13 March, 2016

इतरां की माही. वो जीती जागती औरत थी या कंठ से फूटता लोकगीत? |God is a postman| (2)

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माही नहीं रही. मगर सिर्फ अपने बदन में. उसकी रूह पिंजरे से आजाद होकर यूं बिखरी कि इत्र हो गयी. पूरा गाँव माही से सिंचता. सारी औरतें. फसलें. त्यौहार. और जिंदगी भी. माही होती इतरां में...बसती जाती...किस्सा दर किस्सा दर किस्सा.

गाँव भर की स्त्रियाँ माही को याद कर कर के आँसू आँसू बहातीं लेकिन इतरां को देखते ही आँसुओं का स्वाद बदल जाता. उसे गोद में उठाते ही माही खोयी हुयी नदी बन जाती सरस्वती. इतरां को मालूम भी नहीं था कि हर बार अपने स्पर्श में गाँव की हर स्त्री एक किस्सा रख जाती थी उसके ह्रदय में. वो किस्सा जो वो सिर्फ माही को सुना सकती थीं. माही उस पूरे गाँव में इकलौती थी जो बचपन में बिछड़े प्रेमी का किस्सा सुन कर किसी को ये नहीं कहती कि भूल जा....इसी में तेरे घर का भला है. माही कहती थी 'जी ले, यही एक जिंदगी मिली है सोनी...देख ले उसे जी भर के...अगली बार होली पर आएगा मेरे घर तो मैं तेरे हाथ उसके लिए पुए भिजवा दूँगी. जरा सा इश्क़ कर ले. कुछ गलत सही नहीं होता इस दुनिया में'. माही उस पूरे गाँव के लिए डाकिये का भूरा झोला थी...डाकघर के आगे लगा लाल डिब्बा थी. जो सारा प्रेम औरतों ने जाने किस किस के हिस्से कर रखा था, जो मन्नतें अपनी साड़ी की कोर में बाँध रखी थीं, सब माही के नाम होता गया. माही के पहले किसी ने जाना नहीं था कि औरतें प्रेम से भरी होती हैं. उन्हें कोई मिलता नहीं जिसके नाम ये सारा प्रेम लिख सकें. किस्से में अपरिभाषित बहुत कुछ होता जिसके लिये माही अपने शब्द गढ़ती. दुनिया उसे अवैध करार देती लेकिन अवैध प्रेम दुखता भले था, मरता नहीं. खेत में फसल के साथ बहुत सी खरपतवार भी उग जाती थी. समय समय पर किसान ये खर-पतवार उखाड़ते रहते थे कि फसल अच्छी हो. मगर कभी कभी होता था कि पीछे की बाड़ी में औरत अपने हिस्से के पौधे लगा लेती. नीम्बू. गुड़हल. गेंदा. गुलदाउदी. मिर्ची. औरत के हिस्से की जमीन में हर किस्म के पौधे को उगने की इजाजत थी. कभी कभी उन पौधों पर जहरीले जंगली फूल भी आ जाया करते थे. उन दिनों माही अपने डॉक्टर पति से बात कर लिया करती थी. उसकी दुनिया के कौन से नियम थे कोई नहीं जानता मगर माही अगर एक बार कुछ माँग ले तो इश्वर की भी क्या ही मजाल कि मना कर दे. माही का मन बहती नदी सा साफ़ रहता था. नदियाँ हमेशा पाप पुण्य से परे रही हैं. उन्होंने सदियों सदियों स्त्रियों के प्रेम को पनाह दी है.

स्त्री के प्रेम में असीम धैर्य होता है. उसके होने में होती हैं कितनी चिट्ठियां. लोकगीत यूं ही नहीं फूटते कंठ से. तुलसीचौरा में खिलते हर नन्हे फूल को स्त्री के प्रेम का पता होता है. अभिशप्त तुलसी हमेशा पूजाघर से निर्वासित रहती लेकिन बिना तुलसी दल के कृष्ण की पूजा भी अधूरी रहती. माही को कहने वाली सारी बातें इतरां को तबसे सुनाई जाती थीं कि जब इतरां को शब्दों का अर्थ मालूम भी नहीं था. उसके इर्द गिर्द माही नहीं होते हुए भी हर सिम्त थी. इतरां छः महीने की ही हुयी थी. वसंत पंचमी का दिन था. आँगन में बच्चे खेल रहे थे. बच्चों ने बोलना सीखा तो खाना मांगने और दूध के लिए मचलना शुरू किया. त्यौहार का दिन था तो घर में खीर बनी थी. दादी उसे जरा जरा पीढ़े पर बिठा कर कौर कौर खिला रही थी. इतरां ने कटोरी को देखा...आसमान में चमकते चाँद को देखा और सीधे आसमान की ओर ऊँगली उठा कर कहा, 'माही'. बड़ी सरकार के अन्दर चांदनी की नदी में ऐसा उफान आया कि इकबारगी लगा कि उनकी सांसें अटक जायेगीं और वो डूब जाएँगी. मगर फिर अपनी माही का चाँद सा चेहरा याद आया और उसी दिन बड़ी सरकार सिर्फ इतरां की बन गयीं. भूल गयी कि इतरां की माँ थी, माही...उनके जिगर का टुकड़ा माही...रेगिस्तान की प्यास बुझा कर मीठी हँसी की पौध लगाने वाली खिलखिल नदी थी उनकी माही...माही का सारा प्यार और याद दिल में यूं भुला दिया कि जैसे खोयी हुयी नदी...सरस्वती...मगर बड़ी सरकार भूल गयीं कि सरस्वती सिर्फ एक खोयी हुयी नदी नहीं विद्या और संगीत की देवी भी हैं. उनके ह्रदय से लुप्त होती माही अपनी इतरां की रूह में बहने लगी. बड़ी सरकार ने चांदी का भरा हुआ खीर का कटोरा उठाया और हँस कर कहानी सुनाने लगी, 'मेरी लाड़ो इतरां...ये देखो...एक कटोरी चन्दा है मेरे पास...चाँद के टुकड़े टुकड़े खिला रही तुझे...देखो तो...कितना मीठा है न चाँद?'. इतरां हंसती रहती तो उसकी किलकारी में गाँव भर के कुओं में मीठा पानी आता.

माही अदृश्य हो कर इतरां में बहती थी. कितने किस्से होंगे कि माही को सुनाने थे इतरां को. माही की सारी बातें इतरां की धमनियों में दौड़ती थीं. कभी कभी इतरां अपनी एकदम सफ़ेद कलाई के पास दादी की ऊँगली रखती और कहती कि दादी सरकार, देखो न माँ की चिट्ठी यहाँ अटकने लगी है. फिर वो खोल खोल कर अपनी माँ की चिट्ठियां सुनाती. जन्नत में उसकी माँ कितनी खुश थी. माँ के रहने के लिए वहाँ बहुत बड़ा मकान था. मकान की दीवारों पर ग़ालिब और मीर के शेर लिखे हुए थे. कायदे से बड़ी सरकार को और बाकी लोगों को भी उसी समय टोकना चाहिए था कि बच्ची को जन्नत की सारी चीज़ें गलत पता चल रही हैं. उसकी माँ स्वर्ग गयी है. वहाँ पर रामायण की चौपाई भले खुदी होगी लेकिन ग़ालिब और मीर के शेर तो हरगिज़ नहीं होंगे. मगर वो इतने ऐतबार के साथ कलाई पर अपनी दादी की ऊँगली रख कर चिट्ठी पढ़ती कि उसकी भोली दादी का दिल नहीं होता कि सच बोल कर बच्ची का दिल तोड़ दे. यूँ भी स्वर्ग देखा ही किसने है. हो सकता है इतरां सच ही कहती हो. जो मान लो ग़ालिब और मीर वहीं रहते ही होंगे तो क्या फर्क पड़ जाएगा.

बड़ी सरकार की बहनें कभी कभार परब त्यौहार पर आतीं तो उनको समझातीं. 'बिसरा की माय, इतरां को बाद में बहुत दिक्कत होगी. ये जो तुम रामायण की चौपाइयों के बीच बीच में ग़ज़ल गुनगुनाने लगती हो उसी का असर है. कहीं देखा है कि इतनी छोटी बच्ची ग़ालिब और मीर का नाम भी ले. इस कलमुये रेडियो को बाहर कर. ये मर्दों के चोंचले मर्दों को ही शोभा देते हैं' बड़ी सरकार हल्के हल्के हँसतीं, जब से माही अचानक चली गयी थी उन्हें किसी 'बाद' पर कोई यकीन नहीं होता. इतरां उन दिनों सोचती कि ये बिसरा कौन है जिसके नाम पर सब दादी सरकार को बुलाती हैं. मगर घर में कोई भी बिसरा के बारे में बात नहीं करता. इतरां को पहली बार वहीं से बिसरने का अर्थ मालूम चला था. बिसारना यानी भूल जाना. मगर इतरां तो कुछ भी नहीं भूली थी कभी. उसे अभी भी अपनी माँ की गहरी गुलाबी साड़ी याद थी. जो सारे गीत वो गुनगुनाती थी वो भी. हाँ एक गंध हुआ करती थी माँ के आसपास. वो गंध उसे कहीं भी नहीं मिलती. परी माँ से खुशबू आती थी लेकिन पूजाघर जैसी. अलग अलग मौसमों में अलग अलग. कभी कनेल, कभी गुलाब और कभी कभी कमल की भी. अक्सर हरसिंगार लेकिन कभी भी माही जैसी खुशबू नहीं. नन्ही इतरां सोचती कि वो अपने माँ की खुशबू खोजने चाँद पर जायेगी. उसे यकीन था कि उसकी माही चाँद है. 

किस्सों के अलावा इतरां का दिल कहीं लगता था तो वो था गज़लों में, अपने नाम की कहानी वो दादी सरकार से कितनी बार सुन चुकी थी. यही कहानी इतरां जब गाँव के बाकी बच्चों को सुनाती तो उसमें कई और किरदार जुड़ते चले जाते. इतरां का घर उन दिनों ब्रिन्दावन में होता और जगजीत को ग़ज़ल गाने के लिए कान्हा ने बुलाया होता था. आखिर में कान्हा की बांसुरी और जगजीत की गायकी की जुगलबंदी हुयी और मृदंग की थाप से आवाज़ आ रही होती...इतरां...
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पहली बार लंबी कहानी लिख रही हूँ. इक किरदार है इतरां. जरा से शहर हैं उसके इर्द गिर्द और मुहब्बत वाले किरदार कुछ. देखें कब तक साथ रहती है मेरे. ये लंबी कहानी की दूसरी किस्त है. 

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