29 November, 2011

खाली दिमाग का घंटाघर!

यूँ ही राह चलते क्या तलाशते रहते हो जब किसी से यूँ ही नज़रें मिल जाती हैं...किसी को तो ढूंढते हो. वो क्या है जो आँखों के सामने रह रह के चमक उठता है. आखिर क्यूँ भीड़ में अनगिन लोगों के होते हुए, किसी एक पर नज़र ठहरती है. वो एक सेकंड के हजारवें हिस्से में किसी की आँखों में क्या नज़र आता है...पहचान, है न? एक बहुत पुरानी पहचान. किसी को देख कर न लगे कि पहली बार देखा हो. जैसे कि इस खाली सड़क पर, खूबसूरत मौसम में अकेले चलते हुए तुम्हें उसे एक पल को देखना था...इतना भर ही रिश्ता था और इतने भर में ही पूरा हो गया.

रिश्तों की मियाद कितनी होती है? कितना वक़्त होता है किसी की जिंदगी में पहली प्राथमिकता होने का...आप कभी भी ताउम्र किसी की प्राथमिकता नहीं बन सकते, और चीज़ें आएँगी, और लोग आयेंगे, और शहर मिलेंगे, बिसरेंगे, छूटेंगे...कितना बाँधोगे मुट्ठी में ये अहसास कि तुम्हारे इर्द गिर्द किसी की जिंदगी घूमती है.

कुछ लोग आपके होते हैं...क्या होते हैं मालूम नहीं. वो भी आपसे पूछेंगे कि उनका आपसे रिश्ता क्या है तो आप कभी बता नहीं पायेंगे, किसी एक रिश्ते में बाँध नहीं पाएंगे. प्यार कभी कभी ऐसा अमूर्त होता है कि पानी की तरह जिस बर्तन में डाल दो उसका आकार ले लेता है. उनकी जरूरत के हिसाब से आपका उनसे रिश्ता बदलते रहता है. प्योर लव या विशुद्ध प्यार जैसा कुछ होता है ये. इसमें दुनियादारी की मिलावट नहीं होती. ऐसा कोई न कोई तो होता है...जो एक्जैक्टली आपका क्या लगता है आप खुद भी नहीं जान पाते. जानते हैं तो बस इतना कि आप उसे खुश देखना चाहते हैं. बस. इंग्लिश में एक ऐसा वाक्य आता है दिमाग में ऐसे लोगों के बारे में...हिंदी में मैं परिभाषित या अनुवाद नहीं कर पाती...यु बिलोंग टु मी(You Belong To Me) खास खास इस वाक्य को समझा भी नहीं पाउंगी, पर ऐसा ही कुछ होता है.

वैसे लोग होते हैं न...जैसे आपसे कोई दस साल छोटी बहन या भाई, आप उसे अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल चीज़ें भी बताते रहते हो...ये जानते हुए कि उसे नहीं समझ आ रहा. पर वो बहुत समझदारी से आपकी हर समस्या को सुनेगी...सुनती रहेगी. पर कभी किसी एक दिन उसकी छोटी सी दुनिया की छोटी सी समझ से एक ऐसा वाक्य निकलेगा कि आपकी समस्या एकदम कपूर की तरह उड़ जायेगी. आप चकित रह जायेंगे कि ये इसने खुद बोला है या इसके माध्यम से किस्मत आपको कोई रास्ता दिखा रही है.

मुझे लगता है प्यार की सबसे पहली डेफिनेशन होती है कि आपके लिए किसी की ख़ुशी जरूरी हो जाए. इसके आगे आप कुछ सोचते ही नहीं, न अच्छा न बुरा, दुनिया एकदम लीनियर हो जाती है. सब कुछ सीधी लाइन में चलता है. Cause and Effect नहीं रहता, बस एक चीज़ होती है, उसके चेहरे पर हंसी...मुस्कराहट. इसके लिए आप कुछ भी करने को तैयार रहते हो...जिस भगवान से गुस्सा हुए बैठे हो, उससे भी हाथ जोड़ कर उसकी ख़ुशी मांग लेते हो. सड़े हुए जोक्स मरते हो, जहरीले पीजे सुनते हो...सब करते हो, बस उसे एक बार हँसते हुए सुनने के लिए.

मैंने बहुत कम पढ़ा और लिखा है...पर जितनी जिंदगी जी है उससे एक चीज़ ही दिखती है मुझे, प्यार. आज भी इसके लिए सब वाजिब है...सब सही है...सब जस्टिफाइड है...मुझे जाने क्यूँ कभी प्यार पर लिखने से मन नहीं भरता. कुछ लोग...नहीं मालूम मेरे क्या हैं, बस मेरे हैं...इस बात पर यकीन है.

डेस्टिनी/किस्मत कुछ तो होती है वरना कुछ लोगों से आप जिंदगी भर नहीं मिल पाते और आप जानते तक नहीं कि क्या खाली है...तो सवाल घूम कर वहीं आ जाता है...भरी भीड़ वाले कमरे/रेलवे स्टेशन/तेज चलती गाड़ी/ट्रेन/एयरपोर्ट...आपको किसी की आँखों में एक लम्हे कौन सी पहचान नज़र आ जाती है कि आपको कहीं और देखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है.

ये कौन से रिश्ते हैं जो समझ नहीं आते...ये कैसे रिश्ते हैं जो एक लम्हे में पूरी जिंदगी जी लेते हैं...या फिर ये वो लोग हैं जो आपके अगले जन्म में आपसे मिलेंगे...अभी तो बस मार्क किया है आपको.

जब दिमाग में कोई ख्याल नहीं चल रहा होता...क्या चलता है? जब आप किसी को नहीं ढूंढ रहे होते, क्या ढूंढते हो? जब आपको कोई काम नहीं है तो मेरा ब्लॉग क्यूँ पढ़ते हो ( ;) बस देख रही थी कि कोई पढ़ भी रहा है कि नहीं, बहुत ज्ञान दे रही हूँ ऊपर :) )
बर्न की पार्लियामेंट बिल्डिंग से
अगर कोई आगे चलता हुआ जा रहा है तो ऐसे सवाल क्यूँ आते हैं कि वो पलटे तो हम देख सके कि उसकी आँखों का रंग कैसा है. मैं सदियों सदियों जाने किसकी आँखें स्केच कर रही हूँ जो पूरी ही नहीं होती. ऐसा कोई भी तो नज़र नहीं आता जिसकी आँखें वैसी हैं जो मुझे पेंट करनी हैं...मैं किसे तलाश कर रही हूँ. आइना देखती हूँ तो कई बार लगता है...खुद की तलाश शायद इसी को कहते हैं. किताबें कहती हैं, सब कुछ तुम्हारे अन्दर है...सोचती हूँ, सोचती हूँ...अपने अन्दर उतर नहीं पाती...जाने कहाँ सीढ़ी है. ध्यान करने बैठती हूँ तो चाहने लगती हूँ कि तुम खुश रहो...सबके मुस्कुराते चेहरे सामने आने लगते हैं.

दिन भर सोच सोच के परेशान हो जाती हूँ...दिकिया के लिखने बैठ जाती हूँ...आजकल जाने क्या हो गया है...दिन भर लिखती ही रहती हूँ, लिखती ही रहती हूँ. क्या है जो ख़त्म नहीं होता? क्या लिखना है ऐसा...ऐसा क्या कहना है जो कहा नहीं गया है. चुप जो जाओ री लड़की!!

Q: What's cooking?
A:  Disaster
Q: Where did you get the recipe?
A: It's a girl called Puja...She is THE recipe for disaster!!!

11 comments:

  1. All excellent writings are monologues! :)

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  2. :) :) I will take that as a compliment :D Thanks Gyan jee :D

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  3. मन को उड़ेल देना कोई आपसे सीखे, आप जितना उड़ेल देती हैं, उतना और भर जाता है, परिष्कृत होकर।

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  4. मुझे लगता है प्यार की सबसे पहली डेफिनेशन होती है कि आपके लिए किसी की ख़ुशी जरूरी हो जाए. इसके आगे आप कुछ सोचते ही नहीं, न अच्छा न बुरा, दुनिया एकदम लीनियर हो जाती है. सब कुछ सीधी लाइन में चलता है. Cause and Effect नहीं रहता, बस एक चीज़ होती है, उसके चेहरे पर हंसी...मुस्कराहट. इसके लिए आप कुछ भी करने को तैयार रहते हो…

    यूँ लगा जैसे कोइ गाँठ थी मन में मेरे जो आपकी इन पन्क्तियों ने खोल दी… :)

    बहुत धन्यवाद आपको मन की लिखने के लिये जो सीधे मन से जुड़ गयी आ कर॥

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  5. :):)
    आजकल मैं भी खूब लिख रहा हूँ, पता नहीं क्यों जब भी डायरी लेकर बैठता हूँ तो एक शब्द नहीं लिखा जाता तो मैंने दूसरा तरीका एख्तियर किया है...हमेशा जेब में दो-तीन सादे पन्ने और कलम लेकर चलता हूँ और वो पन्ने बहुत जल्दी भर जाते हैं, मुझे ऐसा लगने लगता है कभी कभी की मैंने उतना तो सोचा ही नहीं जितना लिख डाला है....पन्नों में लिखना आजकल मुझे अच्छा लग रहा, पुराने दिनों में ऐसे ही लिखता था...

    और आपने सही कहा, 2010 के जनवरी का समय रहा होगा, मैं और मेरी छोटी बहन दीप्ति(जो मेरे से 9 साल छोटी है उसे अपनी बहुत सी बातें मैं पूरी रात बता रहा था और अंत में उसके जवाब ने मुझे हैरान कर दिया!!

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  6. @अभी...कागज लेकर चला करो...मेरे गुरु का कहना है कि कहीं भी लिख दिया करो, कागज़, अखबार, टिशू पेपर...जो हाथ में आए।

    अच्छा कर रहे हो, मुझे भी कागज़ पर लिखने में अच्छा लगता है, पर मैं सादे कागज़ पर नहीं लिखती, लाइन ऊपर नीचे होती रहती है, खास तौर से हिन्दी। इंग्लिश फिर भी लिख लेती हूँ पर हिन्दी में लिखने से सबके ऊपर की डंडी होती है न, सीधे रेखा नहीं बनती तो सब बिखरा हुआ लगता है। मैं हमेशा रूल वाले कागज़ पर लिखती हूँ।

    शायद तुम्हारे सादे कागजों का नतीजा है...पोस्ट कितनी चकाचक लिखे हो अभी वाली।

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  7. Is it just a coincidence that I was also thinking to comment in English? Saw first comment by Gyan bhaiya and... ! is it true that in some cases some people think alike? I don't know... may be just a small random coincidence.

    btw I thought I will leave a small comment: "too good to comment" :)

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  8. @abhishek, it's an age old saying 'Great minds think alike' :D :D

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  9. पोस्ट के लफ़ड़े से निकलकर टिप्पणियों के बवाल में उलझ गया। :)

    चकाचक लिखा है। बहुत लिख डाला दो-तीन दिनों में और अच्छा भी। :)

    पूजा डिसआस्टर पकाती है! वाह!

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  10. @अनूप जी...लिखने का भूत चढ़ा था, ये कमबख्त मुआ लिखे बिना उतरता भी नहीं...तो निपटा दिये ताबड़तोड़ स्पीडपोस्ट में :) हमको यकीन था कि एक दिन भूले भटके लोग आ के सब पोस्ट पढ़िये जाएँगे। :) :)

    अब देखिये ना...आज आप कितना तो पोस्ट निपटा डाले :D

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