लिखना

शब्दों में जितना कुछ होना समेटा जा सकता है उतनी भर कोशिश है. इन शब्दों के अलावा मुझमें 'मेरा' कुछ बचता नहीं है. बहुत दिनों के होने और ना होने के बीच बहुत से शब्द हैं जो रंगते हैं अपने अपने हिस्से का कैनवास. इस कैनवास में एक घर, थोड़ा काम, घूमना फिरना, बाइक चलाना देर रात में गाने गाना, यादों को झाड़ना बुहारना जरूरी है. मेरी इतनी ही जिंदगी है जो मेरी है. अच्छे लोग किस्मत से मिले, उँगलियों पर गिने कुछ दोस्त, आँखों में बसा कुणाल और कुछ लोग जिनके शब्द धुंध में खुशबू की तरह हैं. घर बनाया ढेर सी किताबों और ढेर से कबाड़ के साथ...इसमें अनगिन गाने, कुछ बिसरे सुर-ताल हैं. एक कमरा है, खुली धूप है, दिल्ली का कोहरा है...

मैं सबसे ज्यादा अपने इन शब्दों में हूँ...कल्पनाओं की कच्ची डोर पर पतंग उड़ाती मैं. यही मेरा परिचय है, ये मेरा जीना है.

कभी कभी मूड आता है तो इंग्लिश में भी लिखती हूँ...खास तौर से ऑफिस में कुछ काम करने के दरमियान...
उसका पता यहाँ है...I Dream

इसके अलावा एक पोडकास्ट के लिए ब्लॉग बनाया था...पर आजकल बात करने का मन कम ही करता है तो उधर सन्नाटा छाया हुआ है...यहाँ इसलिए चिपका रही हूँ कि कभी खुद को ही याद दिलाना जरूरी होता है कि अपने होने को कहाँ कहाँ सकेर आये हैं हम. चार चिंदी पोस्ट्स पड़ी हुयी हैं वहां कि कभी फिर से मूड आएगा तो उधर का भी रुख करेंगे...बहरहाल हौसला बढ़ाने वाले लोगों का स्वागत है...वो क्या है न कि आवाज़ को लेकर हम खासे सेंटीमेंटल है...बहुत ख़राब आवाज़ है इत्यादि कह कर खुद का ही मोरल डाउन करते रहते हैं. बहरहाल...साल के जाते महीने, बोले तो दिसंबर में हम अक्सर खासे क्रिएटिव हो जाते हैं...तो कुछ और वहां आएगा...कभी न कभी...अरे हाँ...इतने में लिंक तो भूल ही गए...
ये रहा...Puja Nonstop

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