21 August, 2009

ब्लॉग जगत के कबाब की हड्डी...

अजी नहीं नहीं...शीर्षक पर मत जाइए...ये शीर्षक तो लिखा ही गया है ग़लतफ़हमी के कारण।
तो ऐसा हुआ की कल हमारे अपने फुरसतिया जी ने पाँच साल पूरे कर लिए...हम भी गए ताली वाली बजाने, सुबह.
पोस्ट भी पूरे फुरसतिया स्टाइल थी...और टिप्पणियां भी थोक से भाव में लोगों ने फुर्सत से लिखी थी...तो एक साँस में पढ़ते आ रहे थे ऊपर से नीचे कि एक टिप्पणी पर नज़र अटकी...आख़िर क्यों न अटकती, डॉक्टर अनुराग जो कह रहे थे...
ब्लॉग जगत के कबाब में अगर कुछ हड्डियाँ हैं तो यकीनन आप उनमें से एक हैं

हम घबराए, दाएं बायें देखे...और मन ही मन बोले...चलो आज फाईनली अनुराग जी ने अपने दिल की बात बोली है और जैसा की हमेशा होता है...उनके दिल की बात कईयों के दिल की बात होती है...मेरी भी थी जो हम न कह सके, किसी ने तो कहा ;)

नीचे ए तो देखा कुश को बुखार चढ़ गया अनूप जी पोस्ट पढ़ के...अनूप जी ने इतना हड़काया की बिचारा बुखार में टिप्पणी देने चला आया...इससे पता चलता है, अनूप जी से कित्ता डरता है भला मानुस। उसपर भारत रत्न दिलवाने की बात हमको तो लगता है किसी ने उसे धमकी वम्कि भी दी है...कौन जाने। अब तो बुखार ठीक होने के बाद ही कुछ पता चलेगा। वैसे चुपके से कुश ने भी सच्चाई बयां करने की कोशिश की है...बधाई आपको दूँ या आपको झेलने वालों को दूँ...हम तो इस बात के लिए कुश को बधाई देते हैं...मेरे भाई, सच्चाई में बहुत ताकत होती है, चिंता मत करो...और बधाई का टोकरा इधर भेज दो...हम भी काफ़ी दिन से झेल रहे हैं जी.

एतना पढ़ उढ़ के हम भी टिप्पणी चिपकाये दिए...मगर जवाब कहाँ से आता, अनूप जी तो जैसे ही सुने की ज्ञान जी उनके पंखे हैं, बस पंखे की हवा में उड़ लिए...जमीन पार आयें तब तो हम बेचारे गरीब लोगों को प्रति टिप्पणी मिले...फ़िर दिन भर जा जा के देखत रहे, अब जवाब आया , न अब जवाब आया.

ई चक्कर में पीडी भी आया...जरूर ऑफिस से बीच में कल्टी मार के पढ़ रहा होगा हल्ला कर रहा था की एतना लंबा पोस्ट काहे लिख मारे हैं...तो अनूप जी उसको हड़का दिए...की बेटा सुस्ता के पढ़ा करो, एक साँस में bottoms up करने की कौनो जरूरत आन पड़ी है।

समीर लाल जी तो वीआईपी हैं, फ़िर भी स्माइली चिपकाना भूल गए, इसलिए दू ठो टिप्पणी किए, अनूप जी भी बड़े आदमी हैं, पाँच साल की साल गिरह पर दू दू ठो टिप्पणी मिली समीर जी की...हमको लगता है ऐसा इसीलिए की समीर जी जबसे अनूप जी को मिले थे तो अनूप जी दू साल के हुए रहे बस्स।

ढेर सारे लोग आए...एतना बधाई मिला है की टोकरा दर टोकरा अनूप जी का घर भर गया है...कोई कानपूर जाए तो उनके घर में कैसे ठहरे भला, इसलिए हम एक गिलास बधाई देने का सोच रहे थे, की कोई बधाई देने घर पहुच जाए तो अनूप जी बाहर से एक गिलास पानी पिला के विदा कर दें।

बहुत बड़ा तीर मारे हैं...उ भी पाँच पाँच ठो...एक साल का एक...सबने अनूप जी को बधाई दी...हम बाकी लोगों को देते हैं...धन्य भाग हमारे की ऐसे ऐसे ब्लॉगर हैं ब्लॉग जगत में...

डॉक्टर अनुराग ठीक कह रहे थे:
हिंदी ब्लॉग जगत की रीड में अगर कुछ हड्डियाँ है…तो यकीनन आप उनमे से एक है…

डिस्क्लेमर: इस पोस्ट को लिखने की लिखित परमिशन हमको अनूप जी ने दी है...और जो बाकी लोग लपेटे गए हैं इसलिए लपेटे गए हैं की हमको उनसे डर नहीं लगता...मतलब कि भले लोग हैं, थोड़ी बहुत जान पहचान है तो बस ग़लत फायदा उठाय लिए हैं :)

20 August, 2009

कैमरा...शौक़ और कोशिश

IIMC में पढ़ते हुए मैं कुछ बेहतरीन लोगों से मिली...कुछ से रिश्ते अभी भी कायम हैं, कुछ से टूट गए...कुछ लोग खो गए और कुछ की मंजिलें बिल्कुल अलग थीं तो फ़िर किसी मोड़ पर टकरा नहीं पाये।

IIMC में जर्नालिस्म के तीन डिपार्टमेन्ट हैं, हिन्दी, इंग्लिश और रेडियो & टीवी...शुरुआत के एक महीने सबकी क्लास एक साथ ऑडिटोरियम में होती है। मेरे अधिकतर दोस्त इसी ऑडिटोरियम में बने...आते जाते मिलते हुए।

कुछ लोग बाद में मिले...अनजाने जिनसे शायद ही कभी बात की हो एक साल के दौरान...सनी इन लोगों में से एक था...गाहे बगाहे टकरा जाते थे, पर कभी बैठ कर बहुत सी बातें नहीं की...उसके ऑरकुट पर एक से एक बेहतरीन फोटोग्राफ अपलोड होते रहते थे...इसी से मेरा ध्यान गया...फ़िर बात शुरू हुयी। मुझे भी फोटोग्राफी का बहुत शौक़ था, आज भी है...सनी ने उस वक्त एक ग्रुप ज्वाइन किया था और ये लोग मिल कर पुरानी दिल्ली की
गलियों में भटकते रहते थे, गले में कैमरा लटकाए...मैंने कितनी बार सोचा की मैं भी चलूँ...पर सोचा भर...गई कभी नहीं।

हम सबके अपने अपने शौक़ होते हैं...जिन्हें करने में एक अजीब तरह की मानसिक शान्ति मिलती है...एक सुकून, की ये मैंने ख़ुद के लिए किया है। अपने शौक़ के साथ वक्त बिताने का मतलब होता है हम अपने आप से कितना प्यार करते हैं क्योंकि ये हमें ख़ुद से जोड़े रखता है।

सनी जर्नलिस्ट है...वक्त का रोना उससे बुरा कोई नहीं रो सकता...मगर आज देखती हूँ तो अच्छा लगता है...कोई अपने सपनों की राह पर चल पड़ा है...अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद वक्त निकालना बेहद मुश्किल का काम है...पर उसने ऐसा किया...

ये पोस्ट आज मैं उसके इस जज्बे को सलाम करते हुए लिखती हूँ...इस हफ्ते से उसका exhibition लगा है...दिल्ली में इंडिया हैबिटैट सेंटर में...पहला फोटोग्राफी exhibition, काश मैं दिल्ली में होती तो जरूर जाती देखने...पीठ ठोकने...कि शाब्बाश...जिंदगी जीना इसे कहते हैं...

आपमें से किसी को फुर्सत हो तो एक शाम बिताएं...इंडिया हैबिटैट सेंटर वैसे भी मेरे दिल्ली कि पसंदीदा जगहों में से है...उसपर से फोटोग्राफी जैसे और क्या चाहिए एक शाम से...बस लिखने में देर हो गई मुझे...बस कल भर ही है...१७ से २१ अगस्त टाइम था...ऐसी फंसी रह गई कि लिख ही नहीं पायी।

बधाई हो दोस्त! जिंदगी के रंग तुम्हारे कैमरा से गुजर के एक नई सोच, एक नई दृष्टि दें...मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं.

17 August, 2009

जिंदगी...तुम जो आए तो


बादलों का ब्रश उठाऊं
रंग दूँ आसमान...
सिन्दूरी, गुलाबी, आसमानी नीला,
तोतई हरा और थोड़ा सा सुनहला भी...
टांक दूँ एक इन्द्रधनुष का मुकुट
उगते सूरज के माथे पर

थोड़ी बारिश बरसा दूँ आज
धुल के निखर जाएँ पेड़, पत्ते सड़कें
खिला दूँ बहुत से फूल रास्तों पर
खुशबू वाले कुछ हरसिंगार...
भीनी रजनी गंधा और थोड़े से गुलाब

आम के पत्ते गूँथ लूँ
थके उदास लैम्पपोस्ट्स पर
बंदनवार सजा दूँ क्या
मौसम भीगा हुआ है आजकल
थोड़ी धूप बुला लूँ, शायद खूबसूरत लगे

क्या करूँ इंतज़ार के आखिरी कुछ लम्हों का
कट नहीं रहे हैं मुझे...
बावली हो गई हूँ मैं जैसे

कल सुबह तुम जो आ रहे हो!

बुकमार्क वाले पन्ने

जिंदगी की डायरी...कुछ पन्ने बुकमार्क कर के रखे होते हैं। इन पन्नों पर अक्सर कोई ऐसा दिन पसरा होता है जो सिर्फ़ मेरा नहीं होता, हो ही नहीं सकता...उस दिन के कतरे कतरे हम सब उठा के ले गए होते हैं, अपनी डायरी में संजोने के लिए...ये सबसे हसीं और खूबसूरत लम्हे, दोस्तों के साथ बिताये हुए होते हैं।

हम में से हर एक को लगता है, मैं ही पागल हूँ...अभी तक उस दिन को याद करती हूँ, शायद एक मैं ही हूँ जिसे वो मुस्कान याद है वो जोश में एक साथ चिल्ला चिल्ला के गला फाड़ना याद है...वो घंटों घंटों प्रैक्टिस करना याद है। १५ अगस्त आया और चला गया...मेरे लिए महज एक छुट्टी का दिन रह गया...अकेलेपन और तन्हाई में डूबा एक बेहद बोरियत वाला दिन...दोपहर होते पन्ने फड़फड़ाने लगे...कितने सारे गीत गूंजने लगे, कितने सारे लम्हों के मिले जुले डांस करने वाली थिरकन पैरों में आने लगी।

जब बिल्कुल छोटी थी तो ग्रुप डांस में अक्सर लाइन में सबसे आगे लगती थी...सब कहते हैं बचपन में मैं काफ़ी क्यूट हुआ करती थी...तो टीचर से सबसे ज्यादा पैर में छड़ी की मार भी मैं ही खाती थी। ये वो बचपना था जब इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था की मैं कहाँ लग रही हूँ लाइन में...पर इतना मार खाना जरूर बड़ा ख़राब लगता था। पर ऐसा कोई १५ अगस्त नहीं रहा जब स्कूल के प्रोग्राम में हिस्सा न लिया हो। कुछ नहीं होता तो एक न एक साल पकड़ के भारत माता जरूर बना देते थे हमको। हम ठहरे छटपटिया...हिलना डुलना मना जैसे सजा हो जाती थी।

थोड़ा बड़े हुए तो अक्सर गाने वाली टीम में रहते थे...कितने दिन से खोज जारी रहती थी, गाने की...की सबसे अच्छा गाना हो हमारा...उसपर लगातार प्रक्टिस...गला ख़राब होने तक प्रक्टिस, फ़िर घर जा के गार्गल...आइस क्रीम बंद...ठंढा बंद...सब बंद। जब जन गण मन गाती थी, तो जैसे गर्व से एक इंच और लम्बी हो जाती थी।

उसके बाद आया स्कूल लाइफ का सबसे हसीन दौर...मार्च पास्ट में हम अपनी पलटन के कैप्टेन हुआ करते थे...झंडे को सलामी देते हुए एक अजीब सी अनुभूति होती थी...और मार्च पास्ट में एक कदम भी ग़लत नहीं...धुप में खड़े होकर कितने कितने दिन की प्रैक्टिस करते रहते थे। उस वक्त बड़ा अरमान हुआ करता था आर्मी में जाने का...जो काफ़ी दिन तक रहा...अभी भी आह भरती हूँ। वो bata के कैनवास जूते, धो के सुखा के whitener लगा के तैयार रहते थे। स्कर्ट की क्रीज़ बना बना के bed के नीचे रख देते थे, की एकदम ही न टूटे।

हर साल कमोबेश एक ही गाने हर तरफ़ से...और मुझे याद है एक भी साल ऐसा नहीं था की मैं "ए मेरे प्यारे वतन "-काबुलीवाला फ़िल्म का गीत सुन कर रोऊँ न या फ़िर ए मेरे वतन के लोगों बजता था तो जैसे अन्दर से कोई हूक सी उठने लगती थी. कॉलेज में भी अधिकतर गाने गाये, बहुत से इनाम भी जीते...और हमारा एक गीत तो पटना विमेंस कॉलेज में लोगों को इतना पसंद आया था की दिनों दिनों तक कॉलेज के हर प्रोग्राम में उसकी फरमाइश हो जाती थी। उस गीत के अंत में मैंने एक तराना जोड़ने के लिए कहा था, थोड़ा शास्त्रीय पुट देने के लिए...उससे कमाल का asar पड़ा tha...लोग अचंभित rah गए the। इत्ती तारीफ़ मिली थी की कित्त्ने दिन हम फूल कर कुप्पा रहे थे।

आप लोगों को बताना भी भूल गए की ताऊ ने हमारा interview लिया था...बहुत अच्छा अनुभव रहा, उसमें मैंने अपने IIMC के हॉस्टल के समय की १५ अगस्त वाले प्रोग्राम का जिक्र किया था...उसे मेरी एक दोस्त ने पढ़ा...जो उस डांस में हमारे साथ ही थी...और कई साल बाद हमारी बात हुयी...तुमको भी याद है...i thought i was the only one.
Most of the times we forget the magic of some shared moments...that the magic belonged to all of us...and we all remember it...some way of the other, some day or the other.

ताऊ का फ़िर से धन्यवाद...उनके कारण अरसे बाद कुछ बेहद खुशनुमा लम्हों को हमने बांटा...और फ़िर से जिया.

13 August, 2009

गिनती, मैं और तुम


हर तीसरे दिन
मेरा हिसाब गड़बड़ा जाता है
मैं भूल जाती हूँ गिनती...

पलंग पर बिछा देती हूँ
तुम्हारे पसंद वाली चादर
सीधा कर देती हूँ सलवटें

बुक रैक पर तुम्हारी किताबें
झाड़ देती हूँ, एक एक करके
रख देती हूँ उन्हें अपनी किताबों के साथ

फेंक देती हूँ अलमारी में
धुले, बिन धुले कपड़े साथ में
मेरे तुम्हारे...हम दोनों के

जूतों को रैक से बाहर निकाल कर
धूप हवा खिलाने लगती हूँ
और अक्सर बाहर भूल जाती हूँ

जाने क्या क्या उठा लाती हूँ
अनजाने में...तुम्हारे पसंद की चीज़ें
और फ्रिज में भर देती हूँ

सारे कपड़े पुराने लगते हैं
कोई आसमानी रंग की साड़ी खरीदना चाहती हूँ
और कुछ कानों के बूंदे, झुमके, चूड़ियाँ

फ़िर से तेज़ी से चलने लगती हूँ बाइक
भीगती हूँ अचानक आई बारिश में
और पेट्रोल टैंक फुल रखती हूँ

टेंशन नहीं होती है अपनी बीमारी की
लगता है अब कुछ दिन और बीमार ही रहूँ
अब तो तुम आ रहे हो...ख्याल रखने के लिए

कमबख्त गिनती...
मैथ के एक्साम के रिजल्ट से
कहीं ज्यादा रुलाती है आजकल...

हर तीसरे दिन
मैं गिनती भूल जाती हूँ
लगता है तुम आज ही आने वाले हो...

जाने कितने दिन बाकी हैं...

08 August, 2009

एक और शाम ढल गई

दर्द अपनी वजहें ढूंढ लेता है
आंसू अपनी राह चले आते हैं
सबने तुम बिन जीने का बहाना ढूंढ लिया है

धुल जाते हैं तुम्हारे कपड़े
नींद नहीं आती तुम्हारी खुशबू के बिना
खाली हो जाता है मेरा कमरा

झाड़ू में निकल जाते हैं
तुम्हारे फेंके अख़बार
बेड के नीचे लुढ़के चाय के कप

करीने से सज जाता है
किताबों का रैक
अलग अलग हो जाती हैं तेरी मेरी किताबें

सब कुछ अपनी अपनी सही जगह पहुँच जाता है...
तुम्हारी जगह कुछ बहुत ज्यादा खाली लगने लगती है...

07 August, 2009

अकेले हम...अकेले तुम...मेरा सामान हुआ गुम



जरा अपने सामान में चेक करो
मेरा क्या क्या चुप चाप ले गए हो
मुझे बिना बताये
३० दिन की हंसी...
हिसाब लगाओ तो, एक दिन का १० बार तो होता ही होगा
दिन में दो बार करीने से आइना देखना
अक्सर एक बार तुम्हें लिफ्ट देने के कारण
खर्च होता एक्स्ट्रा पेट्रोल
मोड़ पर तुम्हें ढूँढने वाले ५ मिनट
और तुम्हें देख कर १००० वाट से चमकने वाली आँखें
इन सबके बिना जी नहीं सकती मैं...सब भिजवा दो...

या खुद ही लेकर आ जाओ ना...

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