01 June, 2012

कुर्ते के थर्ड बटन से पॉज़

तुम्हें पहली मुलाकात में उतना खूबसूरत कुर्ता नहीं पहनना चाहिए था...अब कभी इतने अच्छे तो कभी नहीं लगोगे तुम मुझे. लखनवी कुरता...चिकन की कढ़ाई...और पतली सी जंजीर से बंधे नफासत वाले बटन... एक...दो...मेरे ख्याल तुम्हारे कुर्ते के तीसरे बटन पर अटक गए हैं. 

कोई लफंगा भी पहली बार किसी दोस्त से मिलने आएगा...और वो दोस्त लड़की होगी तो किसी भी हाल में कुर्ते के तीन बटन खोल कर नहीं आएगा...तुम्हें तो मैं कितना भला लड़का समझती थी. एकदम लुच्चे लग रहे थे...जैसे पटना में गोलंबर पर खड़े हुआ करते थे लड़के...कॉलेज आते जाते लड़कियों को घूरते हुए...वैसे. प्लीज गर्मियों की दुहाई मत दो...ऐसी गर्मी में कोई काले कपड़े पहनता भी है? तुम जानते हो काला रंग मेरी कमजोरी है तो बस...तुम आज फ्लर्ट मारने के मूड में आये थे न?


कह लो...हम ही कौन से भली लड़की की कैटेगरी में आते हैं...अब ये न कहना कि हमारी उम्र के हिसाब से हम आंटी की कैटेगरी में आते हैं...लेकिन कसम से यार...शिद्दत से लड़के छेड़े हुए जमाना गुज़र गया था. आखिरी बार कोलेज में एक लड़के को इसी तरह चिढ़ा मारे थे...रोआंसा हो गया था बेचारा तब जा के उसकी जान बक्शे थे. गुस्सा हो लेना बाद में, पर कसम से मेरी जान...लजाते हुए क्या कातिलाना लग रहे थे...कितने मासूम और प्यारे. मैंने वाकई नहीं सोचा था कि शर्म से लाल टमाटर हुए तुम्हारे गाल दिखेंगे. दुनिया पागल हो जाए फेमिनिज्म के पीछे...पर लड़के अगर शर्मा/झेंप रहे हैं तो कमाल लगते हैं. एकदम हार्मलेस, एकदम वल्नरेबल. देखो न कितना हँसे हम तुमको चिढ़ा के...गाल अभी तक दर्द कर रहे हैं. 

मालूम है...भीड़ में गुम होते नज़र आते जब तुम्हें पहली बार देखा था तो यकीन नहीं हो रहा था कि तुम इतने अट्रैक्टिव होगे...सबमें अलग नज़र आते हो तुम. तुम में कुछ तो है कि अच्छे अच्छों का ईमान खराब हो जाए...कुर्ते का पहला बटन है कि छूते ही सब पॉज़ हो जाता है. हमने कहाँ जाना था...मैंने तो बस उस सीपी के चमकते बटन की तराश देखने को छुआ था...गलती से उँगलियाँ छू गयी थीं तुम्हें...स्टैटिक इलेक्ट्रिसिटी...क्या लगता है, कितने वोल्ट का था वो झटका? आइडियली उस वक्त हम दोनों के दिमागों को वापस ट्रैक पर आ जाना था...लेकिन.

तुम्हारी आँखें देखीं तो कोई शब्द नहीं कौंधा...वो एक आह थी...गहरी साँसों में उलझती...दिल की धड़कनों का डिसिप्लिन तोड़ती...इनवाईटिंग...तुम्हारी आँखें दूर दूर तक खेतों की पगडंडियों का रास्ता खोलतीं थीं. बुलाती थीं...बांधती थीं...फिर जाने देती थीं जैसे कि उन्हें गहरा यकीन हो कि जितना दूर जाउंगी उतनी ही तेज रफ़्तार से तुम्हारी ओर खिंचूंगी. पता है जिन लोगों की आँखें हलके रंग की होती हैं वे कपड़ों के साथ रंग बदलती हैं...जैसे नीले कपड़े पहनो तो नीली लगेंगी...हरे पहनो तो हरी...पलाश के चिकने पत्तों सी. तुमने तो न्यूट्रल कलर पहन रखा था...तो फिर तुम्हारी आँखों का नीला रंग क्या मेरे दुपट्टे से परावर्तित हो कर आ रहा था? 

तुम्हारे हाथ एक कामगार के हाथ थे...ऐसी उँगलियाँ कि जैसे शब्दों से भी वर्जिश करवा लेती हों...कलम को कुदाल की तरह पकड़ती हों. बेहद मजबूती से और इस विश्वास के साथ कि मिट्टी में मेहनत का लहू गिरता है तो फसल अच्छी होकर ही रहती है. मैं एक बार तुम्हारा हाथ छू के देखना चाहती थी...क्या वाकई, सिर्फ इतना? तो फिर नज़र रह रह कर उस तीसरे बटन पर स्टैचू क्यूँ हो जाती थी?

तुम ठीक कहते थे कि हमें नहीं मिलना चाहिए था. अच्छा होता नहीं मिलते. कोम्प्लिकेशन नहीं होती. काफी होना चाहिए था तुम्हारी आवाज़ से रिश्ता. तुम्हें देख कर ऐसे ऐसे ख्याल सर उठाने लगे हैं जो पिछले कई कई सालों से मन का दरवाजा खटखटाने नहीं आये थे. हम अकेले हैं. ऐसा ख्याल सिर्फ तब आता है जब हम उस अकेलेपन तक किसी को पहुँच जाने देते हैं. मेरी जिंदगी में मेरा कैरियर ही सब कुछ था...पूरी दिनचर्या उसके इर्द गिर्द और बाकी बची जिंदगी हर लड़ाई में हर जगह ये प्रूव करने में चली जाती थी कि औरत होने के कारण मैं औरों से कमजोर नहीं हूँ. एक सिंगल औरत शादी नहीं करना चाहती...अपने खुद के फ़्लैट में बेहद खुश खुश रहती है. किसी की मजाल नहीं होती थी कि एक बार पूछ सके कि मुझे अकेलापन महसूस नहीं होता. क्यूँ नहीं होता? ऑफिस में काम के प्रति मेरी दीवानगी को देखते हुए मेरी काफी इज्जत थी और लोग हमेशा मेरे काम से बेहद खुश रहते थे. मेरे इस पूरे सफ़र में तुम हमेशा से मेरे फेवरिट रेडियो जॉकी रहे थे...किसी को याद भी नहीं होगा पर वो देर रात के तुम्हारे लव-गुरु वाले एपिसोड्स भी मेरे पास रिकोर्डेड हैं जो वाकई इतने खराब थे कि चैनल ने कॉपीज भी नष्ट कर दीं. तुमसे पहले मेरे पास सब कुछ था जो जीने के लिए चाहिए. 

हमने जाने कितनी तरह की बातें कीं...हमेशा की तरह हमारी बातें खत्म ही नहीं होती थीं...जाने कितनी कप कॉफी पी गए थे हम...जाने नींद कितने दिनों तक उड़ी रहेगी. पर क्या कैफीन के कारण? तुम्हारा 'जाने दो' ऐसा था कि बार बार रोक लेने को कहता था...और मेरा 'चले जाओ' बार बार पैर ही रोकता था. विरोधाभास. हमारे बीच कुछ तो था जिसे केमिस्ट्री कहा जाता है. लेकिन दोस्ती इतनी अच्छी थी कि जिंदगी में पहली बार खुद से वादा किया कि कभी तुमसे प्यार हो भी गया तो पूरी दुनिया को भले बता दूं...तुम मेरे जीते जी तो नहीं जानोगे. ये प्यार-मुहब्बत कमबख्त रिश्तों में जंग की तरह लग जाती है. तुम्हें रेजिस्ट करना बेहद तकलीफदेह होगा ये भी पता था. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि तुम्हारी उँगलियों से ओल्ड स्पाईस की खुशबू आती थी. क्लास्सिक. जब तक हम अपनी अपनी सिगरेट पी रहे थे ख़ामोशी हमारे दरमियाँ अपनी जगह बना चुकी थी. ख़ामोशी एक जिद्दी किरायेदार है...घर खाली ही नहीं करती. सिगरेट के छल्ले, कॉफी, शाम और तुम्हारा कॉम्बिनेशन डेडली था. 
मुझे लगता है हमारा दिमाग एक ही ट्रैक पर चल रहा था...हम और तुम 'आई लव यू' जैसी टुच्ची चीज़ के पीछे समय बर्बाद करें इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा...घुमा फिर कर कहना मुझे भी तो नहीं आता...किसी न किसी को तो कहना ही पड़ेगा...
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'सो, योर प्लेस ऑर माईन?'
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12 comments:

  1. कामगार के हाथ, शब्दों की वर्जिश, वाह, हमें तो लगता था मस्तिष्क की ही कुश्ती होती थी शब्दों से।

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  2. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  3. अवसाद से कभी कभार मन भर जाता तो यहाँ आ जाता हूँ. मन हल्का हो जाता है.

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    1. Samepinch :) :)
      मैं भी यही करती हूँ...लेकिन मेरा ब्लॉग है न तो कभी कभी लिखना भी पड़ता है मुझे :)

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    2. और मैं भी आते जाते ही रहता हूँ इधर से :P

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  4. ख़ामोशी एक जिद्दी किरायेदार है ...

    और लफ्ज़ ऐसे पडोसी हैं जो तांक-झाँक करने से बाज़ नहीं आते :)

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  5. कितने कोमल ख्यालों का फ़लसफ़ा।

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  6. imaandaar shabd, bohot achha lagta hai padh ke

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  7. Lots there to learn from you, when it comes to playing with words! Nice one!

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  8. This comment has been removed by a blog administrator.

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