27 March, 2016

शब्द उसकी पनाह थे | God is a postman | (4)


ये उन दिनों की बात है जब रूद्र किसी का नहीं था. हवा पानी और मौसम के सिवा. बचपन से ही उसके विलक्षण होने के चर्चे होने लगे थे. किसी भी संगीत को क्षण में पकड़ लेने वाला रूद्र. 'सदा आनंद रहे एही द्वारे मोहन खेले होरी'. कहते थे कि उन दिनों घूमता फिरता मनमौजी रूद्र जिनके घर की दहलीज पर एक बार फाग गा देता, दुःख उस पूरे साल उनके घर का रास्ता भूल जाते.

रूद्र. बड़ी सरकार का मुंहबोला बेटा. सबसे बड़ा. सबसे जिद्दी. जिन दिनों लोग किसानी में खुश रहते थे और सोचते भी नहीं थे कि इंजिनियर लोग होते हैं जो बड़े बड़े पुल बनाते हैं. रेल लाइनें बिछवाते हैं. उनके बीच से ही उभर कर आते हैं. उन बचपन के बेलौस दिनों में एक बार हरिद्वार से आये साधुओं के पास बैठा चिलम गायब करने की जुगत लड़ाते रूद्र के कान में रुड़की की बात पड़ गयी...कि वहां से निकले एक लड़के ने बाँध बनाया है. कि पूरी पूरी नदी का पानी रोक सके और उससे बिजली निकल सके. बस. रूद्र को बिजली पकड़ने वाला वही इंजिनियर बनना था. सिविल इंजिनियर. घर के रोने धोने के बाद खाने पीने का सामान बाँधा गया. बाबूजी खुद हरिद्वार जा के उसे कॉलेज में दाखिला दिला आये. फिर चार साल उधर और रूद्र की अगली जिद. रूस जा के पढूंगा. तब जब कि रूस सिर्फ राजकपूर के रेडियो से चिल्लाते, 'सर पे लाल टोपी रूसी' के लिए जाना जाता था घर पर कोहराम मचा. रूद्र अपने साथ एक ग्लोब लेकर आया था. फीते से नाप कर दिखाया कि देख लो बड़ी सरकार. मैं सिर्फ तीन अंगुल दूर रहूँगा तुमसे. चिट्ठी लिखूंगा. तार भी भेजूंगा. बस मुझे जाने दो. पढ़ना लिखना जो है सो है, दुनिया घूमनी है मुझे.
साहबजादे रूद्र. और उनकी जिद. चल दिए सामान बाँध कर रूस. पांच साल देखते देखते कट गए. लौट कर आया तो देखा कि बाबूजी के सर के बाल पकने लगे हैं. बिहार सरकार की सिविल सर्विसेस थी. देश उन दिनों आगे भागने के सपने देख रहा था और इस सपने की ऊर्जा का एक बड़ा श्रोत था नदी पर बने बांधों से आती जल-ऊर्जा से बनी विद्युत्. बिजली. सपनों में भी चमक आने लगी थी. जिस दिन गाँव तक बिजली की लाइन आई उसकी चमक सबसे ज्यादा बड़ी सरकार की आँखों में दिखी थी. वो बल्ब तो एक आध महीने जलने के बाद फिर बरसों बरस अन्धेरा रहा लेकिन उस लम्हे की ख़ुशी और गर्व को मिटाने को वक्त भी नाकामयाब रहा. इन दिनों एक और ऊर्जा थी. रूद्र के चेहरे पर. उसके दिल पर. दूर संथाल परगना के जिस जंगल में वह अपना अनुसन्धान कर रहा था उसके जीवन की डोर संभाल रखी थी बगरो ने. अठरह साल की बगरो. ताम्बई रंग और चमकती आँखों वाली बगरो. अपनी गहरे लाल पाड़ की सारी में गठे बदन वाली बगरो कि जो रूद्र का खाना पीना, रहना सब देखती थी. रूद्र ने उसे हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाना शुरू कर दिया था और बगरो ने उसे बारिश की भाषा, चिड़ियों का संगीत और झरनों की खुसपुस. बात पढ़ाने की आती तो बगरो हमेशा उससे एक कदम आगे निकल जाती. रूद्र गिटार पर कोई संथाल धुन ऐसी बजा सकता था कि बगरो खुद को नाचने से न रोक पाती लेकिन रूद्र बहुत सीख कर भी नहीं जान पाता कि तूत के सबसे मीठे लाल फल कहाँ मिलेंगे या कि भांग की बूटी जंगल में कहाँ मिलती है. 

प्रेम उनके बीच कविताओं में पनपता. रूद्र ने उसे अंग्रेजी सिखाने के पहले कवितायें पढ़नी शुरू कर दीं. 'एक प्रेमी की सटीक, घातक पहचान सिर्फ एक ही है- मैं इंतज़ार में हूँ.' रूद्र इंतज़ार में रहता. दिन. दुपहर. शाम. जंगल की आदत बहुत भीषण होती है. पहाड़ी झरने के पानी के स्वाद के बाद सब जगहों के पानी का स्वाद फीका लगता है. जंगली फूलों की खुशबू बाग़ के फूलों से ज्यादा तीखी होती है कि उनका होना किसी निमित्त मात्र नहीं होता. वे सिर्फ अपने लिए होते हैं. बगरो ऐसी ही थी. रूद्र की होती हुयी भी स्वतंत्र. रूद्र से प्रेम करते हुए भी उसकी परछाई नहीं बनती, बल्कि कई बार तो उसके होने की चमक इतनी ज्यादा होती कि रूद्र की चमक फीकी लगती. रूद्र को अक्सर उसे देख कर अपनी माँ, बड़ी सरकार की याद आती. वह कई बार सोचता कि घर में बगरो घुल पाएगी कि नहीं. बड़ी सरकार ने अपनी होने वाली बहू के लिए क्या क्या सपने संजोये होंगे. वो कभी कभी बगरो को अपनी बचपन में देखी हुयी भाभियों की तरह बनाना चाहता. एक बार उसके लिए शहर से ब्लाउज बनवा के लाया. उसे सीधे पाड़ की साड़ी पहनाई. बगरो ने उत्साह से पहन ली साड़ी लेकिन उसे देख कर रूद्र का दिल खुद बुझ गया. उसका प्रेम बगरो के अक्खड़ जंगली सौन्दर्य से था. उसके वाचाल होने और बेलौस होने से था. ये साड़ी का अंचल पकड़ शर्माती सकुचाती लड़की उसके लिए माँ भी ढूंढ लाती. ये एक तरह की क्रूरता थी. पिछली छुट्टियों में वो अपने क्वार्टर के आगे से कुछ फूलों के पेड़ ले गया था घर में लगाने के लिए. वे उसके रहते रहते ही हफ्ते भर में मर गए. उसे महसूस हो रहा था कि बगरो उस घर में नहीं रह पाएगी. उसे शायद ऐसी यायावरी की जिंदगी ही चुननी पड़ेगी जिसमें वे दोनों गाँव, जंगल, बस्ती भटकते रहेंगे. उसने बगरो के घर वालों से बात कर ली और अपने साथ उसे लेकर गाँव चला गया कि इसी बहाने माँ और बाबा उसे देख लेंगे और शायद पसंद भी कर लें.

रूद्र घर की बारीकियों को उस वक़्त तक नहीं पहचानता था. घर में नौकर चाकर कभी थे नहीं. बगरो को देख कर किसी ने भी ये सोचा नहीं कि वो उसके साथ बराबरी से है. सबने बगरो की वेशभूषा देख कर सोचा कि माँ को आराम हो इसलिए रूद्र अपने साथ एक नौकरानी लेकर आया है जो बड़ी सरकार का ख्याल रखेगी. उन्होंने पूछने की जरूरत भी नहीं समझी कि बगरो कौन है, किसलिए आई है. रूद्र का कलेजा ऐसा कचका कि आंधी की तरह घर से बाहर निकल गया. सीधे आम के पेड़ की डाल पर. दिन भर घर नहीं लौटा और परेशान होता रहा कि किसको बताई जाए बात और कैसे. मगर लौटना तो था ही. शाम के झुटपुटे के पहले लौटा तो बाबूजी अपनी बैठकी में थे. बाबूजी ने कभी उसकी किसी बात को मना नहीं किया था. इसलिए उसने एक उम्मीद मानी थी दिल में कि शायद बाबूजी मान जायेंगे. संझा बाती के बात लालटेन लेकर वह बाबूजी के कमरे में पहुंचा. बाबूजी को बताया कि वह बगरो से प्रेम करता है. उससे शादी करना चाहता है. बाबूजी ने संयत होकर उसकी पूरी बात सुनी और आखिर में अपने हिस्से की बात समझाई. बगरो से शादी करने के बाद उनके परिवार को बहिष्कृत कर दिया जाएगा. उनके घर में कोई बेटी नहीं ब्याहेगा तो उसके छोटे भाइयों की शादी में बहुत मुश्किलें आएँगी. शायद किसी दूर के गाँव का कोई परिवार अपनी बेटी दे दे लेकिन वे सब भी बगरो को कभी अपने बराबर का नहीं मानेंगी. गाँव के किसी त्यौहार पर उनका न्योता नहीं आएगा और अभी जो तुम्हारी माँ सब जगह जाती रहती है उनका आना जाना भी बंद हो जाएगा. हम एक समाज में रहते आये हैं और इसके नियम तोड़ने की कुछ सजाएं हैं. प्रेम अपनेआप में एक बड़ी संस्था है और कभी कभी ऐसी संस्थाएं कुर्बानी मांगती हैं. रूढ़ियों को तोड़ने में तकलीफ सिर्फ तुम्हें नहीं, तुम्हारे पूरे परिवार को होगी. हम बहुत हद तक आत्मनिर्भर हैं और मैं तुम्हारे फैसले का सम्मान करूंगा. जरूरत पड़ी तो हम किसी नए गाँव जा कर भी बस सकते हैं. रास्ता आसान नहीं है. मैं तुम्हारे हर फैसले में तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन अंतिम निर्णय तुम्हारा है. 

बाबूजी शायद मना कर देते तो रूद्र का खून उबाल मारता और वो कोई इन्किलाबी फैसला ले लेता लेकिन बाबूजी की व्यवहारिक मुश्किलें इतनी सच थीं कि उनके सामने कविताओं की दुनिया का कोई सौंदर्य नहीं ठहरता. रूद्र चाह कर भी अपने बड़े परिवार को अपनी ख़ुशी के लिए तकलीफों में नहीं डाल सकता था. वे त्याग के दिन थे. आत्माभिमान के दिन थे. रात गहरा गयी थी. ढिबरी की रौशनी में उसने देखा बगरो माँ के पैर दबा रही है और कोई उदास गीत गुनगुना रही है. ये नेरुदा की कविता से मिलता जुलता एक था. 'मैं आज दुनिया के सबसे उदास कविता हूँ...जीवन के इस निस्तार में प्रेम कितना छोटा सा लम्हा है मगर विरह...आह...एक जीवन भर का गीत है विरह'. शायद उसने बगरो को नेरुदा के गीत नहीं पढ़ाये होते तो उस रात का दर्द कुछ कम चुभता उसे. वह दृश्य रूह पर टंकित हो गया था. रौशनी में जरा जरा दिखती उसकी उदास आँखें. खटिया पर साथ गुनगुनाती माँ...बीच में पूछती सवाल...तुम इतनी उदास क्यों हो लड़की. कौन है जिसने तुमसे प्यार किया था कभी. क्या वो खो गया है? क्या वो मर गया है? रूद्र के दिल ने कहा...हाँ...वो खो गया है...और काश वो मर सकता.

रूद्र के पठन पाठन में बाबूजी का बहुत योगदान था. उन्होंने उसे दर्शन की बारीकियां समझाई थीं. रामचरितमानस के अंत में एक प्रश्नावली होती है. जब रूद्र को अपने किसी सवाल का कोई जवाब नहीं मिलता तो वो इस प्रश्नावली से अपना सवाल पूछता था और उसके हिसाब से चलता था. आज बहुत बहुत साल बाद उसके पास एक ऐसी समस्या थी जिसके लिए वो इश्वर की थोड़ी मदद चाहता था. देर रात कमरे में माचिस की रौशनी में भगवान् राम को अपने पूरे मन से याद करते हुए रूद्र सवाल बुदबुदाया, 'क्या मुझे बगरो से शादी करनी चाहिए?'. जवाब में रामचरित मानस की वो चौपाई आई जो आज तक उसके किसी सवाल में नहीं आई थी...कि अक्सर इश्वर उसके साथ ही खड़े होते थे जीवन के सारे बड़े निर्णयों में.' होइही सोई जो राम रचि राखा. को करि तर्क बढ़ावै साखा'. मगर यहाँ प्रसंग में यह कहा गया है कि कार्य शुभ नहीं है और इसकी परिणति अच्छी नहीं होगी. 

रूद्र अगले दिन बगरो के घर गया और भरे मन से उसने उसके माता पिता से माफ़ी माँग ली. लौट कर अपना सामान समेटा. बगरो को अंतिम विदा की एक चिट्ठी लिखी. उसे समझाया कि उनका साथ संभव नहीं है कि वह उससे उम्र भर नफरत कर सकती है मगर रूद्र के हिसाब से वो रूद्र को कुछ दिन में भूल जायेगी और अपने जैसे किसी से शादी कर के लोकगीत गाती हुयी सुन्दर बच्चों की माँ बनेगी. इसके बाद रूद्र ने सिर्फ एक बैग में जीने लायक सामान भरा और यायावरी के रास्ते निकल पड़ा. उसकी बेचैन रूह को कहीं करार नहीं आना था. आध्यात्म मे लिए अभी उसकी आत्मा तैयार नहीं थी. अभी वहां विरह की भीषण वेदना थी. जब तक मन इस दुःख से बाहर निकल नहीं जाता, उसे इश्वर के पास शांति नहीं मिलती. ऋषिकेश में हफ्ते भर रहते हुए उसने अपनी जिंदगी के लिए एक मकसद और एक पनाह तलाशनी शुरू की...इन्ही दिनों उसे चिट्ठियां मिलीं. खून में बहती हुयीं. हवा में घुली हुयीं. गंगा के बर्फीले सफ़ेद पानी में उभर आती चिट्ठियां. उसकी नीली नसें तड़कतीं और वो बगरो की चहचहाहट को तलाशता मगर सिर्फ लहरों का शोर होता. गंगा का पानी उसकी सोच को और तीखा कर देता और उसे पहाड़ी झरनों का मीठा पानी याद आता. बगरो की गंध उसके काँधे पर साथ चलती. उसकी उँगलियों में गुंथती. 

पनाह. शब्दों में थी. रूद्र ने निश्चय कर लिया था कि वो अपने जीने के लिए कल्पना का एक वृहद् संसार रचेगा जिसमें पूरी दुनिया से चुनी हुयी कवितायें होंगी और ये कवितायें वो खुद चुन कर लाना चाहता था. एक लम्बे सफ़र के अंत में हमेशा एक किताबों की दुकान होती. एक अनजान भाषा का देश होता. अजनबी लोग होते. धीरे धीरे उसे कविताओं की गंध लगने लगी. जबकि दुनिया को कोई चीज़ इस छोर से उस छोर तक नहीं जोड़ती थी मगर वह पॉइंट्स प्लाट करते चलता. नयी भाषाएं सीखते चलता. टूटे शब्द. बिखरे शब्द. उम्मीद के शब्द. साथ बुनते चलते दुनिया के ऊपर रहमतों का रेशम दुशाला. याद की दुखती रातों में रूद्र दुशाले का एक कोना पकड़ कर सोता. यूँ ही चलते चलते एक दिन दुनिया छोटी पड़ गयी. रूद्र लौट कर अपने देश आ चुका था. उसके साथ थी पूरी दुनिया की कविता की किताबें. दिल्ली के पोस्ट ऑफिस में उसके पोस्ट बॉक्स में वो सारी किताबें सुरक्षित थीं. अब आवारगी को एक ठिकाना देना था. उसने अपने लिए एक कैरवन खरीदा और उसे पूरी तरह एक छोटी लाइब्रेरी और रहने के कमरे में परिवर्तित कर दिया. यहाँ किताबों की जगह थी और चिट्ठियों की दराज थी. सोने का कमरा. छोटा सा किचन. खाने का जरूरी सामान भर. 

जैसे सांस अटकती है रूद्र दिल्ली से वापस आ रहा था. घर. रास्ते के हर गाँव में रुकता हुआ. लोगों को कहानियां सुनाता. चिट्ठियां दिखाता. देर रात गिटार पर अलग अलग देशों के गीत गाता और हमेशा रात के अँधेरे के पहले सो जाता. उससे लैम्प, लालटेन या डिबरी से अब भी तकलीफ होती. कभी कभी पेट्रोमैक्स जला लेता कि जब किसी गाँव के बच्चे बहुत जिद करते. लौट कर आया तो सबसे पहले जो चीज़ महसूस हुयी उसे वो थी माही. मरहम जैसी माही. रूद्र उस दिन पहली बार खूब फूट फूट के रोया था. सिविल इंजीनियर रूद्र ने अपने मन पर भी तो बाँध बना रखा था जिसमें बगरो की सारी यादें ठहरी हुयी थीं. उस दिन उस बाँध से गिरते पानी से इतनी ऊर्जा निकल रही थी कि कई लोगों की जिंदगियां रोशन हो सकती थीं. माही से बात करना इतना आसान कैसे था. कि जैसे बिना बोले समझ जाती थी मन का सारा हाल. कुछ दिन में रूद्र को महसूस होने लगा कि उसके पांवों में जड़ें उगने लगी हैं. गाँव उसे बेतरह खींचता था. माँ, बाबा और माही का निश्छल प्रेम भी. अब रूद्र को बंधन में छटपटाहट होती थी. उसे विदा कहना नहीं आता था. इक रोज़ बस अपना कैरवन लेकर निकल गया बहुत बहुत दूर. फिर माही की खबर मिली कहीं से कि बेटी हुयी है. इतरां. मगर देश के दूसरे छोर से आते आते वक़्त लग गया. 

और यहाँ थी इतरां. और जा चुकी थी माही. 

रूद्र ने बहुत दिन बाद अपनी डायरी निकाली और रोलां बार्थ की कविता पर उसकी नज़र पड़ी...इस नन्ही इतरां ने अपनी मुट्ठी में उसका दिल बाँध रखा था. इत्ती सी इतरां. टिमिक टिमिक कैसे आँखें झपका कर कह रही थी. मैं कल आउंगी. पक्का. वादा. बहुत बहुत साल बाद रूद्र को एक पुरानी बात याद आई कि जब बगरो को घर लेकर आने वाला था तो बहुत लाड़ में कहा था उससे...'मुझे और कुछ नहीं, बस एक बेटी चाहिए...एकदम तुम्हारे जैसी...'.

रोलां कह रहा था...'प्रेमी की सटीक, जानलेवा पहचान एक ही है- मैं इंतज़ार में हूँ'.
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पहली बार लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. देखें कब तक साथ रहती है मेरे. ये लंबी कहानी की चौथी किस्त है. 
पहली तीन इन लिंक्स पर

8 comments:

  1. अभभी एक घंटे से पढ रहा हूँ इतरां की कहानी को और जैसे वो मुझमें जी रही है एक घंटे से । तुम्हारा लिखना इंस्पायर करता है किरदार बुनने को ....ऐसे अनूठे किरदार बुनने को । सोचता हूँ तनया का नाम बदल कर इतरां रख दूँ :) ।

    ज़ारी रखो अफ़साना... आने दो बलास्ट रेडियस में धीरे धीरे सबको ।

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    1. कर्नल. मेरी लेखनी को मिला ये जिन्दगी का सबसे खूबसूरत कमेंट है. ऐसे ही कुछ प्रोत्साहनों के कारण कभी लगा था कि किताब लिखा जायेगी. और अब लगता है कि लिख ही लूंगी नौवेल.
      बहुत शुक्रिया. बहुत बहुत बहुत.
      The next time we meet, drinks are on me :) :)

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  2. मुझे लगता है पढ़ना छोड़ देना चाहिए तुम्हें....इसलिए इतना नहीं आता....बहते बहते कहां बहा देती हो

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  3. पिछले ६ महीनों से आपको पढ़ रहा हू, और एक एक लफ़्ज़ जी रहा हू, आपने मुझे इंस्पायर किया अपने मन की बातों को रोशनाई से सजाने को, बुकमार्क मे एड्रेस सेव है ढूँढ कर पढ़ता हू, पर आज की यह कहानी बिल्कुल अपनी सी लगी, कही कही रुद्र की जगह स्वयम् को स्थापित पाया।

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  4. आपकी कहानियॉ पढ़ते पढ़ते डूब जाता हूँ, कैसे लिख लेती हैं इतना अच्छा कि बस डूबना याद रहता है, और बाकी सब कुछ बहता हुआ गायब हो जाता है। बगरो को भूलना कहाँ आसान था, लेकिन वो त्याग के दिन थे, आत्माभिमान के दिन थे, क्या इतना आसान रहा होगा रूद्र का माफ़ी मांग लेना, और इतरां। ........
    'प्रेमी की सटीक, जानलेवा पहचान एक ही है- मैं इंतज़ार में हूँ'.
    पात्रों को बुनना आसान होता है, लेकिन उनमे जान फूंकना मुश्किल। बड़ी देर से सोच रहा हूँ, क्या लिखूं और सारे पात्र सामने आकर खड़े होते हैं, शरीर के रोएं अब भी खड़े हैं .........कहीं दूर अब भी कोई बोलिआ बॉउल बजा रहा होगा किसी के इंतज़ार में।
    लिखते रहे.

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