06 October, 2010

खो के तुम्हें

बहुत दिन हुए सूरज निकले
चाँद कहीं उग आये भी

इश्क-मुश्क है परी कहानी
हमको कोई समझाए भी

मैं हूँ तुम हो दीवारें हैं 
कोई इन्हें गिराए भी

खुद को दरियादिल समझे थे
खो के तुम्हें पछताए भी

राशन, पानी, फूल, किताबें
जरा तो दिल बहलाए भी

अख़बारों में सब पढ़ती हूँ
नाम तुम्हारा आये भी

रह गए टूटे शब्द बिचारे
कहीं ग़ज़ल बन जाये भी

दुनियादारी बहुत कठिन है
कोई साथ निभाए भी

होठों से तो हँस लेते हैं
आँखों से मुस्काए भी

21 comments:

  1. कई रोज़ बाद आपकी पोस्ट चमचमा रही है

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  2. अनिल ने सही कहा, चमचमा रही है... कुछेक मिसरे बहुत अच्छे हैं... मसलन

    मैं हूँ तुम हो दीवारें हैं
    कोई इन्हें गिराए भी

    अख़बारों में सब पढ़ती हूँ
    नाम तुम्हारा आये भी

    और

    खुद को दरियादिल समझे थे
    खो के तुम्हें पछताए भी

    कितने छोटे छोटे सुन्दर शेर हैं, मोटे मोटे गुदगुदे उँगलियों की तरह

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  3. क्या बात है ... बहुत सुन्दर .. हरेक शेर अच्छा लगा ... खास कर ये शेर तो लाजवाब है
    मैं हूँ तुम हो दीवारें हैं
    कोई इन्हें गिराए भी

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  4. गुद गुदी होने लगी.

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  5. सोचो, क्या बीत रही मन में,

    तुम हँसे नहीं, इठलाये भी।

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  6. मैं हूँ तुम हो दीवारें हैं
    कोई इन्हें गिराए भी

    खुद को दरियादिल समझे थे
    खो के तुम्हें पछताए भी
    wah kya baat hai..........

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  7. बहुत ’प्यारी’ सी गज़ल..किसी मीठे-चरपरे स्वाद वाले लॉलीपॉप की तरह..देर तक घुलती रहनी वाली खट्टी सी मिठास..जिसका स्वाद उसी को याद होगा बस जिसे पाँच साल हुए लॉलीपॉप चखे हुए..

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  8. होंठों से तो हंस लेते हैं,
    आंखों से मुसकाए भी।

    वाह...बेहतरीन ग़ज़ल।...बधाई

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  9. छोटी बहर की सुंदर गजल।
    बधाई।

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  10. मैं हूँ तुम हो दीवारें हैं
    कोई इन्हें गिराए भी

    खुद को दरियादिल समझे थे
    खो के तुम्हें पछताए भी

    बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना !
    बधाई !

    आज और कल
    हर एक पल

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  11. अच्छी कविता है. कम शब्दों में बहुत कुछ कहने का हुनर. तपती दोपहर में पीपल की छांव में घड़ी भर सुस्ताने का सा अहसास होता है. निरंतर लिखते रहें.

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  12. इस आँखों से मुस्काने का जवाब नहीं

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  13. kya bakwaas hai..

    dubara likha to jail bhejwa denge

    --
    pondy

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  14. pondy saala...abhi geeta se bol ke tumko pitwate hai. bhai logon se connection tere aur jai bhijwayega hamko :P

    nautanki sala!
    dubara mere blog pe aaya na to bombay aa ke tumko kavita padh ke sunayenge.

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  15. क्या बात है.. बहुत खूब..

    दुनियादारी बहुत कठिन है
    कोई साथ निभाए भी


    होठों से तो हँस लेते हैं
    आँखों से मुस्काए भी

    यह कुछ लाइन्स हैं जो हकीकत और ज़िंदगी के काफी करीब लगीं...
    कविता, शेर, गज़ल, गीत क्या होते हैं, नहीं जानता .. जानता हूँ सिर्फ उन शब्दों को जो मन को छू लें... आपकी रचना भी कुछ ऐसी ही है.

    मनोज खत्री

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  16. मैं हूँ तुम हो दीवारें हैं
    कोई इन्हें गिराए भी

    bahut khoob kaha.

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