18 September, 2008

काँच की यादें

मैं तो बस टुकडों को समेट के रख रही थी
कि ऊँगली में चुभ गया एक लम्हा...

और बहने लगे आंखों के कोरों से
पिछले कितने कहकहे...

कमरे में थिरकने लगे
आहटों के कितने साए...

खिड़की में आ के छुप गए
लुकाछिपी खेलते बच्चे...

जाने किस दिशा से बहने लगी
रजनीगंधा सी महकी पुरवाई...

और छत से बरसने लगे
हरसिंगार के फूल...

जाने क्यों लगा कि
कुछ कभी बीता नहीं था
बस...ठहर गया था।

17 comments:

  1. मैं तो बस टुकडों को समेट के रख रही थी
    कि ऊँगली में चुभ गया एक लम्हा...

    और बहने लगे आंखों के कोरों से
    पिछले कितने कहकहे...

    dil ko chu gaya hai wo lamaha

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  2. बेहद खूबसूरत शब्दों और भाव से रची बसी आप की ये रचना दिल को छू गयी...अति सुंदर.
    नीरज

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  3. इधर बहुत दिनों बाद आया हूं..
    आना अच्छा रहा..
    एक अच्छी कविता जो पढने को मिल गई..
    वैसे आपने कौन सी बाईक ली? आपने बताया नहीं?

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  4. बहुत सुंदर एवं मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति !!


    -- शास्त्री

    -- ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसने अपने विकास के लिये अन्य लोगों की मदद न पाई हो, अत: कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर अन्य चिट्ठाकारों को जरूर प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

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  5. जाने क्यों लगा कि
    कुछ कभी बीता नहीं था
    बस...ठहर गया था।

    सीधे दिल को कचोट गईं आपकी यह चंद लाइनें। अब और क्या कहूं बहुत खूब।

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  6. जाने क्यों लगा कि
    कुछ कभी बीता नहीं था
    बस...ठहर गया था।

    सीधे दिल को कचोट गईं आपकी यह चंद लाइनें। अब और क्या कहूं बहुत खूब।

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  7. बहुत अच्छा लिखा है.

    ऊँगली में चुभ गया एक लम्हा...

    और बहने लगे आंखों के कोरों से
    पिछले कितने कहकहे...

    वाह !

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  8. ्बहुत खूब लिखा आपने।सब उन ठहरे हुए पल को फ़िर से जीना चाहते है,बहुत बढिया

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  9. कुछ देर साथ रहे ,भीगी आँखो से फिर जुदा हुए
    किताबे-मांझी मे दर्ज है कुछ हसीन लम्हे...............

    ज़िंदगी की दौड़ मगर बदस्तूर जारी है .

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  10. मैं तो बस टुकडों को समेट के रख रही थी
    कि ऊँगली में चुभ गया एक लम्हा

    बहुत ही उम्दा रचना। अच्छा लगा पढकर ।

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  11. जाने क्यों लगा कि
    कुछ कभी बीता नहीं था
    बस...ठहर गया था।

    sahi baat hai...yahi hota hai.

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  12. जाने क्यों लगा कि
    कुछ कभी बीता नहीं था
    बस...ठहर गया था।

    बहुत खुबसूरत ! शुभकामनाए !

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  13. कमरे में थिरकने लगे
    आहटों के कितने साए...

    kitne kam shabd mein kitni gehri baat pooja keh di aapne. bahut hi sunder abhivyakti. please allow me to add your blog in my blog list.

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  14. इसी तरह यादों को संजोए रखिए-
    और बहने लगे आंखों के कोरों से
    पिछले कितने कहकहे....

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  15. जाने किस दिशा से बहने लगी
    रजनीगंधा सी महकी पुरवाई...

    और छत से बरसने लगे
    हरसिंगार के फूल...
    u r compostion is very strog
    keep on thinking
    beautiful world of harsingar
    regards

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  16. शायद कुछ बीतता भी नही
    बस ठहर जाता है
    जैसे किसी ने फ्रीज कर दिया हो
    और इंतज़ार होता है
    उस पल का
    जो घुमा देगा जादुई छड़ी

    बहुत खूब

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