12 March, 2016

किस्से में एक नदी उगती थी. नदी में एक किस्सा पनपता था | God is a postman| (1)


इतरां क्या ही किसी की मुट्ठी में आती. दादी सरकार ने नाम ही ऐसा रक्खा था. खुद से उड़ती जाए हवा के पोर पोर में और जिसे एक बार छू ले वो घंटों गमकता रहे उसकी महकती आँखों के सुरूर में. इतरां जन्मी थी उस वक़्त जगजीत सिंह और चित्रा सिंह गा रहे थे रॉयल अल्बर्ट हॉल में. पंजाबी टप्पे. रेडियो पर कॉन्सर्ट आ रहा था.

बच्ची का नाम चित्रा रखने का मन था इन्दर का और माही को चित्रा नाम पसंद नहीं आया वर्ना तो एक ही मिनट में नाम पक्का हो जाता. यहाँ से किस्सा लम्बा चल निकला. क्या ही इन्दर और क्या ही माही, माँ बाप को कोई एक नाम पसंद ही नहीं आता. हर रोज नया नाम रख देते अपनी लाड़ली का. वो इस कदर ज़िंदा थी कि जैसे उसके पहले किसी में जान ही न हो. जिस कमरे में होती उजास फूटता. रंग जैसे दूध को हल्के सिन्दूर के हाथ से छू दिया गया हो. एकदम ही नर्म, नाज़ुक सफ़ेद में हल्का गुलाबी. बड़ी बड़ी आँखें और इत्ती कालीं कि टिम टिम चमकतीं. माथे पर एकदम काले हल्के घुंघराले बाल. दुनिया का कोई शब्द उसके लायक ही नहीं लगता. फूलों के नाम सोचे गए - अपराजिता, गुलाबो, चिरामिरा मगर नाम लेते ही चाँद में काले दाग जैसे लगते. मौसमों के नाम रखे गए लेकिन कोई मौसम नहीं ठहरता उसकी नीम नींद में मुस्कुराते होटों के सामने. बड़ी मुश्किल थी.

इक ऐसी ही शाम थी. दिन भर के लिए रखा गया नाम पसंद नहीं आ रहा था और इन्दर और माही उसके नए नाम के लिए सोच रहे थे कि अब क्या हो उसका नाम. रेडियो पर फिर से जगजीत सिंह के पंजाबी टप्पे आ रहे थे. इन्दर माही को मनाने की कोशिश में लगा था कि चित्रा कितना सुन्दर नाम है. इश्वर की बनायी तस्वीर ही तो है हमारी दुलरुआ बेटी. आँगन के बीच में एक गुदड़ी बिछाए बड़ी सरकार खुद से बच्ची की मालिश कर रही थीं. उनको पंजाबी बड़ी अच्छी लगती थी. ग़ज़ल के साथ गुनगुना रही थीं...'की लैना हैं मितरां तो...मिलने तो आ जांवां डर लगता हैं छितरां तों'. और फिर अचानक ही माही की ओर देख कर बोलीं, 'अरे माही, इत्तर को लाड़ से बोलो तो इतरां ही बनेगा न?'
'जी...ऐसा ही कुछ'
'तो हम आज से इसे इतरां बुलाया करेंगे...दुनिया में अपनी जैसी सिर्फ एक, कि जिसका नाम भी सिर्फ उसका अपना है. तुम दोनों का नाम पक्का हो जाए तो बता देना...मगर मेरे लिए ये आज से इतरां हो गयी.' 

और बस...उस दिन से वो सबके लिए ही इतरां हो गयी.

——
उन दिनों जगजीत सिंह का क्रेज था. वे सबको अच्छे लगते थे. अख़बारों में उनकी तस्वीर आती थी. लड़कपन की मासूमियत और गीत के बोलों की गहराई के बीच एक ऐसी आवाज़ कि बड़ी सरकार भी उनपर उतनी ही फ़िदा थीं कि जितना उनका सबसे छोटा और सबसे लाड़ला बेटा इंदर. उन दिनों अच्छा रेडियो सबके पास नहीं होता था, गांव भर में एक अच्छा रेडियो हो सकता था. इंदर ने ओवरटाइम कर कर अतिरिक्त पगार उठाई थी और उससे घर में रेडियो खरीद लिया था. दिन भर भले रेडियो बैठक में जमा रहता. कभी भाइयों के साथ खेत में रहता. कटाई के समय अक्सर टाली के ऊपर रखा रहता. मगर रात होते ही बड़ी सरकार के पास रेडियो अपने पैरों चल कर पहुँच जाता था. फिर घर में रोटियों और पंजाबी टप्पों की मीठी गंध एक साथ घुलती. और क्यूँ न जाता. इंदर को बाहर जा के पढ़ने का मन हुआ तो बड़ी सरकार ने ही तो बाबूजी को समझाया था कि उसे आगे जा के पढ़ने का मन है तो जाने दो न. बड़ी सरकार कभी घर के बाहर के मुद्दों में नहीं बोलती थीं इसलिए जब उन्होंने सिफारिश की तो बाबूजी ने उनका मन और मान दोनों रखा और छोटे को बाहर जा कर पढ़ने की इजाजत दे दी. 

उनका बड़ा सा परिवार था. बाबूजी गाँव के स्कूल में प्रिंसिपल थे. उनके सात बेटे थे. गाँव में बहुत पैत्रिक संपत्ति थी. खेती बाड़ी में लगा हुआ सीधा साधा किसानों का घर था. गाँव के बाकी परिवारों की तरह. सब भाई मिल कर मेहनत से खेतों में काम करते थे. घर के काम लायक उपज हो जाती थी. बहुत अमीरी नहीं थी लेकिन गरीबी भी नहीं थी. घर का छोटा बेटा इंदर लाड़ला था सबका. उसकी दुनिया देखने की ख्वाहिश थी. स्कूल में पूरे जिले में एक उसकी ही फर्स्ट डिविजन आई थी, वो भी डिस्टिंक्शन से...घर भर में एक वो ही बाहर गया था. बारहवीं की परीक्षा में उसने नंबर भी बहुत अच्छे लाये और डॉक्टरी का एक्जाम भी पास कर लिया. बाबूजी का सीना चौड़ा हो गया. इससे अच्छी बात और क्या हो सकती थी कि बेटा डॉक्टर बन गया. आसपास कई कई गाँव तक कोई डॉक्टर न था, न कोई उस पोस्टिंग पर आने को तैयार होता था. प्रैक्टिस की सुबह शिवाले ले जाने के लिए बड़ी सरकार ने खुद से गूंथ कर आक के फूलों की माला बनाई. आखिर ये सब करम तो इश्वर का ही था. बड़ी सरकार ख़ुशी के मौकों पर भोले बाबा को कभी नहीं भूलती थी.

देखते देखते इंदर को डॉक्टर बने दो साल बीत गए. घर में भाभियाँ अब मीठी छेड़ करने लगी थीं कि अब तो इसके हाथ पीले कर दीजिये. इन हाथों में इंजेक्शन शोभा नहीं देता. हमें हुक्म चलाने के लिये एक छोटी देवरानी चाहिये. बड़ी सरकार खुद से ढूंढ कर हीरा बहू लायी थी. छोटा सा चाँद चेहरा और छोटी लेकिन चमकीली आँखें. पूरे घर में खनकती रहती. उसके आने से पूरा घर जैसे जिन्दा हो गया था. नाम भी कितना मीठा था...माही. भारत की तीन नदियों में से एक कि जो पश्चिम की ओर बहती हैं. माही को कौन सा रेगिस्तान खींचता था. कौन सी प्यास सींचने को लबालब भरी रहती थी. आखिर कुछ सोच कर ही उसका नाम माही रखा होगा. उसके आने से घर में सिर्फ सुख ही सुख आता था. अलता लगे लाल पैर...कि उसका पैरा इतना अच्छा था कि आते साथ बड़ी बहू के भी पाँव भारी हो गयी. वो अपनी छोटी देवरानी पर निहारी निहारी जाती. माही, तेरा ही करम है जो मुझ अभागन के आँगन में चाँद खिलेगा. माही खिलखिल बहती रहती. बड़ी सरकार उसे इतना मानती थी कि जैसे बहू नहीं बेटी हो. सात बेटों की माँ के अन्दर भी शायद एक बेटी की कोई चाहना बाकी रही होगी और ये सारा प्रेम माही के हिस्से आया था.

माही जब पेट से हुयी तो जैसे पूरा गाँव ही बावला हो गया था उसकी ख़ुशी में. कभी फुलवारी नानी अपने मायके से बने लड्डू लिए आती थी कभी कांची फुआ उसके लिए चने के सबसे महीन पत्ते बीन कर साग बना देती. माही ने पहली बार जाना था कि सिर्फ उसे ही गाँव के हर घर के बारे में सब पता था नहीं था, गाँव की सारी औरतों ने भी उसकी पसंद की चीज़ें ऐसी ऐसी संदूक में भर रखी थीं जिसमें सिर्फ सबसे उजले सुखों की जगह रहती है. पूरे नौ महीनों के दरम्यान घर कहानियों से फलता फूलता रहता. आम के बौर की तरह कहानियां उगतीं. हर आने वाला उसका दिल लगाने को कोई न कोई किस्सा लिए आता. दूर के रिश्ते के मामा भी आते तो उसे पास बिठा कर अपने ग्रामदेवता की कहानियां सुनाते रहते. माही सर तक आँचल काढ़े हंसती खिलखिलाती रहती. रात ढलती तो बड़ी सरकार के साथ रात के फरमाईशी गीत सुना करती. उन दिनों रोज़ कोई न कोई माही के नाम कोई गाना सिफारिश कर देता. रेडियो पर लोग जानने लगे थे कि बिहार के छोटे से गाँव तिलिसमपूर में कोई माही रहती है कि जो पूरे गाँव की इतनी लाड़ली है कि रोज़ उसके नाम सिफारिशी गाने भेजे जायें.
——
बड़ी सरकार ने नाम रख दिया तो बस. पूरे घर की इतरां हो गयी वो. माँ की दुलारी. इतरदानी. इतरडिब्बी. इतरपरी. माही की इतरां...माही...इतरां की माँ माही.

इतरां की आँखों में नींद नहीं और सारे घर की नींद हराम. वो सारे समय आँखें खोले टुकुर टुकुर माही को देखती रहती. उसे सुलाने की कोई तरकीब काम ही नहीं करती. कई तरह के झूले लाये गए. बड़ी सरकार ने कोशिश की, गाँव की कई बूढी पुरानियों ने कोशिश की कि बच्ची कुछ सोया करे लेकिन इतरां तो बस इतरां थी. सोती नहीं और चुपचाप टुकुर टुकुर तकती रहती. माही उसे ठेहुने पर झुलाती रहती गीत गुनगुनाते हुए...'तू मेरी इतरां, मैं तेरी मितरां...पक्की अमिया...मिठियां चिठियाँ...रस की बोली...कुछ ना तोली...जब तक दुनिया...हैं हम सखियाँ...बोल री इतरां...बन मेरी मितरां...बोल मेरी इतरां...कौन तेरी मितरां?'. 

इश्वर सुख अगर बहुतायत में देता है तो उसकी अवधि कम कर देता है. बारिशों के दिन थे. रात भर मेघ लगे हुए थे. पूरा घर किचकिच हो रखा था. बारिश बंद हुए आधा पहर बीता होगा. रौशनी थी लेकिन उजाला फीका था. बड़ी सरकार की नींद इतरां के रोने से खुली. इतरां तो कभी रोती नहीं...क्या हुआ बच्ची को. सोचती सोचतीं माही के कमरे के पास आयीं. कमरा खटखटाया तो इन्दर ने दरवाजा खोला. पलंग पर इतरां की चीखें तेज़ होती जा रहीं थीं और माही गहरी नींद सोयी थी. चेहरे पर टूट चुकी मुस्कान की आखिरी उदास रेख थी. बड़ी सरकार ने इतरां को गोदी में लिया और माही के माथे पर प्यार से हाथ फेरा. माथा. जो पत्थर की तरह ठंढा था. बड़ी सरकार के दिल में उम्र भर के भय ने उझक कर देखा...'इन्दर...देखो ना...माही का माथा इतना ठंढा क्यों है'. इन्दर ने माथे पर हाथ रखा और हहरा के गिर गया. बड़ी सरकार ने माही को पूरी तरह झकझोरा लेकिन माही ने अपने हिस्से के दिन जी लिए थे. इन्दर ने सारी कोशिशें की...एड्रेनालिन का इंजेक्शन...सीपीआर...मगर वो जानता था कि ये सब बेमानी है. उस दिन उसे अपने डॉक्टर होने पर पहली बार अफ़सोस हुआ था. उसने खुद को कहा. 'माही नहीं रही'.

नहीं रहना क्या होता है? हम जब होते हैं कहाँ होते हैं?

माही नहीं रही. मगर सिर्फ अपने बदन में. उसकी रूह पिंजरे से आजाद होकर यूं बिखरी कि इत्र हो गयी. पूरा गाँव माही से सिंचता. सारी औरतें. फसलें. त्यौहार. और जिंदगी भी. माही होती इतरां में...बसती जाती...किस्सा दर किस्सा दर किस्सा.
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पहली बार लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. देखें कब तक साथ रहती है मेरे. ये लंबी कहानी की पहली किस्त है. 

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