06 January, 2009
मायका
जो माँ से बना है...मायका
सोचती हूँ
जब माँ ही नहीं है
तो मायका भी नहीं
तो क्या छूटेगा?
फ़िर दर्द क्यों
क्या शहर भी कभी मायका हो सकता है?
अगर चंदा मामा हो सकता है
तो...शायद हाँ
कुछ रिश्ते
अजन्मे होते हैं
जैसा उस शहर के साथ
जिसने इस बिन माँ की बच्ची को
सीने से लगाया...
मेरे शहर
तुम मेरे क्या हो?
05 January, 2009
समय के परे
कुछ पुराने रिश्तों को एल्बम से उठाया
थोडी धूल लगी थी, झाड़ दी
और फ़िर से एल्बम उसी ताक पर रख दी
फ़िर जाने कितने सालों की धूल जमने के लिए...
कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं...जिनमें बस मैं हूँ
साथ के लोग जाने कब का हाथ छोड़ कर जा चुके हैं
फ़िर भी
मैं तो हूँ...
और जब तक मैं हूँ...ये रिश्ते जिन्दा हैं।
नए साल में
कुछ नए रिश्ते
जाने कब हाथ पकड़ कर चलने लगे
मेरी मुस्कराहट में हंसने लगे
मेरे गीतों में ताल देने लगे
मेरे साथ हवाओं में उड़ने लगे
पुराने और नए साल के बीच
एक लम्हा था
जो न नया था न पुराना
उस लम्हे में मैंने तुमको देखा
और जाना...फ़िर से
तुम
न आए थे, न जाओगे
तुम बस हो
मुझमें...हममें।
मुझसे इतना प्यार करने का शुक्रिया...
तुमने कहा था न, इस साल मैंने तुम्हें कोई तोहफा नहीं दिया...साल की पहली पोस्ट तुम्हारे लिए.
24 December, 2008
नव वर्ष मुबारक हो...मैं चली छुट्टी मनाने
ऐसा है की हम छुट्टी पर जा रहे हैं। एक हफ्ता...लगभग। ७ जनवरी को वापस आयेंगे...तब तक नया साल आ चुका होगा।
तो ऐसे भी कह सकते हैं कि अब एक साल बाद मिलेंगे। ३१ दिसम्बर के बारे में कुछ मजेदार लाइनें
- हम कहते थे कि आज नहा लो, नहीं तो साल भर बिना नहाये रहना पड़ेगा।
- आज झगड़ा किया है तो मना लेना जरूरी है, वरना वो साल भर रूठा रहेगा...और जाहिर है साल भर बहुत लंबा अरसा होता है। तो हम अपने झगड़े आज सुलझा लेते थे। अगर मेरी किसी बात से कहीं किसी को कोई दुःख हुआ है तो इसी साल मान जाइए...मैं please भी कह रही हूँ
- रात को पढ़ाई नहीं करते थे, बड़ा मज़ा आता था, जैसे कि साल भर वाकई पढ़ाई से छुट्टी हो।
बाकी अभी कुछ याद नहीं आ रहा, फ़िर कभी लिखूंगी।
वैसे आज मेरे बारे में राजस्थान पत्रिका में एक article आई थी। सोचा आपको भी लिंक दे दूँ।
आप उसे यहाँ पढ़ सकते हैं। आशीष जी को हार्दिक धन्यवाद.
23 December, 2008
एहतेशाम...ईद...और वो चाँद
आज बस एक खूबसूरत शाम का जिक्र...
हमें IIMC छोड़े लगभग एक साल हो गया था, नई नई जॉब में सब बिजी थे...हफ्ते में एक भी दिन छुट्टी नहीं मिलती थी। ऐसे में दोस्त हैं, जेएनयू है या गंगा ढाबा नाम की किसी जगह को हम भूल चुके थे। और ये लगभग सबकी कहानी थी, मैं भी कभी कभी अगर PSR जा भी पाती थी तो अकेले डूबते सूरज को देख कर चली आती थी।
ऐसे में ईद आई और साथ में एहतेशाम का न्योता की तुम्हें आना है, और सबसे पहले आना है और सबसे देर से जाना है। वो मेरा बहुत प्यारा दोस्त है , न बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। उस दिन ऑफिस में बड़ी मिन्नत कर के मैं ७ बजे भागी थी वहां से। एहतेशाम के घर पहुँची तो एकदम कॉलेज के दिन याद आ गए, सारे लोग वहां थे, एक एक दोस्त।
वो ईद मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत ईद थी, गई तो देखा एहतेशाम और राजेश ने मिल के बहुत ही बढ़िया सेवैयाँ बनाई थी, और साथ में कबाब और पनीर टिक्का। साथ में शायद रूह अफजा था, मुझे याद नहीं...याद है की कितने प्यार से जिद कर कर के हमने सब को खिलाया था। उस दिन मुझे एक प्रोजेक्ट पर भी काम करना था, पर शुक्र था की मेरा बॉस भी ईद मनाने गया हुआ था, उसने कॉल किया की पूजा काम की हो...मैंने डरते डरते कहा की मैं ईद मना रही हूँ, काम कैसे करुँगी। और उस दिन हमारे बिग बॉस यानि सीईओ का फ़ोन आने आला था मुझे, काम की प्रोग्रेस देखने के लिए मैंने पूछा की सर कॉल करेंगे तो क्या कहूँगी...और मुझे यकीं नहीं हुआ, उसने कहा की फ़ोन काट देना, पिक मत करना। और मैंने ऐसा ही किया।
देर रात तक किस्से चलते रहे, सबने अपने अपने ऑफिस की कहानी सुनाई जो की कमोबेश एक ही जैसी थी, फ्रेशेर होना शायद एक जैसा ही होता है। धीरे धीरे सब आपने अपने खेमे में बढ़ने लगे, पर मैंने वादा किया था की सबसे आख़िर में जाउंगी...तो निभाया।
मुझे आज भी ईद पर वो रात याद आती है...सड़क पर चलते हुए चाँद देखना। उस दिन एहतेशाम बहुत अच्छा लग रहा था, उसे कुरते में पहली बार देखा था। उस दिन जिंदगी थोडी अपनी सी लगी थी... लौटते हुए जान रही थी की शायद ऐसी ईद अब कभी नसीब नहीं होगी...पर फ़िर भी दिल ने यही दुआ मांगी चाँद को देख कर। खुदा ये दोस्ती सलामत रखना...ये ईद सलामत रखना। कहीं और नहीं तो मेरे दिल में वो रात आज भी जिन्दा है...साँसे लेती है, ख्वाब देखती है।
22 December, 2008
एक मुलाकात जिंदगी से...
"आई थिंक आई ऍम फालिंग...फालिंग इन...लव विथ यू", गुनगुना रही थी और बस हंस रही थी उसे देख कर...उसकी आँखें जैसे रूह तक झांक सकती थीं, ज्यादा देर तक उसे लगातार देख नहीं पा रही थी, जब कि ऐसा कुछ भी नहीं था जो छुपाना था उससे। या शायद छुपाना था...
उसने कहा कि मैं उससे पिछले एक महीने से बात कर रही हूँ, क्या वाको? मुझे यकीन नहीं हुआ, पता ही नहीं चला इतनी दिन हो गए। जैसे रूह पहचानती है उसको भले चेहरा याद नहीं, शायद हम मिलें हो पहले कभी, समय कि सीमाओं से परे....शायद अंतरिक्ष में साथ भटकें हों...अनगिनत सवाल, और इनके जवाब ढूँढने ki जरुरत नहीं लगती, जैसे कि हम दो लोग नहीं हैं, कुछ समझाने की जरुरत नहीं होती उसे.
कि मुझे सिगरेट से कोई दिक्कत थी, पर उसे नर्वस देख कर थोड़ा घबराने लगी थी मैं भी। पर फौजी ने जब उसे डांटना शुरू किया कि देखो सरे लोग तुम्हें सिगरेट पीने से मन करते हैं तो जाने क्यों मैं बिल्कुल उसके तरफ़ से झगड़ने लगी...मेरा बस चलता तो मैं ख़ुद उसे एक सिगरेट जला के दे देती. बड़े टेनसे से लम्हे थे वो, बड़ी मुश्किल से कटे. रेस्तौरांत से बहार आके बड़ा सुकून महसूस हुआ, मैं लगभग साँस रोके बैठी थी.
फौजी ने बाहर आके कुछ कहा नहीं पर उसकी मुस्कान बहुत सरे वाक्य कह गई, अब मैं चीख तो नहीं सकती न कि वो मेरा बॉयफ़्रेन्ड नहीं है...इन फैक्ट वो मेरा कुछ भी नहीं है। कार में बैठ कर भी टेंशन हो रही थी...मैंने सिगरेट के तीन चार काश लगाये. अच्छी लगी पर ये भी जान गई मैं कि जो लोग कहते हैं कि सिगरेट पीने से टेंशन कम होती है...फत्ते मरते हैं. उसने कहा मैंने उसकी सिगरेट गीली कर दी. बड़ा बेवकूफ की तरह महसूस किया मैंने ख़ुद को...जैसे सिगरेट पीने से बड़ी कला दुनिया में नहीं है.
उससे बहुत सी बातें करने का मन कर रहा था, या अगर सही कहूँ तो उसकी बहुत सारी बातें सुनने का मन कर रहा था। चाहती थी कि वो बोले और मैं चुप रहूँ, बस सुनूं कि वो क्या सोचता है, क्या चाहता है...कुछ भी. उसे अच्छी तरह जाने का मन कर रहा था, उतनी अच्छी तरह जैसे शायद वो मुझे जानता है. कैसे जानता है, मालूम नहीं
बालकोनी पे हलकी सी ठंढ बड़ी अच्छी लगी, कोहरे का झीना दुपट्टा गुडगाँव कि ऊँची इमारतों ने ओढा हुआ था, उसमें से कहीं कहीं गाँव की किसी अल्हड किशोरी की आँखों की तरह किसी की बालकनी में लाइट्स जल रही थी। मीठी मीठी ठंढ जब साँसों में उतर गई तो बालकोनी का मोह छोड़ना पड़ा.
उसे अपनी कवितायेँ पढ़ाई मैंने, अच्छा लगा। वो सारे वक्त आराम से नहीं बैठा था...एक हरारत दिख रही थी उसमें. मैं आधे वक्त बस हंसती रही थी, किसी तकल्लुफ के बगैर. कुछ कहना नहीं चाहती थी, बस देखना चाहती थी उन आंखों में क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ था मैं किसी कि आँख से आँख मिला के बात नहीं कर पा रही थी, और मुझे बड़ा अजीब लग रहा था.
सिगरेट का धुआं मुझे अच्छा नहीं लगता...फ़िर आज क्यों लग रहा था। मुझे इतना तो पता था कि ये गंध मैं बस उससे जुड़े शख्स के कारण पसंद कर सकती हूँ. तो क्यों अच्छा लग रहा था अल्ट्रा माईल्ड का धुआं? उसके कारण? मेर दिल कर रहा था एक काश लेने का, मगर उस सिगरेट का जो वो पी रहा था, क्यों? पता नहीं. वैसे मेरा मन कभी नहीं करता कि मैं सुट्टा लागों, पर उस वक्त कर रहा था. मैंने मग भी पर उसने मना कर दिया. कि मैं फ़िर उसकी सिगरेट ख़राब कर दूंगी, थोड़ा दुःख हुआ. शायद आज तक जो चाहा लेने की आदत बन गई है, चाहे किसी कि उँगलियों में अटका अल्ट्रा माईल्ड क्यों न हो...
उसकी नज़रें बड़े गहरे कुछ तलाशती हैं, जैसे मेरा पूरा वजूद मेरी आंखों में दिख जायेगा। अहसास हुआ कि उससे कुछ भी छुपाना बड़ा नामुमकिन है और ख्वाहिश हुयी उसे वैसी ही नज़रों से देखूं...पर देख नहीं पायी.
डर लगा मुझे, कहीं उसने सुन तो नहीं लिया मेरी आंखों में, "आइ थिंक आई ऍम फालिंग फालिंग इन लव विथ यू।"
| Janno Gibbs - Fall... |
21 December, 2008
छुट्टियाँ
गौरतलब है कि लगभग इसी समय आलू निकलने का भी वक्त होता है। हमारे यहाँ घर की बाकी जमीन, जिसे हम फिल्ड कहते थे में आलू की खेती होती थी। क्यारियों में आलू के पेड़ लगे होते हैं, मिट्टी हटा कर आराम से आलू निकाल लेते थे हम। लगभग सात बजे घर में अलाव जलता था, जिसे थोडी देर ताप कर मम्मी खाना बनाने चली जाती थी और हम दोनों भाई बहन पढने बैठ जाते थे, लैंप की रौशनी में। ९ बजे के लगभग पापा के आने का टाइम होता था और मम्मी अलाव सुलगा के रखती थी, पापा आते थे और खाना लग जाता था १० मिनट में। इतने देर में हमारा homework ख़त्म हो जाता था।
फ़िर पापा के sath खाना खाते थे, और पापा हर रोज हमें कहानी सुनते थे, हातिमताई की...हम बेसब्री के पापा के आने का इंतज़ार करते थे। और हर रोज़ सारी कहानी सुन लेने का मन करता था पर पापा रोज़ थोडी कहानी सुनाते थे, जैसे हर रात हातिमताई हुस्न्बनो के एक सवाल का जवाब dhoondhne कैसे गया और सवाल का जवाब क्या था। इस बीच हम अलाव में आलू घुसा देते थे, आलू पाक जाते थे और खाने में इतना सोन्हा स्वाद आता था कि क्या बताएं। हम झगड़ते रहते थे कि कौन सा आलू किसका है अक्सर बड़े wale आलू के लिए खूब झगडा होता था। और आप यकीं नहीं करेंगे कि हमने इसका क्या उपाय निकाला...कच्चे आलू पर ही हम अपने अपने नाम का पहला लैटर लिख देते थे, मेरा P और जिमी का J
ऐसे ही जाड़े कि छुट्टियाँ ख़त्म हो जाती थी, हम रोते पाँव पटकते स्कूल जाना शुरू कर देते थे।
19 December, 2008
दिल ढूंढता है...
ये एक शब्द जाने कैसे
अजनबी, अछूता सा हो गया है
वो घर जहाँ शीशम के पेड़ थे
आसमान तक जाती झूले की पींगें थी
क्यारियों में लगी रजनीगंधा थी
कुएं में छप छप nahata चाँद था
पोखर में उछलते कूदते मेंढक थे
बारिशों में कागज़ की नाव थी
धूप में अमरुद का पेड़ था
छोटी सी चारदीवारी थी
जिसे सब फांद जाते थे
खूब सारे पीले फूलों से ढका पेड़ था
गुलमोहर के फलों की तलवारें थी
बालू के घरोंदे थे
गिट्टी के पहाड़ और किले
बुढ़िया कबड्डी थी
खाली खाली सड़क थी
हाफ पेडल साईकिल थी
११ सालों में बड़ा हुआ बचपन था
जो ६ सालों से खोया हुआ है...
जाने कैसी कैसी यादों ने आ घेरा, शब्द कबड्डी खेलने लगे, परेशान हो गई मैं। इस पोस्ट की पोटली में बाँध दिया, अब शायद इनकी शरारत थोडी कम हो।
आज से महेन के ब्लॉग चित्रपट पर भी लिख रही हूँ। फिल्मों को एक अलग नज़र से देखने का शौक़ वो भी रखते हैं उन्होंने अपने कारवां में साथ चलने का आमंत्रण दिया...और हम चल पड़े। अलग सी फिल्मों के बारे में बहुत अच्छी जानकारी है इस नवोदित ब्लॉग पर।