07 November, 2016

आइ लव यू टू, शैतान । God is a postman (9)


रूद्र ने सिखाया इतरां को। जब दिल करे। घास पर पड़ी रहना। बेफ़िक्र। आसमान में जो हो, उसे देखना। सूरज हो तो बंद आँखों से। चाँद या सितारे हों तो खुली आँखों से। हर रोशनी को हमेशा चूमने देना अपना माथा। आत्माओं की दुआ से बनती है रोशनी। सबसे शुद्ध। सफ़ेद। रोशनी का हर स्पर्श तुम्हें सुख से भर देगा। अपने अंधेरों को इन चमकती पुतलियों में बाँध कर नहीं रखना, हर रात वे चाहेंगी उड़ के बाक़ी अंधेरों में मिल जाना। उन्हें जाने देना। अंधेरों की ज़रूरत सिर्फ़ चिट्ठियाँ लिखते हुए होगी। उस समय अपनी रूह के सबसे अंदर झाँक के देखना। वहाँ हमेशा इतना अंधेरा तो मिल ही जाएगा कि उससे स्याही बन सके।

जब रूद्र नहीं होता इतरां घास पर पड़ी होती। बाल फैलाए। कभी सितारों को जोड़ कर अपनी मर्ज़ी की कहानियों को आसमान में फिरते हुए देखती। जन्म के समय से इतरां के लम्बे घुंघराले काले बाल थे। पाँच साल की हुयी इतरां तो मन्नत के हिसाब से तारापीठ में उसका मुंडन हुआ। उसके इतने सुंदर बालों पर उस्तरा चला तो दादी सरकार की आँख भर आयी। लेकिन बालों का क्या था। बढ़ आए फिर। बोर्डिंग स्कूल जाते हुए इतरां के बाल काँधे से नीचे थे। जाने के पहले कुछ दिन लगातार दादी सरकार ने उसे दो चोटियाँ गूँथनी सिखायीं ताकि वहाँ स्कूल में उसे कोई दिक़्क़त ना हो और बाल कटवाने ना पड़ें।

पहली बार हवाईजहाज़ से स्कूल देखा तो इतरां उसके तिलिस्म में क़ैद हो गयी। बादलों के बीच से दूर दूर तक रेत के धोरे दिख रहे थे और उनके बीच पानी की मरीचिका सा शाद्वल चमक रहा था। भूगोल के क्लास में पढ़ा हुआ ओएसिस वाक़ई कहीं ज़िंदा, साँस लेता हुआ दिखेगा, ऐसा तो उसने कभी सोचा भी नहीं था। एक लम्हे के लिए वो सब भूल गयी, पीछे छूटते हुए परिवार वाले, चवन्नी जैसे दोस्त, बुलेट की व्हीली…सब। रेगिस्तान का जादू घेरता है तो किसी और याद के लिए जगह कहाँ बचती है।

रूद्र के लौटने के बाद इतरां को महसूस हुआ कि इकतरफ़ा प्रेम आसान नहीं होता। रेत की प्यास का मुक़ाबला कोई मुहब्बत नहीं कर सकती थी। रेत उसके सारे आँसू सोख लेती और झील का पानी एक इंच भी नहीं बढ़ता। अभी तक उसके एक आँसू पर घर भर में फ़साद खड़ा हो जाया करता था। बोर्डिंग स्कूल उससे वो घास का क़ालीन छीन रहा था जिसपर पड़े रह कर रोशनी को आँखों में बुलाया जा सकता था।

पहला फ़ोन कॉल
नयी जीप में बैठ कर सब लोग शहर गए इतरां को फ़ोन करने के लिए। रूद्र। इंदर। दादी सरकार। घर के बाक़ी बच्चे। रूद्र ने सबको बताया था कि फ़ोन से इतरां की आवाज़ सुनी जा सकती है। इधर से भी बात कर सकते हैं। कॉल लगायी गयी। सबसे पहले दादी सरकार ने फ़ोन का चोंगा पकड़ा...'इतरां। इतरां। कैसी है बेटा…मेरी चंदा…इतरां.’ उधर से कोई आवाज़ नहीं। दादी की आवाज़ और ऊँची होती जा रही थी।

‘आहिस्ता बड़ी सरकार, इतना तेज़ बोलेंगी तो बिना फ़ोन के ही आवाज़ पहुँच जाएगी’। रूद्र ने अपनी घबराहट छुपाने के लिए बड़ी सरकार को छेड़ा और सारे बच्चे हँस पड़े। बड़ी सरकार से ठिठोली की हिमाक़त एक रूद्र ही कर सकता था। सरकार लेकिन सरकार थीं, फ़ोन बूथ वाले को हड़काया और फ़ोन इंदर को थमा दिया। इंदर ने आवाज़ में बहुत सा दुलार भर कर इतरां का नाम पुकारा। एक पल को तो लगा जैसे माही ने पुकारा हो अपनी बेटी को। लेकिन उधर से कोई भी आवाज़ नहीं आयी। अब रूद्र की बेसब्री और इंतज़ार नहीं कर सकती थी। इंदर से लगभग फ़ोन का चोंगा छीनते हुए इतरां का नाम पुकारा। 'इतरां। क्या हुआ। कुछ बोल तो सही। स्कूल पसंद नहीं आया? क्लास अच्छी नहीं है? खाना वाना देते हैं तुझे? किसी ने परेशान किया क्या। बता तो सही। क्या हुआ। इतरां। इत्ति। इत्तु। मेरी इतरमिश्री। कुछ बोल तो’

कोई भी आवाज़ नहीं।

रूद्र ने एक गहरी साँस ली और फ़ोन में हौले से पुकारा, ‘सरकार’।

फ़ोन के उस तरफ़ से सिर्फ़ एक सिसकी आयी।

सिसकी। सिर्फ़ एक सिसकी।

ठंढी। लोहे की कील। सीने में ठुकी हुयी। ख़ून का बहना रोकती। साँस का आना।

इतरां की सिसकी से ऐसा तीखा दर्द हुआ कि रूद्र का मन किया आँधी की तरह बुलेट पर उड़ता जाए, कोई जादू का क़ालीन मंगा ले कहीं से…कि स्कूल विस्कूल जाए भाड़ में, इतरां को उठा कर ले आए। उसके जीते जी इतरां रो जाए तो ऐसा जीना किस काम का। लेकिन इतरां सिर्फ़ उसकी थोड़ी थी, घर में किसी को भी मालूम हो जाए इतरां उस तरफ़ रो रही है, वे वाक़ई उसे स्कूल से उठा कर ले आते। इतरां के लिए ज़रूरी था वो पढ़े…और इसी स्कूल में पढ़े। रूद्र के चेहरे पर तबाह इमारत का सफ़ेद सन्नाटा फैलता गया। घर वाले पूछते रहे क्या हुआ, इतरां ने कुछ कहा या नहीं, लेकिन रूद्र ने कुछ नहीं कहा। ये ऐसा दुःख था जो किसी से बाँटा नहीं जा सकता था।

रूद्र ने बगरो को जब आख़िरी बार सीने से लगाया था तो उसने भी कुछ कहा नहीं था। एकदम चुप। सिर्फ़ एक सिसकी थी। अब तक सीने में चुभी हुयी। सिसकियों के पीछे की चुप नदी जानता था रूद्र। बाँध के छेद में ठोकी हुयी कील थी ऐसी सिसकी।

कॉल के बाद घर पर सब लोगों ने निर्णय लिया कि ये फ़ोन नाम की चीज़ बकवास है। चिट्ठी लिखी जाए इतरां को। शहर की सारी दुकानें तलाशी गयीं। सबने अपनी अपनी पसंद का काग़ज़ ख़रीदा। बच्चों ने झिलमिल और चिमकी ख़रीदी। चवन्नी ने पतंग बनाने का काग़ज़ ख़रीदा। उसने किसी फ़िल्म में देखा था कि प्रेमी प्रेमिका पतंग पर शायरी लिख कर भेजते हैं। इतरां के जाते ही चवन्नी ने ग्यारहवीं कक्षा के सभी लड़कों के बीच सीना चौड़ा कर कर ऐलान कर दिया था कि इतरां के लौट कर आते ही वे दोनों शादी कर लेंगे। पूरे घर वालों ने अपने अपने हिसाब से इतरां को चिट्ठी लिखी। रूद्र के पास कोई शब्द नहीं थे जो इतरां के काम आते। उसने पाब्लो नेरुदा की किताब, ’२० लव सौंग्स ऐंड अ सौंग औफ़ डिस्पेयर’ भेजा। इसके कई कई कई दिनों बाद तक इतरां के जवाब का इंतज़ार हुआ। पोस्टऑफ़िस वाले अगर इतरां से इतना प्यार नहीं करते तो सुबह शाम के सवालों से तबाह हो जाते। गाँव का डाकिया एक बार इतना परेशान हो गया कि उसने सोचा वो ख़ुद ही इतरां की तरफ़ से कोई चिट्ठी लिख दे। घर वालों को कुछ तो सुकून आएगा। सच बोलना बिलकुल आसान होता है लेकिन झूठ बोलने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है। उसमें बात इतरां की थी तो झूठ बोलने में सबकी ही रूह कांपती।

चिट्ठी १
किसी के मर जाने के लिए उसका मर जाना ज़रूरी नहीं होता। दूर जाना भी मर जाना होता है।

चिट्ठी २
जेल हमेशा किसी पाप के लिए नहीं होती। कभी कभी भविष्य में होने वाले पापों के लिए पहले ही सज़ा भुगत लेनी होती है। क़िस्मत को हमारे जीवनकाल पर भरोसा नहीं होता। मान लो कहीं जल्दी मर गए तो। सिर्फ़ सज़ा भुगतने के लिए दूसरा जन्म लेना कितना मुश्किल है।

चिट्ठी ३
मुझे जवाब लिखने नहीं आते तो तुम लोग चिट्ठी लिखना बंद कर दोगे? सब नालायक हो तुम सब के सब। मैं वापस आयी ना तो देखना किसी से बात नहीं करूँगी। ग़ुस्सा मैं हूँ। तुम लोगों का कोई हक़ नहीं होता ग़ुस्सा होने का।

चिट्ठी ४
कल एक्जाम है। फ़ेल कर गयी तो वापस तो नहीं भेज देंगे? स्कूल उतना भी बुरा नहीं है। मैं यहाँ की टॉपर बनना चाहती हूँ।
लव यू आल।
मिस यू रूद्र।

चार चिट्ठियाँ लिखीं इतरां ने अपने पूरे स्कूल के टाइम में। बाक़ी तीनों तो ठीक हैं। कोहराम का कारण बनीं लेकिन आख़िरी चिट्ठी जो थी उसमें आख़िर में सिर्फ़ रूद्र के लिए मिस यू था। स्पेशल। घर का तापमान इतना बढ़ गया था उस रात कि एकबारगी तो लगा कि दादी सरकार रूद्र को दुबारा घर से निकाल देंगी। रूद्र के हाथ चिट्ठी लगने ही ना दे कोई। भाभियों ने थाली पटकने में कोई कसर ना रखी। बच्चे उसे बेमतलब चुट्टी काटते रहे दिन भर। रूद्र हरान परेशान की आफ़त की पुड़िया ने अब क्या लिख मारा है कि पूरा घर दुश्मन बना पड़ा है। 

देर रात रूद्र को जी भर सता कर सबका जी भर गया तो आख़िर बड़ी सरकार ने चिट्ठी रूद्र के हाथ में दी। दी भी क्या जैसे भीख दे रही हो। रूद्र का जी तो हुआ वहीं खोल ले लेकिन इतरां पर इतना हक़ महसूसता था वो कि सबकी नज़रों के सामने पढ़ नहीं सकता था। पूरा घर खा पी के शांत हुआ तो रूद्र घर से बाहर अपने पसंदीदा आम के पेड़ की ओर बढ़ गया। पूरे चाँद की रात थी। भयंकर गरमी में ऐसा महसूस हो रहा था जैसे दूर कहीं बारिश हुयी हो। घास पर लेटा रूद्र और चाँदनी में छिपे एक आध तारों को देखता रहा। चिट्ठी खोली तो चाँद इतरा रहा था। चाँदनी में चिट्ठी की आख़िरी लाइन चमक उठी। 
‘मिस यू रूद्र’। 
उसे ऐसा लगा जैसे घास नहीं क़ालीन है कोई, हवा में उड़ा जा रहा है। ख़ुद में बुदबुदाया। 
‘आइ लव यू टू, शैतान’।
***
लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. कहानी की ये 8वीं किस्त है. इसके पहले के हिस्सों के लिए इस लेबल पर क्रमवार पढ़ें। 

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