
और इस तरह हम २५ साल के हो गए...तकरीबन आधी जिन्दगी जी ली...आगे देखें क्या होता है :D
याद है पहली मर्तबा जब छुपा के खाई थी
माँ से, अपने आँगन की धुली हुयी मिट्टी
और वो कबड्डी खेलते हुए बॉर्डर पहुँचने को
भरी थी मुट्ठी में मुह्ल्ले की गली की मिट्टी
पांचवी में भूगोल का एक चैप्टर था
क्यों लाल थी हमारे शहर की मिट्टी
खेल में जब कभी गिर जाते थे
घाव भर देती थी स्कूल की मिट्टी
उसके साथ भीगना पहली बारिश में
और पैरों के नीचे भीग रही मिट्टी
वो हर दिन उसी का इंतज़ार
जब कि बस दिन भर खोदती थी मिट्टी
जिंदगी भर निभाना मुश्किल हो गर
रिश्तों की जड़ सम्हालती नहीं मिट्टी
शहर की भाग दौड़ में भी है
हर एक के अन्दर अपने शहर की मिट्टी
जाने कितने शहर अब अपने है
मुझमें बसती है इन सबकी मिट्टी

तुम्हारी आवाज़ का तिलिस्म
जैसे जंगल में ठहरी हुयी हवा
थोड़ा शोर, थोड़ी खामोशी
जैसे सागर की लहरों का किनारे आना
और पैरों को छूकर चले जाना
जैसे भीड़ में
अचानक मिल जाए कोई पुराना दोस्त
या छत पर आ गिरे
पड़ोसी की काटी हुयी पतंग
कुछ छोटी छोटी खुशियाँ
जिनमें जिन्दगी का लुत्फ़ मिलता है
जैसे जब तुम मेरा नाम लेते हो...

जिंदगी में दो बार हुआ है कि मैं ख़ुद पे फ़िदा हो गई हूँ...
पहली बार तो अपने 12th के farewell के लिए साड़ी पहनी थी, जिंदगी में पहली बार। और जब आइना देखा तो मंत्रमुग्ध सी देखती रह गई, कि ये मैं ही हूँ क्या...शायद तरुणाई की आहट पहली बार महसूस हुयी थी। वैसे भी वो उम्र होती है आइना देखने की, सजने सँवरने की पर मुझे उस दिन से पहले कभी फुरसत नहीं मिली थी। भाइयों के साथ कभी पेड़ों पर टँगी पायी जाती तो कभी शर्त लगाती कि आंगन की ऊँची सी दीवार पर सब से पहले कौन चढ़ सकता है। और इन खुराफातों से फुरसत मिलती थी तो आराम से सीटी बजती कभी फील्ड में घूमती रहती, माँ कहती रहती कि कब लड़की के गुण आयेंगे इसमें। मुहल्ले के लड़के भी छेड़ते कि कभी तो लगे कि पड़ोस में कोई लड़की रहती है लगता है कि और एक लड़का ही रहता है, कभी सीटी मारती हो कभी लंघी मारती हो सुधर जाओ कौन शादी करेगा तुमसे। मुझे बड़ा मज़ा आता था, क्लास में भी जब बाकी लड़कियां कॉस्मोपोलिटन की बातें discuss करती थी मैं बोरे हो जाती थी, और बड़ा अजीब सा लगता था। कभी कभी जरूर मैं भी उस खुसुर पुसर में लगी हूँ पर ज्यादा मन नहीं लगता।
मेरे लिए बातें थी कि मुझे मोटरसाईकिल क्यों नहीं चलने मिलता है, एक्सीडेंट करुँगी तो देखा जायेगा, बाकी लोगो कि मुझे परवाह नहीं थी कि मेरी बाईक से ठुक के बेचारों के शरीर में कितनी हड्डियाँ बचेंगी. वैसे तो मैं साईकिल पर भी चलती थी तो लोग मुझे रास्ता दे देते थे और तो और बस चलता तो शायद रास्ते के सारे खम्भे भी हट जाते, पता नहीं कितनी बार मैं टकरा चुकी थी. पर मुझे इसमें भी मज़ा आता था. लोग मुझे हेलीकॉप्टर कहते थे, झाँसी की रानी और आफत भूचाल टाइप की हुआ करती थी मैं. मेरे रास्ते पड़ने वालो की शामत.
पर इन सबके बीच अचानक से मेरा farewell आ गया, और जैसा की सब पहनते थे माँ ने मुझे भी साड़ी पहना के तैयार कर दिया, पर झटका तो तब लगा जब सामने देखा। एक पल को तो लगा की कोई और खड़ी है. फ़िर आंखें खुली और महसूस हुआ की ये जो इत्त्तीई सुन्दर लड़की है आईने में, मैं ही हूँ...और शायद जिंदगी में पहली बार मैं शरमा गई...
खैर वो लड़कपन के दिनों तो अब क्या आयेंगे...पढ़ाई और अब जॉब में इतना व्यस्त हो गई की ध्यान ही नहीं रहा फ़िर से ख़ुद को देखने का. इधर कुछ दोस्त आए थे मुम्बई से, उन्हें कुतुब मीनार दिखाना था, तो चल पड़े हम. क्या धूप थी, बाप रे!!!पर मज़ा बहुत आया, और उससे भी ज्यादा आया जब फोटो देखी...धूप में ऐसा खिला हुआ था जैसे सूरजमुखी...लगा की ये मैं ही हूँ...उजली खिली हुयी सी, धूप गर्मी से बेखबर...खिलखिलाती हुयी...चंचल हँसती हुयी...
अपने इस बेलौसपने पर मैं फ़िर से फ़िदा हो गई :)
उजाड़ पत्तों का एक कब्रिस्तान सा है
ये जर्द पत्ते मेरी खामोशी के रंग में रंगे दिखते हैं
कुछ तो बियाबान सी लगने लगी है ज़िन्दगी
जिसमें कुछ आँसू अनाथ बच्चो की तरह बिलखते हैं
मैं कतरा कतरा बिखरती हूँ अपने दामन में
हवाएं तिनका तिनका उड़ा जाती हैं मेरे वजूद के हिस्से
मगरूर हुआ करते थे हम किसी ज़माने में
सोचा था बदल देंगे तकदीर जो भी लिखे
कितने मासूम हुआ करते थे ख्वाबों के काफिले
चांदनी रात में छत पर मिलने की ख्वाहिश की तरह
अब तो दरिया सी है प्यास और समंदर के सामने हैं
दरकते हुए दरख्तों के कभी कभी यूँही
आस कहीं आके सुलगी हुयी सी लगती है
शब्द कभी कभी यूं ही आके परेशां करने लगते हैं कि हमें कहीं कागज पे उतारो, हम यूं ही तुम्हारे दिमाग में नहीं रह सकते. ऐसे में कुछ तो लिखा जाता है, ये कविता नहीं होती, बस कुछ खयालात होते हैं, कुछ उड़ते हुए आवारा बंजारा से ख्याल
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिन्जरबद्ध न गा पायेंगे
कनक तीलियों से टकरा के
पुलकित पंख टूट जायेंगे
हम बहता जल पीने वाले
मर जायेंगे भूखे प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक कटोरी की मैदा से
स्वर्ण श्रृंखला के बन्धन में
अपनी गति उड़ान सब भूले
बस सपनो में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले
ऐसे थे अरमान की उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण सी चोंच खोल
चुगते तारक अनार के दाने
होती सीमा हीन क्षितिज से
इन पंखो की होड़ा होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी
नीड़ न दो चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो
काफ़ी बचपन में पढी गई कविता, शीर्षक तू याद नहीं है और ना लेखक का नाम। पार आज काफ़ी सालों बाद भी इस कविता के शब्द दिल को वैसे ही छूते हैं। सच्चाई का इतने सादे शब्दों में चित्रण, आज भी कहीं ऐसी ही जगह पाती हूँ ख़ुद को...
कुछ लोग ऐसे ही पंछियों की तरह होते हैं, उन्हें कुछ भी ना मिले पर आजादी चाहिए होती है, इसके बिना जीवन अर्थहीन हो जाता है। कोई ललक नहीं रहती, कोई उत्साह नहीं रहता और धीरे धीरे पंखों को उड़ने की आदत भी नहीं रहेगी, और इसके साथ ही शायद जिंदगी धीरे धीरे मर जायेगी।
फ़िर ना कोई चहचहाहट गूंजेगी और ना कोई अपनी उड़ान से सबका मन मोहेगा
what would you do if you had just one day to live?
what would you do if knew that the clock was ticking and you might be whisked away even before you had hte time to say your goodbyes
and how do you day goodbye
and to whom
how does it feel to know there are no people whom you wave your hand and day that you are leaving...forever
absolute loneliness...maybe nearness to death brings that on all of us. may be everyone feels hte same when he thinks he is going to die.
i would want to read harry potter...all the volumes again. i guess all these years life hasnt taught me anything, but sincerely i dont want to bury my head in something i havent touched all my life...i mean something spiritual...i would not even want to pray for that matter.
life becomes so busy...it feels so frightening that you wont be missed by anybody. the world is complete without you, and your absence wont make a dent anywhere...leave a gaping hole.
and then i think...all these people who have read my blog some 600 types, and of the few who keep coming back to it, will they know that suddenly hte posts stopped coming because i am no more, will someone paste an obituary here???
i dont know, coz i havent told a living soul how important this place is for me.
anyways
i guess i wont be dying after all...a small operation is a small operation and i have these bouts of pessimism at times that makes all feel bleak and black.
हवाओं की अल्हड़ सी मस्ती सी
उड़ती फिरूं कभी तितली सी
बाहों में भर लूँ सारा आकाश
और दौडूँ उनमें कभी बिजली सी
चंचल...खिल खिल शोख हँसी सी
चली पवन पगली सी
पहले प्यार की मदहोशी सी
खुशबू सावन की मिट्टी सी
इतराती बलखाती नदी सी
कौन हूँ ये मैं...जिंदगी सी :-) :-)
जब शिव की तीसरी आँख खुलती है तो क्या बाकी दोनों आंखें बंद हो जाती हैं?
या सारा विध्वंस वो देखती हैं-- प्रलय की सारी लीला, सारा विष, सारी अग्नि...
क्रोधाग्नि में जल कर, तप कर , और भस्म होकर सृष्टि फ़िर बन जाती है और आराध्य देव शंकर उस पल्लवित पुष्पित और सुरभित कानन से उदासीन होकर आंखें बंद कर ध्यान में डूब जाते हैं।
इस समाधि से किसी तुच्छ की पुकार सुनने क्या वो उठेंगे? नहीं...कदापि नहीं
इसलिए...नहीं उठे वो
कितने कितने पुर्जो पर
तुम्हारे हाथों के चलने को
समेट कर रखा है मैंने
कुछ ख़त...कुछ ऐसे ही तुम्हारे ख्याल
और कितने डिज़ाईन फूलों के, बूटियों के
कुछ फिल्मो की टिकटों पर लिखे फ़ोन नम्बर
कुछ कौपी के आखिरी पन्नों पर
पेन की लिखावट देखने के लिए लिखा गया नाम
मैंने हर पन्ना सहेज कर रखा है माँ
और जब तुम बहुत याद आती हो
इन आड़ी तिरछी लकीरों को देख लेती हूँ
लगता है...तुमने सर पे हाथ रख दिया हो
कि अब भी ढूँढती हूँ
रेत पर मैं खुशियों के निशां
मैं अब भी कागजों कि कश्तियाँ देती हूँ बच्चों को
औरअब भी उनके डूब जाने पर उदास होती हूँ
ओ गंगा समेट लो अपना किनारा तुम...
कि जब भी डूबता है सूरज
और लाल हो जाता है पश्चिमी किनारा
यूं लगता है किसी ने फ़िर से कोई लाश बहा दी है
किसी ने फ़िर कोई जुर्म किया है...चुपके से
ओ गंगा समेट लो अपना किनारा तुम...
या कि एक बार आओ...साथ बहते हैं
it hurts...it does
i bleed...and life drains out of me
i lose a part of me
and the departure hurts
rescue me...i say
look around to find a way
blocked pathways
roads lost in wilderness
i feel bad about continuing to live
i try to drown myself in noise
in pain
in hurt
in death
in memories
but i cant
and life hurts
शायद
अब भी बचा है कुछ
जो तुम तोड़ नहीं पाये हो
अब भी
टुकड़े ही हुए हैं वजूद के
कि कोई है जो सम्हाल के रखता है मुझे
आश्चर्य होता होगा तुम्हें
या अफ़सोस...
कि तुम असफल हुए
इश्वर
तुम्हारी सत्ता पर कुछ प्रश्नचिंह
मैं खड़े करती हूँ
सवालों का एक चक्रव्यूह मैं
देखूं कैसे बाहर आते हो तुम
अनगिनत बाणों से
बिंध कर
कैसे महसूस करते हो दर्द
तुम क्या जानो
मौत...
क्या होती है
तुम तो अमर हो
अजन्मा हो...अनाथ का मतलब कैसे समझोगे
जो तुमने पाया ही नहीं उसका खोना कैसे जानोगे
कृष्णा तुम्हारे इतने कारनामे सुने हमने
पर क्यों नहीं एक भी वक्तव्य
यशोदा की मृत्यु पर तुम्हारे क्रंदन का
कैसे भगवान हो?
ख़ुद के लिए कुछ और
और हमारे लिए कुछ और
partiality क्यों करते हो???