24 April, 2016

अदब का नाम, 'सरकार' | God is a postman (5)


गोधूली में बाइक की आवाज़ देर तक सुनाई देती रही. कि जैसे उसने जिंदगी दो फाँक बाँट दी हैं. अतीत और भविष्य. जैसे वर्त्तमान कुछ था ही नहीं. रूद्र अपने अतीत और भविष्य के बीच झूल रहा था बिना बीच के बिंदु पर रुके हुए. उस दिन पहली बार रूद्र को इतरां के मर जाने का डर लगा.

क्यूँ का जवाब उसके पास नहीं था. इत्ती सी इतरां. अभी एक लम्हा पहले यहीं थी. वादा करके गयी है कि कल आएगी. मगर ये सीने में किस विरह की हूक उठी है कि जैसे उससे क्या छिन गया हो. रूद्र भी गाँव के बाकी लोगों की तरह इतरां और माही में फर्क नहीं कर पा रहा था शायद. आसमां में चाँद की पतली सी रेख थी. कल की अमावस के होने को गहरा करती हुयी. इतरां के नहीं होने के अँधेरे को गहरा करती हुयी भी. रूद्र ने दरी निकाल कर आम के पेड़ के नीचे डाल दी थी. उसपर लेटा हुआ सोचता रहा कि चाँद किसकी याद में घुलता रहता था इतनी इतनी रातें. उसके लिए तो यहाँ जमीन पर इतरां है और ऊपर आसमान में माही. क्या ही चाहिए और. चाँद को एक पूरी अमावस की रात मोहलत थी कि अपने उदास चेहरे को धो पोंछ सके और अगले दिन मुस्कान की पतली रेख सा खिल सके, नया चाँद. 

यादों को फुर्सत कहाँ लेकिन. रूद्र सितारों में माही का नाम तलाशने लगा. बेतरतीबी से पड़े सितारे उसे उलझाते रहे. उसे कई बार लगता था कि उसे सारे सितारे याद हैं. कि जैसे किसी के साथ प्रेम में बिताये सारे लम्हे. कुछ कम तेज़ चमकते. कुछ ज्यादा. मगर प्रेम के हर लम्हे की मौजूदगी होती थी. अपने नियत स्थान पर. रूद्र बहुत साल बाद बगरो से अचानक मिल गया था संक्रांति के मेले में. अपने बेटे के साथ जलेबी खरीद रही थी. उसको देख कर बेतरह खुश और बेतरह उदासी के बीच रंग में ढल गयी. आँखों और होठों ने आधी आधी जिम्मेदारी ले ली. होठ मुस्कुरा रहे थे. आँखें भर आई थीं. माथे पर घूंघट खींच के पास आई और कहा, 'शहर में अब तक कोई कुरते का बटन टांकने वाली नहीं मिली का? ई लफुआ जैसन भर जिंदगी बिना बटन के कुरता पहनोगे?'. और फिर वो मेला मेला नहीं रहा, कच्चा मकान हो गया जहाँ बगरो उसकी ब्याहता थी और लजाये हुए लाड़ कर रही थी सुबह, काम पर जाने के पहले. फिरोजी कांच की चूड़ियों से एक आलपिन खोली और कुरते के बटन की जगह लगा दिया. रूद्र भूल गया था कि कुरते के बटन टांकने वाली कोई होती है...होगी. या कि उसके कुरते का बटन खुला है. कितनी सादगी से बगरो उसकी बिखरती हुयी दुनिया को एक आलपिन से टांक कर चली गयी थी. मेले में फिर उसका जी एकदम भी नहीं लगा. किताबों में भी नहीं. उसे माही से मिलने की हूक उठी. एक वही है जो पूरे धैर्य से उसकी कहानी सुनती है. फिर इतरां से भी मिल लेगा. माही का जाना उसे पहले से मालूम होता तो शायद तकलीफ कम होती. मगर यूं नन्ही इतरां की नब्ज़ में अटकती चिट्ठियों में मरने की खबर पढ़ना हिचकियों से अपना नाम अलगाने की तरह बेइंतेहा उलझा हुआ था. इस टूटने में भी उसे सम्हालने को इतरां का नन्हा वादा था. कल आने का. वो इतरां के लिए ठीक वही होना चाहता था जो माही उसके लिए थी...पनाह.

खाना खाने का भी दिल नहीं किया आज. सत्तू रखा था. थोड़ा काला नमक डाल के पी गया. प्याज काटने तक का मन नहीं था आज उसका.उसे माही से शिकायत करनी थी बगरो की...इतरां की भी. इतरां चंदर को देख कर ऐसी भागती क्यूँ गयी उसके पास? चंदर से तो रोज मिलती है न...रूद्र से पहली बार मिली है इतने सालों में. नालायक माही, इतनी प्यारी बच्ची को ऐसे छोड़ कर जाने का जी कैसे हुआ उसका. इतरां के बारे में सोचते हुए उसका दिल एक अजीब शंका से भर गया. कि जैसे इतरां भी उससे छिन जायेगी. रूद्र ने खुद को समझाने की कोशिश की कि माही की मौत का सदमा है जो उसे ऐसे वाहियात ख्यालों में उलझा रहा है. उसकी कच्ची नींदों में छोटी छोटी कब्रें आती रहीं. नदी में बहाए हुए बच्चे. कफ़न में लिपटे हुए गोदी में उठाये हुए बच्चे. वो पूरी पूरी रात नींद में चीखता रहा, इससे बेखबर कि उसकी चीखें इतरां को चुभेंगी. कि भले ही उसे इस बात से गुस्सा आये कि इतरां चंदर को देखते ही उसकी ओर भागती चली गयी थी, उसे ये नहीं मालूम कि इतरां का मन उसी के पास अटका हुआ रह गया है.

भोर को आसमान में गहरा लाल इंतज़ार उगा और रूद्र की टूटी नींद की दरारों में धूप भरती गयी. उस ने रामचरित मानस खोला और सुन्दर-काण्ड का पाठ करने लगा. उसके मन को थोड़ी शान्ति आई और वो गाँव का एक फेरा लगाने निकल पड़ा. गाँव में हल्ला हो चुका था कि रूद्र आया है. सब उसकी कहानियाँ सुनने को बेताब थे. रूद्र का घर गाँव के आखिर छोर पर था. वहाँ तक पहुँचते पहुँचते स्कूल का वक़्त हो गया था. इतरां अपनी स्कूल ड्रेस पहन कर तैयार थी बस स्कूल जाने के लिए. उसने बिना कुछ कहे आ कर रूद्र की ऊँगली पकड़ ली और बड़ी दीदी को बोल दिया कि आज वो रूद्र के साथ स्कूल चली जायेगी. उसे रास्ता मालूम है. रूद्र ने बहुत चाहा कि आते के साथ ही इतरां की अच्छी आदतें न बिगाड़े लेकिन इतरां की शैतान आँखों को देखते ही उसे अपना बदमाश बचपन याद आने लगा था. उनमें एक अलिखित समझौता हो गया कि आज स्कूल नहीं जाना है. इतरां उसे अपने हिसाब का गाँव दिखाना चाहती थी, रूद्र उसे अपने समय के अड्डे. यादव टोला से जरा आगे आम का पेड़ था जिसपर पूरी गर्मियां टीन बाबा पहरा देते थे. उनके पास एक डालडा का कनस्तर होता था और एक बड़ी सी लाठी जिससे वो ताबड़तोड़ किसी भी आमचोर का गधा जनम सुधार सकते थे. यहीं पर एक शहतूत का पेड़ भी था इतरां फट से पेड़ पर चढ़ी और अपनी दोनों मुट्ठियों में गहरे लाल शहतूत लिए उतरी. रूद्र और इतरां साथ में शहतूत खाते हुए भूल गए कि इसका गहरा लाल रंग बाद में कत्थई हो जाता है. जैसे अनुराग गहरा के प्रेम हो जाता है.

दोपहर को दोनों रूद्र की कैरावन में आ गए जहाँ रूद्र गुनगुनाते हुए खाना बना रहा था और इतरां गिलास और चम्मच से ताल दे रही थी. बड़ी सरकार के होते घर में सारे काम हिसाब से होते थे. घर का खाना भी सादा किसानों के घर का खाना होता था जिसमें मर्दों के हाथ कभी नहीं लगते थे. इतरां ने पहली बार किसी आदमी को खाना बनाते देखा था. घर पर तो किसी ने भंसा के चबूतरे पर भी पैर नहीं रखा था. सबका खाना आँगन में ही लगता था. रूद्र ने खाना बनाना बगरो के जाने के बाद सीखा था कि उसे मालूम था कि अब उसके जीवन में कोई दूसरी औरत नहीं आएगी. इतने साल हो गए उससे अब भी ढंग की रोटी नहीं बनती थी. आलू की भुजिया और अचार कच्ची पक्की रोटी में लपेट कर एक एक कौर करके रूद्र और इतरां खा रहे थे कि दांत काटी रोटी का रिश्ता बनायेंगे हम. रूद्र को अचानक से माँ के हाथ का खाना खाने की भूख जागी. उसने इतरां से पूछा कि दादी सरकार क्या बनाती हैं आजकल खाने में. इतरां चटोर, सब एक एक करके गिनाती गयी. बैगन का बचका. लाल साग. कद्दू के फूल का पकौड़ी. दुफ्फा. सब. शाम हो रही थी. इतरां रूद्र की ऊँगली पकड़ कर भारी क़दमों से घर चली. माही की चिट्ठियां इतरां को कुछ नयी ही खुराफात बता रही थी. इतरां घर के चबूतरे पर पहुंची और रूद्र की ऊँगली खींचते खींचते घर के आँगन में ले आई. रूद्र इतरां की नन्ही ऊँगली थामे घर में ऐसे दाखिल हुआ जैसे घर इतरां का ही हो और सारे अधिकार इतरां के हैं. दादी सरकार ने सोचा इन्दर आया है. भंसा से रोज की तरह उसके लिए निम्बू का शरबत लिए बाहर आई. सामने रूद्र को देख कर उन्हें चक्कर आ गया. भरभरा के फर्श पर गिरतीं लेकिन रूद्र भी सम्मोहन से जागा और उन्हें बांहों में भर लिया. बरसों से बिसरे जिस बेटे के नाम सिर्फ साल का एक दिन का व्रत आता था उसे सामने देख कर दादी सरकार इस तरह कलप के रोयीं कि जैसे चट्टान को काट कर नदी के बहने का रास्ता निकला हो. रात को खाना खा कर हाथ धो रहा था रूद्र और इतरां लालटेन और गमछा लिए खड़ी थी. सब इतना आसान भी हो सकता था? ये अधिकार कहाँ से आता है? नन्ही इतरां सबकी अना को अपने भोले बचपने में झुका सकती थी। 

रूद्र ने हथेली आँखों तक उठायी और जिस धीमी आवाज़ को सिर्फ धड़कन में सहेजा जा सके, इतरां का अदब का नाम पुकारा, 'सरकार'.

---
पहली बार लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. देखें कब तक साथ रहती है मेरे. ये लंबी कहानी की ५वीं किस्त है. 
पहली ४ इन लिंक्स पर

2 comments:

  1. कहानी? आप अपने पात्रों को सम्हाल पाएंग? अब तक तो आपके सभी पात्र सिरचढ़े रहे हैं।अपनी माजी के मालिक। और उसी रूप में मुग्ध भी करते आएं हैं ।
    - देखते हैं। Best of luck.

    ReplyDelete
  2. आगे की कहानी का इंतजार हैं

    ReplyDelete

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...