20 June, 2008

एक पुरानी याद

तुम्हें भूलने की ख्वाहिश शायद अधूरी सी है
फ़िर भी तुम बिन जीने की कोशिश जरूरी सी है

इतने गम मिले मुझको की आदत सी पड़ गई है
फ़िर भी तुम्हारे गम में वो कशिश आज भी थोड़ी सी है

न गुलमोहर है न जाड़ों की धूप और न तुम हो साथ
फ़िर भी उन राहों पर जाने को एक चाह मचलती सी है

मालूम है मुझको कि तुम अब कभी नहीं आओगे
फ़िर भी ख्वाब देखने की मेरी आदत बुरी सी है

हालाँकि मेरी साँसे छीनती हैं मुझसे
फ़िर भी तेरी यादें मेरी जिंदगी सी हैं

11 comments:

  1. बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही आपने

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  2. इतने गम मिले मुझको की आदत सी पड़ गई है
    फ़िर भी तुम्हारे गम में वो कशिश आज भी थोड़ी सी है

    bahut khubsurat

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  3. हालाँकि मेरी साँसे छीनती हैं मुझसे
    फ़िर भी तेरी यादें मेरी जिंदगी सी हैं
    bhut hi gahari paktiya.likhati rhe.

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  4. बहुत बढ़िया ख्याल है, वाह!

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  5. मालूम है मुझको कि तुम अब कभी नहीं आओगे
    फ़िर भी ख्वाब देखने की मेरी आदत बुरी सी है

    well said pooja....

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  6. khubsurst line hsin..dil ko chune wali hain..

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  7. बहुत देर से पढ़ा.. मगर सच में लाजवाब..

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  8. इतने गम मिले मुझको की आदत सी पड़ गई है
    फ़िर भी तुम्हारे गम में वो कशिश आज भी थोड़ी सी है

    न गुलमोहर है न जाड़ों की धूप और न तुम हो साथ
    फ़िर भी उन राहों पर जाने को एक चाह मचलती सी है

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