13 March, 2016

बचपन एक आवारा दिवास्वप्न था. बस | God is a postman| (3)


दिवास्वप्नों के घर नहीं होते. वे पनाह तलाशने रास्तों के पास बैठे रहते हैं कि कोई उन्हें घर ले जाए. अनछक बारिशों में इतरां अपने नन्हे डगमग पैर लिए चलने लगी. गाँव की मिट्टी को बहुत दिन बाद किसी ने सुना था. उसकी गुलाबी एड़ियों में कीचड़ लगा रहता. गाँव की पगडंडी. खेत की मेड़. शिवाले के पास का पोखर. सब धांगती रहती इतरां. गरमी की दोपहरें तो उसकी पसंदीदा थीं. गाँव का कोई कोना न होगा जिसके बारे में इतरां को मालूम न था. उसके साथ गाँव के बच्चों की पूरी बानर टोली चलती थी. बस ऐसी ही किसी दोपहर इतरां को सांप ने काट लिया. लोग उठा कर सीधे पास वाले हॉस्पिटल भागे जहाँ इन्दर काम कर रहा था. वहां पहुंचे तो पता चला इन्दर औपरेशन थियेटर में है. इन्दर के दोस्त डॉक्टर हरि ने इतरां को देखा. एंटीवेनम दिया. पर्ची पर बाकी दवाइयों के नाम लिख रहा था कि देखा कि नीचे की ओर भूरे रंग में लिखा जा रहा है 'हरहरिया सांप'. इतरां इंजेक्शन लगते वक्त भी खीखी करके हँस रही थी. डौक्टर को जाने कैसे महसूस हुआ कि इतरां ने लिखे हैं वे टेढ़े मेढ़े शब्द, मगर उसने ख्याल को हवा में उड़ा दिया. गाँव से साथ आये हुये किसी ने लिखा होगा कि इतरां को किस सांप ने काटा है. मगर डॉक्टर हरि को उस दिन के बाद से किसी ने डॉक्टर हरि नहीं कहा, हरहरिया सांप ही कहते रहे. ये इतरां का पहला किस्सा था. बायीं हथेली के उलटी तरफ सांप के दांतों के दो निशान थे. गोल-गोल, काले. इतरां सांप के दांत के निशान को दिखा कर कहती, ये आधा किस्सा है. इसमें एक बिंदु और लगेगा. तुम देखना. ये उन दिनों की बात थी कि जब इतरां को कहानी के अंत में लगने वाली तीन बिंदियों के बारे में हरगिज़ पता नहीं हो सकता था.

इतरां बचपन से ही किस्सागो थी. हवा से कहानियां बुनती. बातें इतरां को छू कर गुज़रतीं तो अपना रंग बदलने लगतीं. उसमें किसी भी किस्से को सुखान्त करने का हुनर था. उसके लिए मौत कोई दुःख भरी चीज़ नहीं थी. वो मौत का किस्सा सुनाती तो कुछ यूं कि उसकी माँ माही अपने मायके गयी है. इश्वर के यहाँ बहुत सुख से रह रही है. लौट आएगी दुनिया में कुछ दिन रह कर. हाँ, यहाँ सबको उसकी याद आती है लेकिन हर औरत अपने मायके में भी तो रहना चाहती है कुछ दिन कि उसके मायके में सब कुछ उसकी मर्जी का होता है. फिर नन्ही इतरां बिलकुल गंभीर होकर ग़ालिब का शेर सुनाती, 'हमको मालूम है जन्नत की हकीकत इसलिए, दिल के खुश रखने को तेरा हर ख्याल अच्छा है’. तो कायदे से इतरां ने कोई बुरी खबर कभी किसी को सुनाई ही नहीं थी. लोगों को पूरा विशवास था कि इतरां की जुबान पर माँ सरस्वती विराजती हैं. गाँव की लड़कियां उसके इर्द गिर्द अपने प्रेमियों के किस्से लिए डोलती थीं. 'बोल मेरी इतरां, वो मिलेगा न मुझे, दशहरा के मेले में...बोल मेरी इतरां...होली पर वो घर आएगा इस साल कि नहीं?' इतरां के पास हर सवाल के लिए एक कहानी होती थी. वो पूरे डीटेल में बताती थी कि महबूब कहाँ अटक गया है...बस इतरां के बिम्ब उसकी अपनी दुनिया के होते थे. इतरां को पूरा पूरा गाँव मिल कर बिगाड़ रहा था. सब ही उसे सर चढ़ाते थे. खास तौर से जब से सांप ने काटा था और लोगों को डर लगा था कि माही की तरह इतरां भी अचानक उनसे छिन जायेगी तब से वे माही के साथ के लम्हे लम्हे को ऐसे जीते जैसे वाकई कल मौत आ ही जानी है. बाकी बच्चों ने सजा का स्वाद चखना शुरू कर दिया था, मगर इतरां को अभी तक किसी ने एक थप्पड़ भी नहीं मारा था.

दादी सरकार इतरां को बढ़ते हुए देख रही थी. इतरां एकदम माही पर गयी थी. जबसे बोलना शुरू किया था इतनी तेज़ तेज़ बोलती थी कि लगता था सांस लेना भूल न जाए. छोटी दूरी के धावक जैसी थी उसकी बातें. इतरां के लिए हमेशा वक़्त कम पड़ जाता था, वो नींद में भी कहानियां बड़बड़ाती रहती थी. 'चाची को कुएं पर कपड़े गयी तो रास्ते में माही मिली थी. चाँद से उतर कर आयी थी. अब वो परी बन गयी थी. चाची की साड़ी की सलवटें परी माँ ने गायब कर दीं. परी माँ ने आज सुनहले पंख लगाए थे. उनके बालों से हरसिंगार की खुशबू आती थी. मैंने उनके बाल सूंघे थे. देखो. मेरी उँगलियाँ देखो'. दादी सरकार उसकी नन्ही उँगलियाँ चूमती तो पातीं कि उनसे वाकई हरसिंगार की खुशबू आ रही होती. बेमौसम. माही की याद की तरह.

इन्ही दिनों इतरां हर चीज़ गौर से देखने लगी थी. चीज़ों को अपने हिसाब से समझने की कोशिश करती. जो समझ नहीं आता उसे कहानियों में रचने लगती. अगले दिन जितिया था. बच्चों के लिए किया जाने वाला पर्व. टोली में चवन्नी को ही इन चीज़ों की कहानी मालूम थी. उसने भाव खाते हुए बस इतना ही बताया था कि जिसके जितने बच्चे होते हैं उसे उतने सारे झिन्गली के पत्ते चाहिए होते हैं. अगली सुबह इतरां को पता चला कि झिन्गली के पत्ते तोड़ने के लिए सीढ़ी आई है और उससे बड़े बच्चों की पलटन को जिम्मा सौंपा गया है कि घर में सब के लिए पत्ते तोड़ लिए जाएँ. बस इतरां लड़ झगड़ के गोहाल के छत पर चढ़ के तैयार. उसने हाल में गिनती सीखी थी तो एक बार में दस ही पत्ते समझ में आते उसे. घर भर के साथ-आठ बच्चे नीचे से चिल्ला चिल्ला कर संख्याएं बता रहे थे. बड़े भैय्या लोग दीदियों को डांट रहे थे कि फिर सांप ने काटा अगर इतरां को तो वो सांप पकड़ के उनको भी उससे कटवा देंगे. इस शोर शराबे में इतरां को एक ही चीज़ याद रह गयी. दादी सरकार के हिस्से सात पत्ते आये थे. लेकिन सात पत्ते क्यों. उसके तो सिर्फ पांच चाचा थे और कोई फुआ भी नहीं थी. इतरां ने सोचा कि आज शायद प्रसाद खाने बड़े वाले चाचा आ जायेंगे कि जिसके नाम से सब दादी सरकार को बिसरा माय कहती हैं. 

घर भर में सबकी पूजा निपटते निपटते दोपहर हो आई. बिसरा चचा का कोई ठिकाना नहीं था और तो और घर में कोई बात भी नहीं कर रहा था उनके आने की...लेकिन इतरां को पूरा यकीन था कि उसके चचा आयेंगे. दोपहर को प्रसाद में ठेकुआ मिल गया और आगे की कहानी किसी से सुनने की कोई उम्मीद नहीं रही तो इतरां चुपचाप अपनी पसंदीदा जगह की ओर चल पड़ी. स्कूल के पीछे एक छोटा सा पोखर था जिसके पास से नहर बहती थी. नहर किनारे बहुत से आम के पेड़ थे. गर्मी के दिनों में इतरां घर से फरार होकर यहीं आम के पेड़ की सबसे ऊंची डाली पर बैठी रहती. प्यास लगती तो नहर से पानी पी लेती. यहाँ से गाँव को आती सड़क का आखिरी छोर भी दिखता था. अक्सर यहाँ से इतरां शाम को ही लौटती जब इन्दर की राजदूत दूर से दिखने लगती. आज इतरां उदास थी. ऐसा कभी नहीं हुआ था कि उसे किसी ने आने की उम्मीद बंधे और वो ना आये. वो खुद को कोई कहानी सुना कर बहला भी नहीं पा रही थी. उसने कलाई पर ऊँगली रखी कि आज माही ने कौन सी चिट्ठी लिखी है उसे लेकिन आज माही गुस्सा थी उसपर कि वो गरमी में पेड़ पर बैठी है. लू लग जायेगी. इतरां माही से कट्टी कर बैठी. आज उसे अकेले आने पर अफ़सोस हो रहा था. चवन्नी अपने घर बुला रहा था. उसके घर शहर से रिश्तेदार आये थे और साथ में रूह अफज़ा लेते आये थे. आज इतरां घर आती तो उसके साथ चवन्नी को भी एक गिलास रूह अफज़ा पीने को मिल जाता. लेकिन इतरां अपने चाचा से अकेले मिलना चाहती थी. शाम होने को आई. थोड़ी देर में सूरज डूब जाता. इतरां को प्यास लग रही थी. उसने एक नज़र दूर सड़क के आखिरी छोर तक डाली...वहाँ से कोई गाड़ी आती दिखी. वो दिल में जानती थी कि ये ही उसके चचा हैं. वो पेड़ से उतर कर नहर पर चली आई और मुंह हाथ धो कर पानी पीने लगी.

गाड़ी ठीक उसी के पेड़ के नीचे आ के रुकी. गाड़ी का दरवाज़ा खुला. इतरां ने बहुत लोग तो नहीं देखे थे अपनी छोटी सी जिंदगी में मगर फिर भी उस शख्स जैसे किसी को उसने कभी नहीं देखा था. न अपने गाँव में. न बाबूजी के अस्पताल में और ना अपने किसी किस्से में. उसके काँधे से जरा नीचे के लम्बे बाल थे और उसने कई सारी छोटी छोटी चोटियाँ बना रखी थीं. ऊपर एक गहरे नीले रंग का ढीला सा कुर्ता पहन रखा था जिसपर कई रंग की चिप्पियाँ लगी थीं. गले में बहुत सी मालाएं. उँगलियों में अंगूठियाँ. हाथों में रंग बिरंगे कड़े. मगर जो चीज़ सबसे ज्यादा उसे खींच रही थी वो थी उसकी आँखें. सूरज उसकी आँखों की सीध में था और उसकी रौशनी भी दुलार से छू रही थी उसकी आँखों को...सोने के रंग की थी उसकी आंखें. तरल. पानी जैसीं. इतरां की नब्ज़ में माही की चिट्ठियां बहुत तेज़ी से धकधक करके जमा होने लगीं. इतरां लेकिन माही से कट्टी थी और उसे माही की कोई बात नहीं सुननी थी. उसे डर था कि माही कहेगी कि इससे बात मत करो. ये झोले में बच्चों को भर कर ले जाने वाला डाकू है. इतरां को पहली बार जरा सा डर लगा मगर उसने कमर पर हाथ रख कर उससे ऐसे सवाल किया जैसे वो गाँव की सीमारेखा की इकलौती रक्षक हो और उसका काम है गाँव में जाने वाली हर विपदा को रोकना. उससे लड़ेगी कैसे ये नहीं सोचा उसने मगर उसका रास्ता रोक कर खड़ी जरूर हो गयी. गाँव के ग्राम देवता का मन में ध्यान किया और पूछा उससे, 'कौन हो तुम?'. वो कुछ बोला नहीं ठठा के हँस पड़ा और इतरां को गोद में उठा के आसमान की ओर उछाल दिया. इतरां को लगा वो तितली है...आसमान से नीचे आएगी ही नहीं. वो हँसता रहा 'इतरमिश्री. इतरजिद्दी. इतरपिद्दी. इतरझूठी. इतरमिट्ठी. इतरचिट्ठी...नालायक...तेरी माही ने बताया नहीं तुझे कि मैं आने वाला हूँ. रूद्र नाम है मेरा'. एक गोल गोल चक्कर घुमा कर उसने इतरां को नीचे उतारा. इतरां की दुनिया में सब कुछ तेज़ी से घूम रहा था. माही की चिट्ठियां सारी समझ आने लगी थीं. इतरां ने कुछ नहीं कहा. रूद्र की ऊँगली अपनी नब्ज़ पर रखी. वो जानती थी रूद्र को माही की चिट्ठियां पढ़ना आता है. मगर वो नहीं जानती थी कि माही की चिट्ठियां पढ़ कर रूद्र को चक्कर आ जाएगा. वो एकदम अचानक घुटनों के बल बैठ गया, उसकी आँखों के ठीक सामने. इतरां ने देखा रूद्र की आँखों में माही का पानी बह रहा था. भर भर छलछलाता. उसे पकड़ कर सीने से लगा लिया उसने. हिचकियाँ आ रही थीं उसे. इतरां को भूकंप याद आया. ऐसे ही थरथरा रही थी जमीन उस दिन भी. इतरां उसके कान में माही की चिट्ठियां सुना रही थी, 'माही मायके गयी है...खुश है वहां'. रूद्र ने कुछ कहा नहीं बस चुपचाप जूते उतारे और पेड़ पर चढ़ता गया. सबसे ऊपर की इतरां की पसंदीदा डाली पर पहुँच गया और इतरां को साथ में बिठा लिया. 'तुझे पता है तू यहाँ इस डाल पर क्यूँ बैठती है?'...नन्ही इतरां बस सर हिला कर इनकार कर पायी. 'ये पेड़ मैंने अपने बचपन में रोपा था. यहाँ पूरी पूरी गर्मियों रहता था...उन दिनों इसको आवारा होना कहते थे...मेरी इतरां...बंजारामिजाजी तुझे विरासत में मिली है...बंजारों से मिली है कभी?'. इतरां यहाँ बिसरा चचा से मिलने आई थी. उसे मालूम नहीं था कि ये कौन था, रूद्र. मगर उसे ऐसा लग रहा था कि उसके नन्हे से दिल में जो बहुत से लोग थे, माही, दादी सरकार, इन्दर, बड़ी चाची, चवन्नी...सबको जरा जरा बाहर करके रूद्र अपने लिए बहुत सी जगह घेरता जा रहा है. कि कहीं कोई चिट्ठियां हैं जो रूद्र ने अपनी भिंची मुट्ठियों में बंद कर रखी हैं.

इतरां को ये भी लगा कि उसकी आँखों में जरा जरा सुनहला मिल रहा है और वो गहरी काली से जरा जरा भूरी हुयी जा रही हैं. कि जैसे रूद्र को तितलियों की भाषा आती है और ये भी कि रूद्र के पास उसके उन सवालों के जवाब हैं जो वो किसी से पूछ नहीं पाती, कि जैसे बिसरा कौन है.

मगर इस लम्हे दूर सड़क से राजदूत आती दिख रही थी. इन्दर घर लौट रहा था. इतरां, जो रोज उसे देखते ही पेड़ से धम से कूद कर सड़क की ओर भागती थी आज जरा सा रूद्र के पास सरक आई. रूद्र ने उसकी मुट्ठी खोली और उसमें एक छोटी सी काले रंग की टिकिया रखी. 'इसे पानी में घोल कर सियाही बनती है. कल मैं तुझे कागज़ पर लिखना सिखाऊंगा. सुबह आ जायेगी न?'...इतरां ने पलकें टिमिक टिमिक झपका कर कहा, 'वादा'...और पेड़ से उतरी और राजदूत की दिशा में हल्के क़दमों उड़ चली जैसे जमीन भी उसकी है, आसमान भी और इस बार उसकी लिखी चिट्ठी लेकर चाँद तक चला जायेगा रूद्र. उसका रूद्र.
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पहली बार लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. देखें कब तक साथ रहती है मेरे. ये लंबी कहानी की तीसरी किस्त है. 
पहली दो यहाँ पर

5 comments:

  1. इतरां का इंतज़ार है :)

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  2. ऐसे लग रहा है की अमृता प्रीतम की कोई कहानी पढ़ रहे हा

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  3. Your writing is nice but I think something is missing like' halke halke kadmon se' instead of "halke kadmon".Something is missing...by the way there is some insight in your writing.

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  4. I used to study Mohan Rakesh literature.

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  5. Your writing is nice but I think something is missing like' halke halke kadmon se' instead of "halke kadmon".Something is missing...by the way there is some insight in your writing.

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