16 January, 2012

तुम्हें मालूम है कि जिस साल तुम आते हो नागफनी पर फूल आता है?

प्रेम नागफनी सरीखा है...ड्राईंग रूम के किसी कोने में उपेक्षित पड़ा रहेगा...पानी न दो, खाना न दो, ध्यान न दो...'आई डोंट केयर' से बेपरवाह...चुपचाप बढ़ता रहता है.
---
एक नागफनी का बाग़ है...उसमें हर तरह के पेड़ हैं...यूँ कहो  कि काँटों की सल्तनत है...कुछ कांटे बेहद तीखे, कड़े और बड़े हैं...जो कि ऊँगली में चुभ जाएँ तो खून निकल आये...मगर ऐसे कांटे ऊँगली में नहीं पैरों में चुभा करते हैं...इस पागल लड़की के सिवा कैक्टस के पेड़ों को कौन सहलाता है...कौन जाता है उनका हाल पूछने की सदियों से नफरत का प्रतीक बने ओ कैक्टस के पेड़ तेरा क्या हाल है.

कहते हैं कि कैक्टस के पेड़ नहीं उगाने चाहिए, इससे रिश्तों में काँटों की बाड़ उग आती है...मैंने कई दोस्तों से सुना है कि मेरी खिड़की पर जो कैक्टस का गमला है उसे कहीं फ़ेंक दूं. कैक्टस पर फूल खिलने में हजारों साल लग जाते हैं. मैं उनसे कहती हूँ कि मेरा इंतज़ार भी तो हजारों साल पुराना है...पर वो मानती नहीं हैं...बस जिद करती हैं कि इस कैक्टस को किसी और को दे दूं. वो नहीं जानती...कैक्टस के कांटे मुझे उन सारी स्त्रियों की याद दिलाते हैं जिन्होंने कभी तुम्हें छुआ हो. सारी...हाँ...सारी...मैं कुबूलती हूँ कि मुझे उस डॉक्टर से भी ईर्ष्या हुयी थी जिसने तुम्हारी तपती पेशानी छूने के बाद तुम्हें ठीक हो जाने वाली दवाइयां लिखी थीं.


मुझे उन सारी स्त्रियों से डाह होती है जिन्होंने कभी...कैसे भी...किसी भी रिश्ते में...बिना किसी रिश्ते में...कैसे भी कभी भी...तुम्हें छुआ हो...इसमें तुम्हारी माँ शामिल है जिसने कितनी शामों में तुम्हारे माथे पर थपकियाँ दी होंगी...तुम्हारी बहन जो राखी में तुम्हारे कलाई पर राखी बांधती है, वो छोटी बच्चियां जिनके साथ तुमने बचपन में कित-कित या छुपम छुपाई जैसे खेल खेले होंगे. तुम्हारी अब तक की प्रेमिकाएं...तुम्हारी होने वाली प्रेमिकाएं...सब...डाह सबसे एक बराबर है. कहीं कम-ज्यादा नहीं.

जब तुम किसी दीवार के पीछे इस यकीन में छुपे होगे कि इधर से तो कोई नहीं आ सकता पर वो दुष्ट दो छोटियों वाली छोटी लड़की उस छोटी सी दीवार को फांद कर तुम्हारे पीछे दबे पांवों पहुँचती है और दोनों हाथों से तुम्हारी पीठ पर 'धप्पा' बोलती है...तुम नहीं जानते हो वो धप्पा कैसे 'धक्' से मेरे दिल पर लगता है हर बार.  तुम बचपने में उससे लड़ते झगड़ते रहते हो, कभी हाथ मरोड़ देते हो...कभी गुत्थम गुत्था हो जाते हो...ऊँचे वाले झूले पर उसे उठा के बिठाते भी तो हो...कभी  बुढ़िया कबड्डी  कि जिसमें तुम उसका हाथ पकड़ कर उसको घर से बाहर लाते हो...कभी चोर पुलिस, कभी  डेंगा-पानी...मैं समय में जाने कहाँ आगे पीछे होते हुए तुम्हें टटोलती चलती हूँ पर मेरे हाथ कहीं छूट के गिरा...तुम्हारे हाथों का एक बिसरता हुआ स्पर्श भी नहीं आता.

मुझे उस लड़की से बेहद जलन होती है जिसपर तुम्हें पहली बार प्यार आया होगा और तुम्हारे दिल की धड़कनें उसे देख कर तेज़ हो जाती होंगी और तुमने किसी बहाने, आते-जाते...स्कूल की कोपियाँ रखते हुए जब कि तुम क्लास के मोनिटर रहे होगे...कभी लाइब्रेरी की किताब देते हुए...किसी भी तरह...कहीं उसकी अनामिका ऊँगली पर बहुत हलके से अपनी तर्जनी छुआ दी होगी...ऐसा करते हुए तुम्हारा पूरा शरीर थरथरा गया होगा...मैं यहाँ एक वाहियात सुबह ये सोच रही हूँ और मेरी कॉफ़ी का जायका चला गया है...उफ़...अब तो पानी भी पी रही हूँ तो लगता है कि खारा पानी है...शायद आरो फ़िल्टर की जाँच करवानी होगी...या कि अपने दिमाग की ही.

मुझे वे सारी लड़कियां भी अच्छी नहीं लगतीं जो तुमपर मरती थीं...और तुम्हारे ख्यालों के खुशबूदार, नर्म हाथ कुनमुनी नींदों के पहले अपने तकियों में पकड़ के सोती थीं...ना ना...मुझे नहीं अच्छा लगता कि वो अपने ख्यालों में तुम्हें छू सकती हैं क्योंकि तुम हमेशा उनके सामने ही तो रहते थे...मुझे ये भी अच्छा नहीं लगता कि  तुम क्लास के मोनिटर हो और हमेशा क्लास की कापियां तुम ही बांटते हो...तुम्हें शायद नहीं पता चलेगा कि तुम्हें कॉपी देते हुए, तुमसे कॉपी लेते हुए कितनी लड़कियों ने तुम्हारे एक स्पर्श को उन कापियों में लिखी बातों से कहीं ज्यादा दिनों तक याद रखा होगा.

कालेज के बारे में तो मैं सोचना भी नहीं चाहती...हालांकि मैं जानती हूँ कि लड़कियां सोचने में भी थोड़ी कंजर्वेटिव होती हैं या कहो कि लड़कों की तरह मुखर नहीं होतीं...पर एक उम्र तो ऐसी आती है न जब हर लड़की का दिल चाहता है कि कोई उसे अपनी बांहों में भर कर तोड़ दे...उसके होठों को यूँ चूमे कि खून निकल आये...उस उम्र में तुम सबसे खूबसूरत भी तो दीखते होगे...गर्ल्स होस्टल में लड़कियां रात बैठ कर तुम्हें डिस्कस कर रही हैं कि तुम कितने 'हॉट' हो...तुम तो जानोगे भी नहीं कि गर्ल्स होस्टल का की रातें कैसी होती हैं...उफ़...मैं ऐसे माहौल में रही ही क्यूँ, इस पहलू से तो अनजान रहती कमसेकम...तुमसे किसको न प्यार हो जाता और फिर कौन लड़की न चाहती होगी कि तुम उसके ख्यालों से ज्यादा बुरे निकलो. ओह...मैं सोच भी नहीं पा रही...मुझे इतनी जलन और इतना दर्द हो रहा है. उफ़ ये कितने कैक्टस के कांटे मेरे हाथों में चुभ गए हैं...मैं जाने क्या करने इस जंगल में आई थी...न ना ये बाग़ नहीं है जंगल है जहाँ तुम्हारे हाथों से मेरा पूरा जिस्म घायल हो रहा है.

मैं नहीं सोचना चाहती उस लड़की के बारे में जो तुम्हारी पहली प्रेमिका रही होगी...कि जब तुम्हारे हाथ उसके काँधे पे फिसलते होंगे तो अगली सुबह उसे उसके काँधों से तुम्हारी खुशबू आती होगी...मेरी सोच में नागफनी के कांटे चुभने लगते हैं...ख्यालों में ही उग आता है नागफनी का जंगल और मैं अन्यमनस्क उस कैक्टस पर ऊँगली फेरने लगती हूँ जो मेरे गमले में वक़्त की रफ़्तार से भी धीमे उग रहा है.

ये सब लिखते हुए मुझे जाने क्यूँ बार बार चंडीगढ़ के रॉक गार्डेन याद आ रहे हैं...शायद इसलिए कि वो पूरा बाग़ बेकार पड़ी, टूटी, कबाड़ चीज़ों से बना था. शायद कुछ वैसा ही जैसा मेरे दिल का अभी हाल हो रखा है...कितने दिन ऐसी बेमुरव्वत ख्यालों में उलझे बीते हैं...कोहरे भरी धुंध का मौसम उतरने लगा है...नीले कागज़ पर नीली स्याही से इस समय तुम्हें सोचते हुए कोई कविता लिख सकती काश...या कि दालचीनी की खुशबू में डूबते उतराते कॉफ़ी बना लेती...दो मैना देख कर अपनी दो उँगलियाँ चूमते हुए एक पुरानी दोस्त को याद करती जो कहती थी 'वन फॉर सॉरो, टू फॉर जॉय'...मगर ऐसे तरतीब के काम मुझसे कबसे होने लगे भला. सोचती ये भी हूँ कि तुम्हारा प्यार मुझे दिन-ब-दिन बुरा बनाता जा रहा है...अंगूर का रस होना क्या बुरा था जो अहिस्ता अहिस्ता रेड वाइन हुयी जा रही हूँ...इस बेतरतीब ख्वाहिश में घुलती कि एक दिन तुम्हारे होठों से जा लगूंगी.










मैं बस एक बार तुम्हारा हाथ अपनी दोनों हथेलियों में भरे अपने गाल से सटा कर बैठे रहना चाहती हूँ...उसके बाद मेरा पूरा जिस्म एक कैक्टस का फूल बन जाए जिसे कभी भी कोई इंसान छू न सके...मुझे परवाह नहीं. 

16 comments:

  1. प्रेम नागफनी सरीखा है..

    बेहद पसंद आया आप का लेख,और आप की लेखन शैली ..

    vikram7: जिन्दगी एक .......

    ReplyDelete
  2. नागफनी पर फूल तो हर साल आता है जी, ये बात और है कि बे-मौसम आता है!

    ReplyDelete
  3. सब जानी हुई बात है फिर भी गोली सी निकली है और कलेजे तक जा धंसी है.

    वैसे कल रात एक फिल्म देख रहा था सुधीर मिश्रा की 'ये साली जिंदगी' एक संवाद है उसमें "इश्क और गोली में ज्यादा फर्क नहीं होता, छाती फाड़ने के लिए दो मिनट ही काफी होते हैं"

    ReplyDelete
  4. सशक्त और प्रभावशाली रचना|

    ReplyDelete
  5. पूजा, आपको पढ़ना एक अनुभव है, बिल्कुल अलग, बिल्कुल नया, बेबाक, हृदय से...

    ReplyDelete
  6. दीवानी हूँ .. बस .. इतना ही कहूँगी

    ReplyDelete
  7. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete
  8. वही अंदाज़ और फ़िर वही बातें हैं
    तुम्हारी लेखनी में कई सौगाते हैं



    आपकी लेखनी को सलाम जी । लहरें उठती रहें और टकराती रहें , आपसे ऐसी ही पोस्टें लिखवाती रहें

    ReplyDelete
  9. वही अंदाज़ और फ़िर वही बातें हैं
    तुम्हारी लेखनी में कई सौगाते हैं



    आपकी लेखनी को सलाम जी । लहरें उठती रहें और टकराती रहें , आपसे ऐसी ही पोस्टें लिखवाती रहें

    ReplyDelete
  10. प्रेम नागफनी की तरह पनपता रहता है चुपचाप .....प्रेम में नागफनी का फूल बन जाने की चाह ....कि कोई और न छू सके कभी....प्रेम के अधिकार की जलन ....हाँ ! मुझे भी याद आती है कुछ-कुछ......जलन ....ऐसी जलन .....कि ख़ाक होकर भी बचा रहता है सब कुछ .....फिर-फिर ख़ाक होने के लिए..... उफ्फ ....उस जलने में भी कितना मजा आता है जलने का ...........

    ReplyDelete
  11. पूजा का अन्दाज़-ए-बयाँ है और्………:)

    ReplyDelete
  12. मैं बस एक बार तुम्हारा हाथ अपनी दोनों हथेलियों में भरे अपने गाल से सटा कर बैठे रहना चाहती हूँ...उसके बाद मेरा पूरा जिस्म एक कैक्टस का फूल बन जाए जिसे कभी भी कोई इंसान छू न सके...मुझे परवाह नहीं.

    बड़ी गहरी बात कही पंडिताइन आपने। हृदयस्पर्शी।

    ReplyDelete

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...