27 April, 2013

न लिखना, न पढ़ना, न फिल्में देखना

लिखना या तो मुश्किल होता है या तो एकदम आसान. मुझे मुश्किल से लिखना नहीं आता. कितनी बार होता है कि अन्दर बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा है पर शब्दों का आकार नहीं लेता...तब एक चुभन सी होती रहती है. जैसे कोई कील चुभी हो पाँव में...सिर्फ चलते वक़्त टीसती है. 

किसी को पढ़ना उसकी आत्मा से बात करने जैसा है. लेखक जितनी ही बड़ी कल्पना की दुनिया रचता है, उतनी ही सच्चाई से अपने आप को उसमें लिखते जाता है. मुझे कम लोगों का लिखना पसंद आता है. जाने क्यूँ कि किसी का लिखा छू नहीं पाता है दिल को. कुछ मिसिंग सा लगता है, जैसे उसने कुछ लिखना चाहा है जिसमें मैं डूबना चाहती हूँ पर पानी इतना उथला है कि चाह कर भी खुद को पूरा खोना नहीं हो पाया. मुझे फंतासी अच्छी लगती है. किसी ऐसी दुनिया में खो जाना जहाँ कुछ भी सच्चा न हो आसान होता है. किसी को पढ़ना कहीं भाग जाने का रास्ता खोलता है, ये लिखते हुए ऐलिस इन वंडरलैंड याद आती है. 

इधर काफी दिनों से कुछ अच्छा नहीं पढ़ा...कुछ भी अच्छा नहीं. मुराकामी की नार्वेजियन वुड रखी हुयी है, एक पन्ना भी पढ़ने का मन नहीं किया है. अकिरा कुरासावा की जीवनी जो कि बड़े शौक़ से खरीदी थी, जब कि उतने ही पैसे थे जेब में. कर्ट कोबेन के जर्नल्स पढ़ती हूँ कभी कभार. हैरी पोटर नहीं पढ़ा बहुत साल से शायद. दुष्यंत कुमार...अब अच्छे नहीं लगते. अज्ञेय...कभी कभी थोड़ा सा पढ़ती हूँ. और कोई नाम याद नहीं आ रहा. फिलहाल कोई पूछे कि तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है तो तुम्हारे पसंदीदा लेखक कौन हैं तो मेरे पास कोई नाम नहीं होगा. मैंने आखिरी कोई किताब कब पढ़ी थी...1Q84, शायद साल होने को आया. मैं टुकड़े में पढ़ नहीं सकती और एक पूरा समय मेरे पास है नहीं. 

कभी कभी सोचती हूँ कि आज के दस साल बाद शायद इस ऑफिस में बिताये लगभग एक साल के समय को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगी. इस दौरान कितना कुछ खो गया मुझसे. मैंने लिखना बहुत कम कर दिया...मुझे सोचने का वक़्त ही नहीं मिलता. घर और ऑफिस के बीच भागती हुयी फुर्सत के लम्हों को ढूंढती रहती हूँ जब मैं कुछ सोच सकूं. इधर काम का प्रेशर भी इतना है कि अपने लिए वक़्त ही नहीं मिलता. इस पूरे हफ्ते मेरे पास कोई मेजर प्रोजेक्ट नहीं था. मेरे पास बहुत वक़्त था कुछ पढ़ने के लिए...कुछ लिखने के लिए मगर मैंने कुछ नहीं किया. लिखना भी एक आदत होती है जब आप चीज़ों को देखते हो और कुछ शब्दों में वे खुद ढलते चलते जाते हैं, लिखना हमेशा एफर्टलेस होता है, कोशिश करके लिखा नहीं जा सकता. 

कुछ फिल्में देखने की कोशिश की. कल दो फिल्में देखीं. इटरनल सनशाइन ऑफ़ दा स्पॉटलेस माइंड और आयरन मैं ३. दोनों फिल्मों ने मुझे निराश किया. आयरन मैन से तो मुझे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी मगर इटरनल सनशाइन मैंने बहुत दिनों से टाल रखी थी...फुर्सत में देखने के लिए. उसका कांसेप्ट कितना अच्छा था...कहानी के साथ कितना कुछ अच्छा किया जा सकता था. फिल्म हड़बड़ी में बनायी गयी लगती है जैसे कोई डेडलाइन छूट रही हो. कांसेप्ट के साथ जो रोमांस शुरू होता है, जब धीमी आंच पर पकता है...बहुत वक़्त लगता है तब जा कर एसेंस कैप्चर हो पाता है. आजकल मुझे कहानियां भी उतना नहीं बांधतीं जितना कांसेप्ट बांधता है. शायद वोंग कार वाई की ज्यादा फिल्में देखने का असर है. इधर हाल में सोर्स कोड देखी थी...अच्छी लगी थी. 

कुछ पसंद करना मुश्किल क्यूँ होता जा रहा है. मैं क्या ओवेर्टली क्रिटिकल हो गयी हूँ चीज़ों के प्रति? नार्मल तरह से सोचूं तो मुझे आजकल कुछ अच्छा नहीं लगता, किसी चीज़ पर खुश नहीं होती. पहले चीज़ें अनकोम्प्लिकेटेड हुआ करती थीं. बारिशों में खुश, बहार में खुश, पतझड़ में खुश और जाड़ों में तो ख़ुशी से पागल. छोटी छोटी चीज़ों में खुश हो जाने वाली वो लड़की जाने कहाँ छुप गयी है. जिंदगी में एक लिखने के अलावा न कभी कुछ समझ में आया न कभी कुछ करने की कोशिश की. हर कुछ दिन में लेकिन जब ऐसा फेज आता है तो कुछ खुराफात मचती है. जैसे घर पेंट करने का मन करता है. खुद से ड्रिल करके घर में कुछ तसवीरें टांगने का मन करता है. बेसिकली कुछ ऐसा करने का मन जिसमें हाथ व्यस्त रहे...कलम से कुछ न लिखूं तो कुछ तो करूँ. इन फैक्ट खाना बनाना भी अच्छा लगता है. पर मम्मी वाला हाल है, नार्मल दाल चावल बनाने में अच्छा नहीं लगता. पास्ता, थाई ग्रीन करी, चाऊमिन जैसा कुछ बनाने का मन करता है. 

ये खुद को समझना कितना मुश्किल होता है. कोई किताब नहीं आती अपने ऊपर. क्या क्या करने का मन करता है...फिर से कहीं भाग जाने का मन करता है. समंदर किनारे खूब सारी रेत हो...लहरों पर रेस लगाऊं, साइकिल चलाऊं...कुछ करूँ...कुछ ऐसा जो करके सुकून मिले. बेसिकली खुद के होने को हमेशा वैलिडेट करने की जरूरत होती है. आखिर हम कर क्या रहे हैं...जिस दिन इसका जवाब नहीं मिलता जवाब ढूँढने की कवायद शुरू हो जाती है. 

कहानियों के किरदार कहीं चले गए हैं. कविताओं का राग भी. बस कुछ इने गिने शब्द हैं, इनका कोलाज है. मुझे एक लम्बी छुट्टी चाहिए. समंदर किनारे. तुम्हारे ही साथ कि अब तुम साथ नहीं होते तो सब अधूरा लगता है. भले ही तुम दूसरे वाले झूले पर अपने पसंद की किताब पढ़ते रहो और मैं अपनी. मगर एक लम्बी छुट्टी, सबसे दूर...फार फ्रॉम दा मैडिंग क्राउड. जिंदगी इतनी छोटी है वाकई कि मुझे लगती है!




How happy is the blameless vestal's lot!
The world forgetting, by the world forgot.
Eternal sunshine of the spotless mind!
Each pray'r accepted, and each wish resign'd.

20 April, 2013

जिला मासूमगंज, थाना मिसरपुर, गाँव पुरैनी

'सुनो, मेरे नाम जो ख़त लिखे थे, वो किसी लाल डब्बे में गिरा दो'
'क्यूँ?'
'ख़त लिख के नहीं गिराने से विद्या चली जाती है'
'कौन सी विद्या'
'चिट्ठी लिखने की'
'मुझे कौन सी चिट्ठी लिखनी आती है'
'वो मैं नहीं जानती, बस मेरे नाम की सारी चिट्ठियां किसी और को भेज दो'
'किसे भेज दूं?'
'किसी को भी भेज दो'
'और जो तुम्हारा नाम लिखा है, सब चिट्ठी के ऊपर सो? पीटेगी न कोई भी लड़की'
'मेरे नाम की एक ही लड़की को थोड़े जानते हो तुम'
'इतना प्यार मुहब्बत से लिखा हुआ चिट्ठी है, ऐरी गैरी किसी को भी कैसे भेज दें, उसको समझ में भी आएगा कुच्छो?'
'ऐसा कौन अजनास बात लिख दिए हो जो किसी को समझ नहीं आएगा, खुल्ला चिट्ठी है, और जो नहीं समझ में आये तो बैठ के समझा देना'
'इतना मेहनत जो करेंगे तो हमको क्या मिलेगा?'
'क्या चाहिए तुमको?'
'तुम'
'मेरा क्या करोगे?'
'बोतल वाला चिट्ठी में बंद करके समंदर में डाल देंगे'
'और जो हम किसी और को मिल गए तो?'
'जिसका किस्मत फूटा है उसको मिलेगा...हम पूरी दुनिया का ठेका लिए हैं'
'इतना है तो हमको इतना चिट्ठी काहे लिखे हो, और कोई काम नहीं था तुमको दुनिया में करने के लिए. इतना में कुछ लिख पढ़ जाते तो आज चार पैसा कमा लेने लायक हो जाते'
'चार पैसा कमाने लायक हो जायेंगे तो हमसे बियाह कर लोगी?'
'नहीं'
'काहे?'
'तुम खाली बोलते हो, तुमको कौनो काम धंधा में मन नहीं लगता है,  टिकुली के मामाजी अपना दूकान पर जो तुमको रखवाए थे, सो काहे भाग आये वहां से?'
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लड़के की आँखों के सामने वो भयानक दिन कौंध जाते हैं. एक बार खाना मिलता था, वो भी आधा पेट...उसपर धौंस और अहसान अलग से. चिलचिलाती लू में दिन भर बोरी उठा उठा कर गोदाम में रखना होता था. सेठ के पास कितना अनाज था, जौ, चना, मक्का, धान, गेहूं...रोज कमसे कम बीस बोरे वो अकेला गिन के उतारता था  लेकिन देने को जी जरा भी नहीं. खाने में एक मुट्ठी ज्यादा चावल मांग लो तो सेठानी का कलेजा फट जाता था. रात को मारे भूख के नींद नहीं आती थी...माँ की याद आती थी, गाँव की याद आती थी. स्कूल ड्रेस में तैयार हुयी तितली भी तो याद आती थी उसे. काजल लगी काली काली आँखें, कित्ती तो सुन्दर लगती थी. वहां दूर अबोहर में एक पल फुर्सत नहीं मिलता था. कभी कभार जो ट्रक आने में देर हो जाती थी तो भाग कर लंगर चला जाता था. वहां सफ़ेद चोगे में जो बाबाजी दिखते थे उनसे उसे अक्सर गाँव के मुखिया की याद आती थी. मुखिया की बेटी तितली. स्कूल में उसके साथ पढ़ती. उसके लिए टिफिन में आम की फांक वाला अचार रखती. उसकी उँगलियों से कैसी शुद्ध घी की खुशबू आती थी, तितली की माँ टिफिन में पराठे देती थी अक्सर. वो कभी कभी उसकी चोटी छू कर देखता था...उसके बाल कितने चिकने थे. स्कूल में सीडीपीओ वाली मैडम आयीं थीं...उनकी साड़ी कैसे फिसलती थी. सब बच्चों के कहा कि रेशम की साड़ी है. उसे रेशम नहीं मालूम था मगर तितली के बाल बहुत मुलायम लगते थे. तितली की माँ उसके बालों में हर रोज़ खूब सारा तेल चुपड़ कर भेजती थी. गुरुवार को जब तितली बाल धोती थी तो कैसे फर फर उड़ते थे उसके बाल. सबकी माँ कहती थी गुरुवार को बाल धोने से अच्छा पति मिलता है.

सेठ के यहाँ ऐसी नौबत आ गयी कि कुछ दिन और रुकता तो जान चली जाती...एक दिन हिम्मत करके वो वहां से भाग गया. एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन होते हुए वो कितनी तो जगहें हो आया. देश के नक़्शे में देखते थे तो कहाँ समझ आता था कि देश कितना बड़ा है. पढ़ाई बचपन में छूट गयी थी. घर का खर्चा खाली बाबूजी के रिक्सा चलाने से पूरा नहीं पड़ता. उसे बहुत सारा काम आता था  और हाथ में बड़ी सफाई थी. जब उसे मालूम भी नहीं था कि देश कितना बड़ा है वो अनगिनत पैसेंजर गाड़ियों पर बैठ कर एक छोर तक पहुँच गया था. वहां उसने नारियल के रेशे से रस्सी बटाई करनी सीखी. वो नाव भी बहुत अच्छे से खे लेता था और अक्सर गाँव के छोटे मोटे काम कर देता था. कभी कोई खाना दे देता, कभी कोई छाछ पिला जाता. बहुत दिनों तक उसे यहाँ का खाना पचता नहीं था. बेहद खट्टा और अजीब. रोटी खाए बहुत दिन हो जाते. याद में रोटी पकने की गंध उठती और वो घर की याद में छटपटा जाता.

उसे कहाँ मालूम था कि देश कितना बड़ा है. उसे बस गाँव का नाम मालूम था. भटकते आया था तो वापसी का रास्ता मालूम भी नहीं था. देश का मानचित्र देख कर सोचता कि कहाँ गाँव होगा. गाँव की  याद में तितली की आँखें चमकती...उसका लाल रिबन, माथे पर छोटी सी बिंदी. वो सोचता कि इतने सालों में तितली जरूर कलक्टर बन गयी होगी. उसकी लाल बत्ती वाली गाड़ी घर के आगे आती होगी तो पूरा गाँव जुट जाता होगा. दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करता, पैसे जोड़ता कि तितली के लिए एक रेशम की साड़ी खरीद सके. सोचता कि उसके बच्चों के लिए कुछ खरीद लेना चाहिए. इतने सालों में तो तीन बच्चे तो हो ही गए होंगे. तितली के जैसे ही होंगे, सांवले, तीखे नाक नक्श वाले. तितली की बेटी होगी तो कैसी होगी...इतने सारे सवाल वो चिट्ठियों में लिखता जाता. दिन भर के बाद उसे जो वक़्त मिलता उसमे सिर्फ तितली को ख़त लिखता. उसे ख़त लिखने से उम्मीद बंधती थी कि एक दिन घर लौट के जाना होगा.

एक दिन एक स्कूल में उसे वही सीडीपीओ वाली मैडम दिख गयीं...वो स्कूल के बच्चों का खाना बना रहा था कि बचपन का सारा मंज़र आँख के सामने घूम गया. मैडम से उसे अपने घर का पूरा पता मिला. कभी कभी अजनबियों के ऊपर दूसरे जनम के अहसान होते हैं. मैडम पूरे देश का मुआयना करने निकली थीं. अगले दिन वापस जा रहीं थीं. उसी गाड़ी में उसे भी जगह मिल गयी. उसके हाथ के खाने की धूम मच गयी थी.

गाँव लौटते हुए महीना लग गया. मैडम जी ने उसे गाँव के स्कूल में ड्राइवर की नौकरी दिलाने की बात कर ली थी. स्कूल अब काफी बड़ा हो गया था और दूर दूर के बच्चे वहां पढ़ने आते थे. घर पहुंचा तो माँ उसे देख कर लगभग बेहोश हो गयी . इतने बरसों में सब उसे मरा हुआ ही मान चुके थे. दिन भर लोगों का तांता लगा रहा. रात को बात करते हुए माँ पूरी गाँव की खबर सुना रही थी. मुखिया जी का रांची में इलाज चल रहा था. तितली शादी के दो साल बाद विधवा हो गयी थी. सास ने मनहूस बोल कर उसे घर से बाहर कर दिया था. दो साल में एक भी बाल बच्चा नहीं था. कितने धूम धाम से मुखिया जी ने शादी की थी उसकी...पूरे सात कोस के गाँव तक को न्योता दिया था. जाने किसकी बुरी नज़र लग गयी बच्ची को.

तितली को देखा तो मन में ऐसी हूक उठी जैसे खुद के जिस्म का एक हिस्सा मर गया हो. चेहरे पर उजाड़ उदासी. तितली इतनी बेरहम भी हो सकती थी. छोटी छोटी चीज़ों के लिए बच्चों की खाल उधेड़ दिया करती. छड़ी बरसाना शुरू करती तो रूकती ही नहीं. बच्चे उससे सहमे सहमे रहते. आवाज़ ऐसी तीखी कि जैसे छाले पड़े हों. वो तितली को जानता था. ये उसका तरीका था अपने भीतर के दर्द को रोके रखने का...तितली को चोट लगती थी तो बाकी लड़कियों की तरह रोती नहीं थी...गुस्से में लाल हो जाती थी. उस बचपन में उसका गुस्सा ऐसा होता था कि जैसे तालाब सुखा डालेगी. अब मगर उदासी के साथ गुस्सा मिलता तो विद्रूप होता जाता. लड़का सोचता कि पहले वाली तितली कहाँ खो गयी...कहीं से चाबी मिले तो वो वापस से उसे ले कर आये.

वो रोज तितली से बात करता. शुरुआत के कुछ दिन तो बस ऐसे ही दिन भर के इधर उधर के किस्से, तितली भी बस बच्चों की कामचोरी की बात करती. उनके पढ़ने को लेकर चिंतित रहती. धीरे धीरे वे सांझतारे की बातें करने लगे. उम्र के इस पड़ाव पर क्या चाहिए होता है...लड़का अपने कच्चे घर में सुखी था. ड्राईवर की नौकरी से इतने पैसे हो जाते थे कि बरसात में छापर टाप सके. माँ की दवाइयां और एक वक़्त के लिए दूध खरीद सके. तितली मगर दुःख का अबडब करता कुआँ थी...जिंदगी को लेकर कोई बहुत बड़े सपने उसने भी नहीं देखे थे. कलक्टर बनने का सपना तो उसके बाबूजी का था...मगर जब उनके बचपन के दोस्त के तितली का हाथ अपने बेटे के लिए माँगा तो बाबूजी उसकी लाल चूनर में बस 'दूधो नहाओ पूतो फलो' का आशीर्वाद रख सके.

लड़का कभी कभी फुर्सत में होता तो तितली को अपनी पुरानी चिट्ठियां सुनाता. तितली ने इतना नेह देखा नहीं था. उसकी दुनिया में जताने वाले लोग नहीं थे. किसी को बिना मांगे इतना गहरा मन में बसा लेना कैसा तो होता होगा. बाबूजी ने अपने ख्वाब जैसे लड़के की आँखों में रोप दिए थे, वो हर रोज़ तितली को लाल बत्ती वाली गाड़ी का वास्ता देता...पढ़ने के लिए अख़बार ला देता. देश दुनिया की कहानियां सुनाता. तितली को उसकी आदत लगती जा रही थी. उसे अब कभी कभी पहले की तरह दो चोटियाँ गूंथ कर उनमें लाल रिबन लगाने का मन करता. साड़ी में गोटा लगाने का मन करता.
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ऐसे ही किसी दिन लड़के ने पूछ दिया था
'चार पैसा कमाने लायक हो जायेंगे तो हमसे बियाह कर लोगी?'

कोरी आँखों में सपने बहुत बड़े थे. टिकुली का कहना था दोनों मिल कर कलक्टरी की तैयारी करें. साथ पढ़ने से तैय्यारी अच्छी होती है. लड़के को बिलकुल भी यकीन नहीं था कि वो एक्जाम पास कर सकता है, किताबें देखे उसे बहुत साल हो गए थे. तितली जिद्दी थी लेकिन. रोज स्कूल ख़त्म होने के बाद दोनों साथ बैठ कर किसी भी क्लासरूम में पढ़ते रहते. उनके पढ़ने की खबर कुछ दूर गाँवों तक पहुंची और उनके जानने के पहले उनके साथ चार लोग और भी पढ़ने लगे थे. साल बीतते कुल जमा पच्चीस लड़के और लड़कियों उनके गाँव आ कर साथ में पढने लगे. कोई कोस्चन का जुगाड़ कर देता तो फिर देर रात सब उसका हल निकलने में लग जाते. कई बार तो भोर हो जाती. पूरा गाँव आस लगाए इन पच्चीस नौजवानों को देख रहा था कि गाँव का नाम पहले कौन रोशन करेगा.

उन्हें किसी चीज़ की हड़बड़ी नहीं थी...दो साल बीतते सबको यकीन था कि तैयारी अच्छे से हो गयी है. एक्जाम देने सब स्कूल की गाड़ी में बैठ कर गए. अकेला सपना अब साझा हो गया था. उनके पास हारने को कुछ था भी नहीं. रिजल्ट अख़बार छापाखाने से आउट हो गया...एरिया का रिपोर्टर रात के साढ़े बारह बजे तितली के घर का दरवाजा पीट रहा था. तितली एक्जाम टॉपर थी. साथ के सात लोगों का बेहद अच्छा रिजल्ट आया था. डिस्ट्रिक्ट में धूम मच गयी थी.

लड़का मंदिर में लड्डू चढ़ाने गया तो तितली भी साथ थी...अब तितली के हिसाब से चार पैसे कमाने लायक हो गया था वो. पंडित जी ने वसंत पंचमी का मुहूर्त निकाला था. पूरा गाँव उनके नाम से रोशन हो रहा था. तितली आखिरी चिट्ठी पढ़ रही थी 'प्यार को हम अक्सर कितना छोटा कर देते हैं...सिर्फ अपना दर्द देखते हैं...प्यार तो बहुत बड़ा होता है...आसमान से ऊंचा...समंदर से विशाल...प्यार तो जोड़ता है...प्रेरणा देता है...रास्ता दिखलाता है...जब हम किसी से प्यार करते हैं तो पूरी दुनिया इसकी परिधि में आ जाती है और हम कुछ अच्छा करना चाहते हैं, कुछ नया बनना चाहते हैं.'
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अनगिन रंग रुलाता, कितने बसंत खिलता, सावन पूर्णिमा को रक्षा का वचन निभाता...कैसा तो होता है प्यार...मुस्कुराता...फागुन में बौराता...समझाता...और अगर सच्चा हो...मन से कोरा तो प्यार समंदर की तरह विशाल होता है...उसमें से कभी कुछ घट नहीं सकता...लहरों के पास अनगिन सीपियाँ हैं...मोती हैं...कौड़ियाँ हैं...मर्जी कि इस किनारे से हम क्या वापस ले कर आते हैं.
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लड़के ने फिर सारी चिट्ठियां उस पते पर भेज दीं...मेरा गाँव भी पास ही है...सोच रही हूँ कब चली जाऊं डाकखाने.  कि उन चिट्ठियों का जवाब लिखने का दिल कर रहा है. 

16 April, 2013

गीले कैनवास पर लिखना तुम्हारा नाम

उसने कलाइयां पकड़ीं थीं...ठीक उसी जगह शिराओं में दिल के धड़कने की हरकत महसूस होती है...दिल हर धड़कन के साथ उसके नाम के अक्षरों को तोड़ रहा था. मैं जितना ही छुड़ाने की कोशिश करती उसकी उसकी उँगलियाँ और तीखेपन से धंसती जातीं...दिल की धड़कन रुकने लगी थी.

उस शाम अचानक से पूरी दुनिया के लोग चाँद की साइट्स का मुआयना करने चले गए थे, शायद इस शहर में हम दो लोग ही बचे थे. कमरे में एक ही स्पीकर था छोटा सा, वो मुझे एक इंस्ट्रुमेंटल पीस सुना रहा था. वो टुकड़ा कुछ ऐसा था कि आसपास की सारी चीज़ें विलय होने लगीं थीं. जैसे हम किसी गीले कैनवास का हिस्सा हों. संगीत में डूबते हुए हम स्पीकर की ओर झुकते चले गए थे, कि जैसे संगीत का एक भी नोट छूट न जाए. वो, मैं, शोपें...सब एक दूसरे में घुल रहे थे. वक़्त को बहुत सी फुर्सत थी उस रोज़.

इस सबके दरमियान एक हल्का सा दर्द संगीत में घुलने लगा. मुझे बहुत देर लगी ये पता करने में कि दर्द किस हिस्से में हो रहा है. वहाँ एक ऐसा तिलिस्म रच गया था जिसमें मैं कोई और हो चुकी थी. कलाई के पास रक्त का निर्वाह बाधित था. फिर से देखा तो पाया कि मेरी कलाई उसकी उँगलियों में लॉक है. इतनी देर में रंगों ने कुछ लकीरें इधर से उधर कर दीं थीं, मुझे मालूम नहीं चल रहा था कि मेरी कलाइयाँ कभी उसकी उँगलियों से जुदा थीं भी या नहीं. कि उसकी उँगलियों के पोरों में वाकई मेरा दिल धड़कता था.

ऐसा कभी नहीं हुआ है कि प्यार एक बिजली के स्विच की तरह औन हो जाए और मालूम चले कि ठीक इसी लम्हे प्यार हुआ है. प्यार एक लम्बा प्रोसेस है और ठीक ठीक किसी लम्हे पर ऊँगली रखना कभी मुमकिन नहीं होता. जिंदगी में मगर बहुत कुछ पहली बार होता है.

जैसे शीशे का दरक जाना...मालूम था कि कुछ भी पहले जैसा नहीं हो पायेगा...वो आखिरी बार था जब उसकी आँखों में देखा था तो तकलीफ की एक बिजली जैसी लकीर सीने को चाक करती नहीं गुजरी थी. उस वक़्त डांस करने का दिल किया था मगर रोक लिया खुद को. जैसे दिल को जाने कैसे उम्मीद थी कि अब भी शायद मुमकिन हो, शायद मैं यहाँ से लौट पाऊं...भूल जाऊं कि उससे प्यार हो गया है अचानक. उसे मालूम भी था...पर सोचती हूँ तो लगता था कि उसे मालूम था.

अंग्रेजी में माइक्रोकोस्म बोलते हैं इसे...दुनिया में एक बेहद छोटा हिस्सा लेकिन जो अपने आप में पूरा है. कुछ ऐसा जिस तक हम बार बार लौट कर जाते हैं. प्यार हर बार अलग अलग जिद लेकर आता है. उसे उतना सा भर मिल जाए तो आपको चैन से जीने देता है. कभी किसी की आवाज़ के एक टुकड़े के लिए हलकान कर देता है तो कभी किसी के हाथ से लिखे एक सिग्नेचर के लिए, कभी माथे पर एक छोटा सा चुम्बन, कभी किसी की खुशबू को बोतल में बंद करने की जिद बांधता है तो कभी सिर्फ एक बारिश वाली शाम को टहलने की गुज़ारिश करता है. उतना भर मिल जाता है तो हम उस अहसास से गुज़र पाते हैं. इस बार प्यार की जिद बहुत छोटी सी थी. बिछड़ने के पहले एक बार गले मिलना चाहता था इश्क. फिर इजाज़त दे देता उसे जाने की.

उसे मालूम थी ये बात...यूँ तो उसकी दुनिया में अनगिन लोग हैं मगर वो जाने क्यूँ मेरी इस बेतरतीब दुनिया में रहना चाहता था. वो जो सिर्फ अपनी माँ से बात करते हुए 'लव यू' कह कर फोन रखता था...वो जो सोचने के पहले बोलता था, सिवाए मुझसे बात करते हुए...मुझसे बात करते हुए जैसे हर बात को तोलता था. एक दिन फोन पर 'ओके लव यू, बाय' कह गया. मैं उस दिन शायद किसी रोड एक्सीडेंट में मर जाती...आँखों के सामने गुलाबी शामें खिल रही थीं...अमलतास लहक रहे थे...मैं सोचती रही पर पूछ नहीं पायी कि कितने लोगों को वो फोन पर लव यू कहता है.

उसका असाइंमेंट कुछ ही दिनों का था...अगला फेस्टिवल कवर करने के लिए वो क्यूबा के किसी छोटे से गाँव जा रहा था. उसकी फितरत थी, जाते हुए सबके गले लगा...कुछ ड्रामा किया...एक आधी बार आंसू भी बहाए. मुझे देखा, आधी नज़र...कैसा गया वो कि अभी तक ठहरा हुआ है. ऐसे जाना कोई मुझे भी सिखाये. बहरहाल. कुछ दिनों से किसी भी तरह का म्यूजिक नहीं सुन रही हूँ. कैसी भी कविता नहीं पढ़ रही हूँ. लिखने का मूड भी नहीं होता. सब ब्लैंक सा है. मेरा रचा हुआ किरदार है...पन्नों से निकल कर पूछता है...मुझे कब तक भूल पाओगी लड़की?

09 April, 2013

द हारमोनियम इन माय मेमोरी

हम अपने आप को बहुत से दराजों में फिक्स डिपाजिट कर देते हैं. वक़्त के साथ हमारा जो हिस्सा था वो और समृद्ध होता जाता है और जब डिपाजिट की अवधि पूर्ण होती है, हम कौतुहल और अचरज से भर जाते हैं कि हमने अपने जीवनकाल में कुछ ऐसा सहेज के रख पाए हैं. 

ऐसा एक फिक्स डिपोजिट मेरे हारमोनियम में है. छः साल के शाश्त्रीय संगीत के दौरान उस एक वाद्य यंत्र पर कितने गीतों और कितने झगड़ों का डिपोजिट है. आज सुबह से उस हारमोनियम की आवाज़ को मिस कर रही हूँ. हमारा पहला हारमोनियम चोरी हो गया था. शहर की फितरत, वहां चोर भी रसिक मिजाज होते हैं. दूसरा हारमोनियम जो लाया गया, कलकत्ते से लाया गया था. बहुत महंगा था क्योंकि उसके सारे कलपुर्जे पीतल के थे, उसमें जंग नहीं लगती और बहुत सालों तक चलता. उस वक़्त हमें मालूम नहीं था कि बहुत साल तक इसे बजाने वाला कोई नहीं होगा. उस वक़्त हम भाई बहन एक रियाज़ करने के लिए जान देते थे. 

हम उसे बहुत प्यार से छूते थे. नयी लकड़ी की पोलिश...चमड़े का उसका आगे का हवा भरने वाला हिस्सा...उसके सफ़ेद कीय्ज ऐसे दीखते थे जैसे बारीक संगेमरमर के बने हों. मैं अक्सर कन्फ्यूज होती थी कि वाकई संगेमरमर है क्या. उस वक़्त हमारी दुनिया छोटी थी और कोई चीज़ हो सकती है या नहीं हो सकती है, मालूम नहीं चलता था. हारमोनियम को गर्मी बहुत लगती थी तो गर्मियों में एक तौलिया भिगो कर, निचोड़ कर उसके ऊपर डाल देते थे और बक्सा बंद कर देते थे. कभी कभी ऐसा शाम को भी करते थे. 

गाना गाने को लेकर हमारी अलग बदमाशियां थी. राग देश में जो छोटा ख्याल सीखा था उसके बोल थे 'बादल रे, उमड़ घुमड़, बरसन लागे, बिजली चमक जिया डरावे'. मजेदार बात ये थी कि जून जुलाई के महीने में अक्सर छुट्टी में रियाज़ में यही राग गाती थी. अब बारिश होती थी तो अपने आप को तानसेन से कम नहीं समझती थी कि मेरे गाने के कारण ही बारिश हो रही है. जिमी ने संगीत सीखना मुझसे एक साल बाद शुरू किया था. वो छोटा सा था तो उसके हाथ हारमोनियम पर पूरे नहीं पड़ते थे. सर हम दोनों को अलग अलग ख्याल सिखाते थे. मैं हमेशा हल्ला करती थी कि सर जिमी को ज्यादा अच्छा वाला सिखाते हैं. राग देश में भी सर उसको कोई और छोटा ख्याल सिखाये कि उसका नाम बादल है न...बादल रे गायेगा तो अच्छा थोड़े लगेगा उसको. 

जिमी हमसे बहुत अच्छा गाता था बचपन में, एक्जाम देने जाते थे तो एक्जामिनर उससे प्यार कर बैठते थे. एक तो एकदम छोटा प्यारा और बहुत मासूम लगता था उसपर आवाज़ इतनी मीठी थी कि एक्जामिनर खुश होकर दो चार और राग सुनने के मूड में आ जाता, जिमी का और गाने का मूड नहीं होता लेकिन...एक तो हम लोग एक ही राग पूरा अच्छे से रियाज़ करके जाते थे, आलाप, ख्याल और तान के साथ. एक्जामिनर खुशामद करता, कोई भजन ही सुना दो...सर बोलते...अरे जिमी वो वाला सुना दो न जो अभी पिछले सन्डे सिखाये थे. जिमी गाता...एक्जामिनर सर या मैडम उसको खूब आशीर्वाद देते. हम दिल ही दिल में सोचते अच्छा है मेरा आवाज़ उतना अच्छा नहीं है, हमको अभी एक ठो और गाना गाने कोई बोले तो यहीं जान चला जाए. एक्जाम का खौफ होता था. एक बड़ा सा हॉल होता था उसमें पूरे शहर के दिग्गज बैठे होते थे...सबको सुनते थे तो कमाल लगता था, उसपर एक्जामिनर कभी कभी अच्छा अच्छा को सुन कर खुश नहीं होता था. हम तो डरे सहमे आधा चीज़ वहीँ भूलने लगते थे. एक उसी एक्जाम और एक उसी ऑडियंस का हमको लाइफ में डर लगा है. वरना हम बड़े तीस मारखां थे...कहीं, किसी से नहीं डरते. 

हारमोनियम हम पटना लेकर आये...वहां कभी कभी रियाज़ करते थे, डर लगता था पड़ोसी हल्ला करेंगे. दरअसल रियाज़ करने का असल मज़ा भोर में है, जब सब कुछ एकदम शांत हो, हलकी ठंढी हवा बह रही हो. पटना में वही गाते थे पर हारमोनियम नहीं बजा पाते थे. याद नहीं कितने साल पहले आखिरी बार हारमोनियम बजाया था. कल रिकोर्डिंग स्टूडियो में थी...शीशे के उस पार जाते ही दिल की धड़कन बढ़ जाती है, गीत के बोल भूलने लगती हूँ, जबकि मैंने लिखे हैं और मुझे हर शब्द जबानी याद है. कल आर्टिस्ट को आलाप लेते देखा तो पुराने दिन याद आये...अब तो सपने में भी ऐसा आलाप नहीं ले सकती. 

शायद हारमोनियम का फिक्स डिपोजिट कम्प्लीट हो गया है. अबकी देवघर जाउंगी तो ले आउंगी अपने साथ. बहुत सालों से टाल रही हूँ, पर इस बार सर से भी मिलूंगी. अन्दर बहुत सा खालीपन भर गया है...उसे कुछ सुरों से, कुछ लोगों से, कुछ आशीर्वादों से भरूँगी. 
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इस सब के दरमयान चुप चुप रोउंगी कि मम्मी के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता, कहीं कभी भी. उसकी याद खुशबू की तरह है...कुछ कहती नहीं...दिल में कहीं बसती है. कल सुबह दराजों को हवा लगा कर कपड़े वापस रख रही थी, मम्मी के बुने सारे स्वेटर थे...वो थी यहीं कहीं. किसी दूसरे कमरे में फंदे गिनती...पीठ से लगा कर बित्ता हिसाब करती. मैं थक गयी हूँ उस खालीपन को दुनिया भर के काम से भरती हुयी. थक कर सो जाना चाहती हूँ हर रोज़ मगर याद भी कोई धुन की तरह ही है...कहीं नहीं जाती. मैं जाने कब उसके बिना जीना सीखूंगी. 
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बहुत दिन से रियाज़ करने का मन कर रहा है. सुर सारे भटक गए हैं. स थोड़ा ऊपर जो जाता है...कोमल ग ठीक से नहीं लगता है...नी जाने कैसा तो सुनने में आता है. पहले जब रियाज़ करती थी तो एक एक सुर पहले साधती थी. अब फिर से थोड़ा जिंदगी को साध रही हूँ. बहुत कुछ सुर से भटक गया...बहुत कुछ स्केल से अलग है. केओस को थोड़ा कम कर रही हूँ. जैसे कुछ सबसे खूबसूरत राग जिनमें सारे स्वर नहीं लगते, कुछ स्वर निषेध होते हैं. कभी कभी होता है...सन्डे को सुबह का वक़्त होता है...यूट्यूब पर कोई पसंद का गीत लगा देती हूँ और दूसरे कमरे में रोकिंग चेयर पर बैठ कर सिलास मारीनर जैसा कोई पुराना क्लासिक पढ़ती हूँ. जिंदगी अच्छी लगती है. सुकून लगता है. लगता है कि बहुत अच्छे से रियाज़ कर के उठे हों. मन शांत होता है. 

याद में स्वर आते हैं...कुछ शुद्ध, कुछ कोमल...गु ज री या  गा आ ग र  भ र ने ए  च ली  रे
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शीर्षक एक कोरियन फिल्म के नाम से. 

03 April, 2013

वो जो सांवला सा रास्ता था

रास्ते तुम्हें ढूँढने को बहुत दूर तलक, बहुत देर तक भटके थे. आज उन्हें थकान से नींद आने लगी है. उन्होंने टेलीग्राम भेजा है कि वे अब कुछ रोज़ सुस्ताना चाहते हैं. एक शाम सिगरेट सुलगाने को ऑफिस से बाहर निकली तो देखा कि रास्ता कहीं चला गया है और सामने दूर तलक सिर्फ और सिर्फ अमलतास के पेड़ उग आये हैं. खिले हुए पीले फूलों को देखा तो भूल गयी कि रास्ता कहीं चला गया है और मुझे उसकी तलाश में जाना चाहिए. ऑफिस से घर तक का रास्ता नन्हा, नटखट बच्चे जैसा था...उसे दुनियादारी की कोम्प्लिकेशन नहीं समझ आती थी. मैंने बस जिक्र किया था कि तुम जाने किस शहर में रहते होगे. रस्ते को मेरी उदासी नहीं देखी गयी. यूँ सोचा तो उसने होगा कि जल्दी लौट आएगा, मगर सफ़र कुछ लम्बा हो गया.

एक छोटे से पोखर में बहुत सारी नीली कुमुदिनी खिली हुयी है, मैं सोचती हूँ कि रास्ते को मेरी कितनी फ़िक्र थी. मैं उसे मिस न करूँ इसलिए कितना खूबसूरत जंगल यहाँ भेज दिया है उसने. अमलतास के पेड़ों के ख़त्म होते ही पलाश की कतारें थीं. वसंत में पलाश के टहकते हुए लाल फूल थे और मिटटी के ऊपर अनगिन सूखे पत्ते बिखरे पड़े थे. चूँकि यहाँ आने का रास्ता नहीं था तो बीबीएमपी के लोग कचरा साफ़ करने नहीं आ सकते थे, वरना वे हर सुबह पत्तों का ढेर इकट्टा करके आग लगा देते और उनमें छुपा हुआ रास्ता दिखने लगता.

ये मौसम आम के मंजर का है और उनकी गंध से अच्छा ख़ासा नार्मल इंसान बौराने लगता है. मैं पोखर के किनारे के सारे पत्थर फ़ेंक चुकी थी और अब अगली बारी शायद मेरे मोबाइल की होती...खतरा बड़ा था तो मैंने सोचा आगे चल कर देखूं किस शहर तक के रस्ते गायब हो गए हैं. ऐसा तो हो नहीं सकता न कि बैंगलोर के सारे रास्तों को बाँध कर ले गया हो मेरे ऑफिस के सामने का नन्हा रास्ता. पर कभी कभी छोटे बच्चे ऐसा बड़ा काम कर जाते हैं कि हम करने की सोच भी नहीं सकते.

मुझे मालूम था कि थोड़ी देर में बारिश होने वाली है...मौसम ऐसा दिलफरेब और ख्वाबों सा ऐसा नज़ारा हमेशा नहीं होता. किसी ने ख़ास मेरे लिए मेरे पसंद के फूलों का जंगल उगाया था. इसके पहले कि सारी सिगरेटें गीली हों जाएँ एक सिगरेट पी लेनी जरूरी थी. मुझे याद आ रहा था कि तुम अक्सरहां सिगरेट को कलम की तरह पकड़ लेते थे. जिंदगी अजीब हादसों से घिरी रही है और मेरी पसंद के लोग अक्सर बिछड़ते रहते हैं. जिस आखिरी शहर में तुम्हें चिट्ठी लिखी थी वहां के रास्तों ने ही पैगाम भेजा था कि तुम किसी और शहर को निकल गए हो.

जिंदगी को तुमसे इर्ष्या होने लगी थी...मैं तुम्हें अपनी जिंदगी से ज्यादा प्यार जो करने लगी थी. ऑफिस के इस रास्ते पर टहलते हुए कितनी ही बार तुमसे बात की, सिगरेट के टूटे छल्ले बनाते हुए अक्सर सोचा कि तुम जिस भी शहर में होगे वहां आँधियों ने तुम्हारा जीना मुहाल कर रखा होगा. तुम्हें याद है तुमने आखिरी धुएं का छल्ला कब बनाया था? ये जो छोटा सा रास्ता था, उसे अक्सर लगता था कि हम एक दूसरे के लिए बने हैं और एक दिन तुम उससे होते हुए मुझे तक पहुँच जाओगे. ये तब की बात है जब तुम्हारे घर का रास्ता मुझे मालूम था...मुझे तुम्हारी आँखों का रंग भी याद था और तुम्हारे पसंदीदा ब्रांड की सिगरेट भी पसंद थी.

तुम्हें जानते हुए कितने साल हो गए? मैंने तो कभी नहीं सोचा कि ऐसा कोई रास्ता भी होगा जिसपर बारिशों के मौसम में हम हाथों में हाथ लिए घूमेंगे. रास्ते से उठ रही होगी भाप और धुंआ धुंआ हो जाएगा सब आँखों के सामने. तो ये जो मेरी आँखों के ख्वाब नहीं थे, उस रास्ते के लिए इतने जरूरी क्यूँ थे कि वो तुम्हें ढूँढने चला गया. मुझसे ज्यादा तुम्हारी याद आती थी रास्ते को. उसे तुम्हारी आवाज़ की आदत पड़ गयी थी. पर एक रास्ता ही तो था जो जानता था कि तुमसे बात करते हुए मैं सबसे ज्यादा हंसती हूँ...एक तुम्हारा अलावा सिर्फ वही एक रास्ता था जो जानता था कि मैं हँसते हुए हमेशा आसमान की ओर देखती हूँ.

तुम कहाँ चले गए हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे घर के आगे का रास्ता भी मुझे ढूँढ़ने निकला है इसलिए तुम मुझ तक नहीं पहुँच सकते. कि कोई एक खोया हुआ होता तो मुमकिन था कि हम कहीं मिल जाते...मगर चूँकि मेरे रस्ते को तुमसे प्यार था और तुम्हारे रास्ते को मुझसे...वे दोनों हमें मिलाने को निकल गए और हम दोनों खो गए. पर सोचो...आसमान तो एक ही रहेगा...चाँद...तारे...रात हो रही है, ऐसा करो न कि तारों में तुम्हारे शहर का नक्शा बना दो. मैं रात नदी का किनारा पकड़ कर तुम्हारे शहर पहुँच जाउंगी.

तब तक...हम दोनों के कुछ दोस्त मेरे और तुम्हारे शहर के बीच कहीं रहते हैं...उनसे कहो जरा रास्तों का ध्यान रखें...कभी कभी सफ़र में सुनाया करें रास्तों को मेरी तुम्हारी कहानियां. चलो एक 'मिसिंग' का पोस्टर बनवाते हैं. कभी वापस आ जायेंगे रस्ते तो एक दूसरे के पास ही रहने देंगे उन्हें. तुम भी मेरे शहर चले आना उनकी ऊँगली पकड़े. मेरे रास्ते को कहीं देखोगे तो पहचान तो लोगे? सांवला सा है, उसके बांयें गाल पर डिम्पल है और उसके दोनों तरफ गुलमोहर के फूल लगे हैं. चुप्पा है बहुत, बारिश की भाषा में बात करता है...जो तुमसे भीगने को कहे तो मान जाना.

सी यु सून!

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