26 November, 2008

एक शाम




आलसी चांद
आज बहुत दिनों बाद निकला
बादल की कुर्सी पे टेक लगा कर बैठ गया
बेशरम चाँद
पूरी शाम हमें घूरता रहा

लाज से लाल चेहरा...
संदली शाम में घुलता रहा
गुलाबी सितारे आँख मिचौली खेलने लगे

सारी शाम वो घास खोदता रहा
ग्लेशियर से जिस्म पिघलते रहे
मिट्टी में छोटी छोटी नदियाँ बहने लगीं

खिलखिलाती गुनगुनाती...
छोटी छोटी फ्राक पहने हुये लड़कियाँ
अंगूठा दिखाकर चिढ़ाती रही

मैं तितलियों के पीछे भागी बहुत
वो उंचे आसमानों में जाती रहीं
चाँद भी मुट्ठी से फिसलता रहा


अंजुरी में उठा कर तुम्हारा अहसास
मैं पलकों पे होंठों पे रखती रही
तुम जाने कहॉ खोये खोये रहे


पुरवा तुम्हारी बाहें बन कर
मेरी मुस्कुराहटें दुलराती रहीं
आँख भीगी भीगी रही

लबों पर धुआँ धुआँ सा रहा
मैं तरसती रही तुम तरसते रहे
एक शाम के धागे उलझते रहे

19 comments:

  1. आलसी चांद
    आज बहुत दिनों बाद निकला
    बादल की कुर्सी पे टेक लगा कर बैठ गया
    बेशरम चाँद
    पूरी शाम हमें घूरता रहा

    the starting of the poem is wonderful and brought smile on my face. well knitted words with a picture perfect.

    खिलखिलाती गुनगुनाती...
    छोटी छोटी फ्राक पहने हुये लड़कियाँ
    अंगूठा दिखाकर चिढ़ाती रही

    i have met a small girl in these lines, your emotions are so pure and beautiful. a pure heart is breathing down there. very well written puja.

    सारी शाम वो घास खोदता रहा
    ग्लेशियर से जिस्म पिघलते रहे
    मिट्टी में छोटी छोटी नदियाँ बहने लगीं

    wonderfuly written these deep and sophisticated words.

    लबों पर धुआँ धुआँ सा रहा
    मैं तरसती रही तुम तरसते रहे
    एक शाम के धागे उलझते रहे

    here you have completed your poem on a wonderful note. ek mod par la kar chodna aacha laga.
    good shot puja

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  2. मैं तितलियों के पीछे भागी बहुत
    वो उंचे आसमानों में जाती रहीं
    चाँद भी मुट्ठी से फिसलता रहा
    लाजवाब ! बहुत शुभकामनाएं !
    रामराम !

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  3. आलसी चांद
    आज बहुत दिनों बाद निकला
    बादल की कुर्सी पे टेक लगा कर बैठ गया
    बेशरम चाँद
    पूरी शाम हमें घूरता रहा

    जितनी तारीफ की जाए कम है इस आलसी चांद की लगता है मेरी तरह का चांद है ये इतनी देर बाद आपको बधाई भेज रहा हूं बहुत बहुत बहुत अच्‍छी कविता है आपकी काबिलेतारीफ लाजवाब

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  4. अंजुरी में उठा कर तुम्हारा अहसास
    मैं पलकों पे होंठों पे रखती रही
    तुम जाने कहॉ खोये खोये रहे

    भाव बहुत प्यारे हैं इस रचना के पूजा ..बहुत पसंद आई मुझे

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  5. बेशरम चाँद
    पूरी शाम हमें घूरता रहा

    bahot hi nazuk sa ehsas dala hai aapne khas kar is pankti me bahot pasand aai... bahot badhai...

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  6. बहुत लाजवाब रचना ! धन्यवाद !

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  7. ओह...शुरू से आख़िर तक "पूजाइश "अंदाज ......ओर सच कहूँ मै इसे समेट के ले जा रहा हूँ ......कई बार मन करेगा इसे पढने का

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  8. एक शाम के धागे उलझते रहे.

    यही पंक्ति अपने आप में सम्पूर्ण कविता है. सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

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  9. पुरवा तुम्हारी बाहें बन कर
    मेरी मुस्कुराहटें दुलराती रहीं
    आँख भीगी भीगी रही
    लबों पर धुआँ धुआँ सा रहा
    मैं तरसती रही तुम तरसते रहे
    एक शाम के धागे उलझते रहे
    सुंदर अभिव्यक्ति!

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  10. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

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  11. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

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  12. वाह! चांद सच में बड़ा बेशर्म हो गया है! हम भी यही शिकायत करते हैं लेकिन कोई ध्यान ही नहीं देता।

    चांद की आवारगी है बढ़ रही प्रतिदिन
    किसी दिन पकड़ा गया तो क्या होगा?

    हर गोरी के मुखड़े पे तम्बू तान देता है
    कोई मजनू थपड़िया देगा तो क्या होगा?

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  13. क्या बात है...चांद के इस अलसायेपन ने दिल को छू लिया

    बहुत मोहक रचना

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  14. ek rumaniyat thi is kavita mein..

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  15. aisa lagta hai jaise mei khud ko hi padh raha hoon, kyuki mei bhi usi duniya mei jita hoon .shabdon mei jitni saralta hai utni hi khoobsoorati bhi.
    bahut sunder rachna ..
    आभार...अक्षय-मन

    ๑۩۞۩๑वन्दना
    शब्दों की๑۩۞۩๑

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  16. एक शाम के धागे उलझते रहे....
    अच्छा है.

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