12 March, 2015

उसके घर का नाम था 'अलविदा'


इक खोया हुआ देश है जिसके सारे बाशिंदे शरणार्थी हो गए हैं. कहीं कोई टेंट नहीं है कि लोगों को जरा भी ठहराव का अंदाज़ हो. मैदान में दूर दूर तक कतार लगी है. सब लोग बिखरे हुए पड़े हैं. जैसे अचानक से गिर पड़ी हो कोई सलीके से बनायी गयी लाइब्रेरी और सारी किताबें बेतरतीब हो जाएँ. 

अचानक से उग आये इस देश में कुछ भी अपनी जगह पर नहीं है. स्कूल की जगह हथियार बनाने की फैक्ट्री, बेकरी की जगह ईंटों की भट्ठी और बंदरगाह की जगह ज्वालामुखी उगे हुए हैं. इसी जगह वे अपना जरा सा आसमान तलाशने चले आये थे. उन्हें क्या पता वहां आसमान की जगह एक खारे पानी का झरना था. वे घंटों भीगे हुए इन्द्रधनुष का कोना तलाशते रहते कि जिसे थाम कर वे इस देश से बाहर निकल सकें. 

उन्हें कोई तलाशता नहीं था. वहां कोई लिस्ट नहीं थी कि जिसमें गुमशुदा लोगों की रिपोर्ट दर्ज हो. भीगे हुए उन्हें सर्दी लगनी चाहिए थी मगर उन्होंने देखा एक दूसरे की आँखों में और हँस पड़े. जहाँ बुखार होना था वहां इश्क होने लगा. वे नमकीन झरने में भीगते हुए छुप्पम छुपायी खेलने लगे. लड़के ने सूरज का टॉर्च बनाया और गहरे गोता मार गया...जब उसकी सांस ख़त्म हुयी तो लड़की की आँखें चाँद जैसी चमक रही थी. 

उनके बीच बस खारे पानी का झरना था. धीरे धीरे वे दोनों गोता मारने लगे. आजकल वे महीनों गुम हो जाते. उस नए देश में फरवरी के दी छोटे होते होते एक दिन गायब हो गए. अब वहां ग्यारह महीने का साल होने लगा. अब लड़की परेशान थी कि उसे अब इन्द्रधनुष ही नहीं फरवरी की भी तलाश करनी थी. उसे गुम होती चीज़ों से डर लगता था. वो लड़के को लगाती थी भींच कर गले...उसे लगता था लड़का गुम हो जाएगा. वो खारे पानी से लिखती थी इबारतें. अब लड़की उसे अपने दुपट्टे की छोर में बाँध कर रख लेना चाहती थी. ऐसे ही किसी रोज़ उसने दुपट्टे की छोर में एक चाभी बाँध ली. उस दिन से वो एक घर की तलाश भी करने लगी. बराई सी घूमती थी और खाली जमीन के प्लाट पर टिक लगाती फिरती थी. घर की तलाश में वो दोतरफा बंट जाती और टूटने लगती. एक मन लड़के के साथ आसमान के खारे, उथले झरने में भीगता हुआ इन्द्रधनुष तलाशता तो एक मन बार बार दुपट्टे में बंधी चाभी पर खुरच कर घर का नाम लिखना चाहता 'अलविदा'.

लड़का उससे झगड़ता. कौन रखता है घर का नाम अलविदा. तुम कुछ स्वतं जैसा लिखो वरना इस घर आने को किसका दिल चाहेगा. लड़की मगर उलटबांसी चलती थी. उसने अलविदा कह कर लोगों को दिल में और गहरे बस जाते देखा था. यह नया बना देश था...यहाँ कुछ भी अपनी जगह पर नहीं था. लोग लड़की के घर को सराय की तरह इस्तेमाल करने लगे. वहां दस दिशाओं से आती थी...हवा...मुहब्बत...और कहानियां भी. 

इक रोज़ लड़की के दुपट्टे से चाभी गुम हो गयी. वो अपने घर के बाहर खड़ी टुकुर टुकुर ताकती. सोचती अपने घर में मुसाफिर की तरह जाना कैसा होगा. और क्या घर उसे पहचानेगा भी? घर की दीवारें मगर इश्क की बनीं थीं, वे लड़की की उँगलियों की खुशबू पहचानती थीं. लड़की ने कितनी बार बनायी थी अप्लाना और चौखट पर लिखा था स्वागतम. फिर उसने फेंके सारे गैरजरूरी लोग बाहर. वो घर के बाहर आई तो उसने देखा कि इन्द्रधनुष दहलीज़ पर टिका था, शरारत से झांकता हुआ. 


अब बस लड़के का इंतज़ार था. उसकी बाँहों में भी एक घर था. घर जो हमेशा से होता है. लड़की इस घर की चाह में मिट रही थी. लड़का राह भूल गया था. लड़की अलविदा में ठहरी थी. 

3 comments:

  1. बेहतरीन पूजा ..
    हमेशा की तरह उम्दा ।
    नई किताब के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं ।
    दुआ है सबके सर चढ़कर बोले तीन रोज इश्क़...

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. सोचती अपने घर में मुसाफिर की तरह जाना कैसा होगा.

    ...जाने कैसा तो होता है... पिछले साल १६ जनवरी को घर गए थे और एक फरवरी को वापस यहाँ लौट आये थे... इतना कम समय था कि यह मुसाफ़िर अपने घर मुसाफ़िर की तरह जाने के दुःख से अब तक नहीं उबर पाया है... जाने फिर कब जाना हो...!

    बेहद सुन्दर पोस्ट है... हमेशा की तरह...
    बहुत देर से तुम्हारे शब्दों के ही साथ हैं... बहुत दिनों बाद अच्छा लग रहा है...!
    ढेर सारा प्यार तुम्हें!

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