26 April, 2008

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कभी कभी मेरी सारी कायनात सिमट कर एक ख्वाहिश में आ जाती है
काश तुम अपनी गोद में मेरा सर लेकर बालों में उँगलियाँ फिराओ कुछ देर

उफ़ इस ipl ने जिंदगी की सारी रूमानियत ख़त्म कर दी है

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अंधेरे में खाना बनाना पड़ता है, गर्मी के मारे हालत ख़राब हो जाती है
फ़िर भी पॉवर कट से कोई खास शिकायत नहीं होती
टीवी से हटकर तुम मेरे पास घड़ी भर ठहरते तो हो
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25 April, 2008

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तुम सामने होते हो तो कहने को होती हैं बातें कितनी
फिर भी बिता देते हैं खामोश हम रातें कितनी
ना वैसी ठंढ फिर आई ना फिर कोहरे में लिपटी सड़कें
याद आती हैं वो पहले दिसम्बर की की मुलाकातें कितनी

घर से ऑफिस को निकले और पहुंचे चिडियाघर में हम
बना के सबसे बहाने की हम ने खुराफातें कितनी
न तो मंजिल का पता था और न रस्ते का कोई ख्याल

ले के आता था हर मोड़ सौगातें कितनी

यही तो लुत्फ़ है तेरे साथ ऐ मेरे हमसफ़र
अब गिनती नहीं कि जिंदगी में हैं रातें कितनी

फ़िदा!!!




जिंदगी में दो बार हुआ है कि मैं ख़ुद पे फ़िदा हो गई हूँ...



पहली बार तो अपने 12th के farewell के लिए साड़ी पहनी थी, जिंदगी में पहली बार। और जब आइना देखा तो मंत्रमुग्ध सी देखती रह गई, कि ये मैं ही हूँ क्या...शायद तरुणाई की आहट पहली बार महसूस हुयी थी। वैसे भी वो उम्र होती है आइना देखने की, सजने सँवरने की पर मुझे उस दिन से पहले कभी फुरसत नहीं मिली थी। भाइयों के साथ कभी पेड़ों पर टँगी पायी जाती तो कभी शर्त लगाती कि आंगन की ऊँची सी दीवार पर सब से पहले कौन चढ़ सकता है। और इन खुराफातों से फुरसत मिलती थी तो आराम से सीटी बजती कभी फील्ड में घूमती रहती, माँ कहती रहती कि कब लड़की के गुण आयेंगे इसमें। मुहल्ले के लड़के भी छेड़ते कि कभी तो लगे कि पड़ोस में कोई लड़की रहती है लगता है कि और एक लड़का ही रहता है, कभी सीटी मारती हो कभी लंघी मारती हो सुधर जाओ कौन शादी करेगा तुमसे। मुझे बड़ा मज़ा आता था, क्लास में भी जब बाकी लड़कियां कॉस्मोपोलिटन की बातें discuss करती थी मैं बोरे हो जाती थी, और बड़ा अजीब सा लगता था। कभी कभी जरूर मैं भी उस खुसुर पुसर में लगी हूँ पर ज्यादा मन नहीं लगता।



मेरे लिए बातें थी कि मुझे मोटरसाईकिल क्यों नहीं चलने मिलता है, एक्सीडेंट करुँगी तो देखा जायेगा, बाकी लोगो कि मुझे परवाह नहीं थी कि मेरी बाईक से ठुक के बेचारों के शरीर में कितनी हड्डियाँ बचेंगी. वैसे तो मैं साईकिल पर भी चलती थी तो लोग मुझे रास्ता दे देते थे और तो और बस चलता तो शायद रास्ते के सारे खम्भे भी हट जाते, पता नहीं कितनी बार मैं टकरा चुकी थी. पर मुझे इसमें भी मज़ा आता था. लोग मुझे हेलीकॉप्टर कहते थे, झाँसी की रानी और आफत भूचाल टाइप की हुआ करती थी मैं. मेरे रास्ते पड़ने वालो की शामत.
पर इन सबके बीच अचानक से मेरा farewell आ गया, और जैसा की सब पहनते थे माँ ने मुझे भी साड़ी पहना के तैयार कर दिया, पर झटका तो तब लगा जब सामने देखा। एक पल को तो लगा की कोई और खड़ी है. फ़िर आंखें खुली और महसूस हुआ की ये जो इत्त्तीई सुन्दर लड़की है आईने में, मैं ही हूँ...और शायद जिंदगी में पहली बार मैं शरमा गई...





खैर वो लड़कपन के दिनों तो अब क्या आयेंगे...पढ़ाई और अब जॉब में इतना व्यस्त हो गई की ध्यान ही नहीं रहा फ़िर से ख़ुद को देखने का. इधर कुछ दोस्त आए थे मुम्बई से, उन्हें कुतुब मीनार दिखाना था, तो चल पड़े हम. क्या धूप थी, बाप रे!!!पर मज़ा बहुत आया, और उससे भी ज्यादा आया जब फोटो देखी...धूप में ऐसा खिला हुआ था जैसे सूरजमुखी...लगा की ये मैं ही हूँ...उजली खिली हुयी सी, धूप गर्मी से बेखबर...खिलखिलाती हुयी...चंचल हँसती हुयी...
अपने इस बेलौसपने पर मैं फ़िर से फ़िदा हो गई :)

22 April, 2008

मंथन

आज मैंने बहुत रिसर्च की आइपीअल के बारे में ताकि मैं अच्छे से ये पोस्ट लिख सकूं। पता नहीं किसी को दिख रहा है या नहीं पर ये match जो की सिर्फ़ और सिर्फ़ मार्केटिंग का एक भद्दा तरीका है...क्रिकेट का कर्मयुद्ध कहलाने वाला ये नाटक घरों में युद्ध जरूर कराएगा।

इसकी और भी हज़ार बुराइयाँ नज़र आती हैं मुझे पर जो सबसे पहले दिखता है वो ये है की ये घर में रिमोट की लड़ाई करवाएगा। चाहे जितने भी सड़े हो हमारे टीवी में चलने वाले कचरा सीरियल पर हमारी गृह लक्ष्मी उन सीरियल की रोजाना खुराक के बिना नहीं रह सकती। अब ये सारे match उसी टाइम पर होंगे। ऐसे में पति पत्नी में झगड़ा नहीं होगा तो क्या होगा...कौन सा पति अपनी पत्नी को रिमोट थमने देगा जब क्रिकेट आ रहा है। पत्नियों को तो वैसे भी दोयम दर्जा ही मिलता है, उनकी क्या बिसात की पति से रिमोट छीन ले।

या अगर घर में पत्नी की चलती है तो पति बेचारा किसी ऐसे दोस्त को ढूंढेगा जिसके यहाँ match देख सके, किसी भी परिस्थिति में घर में अच्छा माहौल नहीं बनने वाला है। कोरी बजरिकता वाले इन खेलों में कोई कैसे दिल लगा सकता है ये मेरी समझ से परे है।

अब मैं आती हूँ दूसरे मुद्दे पर...ये नौटंकी आख़िर है क्या...नयापन परोसने की होड़ में आख़िर हमारा मीडिया कहाँ तक जायेगा? इस पतनशील समाज में क्या मीडिया अपनी जिम्मेदारी से इसी तरह मुँह चुराता रहेगा। और क्या हमारे देश के लोगो के पास कोई भी काम नहीं है कि कुछ भी चलते रहता है टीवी पर और वो देखते रहते हैं। आलस से सृजनशीलता का ऐसा हनन होता है कि लोग कुछ सोचना ही नहीं चाहते, जो भी entertainment के नाम पर देखने को आता है देखते रहते हैं।

पहले भी काफ़ी हो हल्ला उठा था कि खिलाड़ी बिकाऊ हौं, खास तौर से जब इंडिया कोई match हार जाती थी तब तो शामत आ जाती थी, आइकन खिलाड़ियों को भी कहाँ छोडा जाता था इस बहस के बाहर। और आज जब खुलेआम बोली लगाई गई तो सब चुप थे कोई आवाज नहीं उठी कहीं से भी। इस तरह एक खिलाड़ी जब सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए लड़ेगा तो देशप्रेम कि भावना कहाँ जायेगी, क्या फ़िर से कभी भारतीय टीम एक संगठित टीम कि तरह खेल पाएगी? क्या सब एक दूसरे को प्रतिद्वंदी कि नज़र से नहीं देखेंगे?

और इतने होहल्ले का मकसद क्या है? इतना पैसा फूंक कर क्या मिलेगा...क्या हासिल हो रह है किसी आम आदमी को? बस फुलझड़ियों कि तरह कुछ देर का आकर्षण ...कई सवाल और जवाब कुछ भी नहीं।

18 April, 2008

random

उजाड़ पत्तों का एक कब्रिस्तान सा है

ये जर्द पत्ते मेरी खामोशी के रंग में रंगे दिखते हैं

कुछ तो बियाबान सी लगने लगी है ज़िन्दगी

जिसमें कुछ आँसू अनाथ बच्चो की तरह बिलखते हैं

मैं कतरा कतरा बिखरती हूँ अपने दामन में

हवाएं तिनका तिनका उड़ा जाती हैं मेरे वजूद के हिस्से

मगरूर हुआ करते थे हम किसी ज़माने में

सोचा था बदल देंगे तकदीर जो भी लिखे

कितने मासूम हुआ करते थे ख्वाबों के काफिले

चांदनी रात में छत पर मिलने की ख्वाहिश की तरह

अब तो दरिया सी है प्यास और समंदर के सामने हैं

दरकते हुए दरख्तों के कभी कभी यूँही

आस कहीं आके सुलगी हुयी सी लगती है

शब्द कभी कभी यूं ही आके परेशां करने लगते हैं कि हमें कहीं कागज पे उतारो, हम यूं ही तुम्हारे दिमाग में नहीं रह सकते. ऐसे में कुछ तो लिखा जाता है, ये कविता नहीं होती, बस कुछ खयालात होते हैं, कुछ उड़ते हुए आवारा बंजारा से ख्याल

15 April, 2008

रिश्ते

किसी ज़माने में जी टीवी पर एक सीरियल आता था...रिश्ते। प्रायः एक या दो एपिसोड में कहानी ख़त्म हो जाती थी। बड़ी प्यारी सी कहानियाँ हुआ करती थीं, इश्क तब इश्क हुआ करता था, आज की तरह नौटंकी नहीं। अनगिन चलने वाले सीरियल मुझे तब भी पसंद नहीं थे, आजकल तो टीवी देखती ही नहीं हूँ।

इश्क...जैसे खुशबू सी आती है इस अल्फाज़ से, उर्दू की बात ही कुछ और होती है। रूमानियत है इस लफ्ज़ में, जैसे कुछ फिल्में थी पाकीजा, मेरे महबूब, उमराव जान, बरसात की रात, और इन सबके ददाजान...मुग़ल-ऐ-आज़म, लगता था की वाह क्या इश्क है, क्या रोल हैं, और क्या डायलॅग होते थे, "साहिबे आलम, ये कनीज आपका हिज्र बर्दाश्त कर सकती है मगर आपकी रुसवाई नहीं"। प्यार बस हो नहीं जाता था, एक लम्हे में, धीरे धीरे चूल्हे पर चाशनी सा पकता था। इजहार की कितनी मुश्किलें होती थी, और प्यार को अंजाम तक पहुँचने की कितनी जद्दोजहद होती थी।

आज के मीडिया में कहाँ है वो प्यार की खुशबु, कहाँ है वो जज्बातों की गहराई, और एक मिनट के प्यार में अंजाम तक पहुँचने की फिक्र किसे है। इजहार के डर को दूर करने के लिए लोग आराम से २४ ड्रिंक्स का सहारा ले सकते हैं। लगता है रुमानियत ख़त्म हो गई है, रिश्तों की जिस सोंधी खुशबु में जिंदगी हसीन लगती थी, pollution के कारन शायदवो हम तक पहुँचती नहीं।

अचानक से लगता है मैं किसी और सदी की हूँ, आज की इस भागम भाग जिंदगी में कहीं खोया हुआ सा पाती हूँ ख़ुद को। आज भी मुझे अच्छा लगता है अगर वो मेरे लिए दरवाजा खोले, चाहे गाड़ी का हो या घर का, आज भी लगता है की कभी कहीं खामोश सा बैठे रहें, बिना कुछ कहे हुए। disco गई मैं (जिंदगी में पहली बार) बहुत अच्छा बीही लगा फ़िर भी given an option main समंदर किनारे उसके साथ बैठना चाहूंगी। मरीन ड्राइव पर बिना कुछ कहे सिर्फ़ हवाओं को महसूस करना ज्यादा अच्छा लगा मुझे। और डांस भी, मुझे अपने घर के ड्राइंग रूम में उसके साथ किसी भी गाने पर थिरकना ज्यादा अच्छा लगेगा।

क्या मैं बहुत अजीब हूँ? इसको ही शायद ठहराव कहते हैं, ये उमर तो बाहर जा के हल्ला गुल्ला करने की, गोल्गाप्पा खाने की, खूब सारी shopping करने की होती है...ये कहाँ ठहर गई हूँ मैं, रुकना तो मेरी फितरत में नहीं था।

खैर कहाँ से कहाँ तक पहुँच गई मैं...बात शुरू की थी रिश्ते से...शायद कहीं कहीं मैं अब भी वैसी ही हूँ...unpredictable

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