19 November, 2013

झूलती हरियाली, नीला आसमान और बूंदों का ओपेरा

यूँ मुझे सरप्राइज होना कभी पसंद नहीं है. चीज़ों को लेकर इतनी पर्टिकुलर हूँ कि शायद ही कभी कोई मेरी पसंद का कुछ ला पाता है. बहुत कम लोग हैं जो अधिकारपूर्वक ये कह सकते हैं कि 'तुम्हें ये पसंद आएगा'. कल ऑफिस पहुंची तो पता चला हमें बेसमेंट से ऊपर शिफ्ट कर दिया गया है. ऑफिस में नया कमरा बना था कंटेंट और डिजाइन टीम के लिए, सबसे ऊपर वाले तल्ले पर. 

दरवाज़ा खोलते ही मिजाज हरा हो गया एकदम. हॉल में सफ़ेद दीवारें थीं...खुला खुला...हवादार और हर खिड़की पर झूलते हुए गमले. टेबल के पास कोई छः इंच की जगह पर छोटे छोटे फूलों वाले गमले. बहुत सारी धूप और रौशनी. ग्यारह बजे ऑफिस जाने का नतीजा ये कि सबसे अलग वाली खिड़की मिली मगर फायदा ये कि पूरी की पूरी खिड़की मेरी...किसी से शेयर करने की जरूरत नहीं. 

सीट से सामने खुला आसमान दिखता है, एकदम नीला और उसमें सफ़ेद बादल. लैपटॉप से नज़रें उठाओ और रिचार्ज हो जाओ. इन फैक्ट जगह इतनी अच्छी थी कि किसी का काम करने का मन नहीं करे...यहाँ दिन भर खयाली पुलाव पकाए और शेयर करके खाए जा सकते थे...कहानियां बुनी जा सकती थीं और खूबसूरत संगीत सुना जा सकता था. जगह इतनी अच्छी कि सुबह सुबह ऑफिस जाने का दिल करे. बाकी के ऑफिस के सारे लोग भी आ कर कह रहे थे कि ये अब वाकई क्रिएटिव रूम लगता है...कि वे भी यहाँ बैठ कर काम करना चाहते हैं. कमरे की सारी दीवारें सफ़ेद हैं सिवाए इस वाली के जिसका रंग डार्क ग्रे है...दोपहर को जब धूप गिरती है तो शेड्स बन जाते हैं और फिर बाहर के नीले आसमान को एक बेहतरीन कंट्रास्ट देते हैं. कल आइफोन से ही बहुत सी फोटो खींची...आज अपना डीएसएलआर ले कर जा रही हूँ. 

हम जिस जगह रहते हैं, उसको बेहतर किया जा सकता है कई मायनों में...इसके लिए सिर्फ सोच की जरूरत होती है. यहाँ जो गमले हैं वो नारियल रेशे की बुनी हुयी हैं, ये जोर्ज ने अपने भाई से केरला से मंगवाए थे. सन्डे को पूरा दिन वो इन गमलों की सही जगह और बाकी डेकोरेशन करता रहा. छोटी छोटी चीज़ों से कितना असर पड़ता है. थोड़ी सी हरियाली...जरा सा खुला आसमान...और क्या चाहिए? आज मैं कुछ और किताबें ले जा रही हूँ कि अब ये जगह अपनी सी लगती है, जिसे अपने हिसाब से सजाया और संवारा जा सकता है. 

ऑफिस की व्यस्ताओं के कारण लिखने का एकदम वक़्त नहीं मिला. इन फैक्ट जब से लिखना शुरू किया है, ये पहला साल है जब मैंने इतना कम लिखा है, बाकी सालों से आधा. कई बार इस चीज़ को लेकर काफी कोफ़्त होती है कि मेरे लिए जीने का मायना सिर्फ लिखने के पैमाने में नापा जा सकता है. अगर लिखती नहीं हूँ तो समझ नहीं आता कि पूरा साल गया कहाँ...किधर गायब हुआ...क्या करते बीता. यूँ बहुत सी चीज़ें की हैं प्रोफेशनली मगर उनसे जाने क्यूँ न गर्व का भाव आता है न वैसी संतुष्टि मिलती है. 

कल शाम होते होते काले बादल घिर आये और तेज़ बारिश हुयी. टप्पर की छत पर बूंदों ने ऐसी धमाचौकड़ी मचाई कि हम बगल वाली सीट पर बैठे व्यक्ति को सुन नहीं सकते थे. बारिश बेहद तेज़ थी...बिजली का कड़कना दिखता और फिर जोर से बादल गरजते...ठीक बारिश के बीच बना घर जैसा कोई...एक ऐसा द्वीप जो बाकी दुनिया से कटा है. कमाल थी वो आवाज़...संगीत जैसी...ऊंचे सुर के आलाप जैसी...जहाँ कहानी का क्रेसेंडो हो. अभी जेनरेटर बैक अप नहीं है तो बिजली जाने के बाद अँधेरे में बस बिजली का चमकना...बूंदों का शोर और जाने कितनी कहानियां उमड़ती घुमड़ती हुयीं. 

शब्दों में यकीन करने वाले लोगों के लिए सब कुछ तो शब्द ही हैं...इसलिए...थैंक यू जोर्ज. 

3 comments:

  1. खिड़की जो दूसरी ही दुनिया में खुलती है...खूबसूरत

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  2. थैंक यू जोर्ज .............................आखिर इतनी सुंदर पोस्ट जो मिली । कमाल की अभिव्यक्ति हमेशा की तरह । पूजा लहरों को बहने दो निर्बाध इसी तरह

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