19 May, 2016

दुनिया का सबसे ख़तरनाक, सबसे दिलफ़रेब शब्द- हमेशा | God is a postman (6)


इतरां के दसवीं के एक्ज़ाम के समय रूद्र घर आया हुआ था। इतरां की ज़िद थी। चिट्ठी आयी थी उसकी। ‘मैं नर्वस हो रही हूँ। तुम्हें मेरी कोई परवाह है भी कि नहीं। मेरा रिवीज़न करवा दो। फ़ेल हो गयी तो तुम डूब मरना’।

रूद्र की बहती हुयी ज़िंदगी को मनचाहा अगर कोई मोड़ सकता था तो वो बस इतरां ही थी। पूरा घर और गाँव काफ़ी नहीं था उसे बिगाड़ने को कि रूद्र के साथ भी मनमानी करती थी। रूद्र की यायावर ज़िंदगी में मील के पत्थर इतरां ही लगाती चलती थी। किताबें इस तेज़ रफ़्तार पढ़ती थी कि रूद्र को हर कुछ दिन में गाँव का चक्कर लगाना ही पड़ता था। इतरां की फ़रमाइशें भी तो दुनिया जहान से अलग होती थीं। बचपन से उसे कविताएँ पढ़ा रहा था रूद्र। वे किसी एक देश को चुनते और फिर वहाँ के साहित्य में डूबते। वहाँ के लोग। वहाँ का माहौल। वहाँ के लेखकों की चिट्ठियाँ। सब कुछ ही तो। आधे आधे में इतरां का जी नहीं भरता। कभी ज़िद करती कि वहाँ के पोस्टकार्ड देखने हैं। वहाँ के स्टैम्प्स देखने हैं। तब रूद्र दूर देश घूमने निकल जाता। सिर्फ़ इसलिए कि इतरां को पोस्टकार्ड भेज सके। फ़्रान्स। चेकस्लोवाकिया। कम्बोडिया। ग्रीस। इटली। नॉर्वे। कांगो। पेरू। हर बार की तस्वीरों के साथ आता वहाँ का संगीत। लोकगीतों की धुन। रूद्र उन दिनों घर आता तो देर शाम दोनों मिल कर गीत लिखा करते। वे जाड़ों के दिन होते थे अक्सर। रात को अलाव जला कर रूद्र अपना गिटार निकाल लाता। इतरां की त्वचा इतनी बारीक और सफ़ेद थी कि उसमें दौड़ती नसें दिखतीं। रूद्र जब उसकी नब्ज़ पर ऊँगली रखता तो इतरां की चिट्ठियाँ उसे सुनायी पड़तीं। रूद्र उसकी नब्ज़ चूम लेता। इतरां की चिट्ठियां उसके होठों पर गीत बन तड़पतीं। दूर गाँव के लोग पहली बार जानते कि उदासी हर वाद्य यंत्र पर एक ही सम्मोहन रचती है। उसकी धुनें गाँव के चूल्हों में घुलने लगतीं तो उनसे बहुत धुंआ निकलने लगता। औरतें आँचल की कोर से अपनी आँख का धुंआ पोछ्तीं तो उन्हें उसमें गाँठ लगाये चिट्ठियां मिल जातीं। वे गांठें जो माही के गुज़र जाने के बाद कभी नहीं खुलीं। हर बार धुलती साड़ियाँ और गांठें और पक्की होती जातीं। रूद्र का गीत इन गाँठों को खोलता। इन चिट्ठियों को भी।

थ्योरी के एक्ज़ाम हो गए थे सारे बस प्रैक्टिकल बाक़ी था। उसमें क्या ही पढ़ना था। इतरां रूद्र के साथ आम के पेड़ के पास बैठी हिसाब लगा रही थी कि एक्ज़ाम के बाद की छुट्टियों का क्या करना है। किस पेड़ पर कितने आम फलेंगे वग़ैरह। रूद्र किताब पढ़ रहा था, ‘Tonight I can write the saddest lines’। उसे इतरां को बताना था कि एक्ज़ाम के बाद उसे हॉस्टल जाना पड़ेगा पढ़ने के लिए, कि गाँव के आसपास कोई ढंग का स्कूल नहीं है। इसके लिए ज़रूरी था कि इतरां का मूड अच्छा रहे। बड़ी सरकार ने रूद्र को ज़िम्मेदारी दी थी कि इतरां को और कोई मना नहीं सकता था।

‘इतरां। तू मुझे रूद्र क्यूँ बुलाती है रे?’
‘रूद्र तुम बहुत नालायक हो। क़सम से। ख़ानदान भर के बच्चे तुमको बड़े पापा बुलाते हैं। आधा गाँव तुमको चाचा बुलाता है। तुमको संतोष नहीं होता…बचपन में सुधार दिए रहते। उस समय इतना सिर क्यूँ चढ़ाए’
‘तुमको ना सिर चढ़ाने से तुम्हारे ज़मीन पर रहने का कोई उपाय होता क्या?’
‘देखो। अब बहुत साल हो गए हैं। अब हम कुछ और नहीं बुला सकते। बिसरा, बेसरा…छी। ये कोई नाम है बुलाने का। इतना अच्छा नाम रखा काहे थे रूद्र जब कोई बुलाएगा ही नहीं इस नाम से। हम तुमको रूद्र छोड़ के कुछ नहीं बुलाएँगे। जो करना है कर लो’
‘सरकार। आपका क्या ही कर पाएगा कोई। कहिए। क्या चाहिए, दसवीं पास हो गया। अब क्या चाहिए इनाम में। सो कहिए।’
‘बाइक वाली रोड ट्रिप पर ले चलो’।
‘तुम्हें बाइक चलनी कहाँ आती है’
‘सिखा दो’
‘और मैं बाइक पर तुम्हारे पीछे बैठूँ? मेरी कोई इज़्ज़त है कि नहीं दुनिया में। एक बित्ते की लड़की के पीछे नहीं बैठ रहा मैं बाइक पर’
‘बित्ते भर की किसको बोल रहे हो। चार अंगुल नीचे हैं तुमसे बस। लास्ट टाइम हाइट नापे थे तो पाँच फ़ीट सात इंच के थे।’
‘तुम्हारा सिर्फ़ मैथ ख़राब होता तो फिर भी चल जाता…दिमाग़ ख़राब है तुम्हारा। उसका मैं क्या करूँ। मेरी हाइट छह चार है। समझी। चार अंगुल छोटी है मुझसे। हाइट ऊँची होने से क्या होता है। शक्ल देखी है आइने में। दूध के दाँत तो टूटे नहीं हैं। चलेगी बाइक ट्रिप पर। पहले बाइक चलाना सीखो।’
‘सिखा दो तुम। चलो। पापा की बाइक माँग के लाते हैं’
‘बड़ा ना इंदर दिया तुमको बाइक सीखने के लिए, उसपर एक्ज़ाम पर ध्यान दो अभी। गिर के हाथ पैर तोड़ेगी तो एक्ज़ाम कौन देगा। तुमरा रूद्र?’
‘छी। हम ना दिलवाएँगे तुमसे एक्ज़ाम। फ़ेल नहीं होना है हमको’।
‘तुम ना इतरां, बहुत पिटेगी एक दिन देख लेना। क्लास टॉपर थे हम।’
‘किसका हिम्मत जो हमको पीटे। सब डरता है हमसे यहाँ पर। और तुम्हारे टाइम में सिलेबस बहुत आसान था इसलिए तुम टॉप कर गए। हम लोग का कोर्स मुश्किल है।’
‘नंबरी बदमाश हो तुम। मालूम है ना तुमको’
‘हाँ। और ये भी कि बदमाश होना अच्छा होना से बेहतर है’
‘गप्प दो ख़ाली बड़ा बड़ा’
‘तुम्हीं से सीखे हैं’
‘कोई अच्छा चीज़ भी सीखी हो हमसे?’
‘तुमको कोई अच्छा चीज़ आता है?’
‘बहुत बढ़िया पिटाई करते हैं हम। पीट के दिखाएँ तुमको?’
‘बाइक चलाना सिखा के दिखाओ तो मानेंगे’
‘क्या मानोगी?’
‘जो तुम कहोगे सो मानेंगे’
‘प्रोमिस?’
‘पक्का प्रोमिस’
‘इंदर से बाइक कौन माँगेगा?’
‘दादी सरकार।’
‘बाबू सब मिल के माथा चढ़ाया है तुमको। एक हम ही थोड़े हैं’।
एक्ज़ाम ख़त्म होते ही रूद्र इतरां को बाइक पर बिठा कर गाँव से बाहर वाले खेल के मैदान में ले गया। पहला टेस्ट था गिरी हुयी बाइक को उठाना। कि बाइक चलाने के पहले उसे मालूम होना चाहिए था कि बाइक को कैसे उठाना है। बाइक के कलपुर्ज़े दिखाए। हर चीज़ का फ़ंक्शन समझाया। स्पार्क प्लग साफ़ करना सिखाया। प्रैक्टिकल के पहले थ्योरी की ज़रूरत अच्छी तरह समझता था रूद्र। और आत्मनिर्भरता का भी। सीखने में वक़्त तो क्या ही लगना था। बस एक बार सिखाना था कि क्लच धीरे छोड़ते हैं। गियर कैसे बदलते हैं। ब्रेक हल्के दबा कर अंदाज़ा लगाओ कि कितनी ज़ोर से दबाने से बाइक रुकेगी। दो राउंड मारते ही इतरां ने पिक अप कर लिया और बाइक हवा से बातें करने लगी। बाइक को टर्न कर के सीधे सड़क पर उड़ाती चली इतरां। रूद्र के दिल में दुःख तूफ़ानी नदी की तरह उफन रहा था। पलाश लहके हुए थे। जंगल से गुज़रती सड़क पर और कोई गाड़ी नहीं थी। इतरां बाइक एकदम बैलेंस में चला रही थी। बगरो के जाने के बाद से रूद्र बहुत हद तक कंट्रोल फ़्रीक होता गया था। ज़िंदगी के हर मसले पर उसे चीज़ें अपने हाथ में चाहिए होती थीं। वो किसी की नहीं सुनता था। बस एक इतरां थी, कि जैसे बचपन में ऊँगली पकड़ कर घर के अंदर ले गयी थी, वैसे ही कभी भी उसका रूख मोड़ देती जिस दिशा में उसका दिल चाहे। उम्र में इतनी छोटी थी लेकिन रूद्र को लगता था कि इतरां के हाथों में उसकी ज़िंदगी सुरक्षित है। कि इतरां के साथ रहते हुए ऐसी कोई चीज़ नहीं हो सकती जो तकलीफ़ दे। इस लम्हे, बहुत साल बाद रूद्र को ऐसा लगा जैसे वो आज़ाद है। कि उसे फ़िलवक़्त और किसी चीज़ की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। जो है घर वापस जा के देखा जाएगा। अभी ये मौसम है। इस लम्हे इतरां है। तेज़ बाइक है। हवा है। रूद्र ने अपनी बाँहें खोलीं और पीछे की ओर झुकता गया। गहरा नीला आसमान दहके हुए पलाश के बीच झाँक रहा था कभी कभार। तेज़ हवा थी। उसके भरे हुए दिल में सुकून था। मुहब्बत थी बहुत। सालों में उसके होठों पर वे शब्द आए जो किसी भूली डायरी में रख दिए गए थे। वो किसी खुदा के लिए चीख़ा था, ‘आइ लव यू इतरां’। मगर आवाज़ उसके होठों से नहीं आयी थी। इतरां दीवानी हुयी थी। ‘This is the best day ever…’ और फिर, ‘आइssssss लssssssव यूssssss’…‘रूद्र’…जवाब में चिल्ला नहीं पाया था वो, हँसा था अपनी पगली इतरां पर। हल्की सी चपत लगायी थी उसके सर पर। ‘मेरी पगली, इतरां’।

ज़िंदगी में सब कुछ वापस आएगा। वे दिन नहीं आएँगे कि जब दिल टूटा नहीं था। कि जब ज़िंदगी का पहला ‘आइ लव यू’ इतरां ने रूद्र के नाम लिखा था। सबसे ज़्यादा मुहब्बत। सबसे तेज़ रफ़्तार। सबसे ज़्यादा बेपरवाही। ये वो दिन थे जब ज़िंदगी ने सबक़ नहीं दिए थे कि किन्हें आइ लव यू कहना है, किन्हें नहीं। किताबों और काग़ज़ों से बाहर के इन तीन लफ़्ज़ों ने पहली बार आवाज़ चखी थी। ये उसका सबसे सच्चा, सबसे मासूम आइ लव यू था। सबसे गहरा भी। ‘आइ लव यू दी मोस्ट इन दी वर्ल्ड, दी मोस्ट…आइ लव यू फ़ौरेवर रूद्र…’।

फ़ॉरएवर। दुनिया का सबसे ख़तरनाक। सबसे दिलफ़रेब शब्द। हमेशा।
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पहली बार लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. देखें कब तक साथ रहती है मेरे. ये लंबी कहानी की 6ठी किस्त है. इसके पहले के हिस्सों के लिए इस लेबल पर क्रमवार पढ़ें। 


[featured photograph: Raman's Desert Storm]

1 comment:

  1. नमस्ते मेरा नाम सागर बारड हैं में पुणे में स्थित एक पत्रकारिकता का स्टूडेंट हूँ.

    मेंने आपका ब्लॉग पढ़ा और काफी प्रेरित हुआ हूँ.

    में एक हिंदी माइक्रो ब्लॉग्गिंग साईट में सदस्य हूँ जहाँ पे आप ही के जेसे लिखने वाले लोग हैं.

    तोह क्या में आपका ब्लॉग वहां पे शेयर कर सकता हूँ ?

    या क्या आप वहां पे सदस्य बनकर ऐसे ही लिख सकते हैं?

    #भारतमेंनिर्मित #मूषक – इन्टरनेट पर हिंदी का अपना मंच ।

    कसौटी आपके हिंदी प्रेम की ।

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    जय हिन्द ।

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