24 May, 2016

व्हीली - स्लो मोशन पागलपन। God is a postman | (7)


‘दादी सरकार ने तुम्हारा नाम इतरां रख दिया। मैं होता ना तो हरगिज़ इतरां नहीं रखने देता।’
‘अच्छा। क्या ही नाम रखते तुम?’
‘आफ़त…तुम्हारा नाम सिर्फ़ और सिर्फ़ आफ़त रखा जा सकता था’।

पहले दिन बाइक ट्रिप से लौट कर रूद्र ने इतरां को बताया था कि वनस्थली रेसीडेंशियल स्कूल के लिए फ़ॉर्म ले आया है और वहाँ उसे जाना होगा कि गाँव में कोई अच्छा स्कूल नहीं है। इतरां ने कहा था कि रिज़ल्ट आने के दिन तक अगर रूद्र उसकी हर बात मानेगा तो वो इस बारे में सोचेगी। इसका मतलब ये भी था कि आने वाला एक महीना रूद्र को गाँव में ही रुकना पड़ेगा। उपाय ही क्या था। इतरां यूँ भी किसी छोटी चीज़ से तो मानने वाली थी नहीं।

दोनों मिल कर प्लान कर रहे थे कि क्या क्या किया जा सकता है एक महीने में। ये आख़िरी महीना था आज़ादी का। बचपने का। इसके बाद हॉस्टल जा कर इतरां को होशियार होना पड़ेगा और ख़ुद का ख़याल ख़ुद से रखना पड़ेगा। हालाँकि रूद्र कह रहा था उससे कि उसके लिए इतरां हमेशा वही छोटी सी बच्ची रहेगी जिसे वो पहली बार गाँव के बाहर मिला था, और जिसने कमर पर हाथ रख के डराते हुए कहा था कि उसकी इजाज़त के बिना कोई गाँव नहीं जा सकता।

बात इतरां की होती थी तो सारे नियम कैसे इधर उधर कर दिए जाते थे ये देखने लायक चीज़ थी। घर पर बड़ी सरकार ने सारा इंतज़ाम कर दिया था। इंदर का बहुत दिन से जीप ख़रीदने का मन भी था और गाँव से सबको आने जाने में भी आसानी हो जाती। बारिश के दिनों में अस्पताल जाने में या पेशेंट देखने जाने में दिक़्क़त होती थी। फिर ये भी तो था कि इतरां को साल में कई बार आना जाना पड़ेगा। उसके बक्से वक्से स्टेशन से लाने में काम आता। इसी बहाने घर में जीप आ गयी और इतरां ने इंदर की बाइक अपने नाम ही रख ली। अगले दिन उसने चवन्नी को फुसला लिया और उसके बाबूजी की कावासाकी आरटीज़ेड उठा लायी कि रूद्र और वो दोनों रोड ट्रिप पर मसानज़ोर डैम जाएँगे। तिलिसमपूर से कोई सौ किलोमीटर का रास्ता था और इतनी दूर रूद्र हरगिज़ इतरां के साथ बाइक पर पीछे बैठ के जाने के मूड में नहीं था। इतरां के साथ रहते हुए रूद्र भूल जाता था कि इतरां उसे अपना हीरो मानती है और उसे एक अच्छी मिसाल देनी चाहिए। इतरां के साथ होने में वो अपनी उम्र भूल जाता था और लड़कपन के उन दिनों में लौट जाता था जब कि कुछ टूटने का डर नहीं लगता था। इतरां के साथ जैसे उसपर भी टीनेज चढ़ रही थी।

डैम के पहले के रास्ते में नदी मिली थी और पूरे रास्ते अच्छा घास का मैदान था। इतरां ने रूद्र से बाइक बदल ली कि वो कावासाकी चलाएगी। नयी बाइक का अंदाज़ा नहीं था…गियर डाल कर जैसे ही क्लच छोड़ा ग़लती से ऐकसिलेरेटर पूरा घूम गया…हल्की बाइक थी…बाइक का अगला पहिया हवा में और आधे सेकंड की व्हीली…और फिर धड़ाम…बाइक ऊपर…इतरां नीचे। रूद्र के बाइक किनारे में फेंक के दौड़ने के पहले तक घुटने वुटने, कोहनी, छिल चुके थे। वो तो घास थी वरना और चोट आती। रूद्र ने पहले तो सारी हड्डियां हिला डुला कर देखीं कि कुछ टूटा तो नहीं है। फिर रूमाल निकाल कर ख़ून पोछा। पट्टी बांधी। इतरां रोनी सी शक्ल बनाए थी और रूद्र को हँसी आ रही थी बेतरह। ख़ूब देर घास पर पड़े पड़े हँसता रहा। और यहाँ इतरां का ख़ुराफ़ाती दिमाग़ कोई और ही प्लानिंग कर रहा था।
‘तुम्हें व्हीली आती है ना रूद्र?’
‘हाँ आती है। तो?’
‘मुझे सिखा दो।’
‘अच्छा। ये हाथ पैर छिला के मन नहीं भर…टूटेगा तब ठंढ पड़ेगा कलेजा में?’
‘मुझे व्हीली सिखा दो’
‘काहे सिखाएँ?’
‘क्यूँकि तुमको आता है’
‘तो?’
‘तो हमको वो सब सीखना है जो तुमको आता है।’
‘क्यूँ?’
‘क्यूँकि हमको तुम्हारे जैसा बनना है एकदम’
‘मेरे जैसा कैसा होता है?’
‘जिसको डर नहीं लगता’
‘तुमको डर लगता है?’
‘नहीं’
‘तो फिर मेरे जैसा क्या ही बनना है। हो ना तुम मेरे जैसी।’
‘हमको व्हीली सिखा दो’
‘नहीं सिखाए तो?’
‘तो हम ख़ुद से सीखेंगे और ज़्यादा चोट लगेगा’।
‘अभी पहले बाइक ठीक से चलाना सीख लो। फिर व्हीली भी सिखा देंगे’
‘प्रॉमिस?’
‘हाँ प्रॉमिस’
‘चलो ठीक है, पर व्हीली कर के तो दिखा दो…हम देखे भी नहीं हैं किसी को व्हीली करते हुए’
‘और जो मेरा हाथ पैर टूटा तो हम दोनों को घर कौन ले जाएगा?’
‘रूद्र, प्लीज़, हमको मालूम है तुमको बहुत अच्छे से व्हीली आता है। दिखा दो ना। नहीं तो हम हॉस्टल नहीं जाएँगे’।

कुछ लोग जन्म से ही बावले होते हैं। झक्की। पागल। दीवाने। बौराए। मस्त। अपने में खोए। उनकी अपनी ही दुनिया होती है। रूद्र ऐसा ही था। करने के पहले सोचने की आदत नहीं थी रूद्र को। अंग्रेज़ी में इसे डेरिंग करते हैं। हिंदी में पागलपन ही। ज़िंदा। ज़िंदादिल। बगरो के जाने के पहले रूद्र ऐसा ही था। ज़िंदगी से लबालब भरा हुआ। छलकता हुआ। मगर फिर जैसे प्याला टूट गया था और सारी ज़िंदगी बह गयी थी। रूद्र ने ख़ुद को समझा लिया था और हिसाब की ज़िदंगी जीता था। यूँ भी जिसके ईश्वर भी उसके फ़ैसलों के ख़िलाफ़ जाएँ उसके लिए अपील करने की जगह ही कहाँ बचती है फिर। माही के आने से कुछ दिन का ठहार लग रहा था लेकिन माही के जाते साथ रूद्र का बौरायापन फिर से दिशाहीन हो गया था। उसकी ज़िंदगी में शब्द बचे थे सिर्फ़। कहानियाँ। किताबें। लोगों की ज़िंदगी में इन्हें भरता रहता था बस। मगर इस सबके बीच इतरां अपने नन्हे क़दम रखते चली आयी थी। जिस दिन रूद्र का हाथ पकड़ घर में दुबारा लायी थी उस लम्हे ही वो रूद्र की ‘सरकार’ हो गयी थी। क़ायदे से उसे तानाशाह कहना चाहिए था कि इतरां जी भर कर मनमानी करती थी रूद्र के साथ। मगर फिर इतरां जैसा कोई आया कहाँ था रूद्र की ज़िंदगी में। टूटा फूटा रूद्र इतरां के हाथ में कच्ची मिट्टी हो जाता था। इतरां उसे मनचाहा आकार दे देती थी। ज़िंदगी फिर से ठहरने लगती थी। साँस यूँ आती जाती थी जैसे कि साँस लेना दुनिया का सबसे आसान काम हो। रूद्र को टूटने से डर कहाँ लगता था इतरां के साथ।

हमें अपने पागलपन को वश में करने में बहुत वक़्त लगता है। कई सारे मुलम्मे चढ़ाने पड़ते हैं। धीरे धीरे हम ख़ुद को भूलना सीखते हैं। ये भूलना मगर किसी सोए हुए ज्वालामुखी की तरह होता है। किसी भी दिन टेक्टानिक प्लेट्स हिलती हैं और अंदर का गरम लावा फूट कर बह निकलता है। लावा अपने रास्ते सब कुछ जलाता जाता है और फिर ऊर्वर मिट्टी बन जाता है। जिसमें फिर कुछ भी उगाया जा सकता है। चावल। मीठे फल। तम्बाकू या कि गहरे लाल गुलाब ही।

शैतान की बच्ची ऐसे ही थोड़े कहते थे इतरां को…दुनिया के सारे कांड उसे मालूम रहते थे। लेकिन ये रूद्र की व्हीली के बारे में चुग़लख़ोरी कौन किया है। आज कर के दिखाएगा तो कल ही बोलेगी कि हमको करना सिखाओ। बड़ी सरकार मार डालेगी अगर देखेगी कि इतरां व्हीली कर रही है। उसपर शैतान इतरां, गाँव के सारे लड़कों के सामने शो ऑफ़ करेगी अलग। व्हीली करना आसान नहीं है। उसपर बुलेट भारी बाइक होती है। उसका बैलेन्स बनाना आसान नहीं है। बात फैलेगी। कौन करेगा इस पगली से शादी फिर। रूद्र अपने आप को समझा रहा था जब कि उसे भी मालूम था कि इतरां के सामने हथियार डालने ही पड़ेंगे। एक बार लड़की ने बात पकड़ ली तो किसी की नहीं सुनेगी। दोनों घास पर पड़े हुए थे। वसंत की दोपहर थी। गरमियों की आहट और आम के बौर की महक से भरी हुयी। रूद्र इन लम्हों से जेबें भर लेना चाहता था। इतने सारे कि ज़िंदगी काटी जा सके उनके भरोसे।

इतरां ने तुरूप का पत्ता चला। एकदम से लाड़ से रूद्र के पास खिसक आयी और उसके कंधे पर अपना सर टिका दिया और गाल में गाल सटाते हुए कहा, ‘रूद्र, देखो, अगर तुम हमको व्हीली सिखा दोगे तो तुमको हम एक सीक्रेट बताएँगे।’
‘अच्छा तो इत्ति सी इतरां के बड़े बड़े सीक्रेट्स हैं जिनके बारे में जानने के लिए मुझे ही घूस देनी होगी। मुझे नहीं जानना तेरे किसी भी सीक्रेट के बारे में। अभी तो सिर्फ़ देखने की बात हो रही थी…ये सिखाने की बात कहाँ से आयी? मैं तुझे हरगिज़ व्हीली करके नहीं दिखा रहा।’
‘यानी तुम्हें पक्का आता है।’
‘देखो। इतरां। बहुत पिटोगी तुम अब। मैंने कब बोला मुझे व्हीली नहीं आती है। लेकिन मैं हरगिज़ तुझे दिखा नहीं रहा। तू फिर बदमाशी करेगी कि मुझे सीखना है। और ये चवन्नी के बाबूजी की बाइक तोड़ दोगी तुम अलग’।
‘अच्छा चलो कॉम्प्रॉमायज़। वैसे तो मैं नहीं करती। लेकिन मैं इतना प्यार और किसी से करती भी नहीं ना। तुम तो जानते हो रूद्र। तुम पूरी दुनिया में मेरे फ़ेवरिट हो। आज व्हीली दिखा दो बस, उसी में मैं तुम्हें एक एकदम कमाल का सीक्रेट बताउँगी’
‘मुझे तेरे सारे सीक्रेट्स पता हैं’
‘ये वाला नहीं पता है। ये हमको ख़ुद ही कल पता चला है’
‘चलो ठीक है। पहले बताओ। अगर काम का लगा तो व्हीली दिखा दूँगा’
‘नहीं। ऐसे तो तुम बेईमान हो, एक काम करते हैं। तुम व्हीली दिखा दो। फिर मैं सीक्रेट बताती हूँ। अगर तुमको अच्छा लगा तो व्हीली सिखा देना। फ़ेयर डील?’
‘शैतान की बच्ची। तेरे साथ कोई भी फ़ेयर डील होती है ज़िंदगी में। तानाशाही करती हो तुम’
‘रूद्र व्हीली दिखा दो। प्लीज़। देखो मिन्नत कर रहे हैं हम। वो भी हम। देखो। प्लीज़ बोले ना। मान जाओ वरना गुदगुदी लगा देंगे’
इतरां के पास रूद्र की सारी चाभियाँ थी। उसके पागलपन का कौन सा हिस्सा कैसे अन्लाक करना है सब पता था इतरां को। लाड़। दुलार। धमकी। सबका मिला जुला कॉम्बिनेशन थी शैतान। उससे जीतना क्या ही मुमकिन होता।
रूद्र ने कच्ची सड़क पर कावासाकी उतारी…उसे ख़ुद भी याद नहीं था कि आख़िरी बार व्हीली कब की थी। शायद बगरो को जिस दिन दशहरा मेला में घुमाने ले गया था उस दिन। धुँधली सी याद में तेज़ होती धड़कन और बगरो की घबरायी हुयी चीख़ थी जब उसने रूद्र को पहली बार व्हीली करते हुए देखा था। बगरो को कुछ भी बोल लो वो पैंट शर्ट पहनने को तैयार नहीं हुयी अब साड़ी में उसे बाइक पर बिठा कर व्हीली तो नहीं कर सकता था। अकेले ही की थी। हाँ उसके सपनों में एक ऐसा दिन ज़रूर था कि बगरो को ज़िद करके मना लेगा और किसी दूसरे देश में घूमते हुए पहाड़ों की धूप के बीच व्हीली करेगा…ऐसी तीखी ढलान पर कि उड़ने का अहसास आए। वे सपने अब किसी और जन्म के लगते थे। कभी बेहद धुँधले दिखते तो कभी एकदम चमकीले।

कावासाकी की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी। बदन में बहते ख़ून की भी। दिमाग़ झनझना रहा था। पागलपन का स्वाद जिसने चखा हो उसकी ज़बान पर लौटता ज़ायक़ा बहुत तीख़ा लगता है। बहुत तेज़ बहती हवा। आम के बौर की गंध। पलाश का धुँधलाता लाल रंग। धूल का ग़ुबार। रूद्र चीख़ा था इतरां के लिए, ‘ज़ोर से पकड़ इतरां…हम उड़ने वाले हैं’। इतरां की उँगलियाँ उसके कंधों में धँसतीं गयीं थीं। एक लम्हे का बेतरह फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड था…बाइक की रफ़्तार बदन में ख़ून की रफ़्तार से तेज़ होती गयी। ठीक सम पर पहुँचते ही रूद्र ने फ़ुल ऐक्सेलरेटर मारा, हैंडिल को खींचा ऊपर और पहला पहिया हवा में…वे ज़मीन और आसमान के ठीक बीच थे…सच और सपने के ठीक बीच भी…व्हीली बमुश्किल दस सेकंड की थी लेकिन उसका हर सेकंड स्लो मोशन में महसूस हुआ था। धूल का स्वाद। आँख के आगे का आसमान। हैंडिल पर की ग्रिप। इतरां। रूद्र। दोनों। पागल। उस लम्हे दोनों एक ही थे। पागलपन में। रफ़्तार में। वक़्त के होने और ना होने के बीच।

जब दुनिया पागलपन की रफ़्तार से घूमनी बंद हुयी तो इतरां और रूद्र ने अपनी अपनी बाइक उठायी और एक दूसरे से रेस करते हुए मसानज़ोर डैम पहुँचे। डैम के पुल पर पानी की फुहार आ रही थी। डाइनमो पर पानी गिर रहा था और बिजली का उत्पादन हो रहा था। सूरज की किरणों में पानी की बूँदों से इंद्रधनुष बन रहा था। रूद्र को पुल बहुत पसंद थे। उसे लगता था पुलों पर बिताए हुए पलों की गिनती ज़िंदगी के दिनों में नहीं होती। ये बीच के लम्हे होते हैं। दो जगहों के बीच। दो लोगों के बीच भी। कहीं पहुँचते हुए कहीं से चलते हुए। बीच के लम्हे। हवा में अटके हुए लोग।
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पहली बार लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. देखें कब तक साथ रहती है मेरे. ये लंबी कहानी की 7वीं किस्त है. इसके पहले के हिस्सों के लिए इस लेबल पर क्रमवार पढ़ें। 

2 comments:

  1. bahut dinon bad padha aapko...kamal ki raftar hai shabdon mein.

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26 -05-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2354 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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