03 December, 2008
देखना है जोर कितना बाजू ऐ कातिल में है
जब भी सुनती हूँ तो लगता है कहीं कोई हलचल होने लगी है दिल में, कुछ करने का जज्बा जोर मारने लगता है। मुझे लगता है कि आज ऐसे कुछ और शायरों की जरूरत है, वही हम सब को इस नींद से झकझोर कर उठा सकते हैं।
सरफरोशी कि तमन्ना अब हमारे दिल में है...
02 December, 2008
अक्सर एक व्यथा यात्रा बन जाती है
आजकल जिस तरह के हालात हैं, और जैसी मेरी मनोस्थिति है, कुछ पंक्तियों ने मर्म को स्पर्श किया है। मुझे ये पंक्ति खास तौर से पसंद है.."अक्सर एक लीक दूर पार से बुलाती है ." सोचा आप सब से भी बाँट लूँ....सर्वेश्वर सयाल सक्सेना की ये कविता।
अक्सर एक गंध
मेरे पास से गुज़र जाती है,
अक्सर एक नदी
मेरे सामने भर जाती है,
अक्सर एक नाव
आकर तट से टकराती है,
अक्सर एक लीक
दूर पार से बुलाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहीँ पर बैठ जाता हूँ,
अक्सर एक प्रतिमा
धूल में बन जाती है ।
अक्सर चाँद जेब में
पड़ा हुआ मिलता है,
सूरज को गिलहरी
पेड़ पर बैठी खाती है,
अक्सर दुनिया
मटर का दाना हो जाती है,
एक हथेली पर
पूरी बस जाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहां से उठ जाता हूँ,
अक्सर रात चींटी-सी
रेंगती हुई आती है ।
अक्सर एक हँसी
ठंडी हवा-सी चलती है,
अक्सर एक दृष्टि
कनटोप-सा लगाती है,
अक्सर एक बात
पर्वत-सी खड़ी होती है,
अक्सर एक ख़ामोशी
मुझे कपड़े पहनाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है ।
28 November, 2008
कर्मण्ये वाधिकारस्ते
दो रातों से व्यथित हूँ, और ये कहना ग़लत है कि हम भूल जायेंगे, बाकियों का तो नहीं पता पर मैं तो नहीं भूलूंगी और न चुप बैठूंगी। सोचती हूँ कि हमारे एक अरब कि जनसँख्या वाले देश में क्यों ३०० लोग नहीं हैं जो इस देश को एक सही दिशा दे सकें। हर बार चुनाव के समय बड़े बड़े वाडे करने वाली पार्टियाँ और एक दूसरे को अलग अलग श्रेणी में विभक्त करने वाले नेता, गुंडे और अराजक तत्व ही क्यों नज़र आते हैं।
हमारे जैसे २५ साल के लोग जिनमें कुछ करने का जज्बा है, कहाँ हैं। क्यों नहीं हम एक साथ मिल कर इस देश को एक सही राह पर ले जाने कि कोशिश करते हैं। कल मेरी कई दोस्तों से बात हुयी, सारे गुस्सा थे हमारे नेताओ को कोस रहे थे। मैंने सब से पुछा, कि तुमने अपना वोटर्स आईडी कार्ड बनवाया है...सवाल पर सब चुप, वही बहने कि रेसिदेंस प्रूफ़ नहीं है, कहाँ जाएँ कैसे बनवाएं। सोचती हूँ कि कितनों ने कोशिश भी कि है कुछ सार्थक करने कि। हममें ये अकर्मण्यता क्यों भरी हुयी है, अगर हमारी जेनरेशन कुछ नहीं करेगी तो हमें क्या हक है बैठ कर नेताओं को कोसने का।
आज मैं IIMC के बारे में बात करना चाहूंगी, चूँकि पत्रकारिता वहां का मुख्य पाठ्यक्रम है तो हमारे मित्र अक्सर एक ideology रखते थे, चाहे वो राईट विंग हो या लेफ्ट विंग हो। राष्ट्रवादी हों, या कम्युनिस्ट पर अपनी सोच के हिसाब से देश को एक बेहतर भविष्य देना चाहते थे। श्रीजय के साथ मैंने पहली बार छात्र राजनीति का थोड़ा हिस्सा देखा था। मैंने पहली बार जेएनयू कि दीवारों पर लगे पर्चे देखे थे, जगह जगह वंदे मातरम और इन्किलाब जिंदाबाद लिखा देखा था। मैंने देखा था कि जब श्रीजय ABVP के बारे में बात करता है तो उसकी आंखों में एक चमक आ जाती है....एक जज्बा है जो महसूस होता है। उस वक्त रिज़र्वेशन का दूसरा चरण लागू होने वाला था। उस वक्त मैंने पहली बार जेएनयू में मशाल जुलूस देखा, मैंने देखा कि जनवरी कि सर्द रातों में लोग रात के दो दो बजे तक मिल्क काफी पीते हुए गंगा ढाबा पर देश के मुद्दों के बारे में बहस करते रहते हैं।
आज वो लोग तैयारी कर रहे हैं एक सशक्त और सार्थक कदम उठाने की, इस परिस्थिति से हमें निकालने की किसी कवायद में जुटे होंगे. कुछ अच्छा करने के लिए सिर्फ़ जज्बा ही काफ़ी नहीं होता, उसके साथ चाहिए होता है एक एक्शन प्लान, और ऐसा प्लान बनने के लिए अरसा तक सब भूलकर सिर्फ़ अपने लक्ष्य की पर बढ़ना होता है. आज की पोस्ट में मैं उन्हें और उन सबको नमन करती हूँ जो हमारे देश को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जायेंगे.
दो दिन लगातार उन आतंवादियों की गोलियों और बमों ने सिर्फ़ ताज को क्षति नहीं पहुंचाई है बल्कि मेरे जैसे हर संवेदनशील इंसान को चुनौती दी है. और हम उन्हें मुँहतोड़ जवाब देंगे. न केवल उन आतंकियों को जो इस देश को निशाने पर रखते हैं बल्कि उन नाकारा उन निकम्मे नेताओं को जो इस देश को बेच कर खा जाना चाहते हैं.
ये शोक का नहीं आक्रोश का समय है...कर्मभूमि में आगे बढ़ना मायने रखता है.
तेरा वैभव अमर रहे माँ...हम दिन चार रहे न रहे
27 November, 2008
लेकिन आग जलनी चाहिए.
साथ ही साथ आक्रोश भी है, अपने कुछ न कर पाने का बेहद अफ़सोस भी, अपनी लाचारी पर बेहद दुःख भी। इसलिए आजकल कुछ लिखने से ज्यादा पढ़ रही हूँ, कुछ कवितायेँ कालजयी होती हैं। हर माहौल में उनकी जरूरत होती है।
आज दुष्यंत कुमार की मेरी सबसे पसंदीदा कविता पढ़ा रही हूँ। आप में से अधिकांश ने पढ़ी होगी, पर फ़िर से पढ़ना भी अच्छा लगता है।
शब्दों में ही पनाह है...थोड़ा सुकून जो तलाश करती हूँ फ़िर से यहीं आ कर मिलता है। जैसे किसी बुजुर्ग का हाथ हो सर पर...आशीर्वाद हैं ऐसी कवितायेँ
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
-दुष्यंत कुमार
शोक, क्षोभ, क्रोध
वो आयें
अपनी योजना बनाएं
और जहाँ मन करे विस्फोट कर दें
लोगों को बंधक बना लें
मांग करें आतंकवादियों को रिहा करने की
घंटों फायरिंग करें, ग्रेनेड फेकें
हमारे एक एक करके जवान शहीद हों
और मीडिया फ़िर से चीख चीख कर कहे
ये भारत पर अटैक है
और हमारे जवानों की सारी स्ट्रैटेजी टीवी पर दिखा दे
ताकि उन्हें मालूम होता रहे की जवाबी हमला कैसे होने वाला है
कहें की मुंबई रूकती नहीं, डरती नहीं
मगर क्या उपाय है...घर में बंद हो जाएँ
चूल्हा कैसे जलेगा
मैं दिन भर बस परेशान रह सकती हूँ
प्रार्थना कर सकती हूँ
इश्वर सबकी रक्षा करे
क्योंकि अब अपने ही देश में हम सुरक्षित नहीं
मैं न आर्मी में हूँ, न पुलिस में
ऐसी परिस्थिति में मैं कुछ नहीं कर सकती
कोई उपाय नहीं समझ आता इनसे मुकाबला करने का
खून खौल उठता है
ऐसा कुछ नहीं है जो मैं कर सकूँ
तो मैं क्या बस कविता लिखूँ?
26 November, 2008
एक शाम

आज बहुत दिनों बाद निकला
बादल की कुर्सी पे टेक लगा कर बैठ गया
बेशरम चाँद
पूरी शाम हमें घूरता रहा
लाज से लाल चेहरा...
संदली शाम में घुलता रहा
गुलाबी सितारे आँख मिचौली खेलने लगे
सारी शाम वो घास खोदता रहा
ग्लेशियर से जिस्म पिघलते रहे
मिट्टी में छोटी छोटी नदियाँ बहने लगीं
खिलखिलाती गुनगुनाती...
छोटी छोटी फ्राक पहने हुये लड़कियाँ
अंगूठा दिखाकर चिढ़ाती रही
मैं तितलियों के पीछे भागी बहुत
वो उंचे आसमानों में जाती रहीं
चाँद भी मुट्ठी से फिसलता रहा
अंजुरी में उठा कर तुम्हारा अहसास
मैं पलकों पे होंठों पे रखती रही
तुम जाने कहॉ खोये खोये रहे
पुरवा तुम्हारी बाहें बन कर
मेरी मुस्कुराहटें दुलराती रहीं
आँख भीगी भीगी रही
लबों पर धुआँ धुआँ सा रहा
मैं तरसती रही तुम तरसते रहे
एक शाम के धागे उलझते रहे
25 November, 2008
जहाँ न पहुंचे कवि, वहां पहुंचे ब्लोगर :D
"तुम्हारा और स्कॉच का कुछ रिलेशन समझ में नहीं आया" । वो मेरे ऑफिस में नई आई थी, उसके लैपटॉप पर कुछ सेटिंग करते हुए मैंने देखा कि उसने अपने आईपॉड का नाम "whiskey on the rocks" रखा था। जवाब देने के बजाये वह खिलखिला के हँस पड़ी, ये हँसी भी मेरी कुछ खास समझ में नहीं आई, लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं। जैसे कि उन्हें मालूम होता है कि हम उनकी हँसी से अपना सवाल भूल जायेंगे। पर मुझे मालूम करने की जिद पड़ गई। मैंने फ़िर पूछा, बताओगी नहीं, ये व्हिस्की ऑन द रॉक्स का क्या चक्कर है।
"क्योंकि मैं स्कॉच, ऑन द रॉक्स पीती हूँ ...बस इसलिए", अब इस जवाब के बाद चौंकने की बारी मेरी थी। "पर...पर, तुम तो...तुम तो ऐसी लड़की नहीं लगती", मैं हड़बड़ा के बोला था। "कैसी लड़की नहीं लगती...जिसे स्कॉच पसंद हो?", "हाँ...नहीं नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था", मुझे कुछ सूझा नहीं। बाप रे, अब मैं किसी तरह अपना पीछा छुडाने की सोच रहा था...पड़ा एक और महिला मुक्ति वाले से मोर्चा, अब तो ये मैडम मेरी धज्जियाँ उड़ा देंगी, दिखने में कैसी सीधी सादी लगती है(और प्यारी भी...कहीं से आवाज़ आई)। और मैं सोच रहा था कि बेचारी नई आई है, किसी को जानती नहीं, थोड़ा बात कर लेता हूँ मन बहल जायेगा(किसका? उनका या तुम्हारा...फ़िर से आवाज आई)। इतनी सारी बातें एक मिनट के अन्दर दिमाग में घूम गयीं, और फ़िर दिमाग घूम गया...भागने के रास्ते ढूंढ़ना इतना आसान भी तो नहीं था, लंच टाइम था, अपना खाना मैं ले कर ही आया था उनकी सीट पर...और लैपटॉप कि सेटिंग भी अभी पूरी नहीं हुयी थी, कहाँ जाऊं हे भगवान अब तू ही बचा। इतनी कैल्कुलेशन जब चल रही थी तो मैंने देखा नहीं कि उनके चेहरे का हावभाव क्या है, इसलिये कहते हैं कि आदमी को अपने अलावा औरों के बारे में भी सोचना चाहिए।
खैर अब ओखली में सर दिया तो मूसल से क्या डरना...मैंने देखा, मोहतरमा की आँखें उसी तरह चमक रही थी जैसे शेर की अपने सामने शिकार देख कर चमकती होंगी(मैंने वैसे कभी देखा नहीं है, पर शायद जैसे टॉम एंड जेर्री में जब जेरी हाथ में आता है तो टॉम के चेहरे का भाव जैसा ही होगा)। वो किसी दूसरी दुनिया में जा चुकी थी, "जानते हो, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें पहली बार देख कर भी नहीं लगता कि पहली बार देखा है, किसी से पहली बार मिल कर भी लगता है हम पिछले जनम में मिल चुके हैं...वैसा ही था व्हिस्की का स्वाद, कभी लगा ही नहीं कि पहली बार पी है...जैसे पानी, वैसे ही याद नहीं कि पहली बार कब पी थी..."।
अब तो मुझे काटो तो खून नहीं, इस बार बुरे फंसे बच्चू, कवयित्री से पाला पड़ा है, अब तो भगवान भी नहीं बचा सकते, मुझे पूरा यकीं था कि वो मुझे अब कविता पढ़ाने लगेगी। मैं भला आदमी, इस पूरे प्रकरण में सिर्फ़ अपनी इंसानियत के कारण फंसा हूँ। इससे ये निष्कर्ष निकलता है, इंसान होना ग़लत है, पूरी एवोलुशन प्रक्रिया ग़लत थी, आख़िर इवोल्व होके क्या बना...कवि!!?? इससे तो अच्छे हम पाषाण युग में थे, शिकार करो, खाओ...कम से कम किसी कि कविता तो सुननी नहीं पड़ती थी। जैसे मछली कांटे में फंसती है तो घंटों बैठे मनुष्य के चेहरे पर जो भाव होता है उनके चेहरे पर वही भाव नज़र आ रहा था। मैं क्या कर सकता था, मन मार के तैयार हो गया।
पर उन्होंने जब इन्टरनेट एक्स्प्लोरर पर ब्लोगेर खोला तो हमारी सारी हिम्मत जवाब दे गई...ब्लॉगर!!!!! ये तो मनुष्य की सबसे खतरनाक श्रेणी होती है...मैंने किसके चंगुल में फंस गया, हे हनुमान जी बचाओ...अब ये अपना लिंक रट्वायेंगि, और कमेन्ट न देने पर रोज ख़बर लेंगी...अब मैं क्या करूँ, किसकी शरण में जाऊं। मैंने वादा किया कि मैं रोज़ उनका ब्लॉग पढूंगा और कमेन्ट भी दूंगा, और कोई उपाय भी क्या था।
जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि, और जहाँ न पहुंचे कवि वहां पहुंचे ब्लोगेर. तो बचने का कोई उपाय ही नहीं था. आते साथ मैंने सारी नौकरी की साइट्स पर अपना resume डाला...मोंस्टर से लेकर शाइन तक। और आप सब से अनुरोध है कि अगर किसी के ऑफिस में कोई पोस्ट खाली हो तो मुझे बताएं। मानता हूँ आप ब्लोगेर हैं पर उससे पहले आप एक इंसान है, इसलिए कृपया मेरी मदद कीजिये। आज से मैं कान पकड़ता हूँ, व्हिस्की नहीं पियूँगा, कोई लड़की चाहे व्हिस्की पिए या किरासन तेल उससे कारण नहीं पूछूँगा, और किसी लड़की की मदद करने नहीं जाऊँगा।
नोट:इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं उनका किसी भी व्यक्ति जीवित या मृत से कोई लेना देना नहीं है :D.