21 June, 2008

एक नज़्म भूली सी

सूखे हुए पत्तों को मसला नहीं करते
किसी से नफरत करते हैं पर बेवजह नहीं करते

जीने का अहसास दर्द से ही तो होता है
ज़माने के ज़ख्मों का यूँ गिला नहीं करते

दिलों में नफरतें हो तो फासले और भी बढ़ जाते हैं
यूँ भी बिछड़ के लोग अक्सर मिला नहीं करते

बेजान रिश्तों को दफन करना ही बेहतर है
भूली यादों के सहारे यूँ जिया नहीं करते

मेरे नफरतों के खुदा ये लब तेरी मुस्कराहट मांगते हैं
ये तो जानते हो दुश्मन ऐसी दुआ नहीं करते

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