10 June, 2008

जन्मदिन मुबारक हो!!!



और इस तरह हम २५ साल के हो गए...तकरीबन आधी जिन्दगी जी ली...आगे देखें क्या होता है :D

09 June, 2008

सरकार राज -review

"power cannot be given...it has to be taken"

with a tagline like that i admit i was a bit doubtful about whether the movie would be up to my expectations, i wondered if the movie was over hyped and would not be able to come up to my expectations.

yes it did and more...it exceeded my expectations. i think after a long time gap we got to see a real movie with everything brought up to perfection. it has the finesse of a legendary movie...and it should go in history like that. RGV gives us a taste of real film making, a movie as it is supposed to be.

the characters are well etched out and make a distinct mark on the movie viewers, the actors play their part to perfection, the dialogues are just to the point, subtle and hard hitting. no wonder some frustrated journos complained the movie has too many of punchlines. they seem to be seeped in cliches for such a long time they refuse to accept good dialogues as such forget appreciation.

the story is tighty edited with no extra shots or frames, the camera angles as usual ad a lot the meaning and mood of the scene being carried out. i specially liked a particular scene in which a shankar goes to rescue a kidnapped person who was as usual kept in a place manned by several gundas. here our protagonist hits an electric pole causing short circuit which sets fire to several trees around, when the fire is doused by water, it creates smoke...and using this as cover they operate. its not just the beauty of the shot but the sheer logic applied that makes you want for more.

from a director's point of view the film is perfect almost flawless. the shots chosen, the cameraword, the screenplay, selection of actors and very importantly....the background score. in indian movies its very rare to find movies whose background score is even noticed. but in this movie the score adds a hell lot of meaning to the scene. i have found better utilization in few movies , mr and mrs iyer for example.

aishwarya is an actress to watch out for, she is absolutely fantastic in her role. subtle, elegant and poised...she holds a strong foothold in the same scene as amitabh, something most actors falter in... but she stays, unshadowed...stays with her head held high.

this a movie that should be taught in media schools when explaining how to make a movie...its not an actor's movie, it owns the stamp of its director, his vision. i wish there were more of these movies...and i wish when i make a movie of my own, it has the level of perfection this movie has.

movies like this inspire several people like us who love cinema, for its larger than life image...the 70 mm magic...so cheers to RGV and Sarkar Raj

07 June, 2008

मेरी पहली कविता हिन्दयुग्म पर

मुझे आज भी अपनी पहली बारिश याद है, क्यूंकि माँ हमेशा छाता लेकर भेजती थी, चाहे कोई भी मौसम होएक गर्मियों की दोपहर मैं कॉलेज में भूल गई अपना छाता और संयोग से बारिश हो गई। मैं अपने दोस्त के साथ घर लौट रही थी की बारिश शुरू हो गई, मेरा डर के मरे बुरा हाल था की माँ दान्तेगी, तभी उसने ऊपर चेहरा उठाया और कहा जब दंत कहोगी तब खाओगी अभी एक बार इन बूंदों को महसूस कर के तो देखो...मैंने चेहरा उठाया और पहली बार बारिश महसूस की...

वैसा ही कुछ खास हुआ इस गुरुवार, मेरी पहली कविता हिंद-युग्म पर पब्लिश हुयी, किसी अनजान से कोने में बहुत कम लोग इस कविता को पढेंगे पर फ़िर भी दिल को एक छोटी सी खुशी मिली।ये लिंक है http://merekavimitra.blogspot.com/2008/06/blog-post_05.html#puja
मेरी पहचान के कम लोग ब्लोगिंग करते हैं और उससे भी कम लोगो को कविता में इन्ट्रेस्ट है और उससे भी कम लोगो को मैं अपनी कविता पढने देती हूँ. ये तो ब्लॉग पर जाने क्यों अपनी कवितायेँ लिखती हूँ...क्योंकि अक्सर मुझे पसंद नहीं होता किसी को अपनी कविता पढाना, शायद इसलिए कि यहाँ मुझे कोई जानता नहीं है, सब अजनबी हैं और अजनबियों से वैसा डर नहीं लगता. क्यों कि वो पूछते नहीं हैं कि किस दुःख में तुमने लिखा, ये जानने की कोशिश नहीं करते कि कौन सी खुशी मिली, कविता को उसकी फेस वैल्यू पर लेते हैं उसके पीछे की हिस्ट्री नहीं जानते. मुझे आज भी याद है मेरे छोटे भाई ने एक बार कहा था, "जानती हो दीदी हम तुम्हारी कविता की बड़ाई क्यों नहीं करते कभी, क्योंकि हमको दुःख होता है कि आख़िर ऐसा कौन सा दर्द महसूस कर रही हो और किसी से कह क्यों नहीं पाती, और हम तुम्हारे दर्द को कम क्यों नहीं कर सकते". उस दिन सादगी से कही उसकी बात दिल को छू गई मेरे और मुझे अचानक से लगा कि मेरा नन्हा सा भाई कितना बड़ा हो गया है. आज जाने क्यों उसकी ये बात याद आ गई.देखूं कितने लोग पढ़ते हैं, मेरी कच्ची सी कविता

06 June, 2008

खाली दिमाग के खुराफाती विचार

ईश्वर के दफ्तर में
एक विभाग सिर्फ़ इसलिए है
कि कहीं गलती से
मेरी कोई इच्छा पूरी ना हो जाए

चित्रगुप्त का खाता हिसाब रखता है
मेरे सपनो की उम्र ज्यादा ना हो
वो जन्म लेते ही अकाल मृत्यु को प्राप्त हों

फ़िर भी कई बार होता है
कि कोई नन्हा सा सपना
मेरी ऊँगली पकड़ के खड़ा हो ही जाता है

वह एक जिद्दी सपना
ईश्वर के अहम् को चोट पहुँचाता है
मैं हाथ जोड़ कर उनके सामने खड़ी जो नहीं होती
कोई समझाए उन्हें
इतना अंहकार ठीक नहीं होता


आख़िर ईश्वर का होना भक्ति से ही तो है
अगर कोई उनके होने पर यकीन ना करे
तब ??

लेकिन ऐसी तो कोई मेरी चाह नहीं
छोटी सी ही खुशी चाहती हूँ
फ़िर ईश्वर को इतना क्रोध क्यों है

मुझे क्या किसी और ने बनाया है
ऐसा सौतेला व्यवहार
क्या दो भगवान लड़ गए थे
मेरे जन्म के समय

और ये जो नियति में उलट फेर है
इसलिए है...कि वो अभी भी लड़ते रहते हैं

और उनकी आपस की लड़ाई में
मेरी सपने पिस जाते हैं

ऐसा होता है
तो परमपिता...जो सबसे बड़े हैं
उन्हीं समझाते क्यों नहीं

या वो ईश्वर जो सबसे बड़े हैं
मुझे समझाते क्यों नहीं...

05 June, 2008

मम्मी भूख लगी है

मम्मी भूख लगी है, लेट हो रहे हैं कॉलेज को
मम्मी...मम्मी...
आज बिना खाए चले जाएँगे
देर हो गई है बहुत

नहीं नहीं एक रोटी खा लो,
और कौर कौर कर के खिला देती माँ
एक एक कर के तीन रोटियाँ

याद है...
घर से निकलते हुए भी
एक कौर मुंह में डाल देती वो

अब अक्सर बिना खाए चली जाती हूँ
ज्यादा फर्क नहीं पड़ता
पर जब भूख लगती है
तुम्हारी बहुत याद आती है माँ...

तुमसे अच्छा खाना खाया है कई जगह
कहीं पर बिल्कुल ख़राब खाना भी खाया है
लेकिन तुम्हारे हाथ का खाना नहीं खाया है

जब से तुम गई हो
कुछ भी खा लेती हूँ
मन नहीं भरता
भूख नहीं जाती
प्यास नहीं जाती

तुम्हारे हाथों का खाना चाहिए
मुझे भूख लगी है मम्मी
मम्मी मम्मी...

04 June, 2008

शौक़ है...

बहुत पुराना एक गाना था गुलज़ार का, मेरा कुछ सामान...लगता था जैसे इसके शब्द और धुन एक दूसरे के लिए ही बने हैं. एक बहती हुयी नदी सा गीत था. आज बहुत दिनों बाद गुरु का ये गीत सुना, पता नहीं था कि किसने लिखा है पर लगा की फ़िर से वही गुलज़ार पंचम की जोड़ी है, शब्दों की गुनगुनाहट, बिना किसी छंद के, जैसे बन्धन तोड़ के बहती हुयी कविता.

सुनकर काफ़ी देर तक गूंजते रहते है ये शब्द मन में, और धुन तो खैर लाजवाब है ही. video तो कहीं से नहीं मिला, बस एक रीमिक्स टाइप था, बहुत ढूँढने पर भी सोंग ट्रैक नहीं मिला. आज सोचा की ब्लोग्गिंग के नेक्स्ट स्टेप से रूबरू हो ही जाएँ.
मैंने ये video youtube से लिया है जिसके लिंक है http://www.youtube.com/watch?v=QyUeYRJ1jZc&NR=1


रात का शौक़ है
रात की सोंधी सी
खामोशी का शौक़ है
शौक़ है...

सुबह की रौशनी
बेजुबान सुबह की ओ गुनगुनाती
रौशनी का शौक़ है
शौक़ है...



शौक़ है
सनसनी बादलों का
ये इश्क के बावालों का
बर्फ से खेलते बादलों का
शौक़ है...

काश ये जिंदगी
खेल ही खेल में खो गई होती
रात का शौक़ है
शौक़ है...

नींद की गोलियों का
ख्वाब की लोरियों का
नींद की गोलियाँ
ख्वाब की लोरियाँ
बेजुबान ओस की
बोलियों का
शौक़ है

काश ये जिंदगी
बिन कहे बिन सुने सो गई होती

सुबह की रौशनी
बेजुबान सुबह की ओ गुनगुनाती
रौशनी का शौक़ है

29 May, 2008

missing my ipod



i miss you...subuk subuk :(

ऐसे ही

सुनो, मुझे एक रात ला दो ना...
हाँ चाँद भी ले आना चाहे जितना भी बड़ा मिले
कुछ तारे भी तोड़ देना अगर ज्यादा परेशानी ना हो

जनाब ने "जो हुकुम" कह के सर झुकाया
और दो मिनट में गेट से बाहर

और मैं अपने कीबोर्ड पर उँगलियाँ चलने लगी

दिन तो फ़िर भी मिल जाता है
वो रातें नहीं मिलती
कोहरे वाली, कभी बारिशो में भीगी हुयी
कुछ गीतों की यादों में लिपटी हुयी

वो आस्मान के नीचे खुली खुली सी रातें
क्या सच में कभी ला पायेगा वो

मैं सोच रही थी...शाम ढल गई
रात हो रही थी

कॉल बेल बजी,
और जनाब ने मेरी आंखों पर पट्टी बान्ध दी

और पट्टी खुली तो देखा
घर के गेट पर chevrolet optra लगी हुयी थी

और जनाब का कहना था
ये लो...बैठ के आराम से रात देखो !!!!

अपने लोग

कुछ लोग साथ चला करते थे
कुछ वक्त पहले

ऐसा नहीं होता था कि एक ही ओर जाना होता था
ऐसा भी नहीं कि कुछ काम होता था

ये भी नहीं कि चाय या सिगरेट कि तलब हो किसी को
ये भी नहीं कि एक ही ढाबे का खाना पसंद आता था

हम साथ चलते थे क्योंकि
हमें साथ चलना अच्छा लगता था

रास्ते तो तब भी अलग होते थे
रस्ते अब भी अलग ही हैं हमारे

ये अलग रास्तों पर चलने कि थकन
ये अपनी मंजिल पर जल्दी पहुँचने की होड़

ये नहीं हुआ करती थी उस समय
घंटों टहलना, ठहरना, बातें करना

कभी पार्थसारथी रॉक पर बैठना
सूर्यास्त और चंद्रोदय देखना

जाने कब ये वक्त बीच में आ गया
जाने कब हम अपने अपने रास्ते चलने लगे

और जाने कब...
कई मोड़ों पर मुड़ते मुड़ते
हम सब खो गए...

अपने रास्तों पर
अपनी जिंदगी में
अपनी नौकरी में
अपनी व्यस्तताओं में

सब अपना...
सिवाए...अपनों के.

26 May, 2008

एक शाम

क्यों खास थी वो शाम?

तुम और मैं
एक पार्क की बेंच पर अकेले बैठे रहे थे
काफ़ी देर तक

बस...
कुछ खास बातें भी तो नहीं की थीं
एक भुट्टा खाया था

नहीं...
मेरा भुट्टा था, और तुमने खाया था
मेरा जूठा पानी पिया

मौसम...
भीगा सा, चंचल सा था
बारिश हुयी थी सुबह

पैदल...
देख रहे थे कि कौन थकता है
और लौटना किसे है

हाथ भी तो नहीं पकड़ा था मेरा
मेरी तारीफ़ भी नहीं की
फ़िर?

पर उस शाम
कई दिनों बाद
जैसे हम मिले थे

सिर्फ़ हम...

मॉल की चमचमाहट में
बर्गर और कोक के साथ
शॅपर्स स्टॉप में भटकते हुए
बिग बाज़ार की छूट में

मैं और तुम ही रहते हैं
हम नहीं हो पाते

उस पुरानी सी शाम में
फ़िर से तुम और मैं
हम हो गए थे...

khurafaat

ohh...the joy of khurafaat

the keeda of shaitani

and to make everything ulta pulta

or to change just for the heck of it

i think its after long that i am experiencing this silly feeling thats somewhere near to euphoria, coz i tried something that is not at all in my domain, i changed the template of my other blog, and a little bit of tweaking with html.

software and these infinite lines of coding always seemed greek to me, nothing made any sense and i was really terrified...but today i overcame a great fear of mine

hurraaayyy!!!

13 May, 2008

reaction-perhaps

नदी कैसे बनती है
किसी एक जगह से निकल कर

जैसे गंगोत्री या यमुनोत्री
बढ़ती जाती है...
पर उसका रास्ता कैसे तय होता है
कैसे निश्चित होता है उसका सागर में मिलना

क्या कविता नदी की तरह होती है
कहीं से उठी और जिधर मन किया बहती चली गई

मुझे लगता है कवितायेँ दो तरह की होती हैं
एक तो वो जो नदी की तरह होती हैं

और एक कैनाल की तरह
जिसका रास्ता नक्शों पर पहले से निर्धारित होता है

बहाव दोनों में होता है
और पानी भी

बस दोनों की इच्छा में फर्क होता है
एक मनमौजी होती है...जन्म से
दूसरी किनारों में बंधी
रास्ते पर निर्भर

पर दोनों जीवन देती हैं
खेतों में फसलें उगाती हैं


बस एक को बारिश में किनारे तोड़ कर बहने की इजाजत होती है
दूसरे को नहीं

क्या नदी कविता की तरह होती है?

समसामयिकता

नीलकंठ बनना आसान नहीं होता
सारा हलाहल
कंठ में रोक लेना

द्वेष, दुःख, क्रोध, अपमान
और कभी कभी तटस्थता भी

आप सोचोगे तटस्थता कैसे
ये कौन सा विष है?

पर सोचो तो सबसे भयंकर
बस यही विष है

इसे कंठ में रोक लेने के लिए
शंकर जैसा तप का ओज चाहिए होगा

या कौन जाने इश्वर होने की आवश्यकता भी हो
विष पीना ही काफ़ी नहीं होता...
उसके बाद जीना भी अवश्यम्भावी होता है


मृत्यु समाधान नहीं है समस्या का
इसलिए भयानक विष पी कर भी जीवित रहने के संसाधनों की खोज जरूरी है


ये तटस्थता जब जयपुर में २० लोगो की मृत्यु का समाचार देख
लोग चैनल बदल के आईपीअल देखने लगते हैं

जब बर्मा के साईक्लोन के बारे में गूगल न्यूज़ पढ़कर
वीकएंड में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म का रिव्यू पढ़ने लगते हैं

संवेदनशून्य भी कह सकते हैं
पर ये शब्द शायद ज्यादा इस्तेमाल हो चुका है

इसलिए तटस्थ कहूँगी
हलाहल को पी कर भी तटस्थ

शायद इतना मुश्किल भी नहीं होता
शंकर होना...

06 May, 2008

एक रोज मैंने सोचा

बहुत दिन हो गए
अपने आप से नहीं मिली हूँ
सोचती हूँ थोड़ा वक्त निकाल
मिल आऊं एक रोज़


जैसे उस नीली जींस के
पिछले पॉकेट में रखा हुआ है
मेरा पुराना वालेट
और थोडी रेजगारी
वैसे ही
कहीं भुलाई हुयी हूँ मैं


अब तक रखा
कॉलेज का आईडी कार्ड
जैसे अभी भी उसी पहचान
में पाना चाहती हूँ ख़ुद को
जिन आंखों में
सपनो पर बन्धन नहीं होते थे


कहीं किसी पहाड़ी की चोटी पर
दुपट्टे से खिलवाड़ करती हुयी
वहीं की हवा में
कहीं उड़ती हुयी हूँ मैं शायद


सोच रही हूँ
मिल आऊं
अपने आप से

इससे पहले कि
अपना पता ही भुला दूँ

01 May, 2008

एक रिश्ता ऐसा भी

याद है पहली मर्तबा जब छुपा के खाई थी

माँ से, अपने आँगन की धुली हुयी मिट्टी

और वो कबड्डी खेलते हुए बॉर्डर पहुँचने को

भरी थी मुट्ठी में मुह्ल्ले की गली की मिट्टी

पांचवी में भूगोल का एक चैप्टर था

क्यों लाल थी हमारे शहर की मिट्टी

खेल में जब कभी गिर जाते थे

घाव भर देती थी स्कूल की मिट्टी

उसके साथ भीगना पहली बारिश में

और पैरों के नीचे भीग रही मिट्टी

वो हर दिन उसी का इंतज़ार

जब कि बस दिन भर खोदती थी मिट्टी

जिंदगी भर निभाना मुश्किल हो गर

रिश्तों की जड़ सम्हालती नहीं मिट्टी

शहर की भाग दौड़ में भी है
हर एक के अन्दर अपने शहर की मिट्टी

जाने कितने शहर अब अपने है

मुझमें बसती है इन सबकी मिट्टी

मैं खफा हूँ

मैं खफा हूँ
हर चीज़ से
IPL से, उन लोगो से जो इसे देखते हैं
उन लोगो से जो बिजली की चोरी करते हैं
जिनके कारण मेरे घर में बिजली नहीं आती

मैं खफा हूँ
उन असामाजिक लोगो से
जिन्हें तमीज नहीं है
कि रात के बारह बजे
इस तरह loudspeaker नहीं चलाना चाहिए

मैं खफा हूँ इन मच्छरों से
जो मुझे चैन से एक पल बैठने नहीं देते
परेशान कर के रख दिया है

मैं खफा हूँ
उन सारे अमीर देशों से
जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं
इस गर्मी में ठंढक आती है
तो सिर्फ़ रिश्तों में


मैं खफा हूँ उन रिश्तों से
जिन तक जाने के पुल टूटे हुए हैं
और इस पार से मैं उन्हें बस देख सकती हूँ
धुन्ध्लाते हुए

मैं खफा हूँ अपनेआप से
किन चीजों में उलझ के रह गई हूँ
उफ्फ्फ़ !!!!!

30 April, 2008

परवीन शाकिर की एक नज्म


इधर दो चार दिनों से परवीन शाकिर की "खुली आंखों में सपना" नज्मों और गजलों का संकलन पढ़ रही हूँ। ख़रीदा तो काफ़ी पहले था पर अपने किताबघर से निकल नहीं पायी थी। काफ़ी अच्छा लग रहा है उनको पढ़ना, इस पाकिस्तानी शायर के बारे में पहली बार पापा से सुना था। फ़िर उनका एक शेर कहीं पढ़ा "उँगलियों को तराश दें फ़िर भी...आदतन उसका नाम लिखेंगे"। जेहन में गहरे उतर गई थी पंक्तियाँ और परवीन उन कुछ शायरों में से हैं जिन्हें पढ़कर शायरी के लिए दिल में एक पाकीजा सा जज्बा करवट बदलता था।

आज इनकी एक नज्म बाँटने की ख्वाहिश है....


पूरा दुःख और आधा चाँद
हिज्र की शब और ऐसा चाँद

किस मकतल से गुजरा होगा
ऐसा सहमा सहमा चाँद

यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तनहा चाँद

मेरे मुंह हो किस हैरत से
देख रहा है भोला चाँद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चाँद

इतने रोशन चेहरे पर भी
सूरज का है साया चाँद

जब पानी में चेहरा देखा
तूने किसको सोचा चाँद

बरगद की एक शाख हटाकर
जाने किसको झाँका चाँद

रात के शाने पर सर रखे
देख रहा है सपना चाँद

सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क में सच्चा चाँद

रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद

29 April, 2008

ऐ जिंदगी

तुम्हारी आवाज़ का तिलिस्म

जैसे जंगल में ठहरी हुयी हवा

थोड़ा शोर, थोड़ी खामोशी

जैसे सागर की लहरों का किनारे आना

और पैरों को छूकर चले जाना

जैसे भीड़ में

अचानक मिल जाए कोई पुराना दोस्त

या छत पर आ गिरे

पड़ोसी की काटी हुयी पतंग

कुछ छोटी छोटी खुशियाँ

जिनमें जिन्दगी का लुत्फ़ मिलता है

जैसे जब तुम मेरा नाम लेते हो...

28 April, 2008

to you...mummy


dear mummy,
this is my 101th post and this is for you. whatever i am whatever i will ever be...its all because of you. i love you maa
कभी कभी तो यकीं नहीं होता कि तुम सच में चली गई हमेशा के लिए। तुम्हारी बहुत याद आती है माँ

26 April, 2008

...

कभी कभी मेरी सारी कायनात सिमट कर एक ख्वाहिश में आ जाती है
काश तुम अपनी गोद में मेरा सर लेकर बालों में उँगलियाँ फिराओ कुछ देर

उफ़ इस ipl ने जिंदगी की सारी रूमानियत ख़त्म कर दी है

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अंधेरे में खाना बनाना पड़ता है, गर्मी के मारे हालत ख़राब हो जाती है
फ़िर भी पॉवर कट से कोई खास शिकायत नहीं होती
टीवी से हटकर तुम मेरे पास घड़ी भर ठहरते तो हो
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25 April, 2008

....

तुम सामने होते हो तो कहने को होती हैं बातें कितनी
फिर भी बिता देते हैं खामोश हम रातें कितनी
ना वैसी ठंढ फिर आई ना फिर कोहरे में लिपटी सड़कें
याद आती हैं वो पहले दिसम्बर की की मुलाकातें कितनी

घर से ऑफिस को निकले और पहुंचे चिडियाघर में हम
बना के सबसे बहाने की हम ने खुराफातें कितनी
न तो मंजिल का पता था और न रस्ते का कोई ख्याल

ले के आता था हर मोड़ सौगातें कितनी

यही तो लुत्फ़ है तेरे साथ ऐ मेरे हमसफ़र
अब गिनती नहीं कि जिंदगी में हैं रातें कितनी

फ़िदा!!!




जिंदगी में दो बार हुआ है कि मैं ख़ुद पे फ़िदा हो गई हूँ...



पहली बार तो अपने 12th के farewell के लिए साड़ी पहनी थी, जिंदगी में पहली बार। और जब आइना देखा तो मंत्रमुग्ध सी देखती रह गई, कि ये मैं ही हूँ क्या...शायद तरुणाई की आहट पहली बार महसूस हुयी थी। वैसे भी वो उम्र होती है आइना देखने की, सजने सँवरने की पर मुझे उस दिन से पहले कभी फुरसत नहीं मिली थी। भाइयों के साथ कभी पेड़ों पर टँगी पायी जाती तो कभी शर्त लगाती कि आंगन की ऊँची सी दीवार पर सब से पहले कौन चढ़ सकता है। और इन खुराफातों से फुरसत मिलती थी तो आराम से सीटी बजती कभी फील्ड में घूमती रहती, माँ कहती रहती कि कब लड़की के गुण आयेंगे इसमें। मुहल्ले के लड़के भी छेड़ते कि कभी तो लगे कि पड़ोस में कोई लड़की रहती है लगता है कि और एक लड़का ही रहता है, कभी सीटी मारती हो कभी लंघी मारती हो सुधर जाओ कौन शादी करेगा तुमसे। मुझे बड़ा मज़ा आता था, क्लास में भी जब बाकी लड़कियां कॉस्मोपोलिटन की बातें discuss करती थी मैं बोरे हो जाती थी, और बड़ा अजीब सा लगता था। कभी कभी जरूर मैं भी उस खुसुर पुसर में लगी हूँ पर ज्यादा मन नहीं लगता।



मेरे लिए बातें थी कि मुझे मोटरसाईकिल क्यों नहीं चलने मिलता है, एक्सीडेंट करुँगी तो देखा जायेगा, बाकी लोगो कि मुझे परवाह नहीं थी कि मेरी बाईक से ठुक के बेचारों के शरीर में कितनी हड्डियाँ बचेंगी. वैसे तो मैं साईकिल पर भी चलती थी तो लोग मुझे रास्ता दे देते थे और तो और बस चलता तो शायद रास्ते के सारे खम्भे भी हट जाते, पता नहीं कितनी बार मैं टकरा चुकी थी. पर मुझे इसमें भी मज़ा आता था. लोग मुझे हेलीकॉप्टर कहते थे, झाँसी की रानी और आफत भूचाल टाइप की हुआ करती थी मैं. मेरे रास्ते पड़ने वालो की शामत.
पर इन सबके बीच अचानक से मेरा farewell आ गया, और जैसा की सब पहनते थे माँ ने मुझे भी साड़ी पहना के तैयार कर दिया, पर झटका तो तब लगा जब सामने देखा। एक पल को तो लगा की कोई और खड़ी है. फ़िर आंखें खुली और महसूस हुआ की ये जो इत्त्तीई सुन्दर लड़की है आईने में, मैं ही हूँ...और शायद जिंदगी में पहली बार मैं शरमा गई...





खैर वो लड़कपन के दिनों तो अब क्या आयेंगे...पढ़ाई और अब जॉब में इतना व्यस्त हो गई की ध्यान ही नहीं रहा फ़िर से ख़ुद को देखने का. इधर कुछ दोस्त आए थे मुम्बई से, उन्हें कुतुब मीनार दिखाना था, तो चल पड़े हम. क्या धूप थी, बाप रे!!!पर मज़ा बहुत आया, और उससे भी ज्यादा आया जब फोटो देखी...धूप में ऐसा खिला हुआ था जैसे सूरजमुखी...लगा की ये मैं ही हूँ...उजली खिली हुयी सी, धूप गर्मी से बेखबर...खिलखिलाती हुयी...चंचल हँसती हुयी...
अपने इस बेलौसपने पर मैं फ़िर से फ़िदा हो गई :)

22 April, 2008

मंथन

आज मैंने बहुत रिसर्च की आइपीअल के बारे में ताकि मैं अच्छे से ये पोस्ट लिख सकूं। पता नहीं किसी को दिख रहा है या नहीं पर ये match जो की सिर्फ़ और सिर्फ़ मार्केटिंग का एक भद्दा तरीका है...क्रिकेट का कर्मयुद्ध कहलाने वाला ये नाटक घरों में युद्ध जरूर कराएगा।

इसकी और भी हज़ार बुराइयाँ नज़र आती हैं मुझे पर जो सबसे पहले दिखता है वो ये है की ये घर में रिमोट की लड़ाई करवाएगा। चाहे जितने भी सड़े हो हमारे टीवी में चलने वाले कचरा सीरियल पर हमारी गृह लक्ष्मी उन सीरियल की रोजाना खुराक के बिना नहीं रह सकती। अब ये सारे match उसी टाइम पर होंगे। ऐसे में पति पत्नी में झगड़ा नहीं होगा तो क्या होगा...कौन सा पति अपनी पत्नी को रिमोट थमने देगा जब क्रिकेट आ रहा है। पत्नियों को तो वैसे भी दोयम दर्जा ही मिलता है, उनकी क्या बिसात की पति से रिमोट छीन ले।

या अगर घर में पत्नी की चलती है तो पति बेचारा किसी ऐसे दोस्त को ढूंढेगा जिसके यहाँ match देख सके, किसी भी परिस्थिति में घर में अच्छा माहौल नहीं बनने वाला है। कोरी बजरिकता वाले इन खेलों में कोई कैसे दिल लगा सकता है ये मेरी समझ से परे है।

अब मैं आती हूँ दूसरे मुद्दे पर...ये नौटंकी आख़िर है क्या...नयापन परोसने की होड़ में आख़िर हमारा मीडिया कहाँ तक जायेगा? इस पतनशील समाज में क्या मीडिया अपनी जिम्मेदारी से इसी तरह मुँह चुराता रहेगा। और क्या हमारे देश के लोगो के पास कोई भी काम नहीं है कि कुछ भी चलते रहता है टीवी पर और वो देखते रहते हैं। आलस से सृजनशीलता का ऐसा हनन होता है कि लोग कुछ सोचना ही नहीं चाहते, जो भी entertainment के नाम पर देखने को आता है देखते रहते हैं।

पहले भी काफ़ी हो हल्ला उठा था कि खिलाड़ी बिकाऊ हौं, खास तौर से जब इंडिया कोई match हार जाती थी तब तो शामत आ जाती थी, आइकन खिलाड़ियों को भी कहाँ छोडा जाता था इस बहस के बाहर। और आज जब खुलेआम बोली लगाई गई तो सब चुप थे कोई आवाज नहीं उठी कहीं से भी। इस तरह एक खिलाड़ी जब सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए लड़ेगा तो देशप्रेम कि भावना कहाँ जायेगी, क्या फ़िर से कभी भारतीय टीम एक संगठित टीम कि तरह खेल पाएगी? क्या सब एक दूसरे को प्रतिद्वंदी कि नज़र से नहीं देखेंगे?

और इतने होहल्ले का मकसद क्या है? इतना पैसा फूंक कर क्या मिलेगा...क्या हासिल हो रह है किसी आम आदमी को? बस फुलझड़ियों कि तरह कुछ देर का आकर्षण ...कई सवाल और जवाब कुछ भी नहीं।

18 April, 2008

random

उजाड़ पत्तों का एक कब्रिस्तान सा है

ये जर्द पत्ते मेरी खामोशी के रंग में रंगे दिखते हैं

कुछ तो बियाबान सी लगने लगी है ज़िन्दगी

जिसमें कुछ आँसू अनाथ बच्चो की तरह बिलखते हैं

मैं कतरा कतरा बिखरती हूँ अपने दामन में

हवाएं तिनका तिनका उड़ा जाती हैं मेरे वजूद के हिस्से

मगरूर हुआ करते थे हम किसी ज़माने में

सोचा था बदल देंगे तकदीर जो भी लिखे

कितने मासूम हुआ करते थे ख्वाबों के काफिले

चांदनी रात में छत पर मिलने की ख्वाहिश की तरह

अब तो दरिया सी है प्यास और समंदर के सामने हैं

दरकते हुए दरख्तों के कभी कभी यूँही

आस कहीं आके सुलगी हुयी सी लगती है

शब्द कभी कभी यूं ही आके परेशां करने लगते हैं कि हमें कहीं कागज पे उतारो, हम यूं ही तुम्हारे दिमाग में नहीं रह सकते. ऐसे में कुछ तो लिखा जाता है, ये कविता नहीं होती, बस कुछ खयालात होते हैं, कुछ उड़ते हुए आवारा बंजारा से ख्याल

15 April, 2008

रिश्ते

किसी ज़माने में जी टीवी पर एक सीरियल आता था...रिश्ते। प्रायः एक या दो एपिसोड में कहानी ख़त्म हो जाती थी। बड़ी प्यारी सी कहानियाँ हुआ करती थीं, इश्क तब इश्क हुआ करता था, आज की तरह नौटंकी नहीं। अनगिन चलने वाले सीरियल मुझे तब भी पसंद नहीं थे, आजकल तो टीवी देखती ही नहीं हूँ।

इश्क...जैसे खुशबू सी आती है इस अल्फाज़ से, उर्दू की बात ही कुछ और होती है। रूमानियत है इस लफ्ज़ में, जैसे कुछ फिल्में थी पाकीजा, मेरे महबूब, उमराव जान, बरसात की रात, और इन सबके ददाजान...मुग़ल-ऐ-आज़म, लगता था की वाह क्या इश्क है, क्या रोल हैं, और क्या डायलॅग होते थे, "साहिबे आलम, ये कनीज आपका हिज्र बर्दाश्त कर सकती है मगर आपकी रुसवाई नहीं"। प्यार बस हो नहीं जाता था, एक लम्हे में, धीरे धीरे चूल्हे पर चाशनी सा पकता था। इजहार की कितनी मुश्किलें होती थी, और प्यार को अंजाम तक पहुँचने की कितनी जद्दोजहद होती थी।

आज के मीडिया में कहाँ है वो प्यार की खुशबु, कहाँ है वो जज्बातों की गहराई, और एक मिनट के प्यार में अंजाम तक पहुँचने की फिक्र किसे है। इजहार के डर को दूर करने के लिए लोग आराम से २४ ड्रिंक्स का सहारा ले सकते हैं। लगता है रुमानियत ख़त्म हो गई है, रिश्तों की जिस सोंधी खुशबु में जिंदगी हसीन लगती थी, pollution के कारन शायदवो हम तक पहुँचती नहीं।

अचानक से लगता है मैं किसी और सदी की हूँ, आज की इस भागम भाग जिंदगी में कहीं खोया हुआ सा पाती हूँ ख़ुद को। आज भी मुझे अच्छा लगता है अगर वो मेरे लिए दरवाजा खोले, चाहे गाड़ी का हो या घर का, आज भी लगता है की कभी कहीं खामोश सा बैठे रहें, बिना कुछ कहे हुए। disco गई मैं (जिंदगी में पहली बार) बहुत अच्छा बीही लगा फ़िर भी given an option main समंदर किनारे उसके साथ बैठना चाहूंगी। मरीन ड्राइव पर बिना कुछ कहे सिर्फ़ हवाओं को महसूस करना ज्यादा अच्छा लगा मुझे। और डांस भी, मुझे अपने घर के ड्राइंग रूम में उसके साथ किसी भी गाने पर थिरकना ज्यादा अच्छा लगेगा।

क्या मैं बहुत अजीब हूँ? इसको ही शायद ठहराव कहते हैं, ये उमर तो बाहर जा के हल्ला गुल्ला करने की, गोल्गाप्पा खाने की, खूब सारी shopping करने की होती है...ये कहाँ ठहर गई हूँ मैं, रुकना तो मेरी फितरत में नहीं था।

खैर कहाँ से कहाँ तक पहुँच गई मैं...बात शुरू की थी रिश्ते से...शायद कहीं कहीं मैं अब भी वैसी ही हूँ...unpredictable

12 April, 2008

अवश्यम्भावी

प्रलय का कहीं आह्वान हो
निकट सृष्टि का आवासन हो
हर ओर बस चीत्कार हो
दस दिशा में हाहाकार हो

हो क्रोध से विकराल जब
तलवों से रौंदे काल जब
सब भस्म करना चाहे मन
धरती गगन सागर औ वन

सारा सृजन जब नष्ट हो
मनुपुत्र की आत्मा भ्रष्ट हो
सच झूठ का ना ज्ञान हो
इश्वर का भी ना भान हो

अभिमान जब फुंकार उठे
प्रतिशोध में जब वार उठे
आपस में ही लड़ जाएँ सब
हो विश्वयुद्ध मर जाएँ सब

चुप ही रहोगे ना केशव?
या कुछ कहोगे तुम माधव?
रक्षा करोगे परीक्षित सी
या सीख दोगे अर्जुन सी

फ़िर महाभारत रचा जा रहा है
पर इस बार तो हर तरफ़ कौरव ही हैं

तुम किस ओर से लड़ोगे केशव...ये युद्ध कैसे रुकेगा
और अंत में...क्या कोई बचेगा?

उड़ान तब से आज तक

हम पंछी उन्मुक्त गगन के

पिन्जरबद्ध न गा पायेंगे

कनक तीलियों से टकरा के

पुलकित पंख टूट जायेंगे
हम बहता जल पीने वाले

मर जायेंगे भूखे प्यासे

कहीं भली है कटुक निबोरी

कनक कटोरी की मैदा से

स्वर्ण श्रृंखला के बन्धन में

अपनी गति उड़ान सब भूले

बस सपनो में देख रहे हैं

तरु की फुनगी पर के झूले
ऐसे थे अरमान की उड़ते

नील गगन की सीमा पाने

लाल किरण सी चोंच खोल

चुगते तारक अनार के दाने
होती सीमा हीन क्षितिज से

इन पंखो की होड़ा होड़ी

या तो क्षितिज मिलन बन जाता

या तनती साँसों की डोरी
नीड़ न दो चाहे टहनी का

आश्रय छिन्न भिन्न कर डालो

लेकिन पंख दिए हैं तो

आकुल उड़ान में विघ्न न डालो

काफ़ी बचपन में पढी गई कविता, शीर्षक तू याद नहीं है और ना लेखक का नाम। पार आज काफ़ी सालों बाद भी इस कविता के शब्द दिल को वैसे ही छूते हैं। सच्चाई का इतने सादे शब्दों में चित्रण, आज भी कहीं ऐसी ही जगह पाती हूँ ख़ुद को...

कुछ लोग ऐसे ही पंछियों की तरह होते हैं, उन्हें कुछ भी ना मिले पर आजादी चाहिए होती है, इसके बिना जीवन अर्थहीन हो जाता है। कोई ललक नहीं रहती, कोई उत्साह नहीं रहता और धीरे धीरे पंखों को उड़ने की आदत भी नहीं रहेगी, और इसके साथ ही शायद जिंदगी धीरे धीरे मर जायेगी।

फ़िर ना कोई चहचहाहट गूंजेगी और ना कोई अपनी उड़ान से सबका मन मोहेगा

11 April, 2008

i feel
laying my wounds bare may heal them
making other laugh at me may give me strength
letting it go may finally bring it back
how long can i hide my hurt in a smile
its better to cry and bleed and burn

the pain refuses to go away
and always returns with a vengeance
i am lost...lonely...uncertain
and resurrection seems impossible

trials, punishments, seclusion
i just want a little sunshine now
i am tired of this meloframa called life

कुछ नहीं

एक हफ्ता नहीं था वो
सात दिन थे
और हर दिन में कितने घंटे
हर घंटे में कितने मिनट, हर मिनट में कितने सेकंड

मैंने गिन गिन के काटे थे
कितनी बार हनुमान चालीसा
कितनी देर शिवलिंग के आगे बैठी रही थी

तुम्हारे जाने के आखिरी लम्हे तक मेरा विश्वास नहीं टूटा था माँ
मुझे लगा था तुम मुझे छोड़ के नहीं जा सकती हो
मुझे लगा था मेरा विश्वास तुम्हें वापस ले आएगा
जागते हैं लोग कोमा से...डॉक्टर ने भी कहा था

मैं बैठी रही, अपनी श्रद्धा को लेकर, अपना प्यार लेकर
ना मानने को उद्यत, हठी, जिद्दी
तुम आओगी...कितनी बार तुम्हारा हाथ पकड़ कर झकझोरा था
तुम्हारे कानो में कही थी, वो सारी बातें जो जिंदगी में नहीं कही

क्या तुमने सुना होगा माँ?
पता भी नहीं चला
तुम ऐसे ही गुस्सा होके चली गई थी क्या?
डांटे बिना

इसलिए तुम्हारे बेटी टूट गई माँ
आज सब हंस रहे थे मुझपर...कि मुझे हॉस्पिटल से कितना डर लगता है
मुझे नहीं लगता था ना माँ...

क्या करूँ...मुझे लगता है वहाँ से कोई वापस नहीं आता
मुझे मरने से डर लगता है

मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है माँ
तुम क्यों चली गई?

डरपोक्कीssss

शायद मेरे छोटे भाई बहन अभी यहाँ होते तो ऐसे ही चिढाते मुझे...वैसे भी मुझे सुई से बचपन से iडर लगता है, डॉक्टर से तो और भी ज्यादा, हॉस्पिटल जाने के नाम से तो मेरी घिग्घी बाँध जाती है...

पर ऐसा हमेशा से नहीं था...अभी दो साल पहली की बात है, हम IIMC में नए आए थे, mushkil से चार दिन हुए होंगे, एक soosre से ज्यादा बात cheet भी नहीं होती थी। मेरे हॉस्टल में रहने वाली मेरी एक classmate के पैर में मोच आ गई, मोच का दर्द शाम होते होते बहुत बढ़ गया। JNU कैम्पस में भी डॉक्टर है ये उस वक्त पता नहीं था। डॉक्टर की एक ही जगह मालूम थी दिल्ली में, एम्स... तो मैंने सोचा की उसे एम्स ही ले जाऊँ, पर मेरी दोस्त थी मोटी, उसे अकेले तो ले जाना सम्भव नहीं था, मैंने कितने और लोगो से पूछा, सब कोई ना कोई बहाना बना के मुकर गए। उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा था। होस्टल में ज्यादातर हम बाहर की लड़कियां थी, और किसी के लोकाक गार्जियन का कुछ पक्का नहीं था की कब होंगे कब नहीं, ऐसे में कोई भी मुसीबत किसी पर भी आ सकती थी। मैंने मन बना ही रही थी की उसे अकेले ले जाऊँ टैब तक एक लड़की तैयार हो गई। मुझे याद है उस दिन की दौड़ धुप। पर हम उसे दिखा के x ray कर के ही वापस लौटे थे।

आज ये सारी बातें जैसे सदियों पुरानी लगती हैं...लगता है वो कोई और थी जिसने हारना जाना ही नहीं था, थकन जानी ही नहीं थी, वो उर्जा वो जिंदगी से भरी लड़की जैसे कोई और ही थी...मैंने नहीं

शायद माँ के जाने के बाद सारे लोग ऐसे ही कमजोर हो जाते हैं। एक हफ्ते तक जब इस जद्दोजहद में जीना पड़ता है की शायद वो कोमा से उठ जाए...उसके बाद अगर डर लगता है...जिंदगी से...और मौत से भी...तो शायद कहीं न कहीं justified होता होगा...पता नहीं

rantings

what would you do if you had just one day to live?

what would you do if knew that the clock was ticking and you might be whisked away even before you had hte time to say your goodbyes

and how do you day goodbye

and to whom

how does it feel to know there are no people whom you wave your hand and day that you are leaving...forever

absolute loneliness...maybe nearness to death brings that on all of us. may be everyone feels hte same when he thinks he is going to die.

i would want to read harry potter...all the volumes again. i guess all these years life hasnt taught me anything, but sincerely i dont want to bury my head in something i havent touched all my life...i mean something spiritual...i would not even want to pray for that matter.

life becomes so busy...it feels so frightening that you wont be missed by anybody. the world is complete without you, and your absence wont make a dent anywhere...leave a gaping hole.

and then i think...all these people who have read my blog some 600 types, and of the few who keep coming back to it, will they know that suddenly hte posts stopped coming because i am no more, will someone paste an obituary here???

i dont know, coz i havent told a living soul how important this place is for me.

anyways

i guess i wont be dying after all...a small operation is a small operation and i have these bouts of pessimism at times that makes all feel bleak and black.

10 April, 2008

मुहब्बत

हवाओं की अल्हड़ सी मस्ती सी

उड़ती फिरूं कभी तितली सी

बाहों में भर लूँ सारा आकाश

और दौडूँ उनमें कभी बिजली सी

चंचल...खिल खिल शोख हँसी सी

चली पवन पगली सी

पहले प्यार की मदहोशी सी

खुशबू सावन की मिट्टी सी

इतराती बलखाती नदी सी

कौन हूँ ये मैं...जिंदगी सी :-) :-)

खिलखिलाहट

मिल जाए तो सारा आसमाँ भी थोड़ा लगता है
टुकड़े टुकड़े चिन्दियों में जोड़ा लगता है
मैं भी थोड़ी थोड़ी सी अधूरी लगती हूँ
तू भी थोड़ा थोड़ा सा अधूरा लगता है

थोड़ा थोड़ा आसमाँ मैं जेब में रखती हूँ
थोड़ा थोड़ा आसमाँ तेरी मुट्ठी से लेकर
और थोडी सी जमीं पर घर बनाती हूँ
अपना सर किसी शाम तेरे काँधे पे रखकर

एक टुकड़ा आसमाँ घर लौटते हुए
रोज फूलों में छुपाकर तुम लाते हो
एक टुकड़ा आसमाँ हर शाम मैं भी तो
चाय की प्याली में भर कर छत पर लाती हूँ

नींद के आगोश में तुम रात होते हो
मैं धीरे धीरे कर के हर टुकड़ा निकलती हूँ
और यादों के धागों से सिलती हूँ चुप चाप
थोड़ा मेरा और थोड़ा तुम्हारा आसमाँ

इसमें खिलखिलाहट का एक चाँद टाँकती हूँ
और आंसू के कुछ तारों से सजाती हूँ
हर रात पहले से थोड़ा बड़ा आसमाँ
खिड़की और दरवाजे पे टाँग आती हूँ

फ़िर भूलकर ये सारे आसमाँ का किस्सा
चैन से तेरी बाहों में आकर सो जाती हूँ

08 April, 2008

random

it's a bleak day
as i stare in the infinite
i find, i have lost myself

to begin the journey
to redicover myself
i need my companion

endless sojourns
miles and miles of barren land

charred trunks, parched earth
barren landscape tells the story
of devastation

of hte calamity that struck
when life lay unguarded

the entire cosmos conspired
and God overheard
he remained impassive, unreactive
in REPOSE

hte power of will was newly born
it's tiny limbs were weak

the small hands didn't have the strength
to turn away the calamity
the frail whimper couldn't turn away
the approaching steps of death

she lied a mute spectator
mere witness to the catastrophe

i see the fragments
of a shattered world
i try to gather the shards
of a lost melody
A tune long forgotten
resonates in my head
and creates chaos

the gods observe and still lay passive
they have loads of other work on their hands
and they seem to be pretty bad at multitasking

but i question
how could you allow this to happen
it was thier duty..thats why they are there

and if at all
why did thy prolong the pain
this should have ended in a moment

a lifetime of pain is not enough
you make dying an equally tiresome process

a lonely soul on its last journey
fumbled over so many speed breakers
shattered and battered
humping and pumping, continued
her relentless search

the search for the ultimate truth continues
but now i dont have the push to move
no inclination to continue
all seems a mirage

12th nov, 07

यूँ ही

जब शिव की तीसरी आँख खुलती है तो क्या बाकी दोनों आंखें बंद हो जाती हैं?

या सारा विध्वंस वो देखती हैं-- प्रलय की सारी लीला, सारा विष, सारी अग्नि...

क्रोधाग्नि में जल कर, तप कर , और भस्म होकर सृष्टि फ़िर बन जाती है और आराध्य देव शंकर उस पल्लवित पुष्पित और सुरभित कानन से उदासीन होकर आंखें बंद कर ध्यान में डूब जाते हैं।

इस समाधि से किसी तुच्छ की पुकार सुनने क्या वो उठेंगे? नहीं...कदापि नहीं

इसलिए...नहीं उठे वो

02 April, 2008

salute to a faceless stranger

the world of internet is amazing. some years back i would have thought it impossible to be connected to some people through an entirely untrustworthy medium and be emotionally involved with them.

but it has happened, time and again words of strangers have been beacons in darkness, hepling hands on slippery roads and at times a burning whiskey on hte rocks just for the heck of it. there are people who open their hearts out...sometimes their faces are there sometimes not...and it hardly makes a difference, coz we make a portrait in our minds, we give them attributes...we are all the people we read about...in our mind.

i write mostly on a regular basis, and now i have the habit of regularly checking out a couple of other people's blogs...i like hte way they think. and yes i do wait to see what they think of what i write, if at all they do think. i wonder if like me everyone has some spare time at hand to think of other people quuietly tapping away in the silences and loneliness of night.

twice in my life...in this love affair with the internet i have come across people whose writings have struck me as a thunderbolt...once for the sheer realism and identification with it...and secondly for the stark surrealism and inability to understand the next person. for some reason i feel i know these two people inside out, i have seen them, talked to them, laughed with them, danced with them...and felt their touch...once as a handshake, and second time as a fatherly pat on my head. they came and from the very first day they became very important part of my life...just like that.

so this is a tribute to you Ms. NB and Mr. FM...may god keep you happy always

31 March, 2008

magical moments

this is a gif image, but i dont know why it doesnt move in hte blog...anybody knows about this kind of stuff please help me out.
click on the image to see the magic :)

29 March, 2008

होली

मोरे किसना तूने मुझको कितनी मुश्किल में डाला रे
कौन सा रंग लगाऊँ तुझको...तू क्यों इतना काला रे
लाल रंग ना दीखे तुझपे...हरा रंग भी दीखे ना
कैसे खेलूं तुझसे होली... तू जो इतना काला रे

सुबह से सारी सखियाँ आयीं रंग लिए पिचकारी भी
जी भर खेली उनके संग मैं, भीगी पूरी साड़ी भी
पर जो तुझको रंगा नहीं तो क्या होली की बात
दही बड़ा ज्यों सब डाला पर भूल गई मसाला रे

प्रीत के रंग मैं डालूं तुझपे आ जाओ मेरे किसना
बतलाऊँ कि क्यों होता होली का रंग निराला रे
नीली पीली हरी गुलाबी सारे रंगो में रंग कर
एक दिन तो हो जाती मैं भी काली...तू जो काला रे

एक रंग ऐसा भी

नूपुर बोले धीमे सुर में
आया किसना री...
हाय! लजा कर लाल हुयी मैं
उसने जो पकड़ी चुनरी...
आज तो होली नहीं है
मनुहार कितनी की...
भाग निकली जैसे ही मैं
उसने मारी पिचकारी...
भीगी साड़ी जो मैं दौड़ी
रंग लेके भी...
छलिया किसना रंग डाला
मेरे रंग से ही...
गाल रक्तिम, मंद स्मित मैं
बनूँ किसलय सी...

26 March, 2008

कभी कभी यूँ ही
किसी कागज़ पे तुम्हारी handwriting दिख जाती है
अनायास ही...सामने आ जाती है पूरी जिंदगी
जो तुमने अपने हाथों से सँवारी थी

याद आती हैं वो थपकियाँ jab गर्मी की दोपहर मैं सोती नहीं थी
याद आते हैं वो किचन के लम्हे जब चटनी का स्वाद चखाती थी
याद आते हैं वो जन्मदिन जब तुम हाथ पकड़ के केक कटवाती थी
याद आता है वो तुम्हारा कौर कौर खिलाना सुबह सुबह

याद आते हैं वो सारे स्वेटर के फंदे वो तुमने मेरी जिद पे बनाये थे
याद आता है मेरी पेंटिंग्स टू तुम्हारा स्ट्रोक्स देना
मेरी कढाई के लिए फ्रेम कसना
मेरी साड़ी बांधना

मेरी जिंदगी तुम्हारे हाथो की संवारी हुयी है माँ
आज मुझे तुम्हारे हाथों की बहुत याद आती है

कोई नहीं रखता है सर पे हाथ तुम्हारी तरह
आज तुम्हारे हाथों की बहुत याद आती है माँ

याद

कितने कितने पुर्जो पर

तुम्हारे हाथों के चलने को

समेट कर रखा है मैंने

कुछ ख़त...कुछ ऐसे ही तुम्हारे ख्याल

और कितने डिज़ाईन फूलों के, बूटियों के

कुछ फिल्मो की टिकटों पर लिखे फ़ोन नम्बर

कुछ कौपी के आखिरी पन्नों पर

पेन की लिखावट देखने के लिए लिखा गया नाम

मैंने हर पन्ना सहेज कर रखा है माँ

और जब तुम बहुत याद आती हो

इन आड़ी तिरछी लकीरों को देख लेती हूँ

लगता है...तुमने सर पे हाथ रख दिया हो

12 March, 2008

ओ गंगा

समेट लो ना...
ओ गंगा! अपना किनारा
यूं ही अंजुरी में भर कर खेलती रहूंगी
संकल्पों का खेल मैं अनगिन दिनों तक
धारा उड़ेलती अंजुरी से
नादान सी ख्वाहिशें पालती रहूँगी
घरौंदे बनाती रहूंगी...और बिलखती रहूंगी
ओ गंगा समेट लो अपना किनारा तुम...


कि बह जाएँ बचपन के सपने
तुम्हारी अठ्खेलियों में
कहते हैं मोक्ष मिलता है तुम्हारे पानियों में
कि शायद मेरे सपनो को भी राहत मिल जाए
ओ गंगा इसलिए समेट लो अपना किनारा तुम...

कि अब भी ढूँढती हूँ

रेत पर मैं खुशियों के निशां

मैं अब भी कागजों कि कश्तियाँ देती हूँ बच्चों को

औरअब भी उनके डूब जाने पर उदास होती हूँ

ओ गंगा समेट लो अपना किनारा तुम...

कि जब भी डूबता है सूरज

और लाल हो जाता है पश्चिमी किनारा

यूं लगता है किसी ने फ़िर से कोई लाश बहा दी है

किसी ने फ़िर कोई जुर्म किया है...चुपके से

ओ गंगा समेट लो अपना किनारा तुम...

या कि एक बार आओ...साथ बहते हैं

20 February, 2008

searing hot pain
gushing through my veins
why cant i understand
why cant i hear the voices banging my ears
why cant i see through my misty eyes
why cant i just kick myself out of this mess of my life

goddamn i want a life

i want some sunshine
a bit of piano sounds
a small cup of sweet coffe
and an easel to paint
some fresh air
some more pain
that makes me feel i am alive

i want some more pain to feel i am alive
there is a vaccum and i dont know what do i fill it from

it hurts...it does

i bleed...and life drains out of me

i lose a part of me

and the departure hurts

rescue me...i say

look around to find a way

blocked pathways

roads lost in wilderness

i feel bad about continuing to live

i try to drown myself in noise

in pain

in hurt

in death

in memories

but i cant

and life hurts

16 February, 2008

शायद

अब भी बचा है कुछ

जो तुम तोड़ नहीं पाये हो

अब भी

टुकड़े ही हुए हैं वजूद के

कि कोई है जो सम्हाल के रखता है मुझे

आश्चर्य होता होगा तुम्हें

या अफ़सोस...

कि तुम असफल हुए

इश्वर

तुम्हारी सत्ता पर कुछ प्रश्नचिंह

मैं खड़े करती हूँ

सवालों का एक चक्रव्यूह मैं

देखूं कैसे बाहर आते हो तुम

अनगिनत बाणों से

बिंध कर

कैसे महसूस करते हो दर्द

तुम क्या जानो

मौत...

क्या होती है

तुम तो अमर हो

अजन्मा हो...अनाथ का मतलब कैसे समझोगे

जो तुमने पाया ही नहीं उसका खोना कैसे जानोगे

कृष्णा तुम्हारे इतने कारनामे सुने हमने

पर क्यों नहीं एक भी वक्तव्य

यशोदा की मृत्यु पर तुम्हारे क्रंदन का

कैसे भगवान हो?

ख़ुद के लिए कुछ और

और हमारे लिए कुछ और

partiality क्यों करते हो???

random thoughts

let the words dissolve
let silence be
i want the time to stop
freeze frames
there is a blackhole
that sucks in existence
fingers go numb
feelings evaporate
eyes go blank
and i cant see

16 January, 2008

yun hi

words rain
splash on the window panes
of my mind
and wash away
without registering anything...

i stare
at the glass
and wonder
was it long ago

these words assembled
in the jaltarang
created melody
giving expression to emotions

and now
as i listen to the pitter patter
of thoughtless words
devoid of any rythm
or cohesiveness

the colours of life seem faded
it has rained a lot
all my life...

08 January, 2008

यादों की किरिचें

shabdon के ढेर आँखों में पड़े रहते हैं
पर भाषा है कोई अनजानी सी
पढ़ नहीं पाता है कोई भी आँखों में

या आँखें ही अजीब है
शायद opaque हैं
जबकि मुझे लगता है transparent होंगी

नहीं है ऐसा

सिर्फ शब्दों के होने से अभिव्यक्ति नहीं होती
उसके लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है

आँखों कि भाषा पढ़ने के लिए आँखें भी वैसी होनी चाहिऐ
बड़ी बड़ी, कजरारी, काली आँखें, जिनमें एक ही झलक में सब साफ दिख जाए

क्लास के blackboard की तरह

मेरी आँखें तो बड़ी नहीं हैं
छोटी छोटी सी हैं मेरी आँखें
इनमें सारे शब्द उलझ जाते होंगे

बहुत confusing सा होगा
जैसे जगह कम पड़ने पर ख़त में लिख देते हैं
आदि तिरछी लकीरों में ही सारी बातें

मुझे एक पोस्टकार्ड याद आ गया
मेरी बातें हमेशा ज्यादा होती थी
और पोस्टकार्ड में जगह कम
कितनी मुश्किल से अटाना पड़ता था सब कुछ

अगर आँखों से नहीं उठता इतना सारा भर
तो मैं कह क्यों नहीं देती

कह भी दूंगी,पर पहले जान तो जाऊँ कि क्या कहना है

क्या इतना कहना काफी होगा की मैं दुखी हूँ
शायद नहीं
वजहें ढूंढ़नीं होंगी

मैं अकेला महसूस करती हूँ
मैं अनाथ महसूस करती हूँ

कुछ नहीं है
माँ तुम्हारी बहुत याद आती है बस
और तुम आ नहीं सकती हो

In loving memory

how long does it take to get to terms with a loss?
are there losses one doesnt get over in a lifetime...
What do I do with the aching in my heart that refuses to go away

How long will I miss you maa…I think a lifetime wont be enough

To think that I will never see that face that beamed when I came back from office, to come to terms with the fact that I feel so unloved, so lonely so sad that I don’t know what to do.

Why do people die? What right does death have to take away people from us and never return them.

What do I do with this one shattered existence of mine, unable to do anything but to sit and sulk and cry my heart out. But nothing seems to pacify me.

Where is peace? How do I console myself, where are those words? Where is life?

Mere questions without anwers

Existence without reason, without objective without desires.

Mummy I miss you very much, I so wish you were able to come back. I love you.

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