीं देगी...वो नहीं देखते मैंने इसे अपने दुपट्टे से बाँध रखा है कि ये जल्दी खुले न...फिर भी कभी कभार खुल जाता है तो बड़ी मुश्किल होती है, सारी आवाजें भीग जाती हैं, फिर उन्हें धूप दिखा के वापस रखना पड़ता है, बड़ी मेहनत का काम है. इस दराज से तो दूर ही रहो...ये सिसकियाँ पीछा नहीं छोड़ेंगी तुम्हारा...और तुम भी इसी तिलिस्म के होके रह जाओगे. यायावर...तुम्हें बाँधने का मेरा कोई इरादा नहीं है. मैं तो तुम्हें बस दिखा रही थी कि कैसे तुम्हारी आवाज़ के हर टुकड़े को मैंने सम्हाल के रखा है...तुम्हें ये न लगे कि मैं तुम्हारी अहमियत नहीं समझती.












तुम्हारी ख़ामोशी मुझे तिनका तिनका तोड़ रही है. बहुत दिनों से इस आवाज़ घर में कोई नयी दराज़ नहीं खुली है...तुम्हारी आवाज़ का एक कतरा मिलेगा?

24 November, 2011

विल यू एवर मिस मी?

मैं महज़ कागज़ का टुकड़ा भर हूँ तुम्हारे लिए कि खतों में मेरी आँखें चमकती हैं? तुम तो कहते थे कि खतों से खुशबू आती है तुम्हें...मुझे तुम्हारी बात पर कभी यकीन नहीं था इसलिए तो ख़त में इत्र छिड़क कर भेजती थी कि अगली बार कभी कहो तो नाम पूछ लूँ कि अच्छा, बताओ तो सही, कौन सी खुशबू आती है...और अगर तुमने सही नाम ले लिया तब मान जाउंगी कि मेरे ख़त पढ़ने के बाद तुम्हारी उँगलियाँ सिगरेट नहीं, एक दूसरी ही गंध में महकती हैं...नहीं?

खतों की अपनी जिंदगी हो जाती है न...मेरे खतों में मेरा एक हिस्सा चला जाता है जो तुम मानो ना मानो, तुम्हारे घर की जासूसी कर आता है. मैंने ख़त लिखे ही इसलिए हैं कि मेरे शब्द कूदते, फांदते तुम्हारे मन के उदास कोनों को बुहार दें...तुम नहीं जानते, मुझे जादू आता है. तुम जब भी ख़ामोशी में हँसते हो मुझे मालूम चल जाता है तुम मेरी बेवकूफी पर हँसते हो...पर पता है, मैं ख़त इसलिए नहीं लिखती कि मुझे तुम्हें दिखाना है कि मैं कित्ती होशियार हूँ...वो तो मैं बहुत हूँ...हाँ, तुम नहीं मानते, अरे सब कहते हैं बाबा! पर चिट्ठी इसलिए लिखती हूँ कि तुम खुश होते हो जब वो बुड्ढा पोस्टमैन तुम्हें अपने घर के दरवाजे पर दिखता है. अरे अब तो दोस्ती कर लो उससे...फिर उसे किस्से सुनाना कि ये कौन पागल लड़की है जो तुम्हें आज के दौर में भी चिट्ठियां लिखती है. तुम यही सोचते हो न मन में...पागल लड़की...है न? है ना?

तुम आजकल मुझसे भी झूठ बोलने लगे हो, मुझे मालूम नहीं कि क्यूँ...पर प्लीज मुझसे झूठ मत बोला करो...लड़ लो, झगड़ लो...सता लो मुझे...गुस्सा हो जाओ, डांट लो...पर यूँ मुझसे झूठ मत बोलो. मुझे भी तुम्हारा झूठ पकड़ना आता है. मुझसे झूठ बोलकर कहाँ जाओगे बाबा...किसी से तो सच बोलो. वैसे भी तो तुम जो बोलोगे उसका उल्टा ही समझूंगी. तुम्हें लगता होगा मैं एकदम ही बुद्धू हूँ...पर मैं हूँ नहीं. हाँ तुम्हारी तरह इंटेलिजेंट नहीं हूँ पर इतना भी नहीं कि तुम्हारी बातों को पकड़ नहीं पाऊं. अच्छा, दूसरे लोग क्यूँ नहीं पकड़ पाते? दूसरे लोगों के पास इतनी फुर्सत नहीं है न...मेरे पास बहुत सी फुर्सत है जो मैं तुम्हारे बारे में सोच सोच के बिताती हूँ...और जब तुमसे बातें करती हूँ तो बातों के अन्दर की आवाज़ सुनते सुनते...यु नो रीडिंग बिटवीन द लाइंस. तुम्हें पढ़ना थोड़ा मुश्किल है...तुम सब कुछ छुपा जाते हो. बहुत मेहनत करनी होती है...तैरना न आने पर भी डाइव मारनी होती है...डर भी लगता है पर तुम्हारे लिए इतना तो करना पड़ेगा. तुम्हें पता है बस मम्मी थी, जिसकी आँख के इशारे से डर जाती थी मैं...एक तुम हुए हो...सोच के भी डर जाती हूँ कि तुम्हारी भृकुटी तन गयी होगी. फ़ोन पर डराए हो और किसी को भी इस तरह?

कर लो झगड़ा मुझसे, जी भर कर लो...जब मर जाउंगी न तब याद आएगी मेरी. तुम्हें क्या...तुम तो जिद्दी हो बला के...तुम्हें पता भी नहीं चलेगा बहुत दिन तक...और देखना न, जब पता चलेगा न बहुत अफ़सोस करोगे. सेंटी मार रही हूँ तुम्हें, और क्या करूँ...रूठ के बैठे हो...उसपर मानते भी नहीं कि रूठे हो...मनाऊं भला कैसे...हद्द हो. पर सोचो भला...क्या मिस करोगे तुम...सिर्फ चिट्ठियां लिखने वाली लड़की को कितना मिस कर सकता है कोई. जो मान लो, मरुँ न भी...बस खो जाऊं कभी...कहीं. 

विल यू एवर मिस मी?


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कोरी चिट्ठी, तुम्हारे नाम...जो मन चाहे लिख लो...अब तो मान जाओ बाबा...क्या बच्चे की जान लोगे?

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