12 April, 2008

अवश्यम्भावी

प्रलय का कहीं आह्वान हो
निकट सृष्टि का आवासन हो
हर ओर बस चीत्कार हो
दस दिशा में हाहाकार हो

हो क्रोध से विकराल जब
तलवों से रौंदे काल जब
सब भस्म करना चाहे मन
धरती गगन सागर औ वन

सारा सृजन जब नष्ट हो
मनुपुत्र की आत्मा भ्रष्ट हो
सच झूठ का ना ज्ञान हो
इश्वर का भी ना भान हो

अभिमान जब फुंकार उठे
प्रतिशोध में जब वार उठे
आपस में ही लड़ जाएँ सब
हो विश्वयुद्ध मर जाएँ सब

चुप ही रहोगे ना केशव?
या कुछ कहोगे तुम माधव?
रक्षा करोगे परीक्षित सी
या सीख दोगे अर्जुन सी

फ़िर महाभारत रचा जा रहा है
पर इस बार तो हर तरफ़ कौरव ही हैं

तुम किस ओर से लड़ोगे केशव...ये युद्ध कैसे रुकेगा
और अंत में...क्या कोई बचेगा?

उड़ान तब से आज तक

हम पंछी उन्मुक्त गगन के

पिन्जरबद्ध न गा पायेंगे

कनक तीलियों से टकरा के

पुलकित पंख टूट जायेंगे
हम बहता जल पीने वाले

मर जायेंगे भूखे प्यासे

कहीं भली है कटुक निबोरी

कनक कटोरी की मैदा से

स्वर्ण श्रृंखला के बन्धन में

अपनी गति उड़ान सब भूले

बस सपनो में देख रहे हैं

तरु की फुनगी पर के झूले
ऐसे थे अरमान की उड़ते

नील गगन की सीमा पाने

लाल किरण सी चोंच खोल

चुगते तारक अनार के दाने
होती सीमा हीन क्षितिज से

इन पंखो की होड़ा होड़ी

या तो क्षितिज मिलन बन जाता

या तनती साँसों की डोरी
नीड़ न दो चाहे टहनी का

आश्रय छिन्न भिन्न कर डालो

लेकिन पंख दिए हैं तो

आकुल उड़ान में विघ्न न डालो

काफ़ी बचपन में पढी गई कविता, शीर्षक तू याद नहीं है और ना लेखक का नाम। पार आज काफ़ी सालों बाद भी इस कविता के शब्द दिल को वैसे ही छूते हैं। सच्चाई का इतने सादे शब्दों में चित्रण, आज भी कहीं ऐसी ही जगह पाती हूँ ख़ुद को...

कुछ लोग ऐसे ही पंछियों की तरह होते हैं, उन्हें कुछ भी ना मिले पर आजादी चाहिए होती है, इसके बिना जीवन अर्थहीन हो जाता है। कोई ललक नहीं रहती, कोई उत्साह नहीं रहता और धीरे धीरे पंखों को उड़ने की आदत भी नहीं रहेगी, और इसके साथ ही शायद जिंदगी धीरे धीरे मर जायेगी।

फ़िर ना कोई चहचहाहट गूंजेगी और ना कोई अपनी उड़ान से सबका मन मोहेगा

11 April, 2008

i feel
laying my wounds bare may heal them
making other laugh at me may give me strength
letting it go may finally bring it back
how long can i hide my hurt in a smile
its better to cry and bleed and burn

the pain refuses to go away
and always returns with a vengeance
i am lost...lonely...uncertain
and resurrection seems impossible

trials, punishments, seclusion
i just want a little sunshine now
i am tired of this meloframa called life

कुछ नहीं

एक हफ्ता नहीं था वो
सात दिन थे
और हर दिन में कितने घंटे
हर घंटे में कितने मिनट, हर मिनट में कितने सेकंड

मैंने गिन गिन के काटे थे
कितनी बार हनुमान चालीसा
कितनी देर शिवलिंग के आगे बैठी रही थी

तुम्हारे जाने के आखिरी लम्हे तक मेरा विश्वास नहीं टूटा था माँ
मुझे लगा था तुम मुझे छोड़ के नहीं जा सकती हो
मुझे लगा था मेरा विश्वास तुम्हें वापस ले आएगा
जागते हैं लोग कोमा से...डॉक्टर ने भी कहा था

मैं बैठी रही, अपनी श्रद्धा को लेकर, अपना प्यार लेकर
ना मानने को उद्यत, हठी, जिद्दी
तुम आओगी...कितनी बार तुम्हारा हाथ पकड़ कर झकझोरा था
तुम्हारे कानो में कही थी, वो सारी बातें जो जिंदगी में नहीं कही

क्या तुमने सुना होगा माँ?
पता भी नहीं चला
तुम ऐसे ही गुस्सा होके चली गई थी क्या?
डांटे बिना

इसलिए तुम्हारे बेटी टूट गई माँ
आज सब हंस रहे थे मुझपर...कि मुझे हॉस्पिटल से कितना डर लगता है
मुझे नहीं लगता था ना माँ...

क्या करूँ...मुझे लगता है वहाँ से कोई वापस नहीं आता
मुझे मरने से डर लगता है

मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है माँ
तुम क्यों चली गई?

डरपोक्कीssss

शायद मेरे छोटे भाई बहन अभी यहाँ होते तो ऐसे ही चिढाते मुझे...वैसे भी मुझे सुई से बचपन से iडर लगता है, डॉक्टर से तो और भी ज्यादा, हॉस्पिटल जाने के नाम से तो मेरी घिग्घी बाँध जाती है...

पर ऐसा हमेशा से नहीं था...अभी दो साल पहली की बात है, हम IIMC में नए आए थे, mushkil से चार दिन हुए होंगे, एक soosre से ज्यादा बात cheet भी नहीं होती थी। मेरे हॉस्टल में रहने वाली मेरी एक classmate के पैर में मोच आ गई, मोच का दर्द शाम होते होते बहुत बढ़ गया। JNU कैम्पस में भी डॉक्टर है ये उस वक्त पता नहीं था। डॉक्टर की एक ही जगह मालूम थी दिल्ली में, एम्स... तो मैंने सोचा की उसे एम्स ही ले जाऊँ, पर मेरी दोस्त थी मोटी, उसे अकेले तो ले जाना सम्भव नहीं था, मैंने कितने और लोगो से पूछा, सब कोई ना कोई बहाना बना के मुकर गए। उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा था। होस्टल में ज्यादातर हम बाहर की लड़कियां थी, और किसी के लोकाक गार्जियन का कुछ पक्का नहीं था की कब होंगे कब नहीं, ऐसे में कोई भी मुसीबत किसी पर भी आ सकती थी। मैंने मन बना ही रही थी की उसे अकेले ले जाऊँ टैब तक एक लड़की तैयार हो गई। मुझे याद है उस दिन की दौड़ धुप। पर हम उसे दिखा के x ray कर के ही वापस लौटे थे।

आज ये सारी बातें जैसे सदियों पुरानी लगती हैं...लगता है वो कोई और थी जिसने हारना जाना ही नहीं था, थकन जानी ही नहीं थी, वो उर्जा वो जिंदगी से भरी लड़की जैसे कोई और ही थी...मैंने नहीं

शायद माँ के जाने के बाद सारे लोग ऐसे ही कमजोर हो जाते हैं। एक हफ्ते तक जब इस जद्दोजहद में जीना पड़ता है की शायद वो कोमा से उठ जाए...उसके बाद अगर डर लगता है...जिंदगी से...और मौत से भी...तो शायद कहीं न कहीं justified होता होगा...पता नहीं

rantings

what would you do if you had just one day to live?

what would you do if knew that the clock was ticking and you might be whisked away even before you had hte time to say your goodbyes

and how do you day goodbye

and to whom

how does it feel to know there are no people whom you wave your hand and day that you are leaving...forever

absolute loneliness...maybe nearness to death brings that on all of us. may be everyone feels hte same when he thinks he is going to die.

i would want to read harry potter...all the volumes again. i guess all these years life hasnt taught me anything, but sincerely i dont want to bury my head in something i havent touched all my life...i mean something spiritual...i would not even want to pray for that matter.

life becomes so busy...it feels so frightening that you wont be missed by anybody. the world is complete without you, and your absence wont make a dent anywhere...leave a gaping hole.

and then i think...all these people who have read my blog some 600 types, and of the few who keep coming back to it, will they know that suddenly hte posts stopped coming because i am no more, will someone paste an obituary here???

i dont know, coz i havent told a living soul how important this place is for me.

anyways

i guess i wont be dying after all...a small operation is a small operation and i have these bouts of pessimism at times that makes all feel bleak and black.

10 April, 2008

मुहब्बत

हवाओं की अल्हड़ सी मस्ती सी

उड़ती फिरूं कभी तितली सी

बाहों में भर लूँ सारा आकाश

और दौडूँ उनमें कभी बिजली सी

चंचल...खिल खिल शोख हँसी सी

चली पवन पगली सी

पहले प्यार की मदहोशी सी

खुशबू सावन की मिट्टी सी

इतराती बलखाती नदी सी

कौन हूँ ये मैं...जिंदगी सी :-) :-)

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