18 December, 2008
तुम
कल शाम तेरी याद आई
कि जिंदगी फ़िर से...जिंदगी लगने लगी
एक लम्हे को छुआ जब
तेरे लबों की तपिश ने
बादलों में फ़िर से...आग सी लगने लगी
तनहाइयों के घर में
डाले थे कब से डेरा
तेरा नाम लिया जैसे...चहलकदमी होने लगी
टूटा हुआ था मन्दिर
रूठे थे देव सारे
जिस दिनसे तुझे माँगा...फ़िर बंदगी होने लगी
तुम सामने हो कब तक
यूँ होश सम्हालें हम
एक नज़र ही देखा...दीवानगी होने लगी
मर ही गए थे हम तो
यूँ तुमसे दूर रह कर
तुम आ गए हो फ़िर से...जिंदगी होने लगी
17 December, 2008
चवन्नी चैप और हम
अजय ब्रह्मात्मज एक वरिष्ठ लेखक हैं और हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री पर मेरे जानकारी में सबसे विस्तृत जानकारी वाला ब्लॉग लिखते हैं। फिल्मों से जुड़े होने के कारण मैं भी अक्सर उनके ब्लॉग पर जाती रही और प्रेरणा पाती रही हूँ।
इसलिए आज जब उन्होंने अपने ब्लॉग के स्तम्भ हिन्दी टाकिज के लिए लिखने को कहा तो मैं बेहद खुश हुयी। ऐसी जगह कुछ भी लिखना, मेरे लिए तो गर्व की बात है, और अजय जी ने जो मान दिया है उसकी मैं बेहद आभारी हूँ। आप मेरे लिखे को यहाँ पढ़ सकते हैं।
हिन्दी टाकिज एक ऐसी श्रृंखला है जिसमें अजय जी के शब्दों में "इच्छा है कि इस सीरिज़ के अंतर्गत हम सिनेमा से निजी संबंधों को समझें और उन अनुभवों को बांटे ,जिनसे हमें सिने संस्कार मिला।चवन्नी का आग्रह होगा कि आप भी अपने अनुभव भेजें।इसे फिलहाल हिन्दी टाकीज नाम दिया जा रहा है।"
तो ये ख़बर मेरे पेट में पची नहीं...तो पोस्ट कर दिया ।
तुम्हारे बिना
वो चूडियों की खनक
जब सिल्ली पर
बादाम की चटनी पीसती थी
एक लय थी उसमें...खन खन खन सी
या जब रात को चुपके से
देखने आती थी की मैं पढ़ रही हूँ
या सो गई
दबे पाँव आने पर भी
पायल थोडी सी बोल ही देती थी...
सुबह जब तक
पॉँच बार आवाज न लगाये
उठने का सवाल ही नहीं उठता था
बिना डांट खाए
रोटी गले से नहीं उतरती थी...
याद है अब भी मुझको
शादी वगैरह में जाने पर
कैसे हुलस के गीत गाती थी तुम
सब तुम्हारे आने का इंतज़ार किया करते थे...
सरस्वती पूजा, दशहरा और दिवाली की आरती
तुमसे ही तो सुर मिलाना सीखा था
शंख की ध्वनि...और वो घंटियाँ
आज बैठती हूँ
अचानक से मेरी चूडियाँ बोल उठती हैं
लगता है सामने दरवाजे से तुम आ जाओगी
लेकिन...बिखर जाता है सन्नाटा
तुम्हारे बिना घर चुप हो गया माँ...
16 December, 2008
फिल्में और ज्ञान :)
कुछ दिन पहले पीडी से बात कर रही थी, उसने फिल्मों के बारे में कुछ और जानने की इच्छा जाहिर की। अब वैसे तो हम इस तरह का ज्ञान बांटने में पहले से ही दो कदम आगे रहते हैं...पर इस बार समस्या थोडी जटिल थी। फ़िल्म बनाना आसान है, ऐसे बहुत director हैं जिन्होंने बिना कहीं से कुछ पढ़े अच्छी फिल्में बनाई हैं। यहाँ पढ़े से मेरा मतलब था की कोई प्रोफेशनल कोर्स किए बगैर।
किसी भी दिशा में बढ़ने से पहले उसके बारे में जानकारी इकठ्ठा करना जरूरी होता है, इन्टरनेट आ जाने से काफ़ी आसानी हो गई है। मैंने अपने कॉलेज के समय में काफ़ी खाक छानी थी, अच्छी किताबें ढूंढ़ना अपने आपमें एक महान कार्य होता है :) और उसपर भी जब आप पटना जैसे शहर में रह रहे हों। साल भर पुस्तक मेला का इंतज़ार रहता था की कोई अच्छी किताब मिलेगी...और वाकई ये इंतज़ार बेकार नहीं होता था।
दिल्ली आने के बाद काफ़ी आसान हो गई चीज़ें, एक तो IIMC की विशाल लाइब्रेरी जिसमें फ़िल्म के हर पक्ष को लेकर कई किताबें थी, चाहे वो नई तकनीक हो या पुराने जुगाड़। इसके अलावा अगर कभी मन होता तो CP जा के किताबें ले आते...यहाँ बंगलोर आई तो पहली बार नेट पर ढूँढने की जरूरत महसूस की...तो पाया की हिन्दी फिल्मो का रेफेरेंस कहीं भी नहीं मिलता है। और बाकी फिल्में ढूंढ़ना काफ़ी मुश्किल भी होता है, अगर किस्मत अच्छी हुयी तब तो मिलेगी वरना बस...आसमान देख कर बारिश की उम्मीद करने वाला हाल।
आग में घी का काम किया एक और व्यक्ति ने, जिसका मुझे नाम भी नहीं पता है। हुआ ये कि मैंने फ़िल्म पर जो वर्कशॉप की थी, उसमें एक उदहारण Blair Witch Project नाम कि फ़िल्म का था...यह फ़िल्म मुझे बिल्कुल ही बकवास लगी थी, कारण किसी और दिन बताउंगी...तो बन्दे ने कह दिया कि ये बहुत अच्छी फ़िल्म थी और तुम्हें फिल्मो की पकड़ नहीं है वगैरह वगैरह...intellectuals के लिए बनाई गई थी फ़िल्म। अब ऐसे अपने मुंह मिया मिठू को तो खैर क्या कहना...पर इस बात बाटी में उसने एक बात और कह दी...कि हम हिन्दुस्तानियों को फिल्मो कि समझ नहीं है, और हमें फ़िल्म बनने नहीं आती। खास तौर से इशारा हिन्दी फिल्मों की और था...उन्होंने कुछ कुछ होता है को छोड़ कर कोई भी हिन्दी फ़िल्म नहीं देखी थी। अब ऐसे बेवकूफ लोगो को क्या कहूँ मैं...बिना ये देखे और जाने कि हमारे यहाँ कैसे फिल्में बनी है चल दिए अमेरिका का गुणगान करने।
तो मैंने सोचा कि फिल्मों पर एक श्रृंखला शुरू करुँगी...भाषा हिन्दी और इंग्लिश जो भी सही लगेगा टोपिक के हिसाब से...पर उसमें मैं कुछ उन फिल्मो का जिक्र करुँगी जो हमारे यहाँ बनी हैं, और उनके कुछ उन पहलुओं पर रौशनी डालूंगी जिससे हम सब रिलेट कर सकते हों।
अब चूँकि इस ब्लॉग पर इंग्लिश में नहीं लिखती हूँ, तो दूसरे ब्लॉग पर लिखूंगी...और सिर्फ़ इसी बारे में लिखूंगी। I dream ब्लॉग फिल्मों के बारे में मेरे सपनो को लेकर है। सोच रही हूँ लिखना शुरू करूँ, पर चूँकि अभी तक ऐसा कुछ मिला नहीं है पढने को , ये भी लगता है कि ऐसे मटेरिअल कि जरूरत है भी कि नहीं, मैं बिन मतलब के वक्त तो नहीं बरबाद करुँगी?
आपकी क्या राय है?
15 December, 2008
किस्सा ऐ शूटिंग
एडिटिंग शनिवार को होनी है।
इस बार फ़िल्म बाने के मैंने बहुत कुछ सीखा...और सबसे जरूरी था एक टीम की तरह काम करते हुए एक दूसरे पर भरोसा करना। जब किसी को कोई बात समझ नहीं आ रही तो उसकी मदद करना, उसे समझाना की वो काम को कैसे बेहतर कर सकती है...न की ख़ुद ही करने लग जाना की तुमसे नहीं हो पायेगा।
ये पहली बार हुआ है कि मैंने कैमरा फेस किया है...मुझे बहुत मज़ा आया मगर फ़िर भी हर शॉट में लगता था कि पता नहीं कोम्पोसिशन कैसी है, लाइट angles सही हैं या नहीं। काफ़ी टेंशन होती रही की फ़िल्म actually स्क्रीन पर लगेगी कैसी??!!!
रात को शूट करना बहुत मुश्किल होता है, इसलिए अधिकतर फिल्में दिन में शूट होती हैं और फिल्टर लगाये जाते हैं कैमरा पर। मुझे थोड़ा बहुत अंदाजा तो था कि दिक्कत होगी मगर इतनी होगी नहीं सोच पायी थी। हर शॉट के लिए लाइट को हटाना पड़ता था, कैमरा अलग जगह रखना पड़ता था, और इस सब के साथ ये भी ध्यान रखना पड़ता था कि ऐसा तो नहीं हो रहा कि परछाई दूसरी तरफ़ आ रही है।
सबसे मुश्किल तो ये था कि कैमरा में अच्छी इमेज आए इसके लिए लाइट कैमरा के पीछे और हमारी बिल्कुल आंखों पर पड़ रही थी...पर उसमें भी बिल्कुल आराम से dialog बोलना...हँसना गप्पें करना। एक अलग तरह का अनुभव था।
खैर शूटिंग ख़त्म हुयी...अब रिजल्ट का इंतज़ार है.
13 December, 2008
दिल्ली तेरी गलियों का...
तारीखें वही रहती हैं
साल दर साल
वही हम और तुम भी...
बदल जाती है तो बस
जिंदगी की रफ़्तार...
खो जाती है वो फुर्सत वाली शामें
और वो अलसाई दिल्ली की सड़कें
सर्द रातों में हाथ पकड़ कर घूमना...
खो जाते हैं हम और तुम
अनजाने शहर में
अजनबी लोगों के बीच...
रह जाती है बस
एक याद वाली पगडण्डी
एक आधा बांटा हुआ चाँद
और अलाव के इर्द गिर्द
गाये हुए गीतों के कतरे...
छः मंजिल सीढियों पर रेस लगाना
रात के teen बजे पराठे खाना
और चिल्लड़ गिन कर झगड़ना
कॉफी या सिगरेट खरीदने के बारे में...
कोहरे से तुम्हें आते हुए देखना
और फ़िर गुम हो जाना उसी कोहरे में
हम दोनों का...
आज उन्ही तारीखों में
मैं हूँ, तुम भी हो...जिंदगी भी है
अगर कुछ खो गया है तो बस
वो शहर ...जहाँ हमें मुहब्बत हुयी थी
दिल्ली, तेरी गलियों का
वो इश्क याद आता है...
जिंदगी...यादें...और कोरे पन्ने
इतवार...वैसे तो बहुत से कारण होते हैं इंतज़ार करने के...पर ये इतवार थोड़ा अलग है।
मैंने डॉक्युमेंटरी पहले भी बनाई है, पर फिल्मों का पहला अनुभव है...भले ही अतिलघु फ़िल्म कह लें। पिछली पोस्ट पर जो कहानी थी, उसे ही शूट करने वाले हैं। और जैसा की छोटे प्रोजेक्ट्स में होता है...लीड रोल भी मुझे ही करना है...हालाँकि मुझे डायरेक्शन और लिखने में ज्यादा मज़ा आता है। पर सोचा एक बार भूत बन के भी देख लिया जाए। मज़ा तो आएगा ही।
अगले सन्डे एडिट करके तैयार हो जायेगी तो अपलोड भी कर दूंगी...आज बस सोच के अच्छा लगा रहा है और डर भी। उम्मीद है सब अच्छा ही होगा।
क्या जरूरी है
जिंदगी की किताब के
हर पन्ने पर कुछ लिखा हो
कुछ पन्ने तो कोरे रहने दो...
कभी यादों को अपने रंग में रंगने का मन किया तो?