29 April, 2008

ऐ जिंदगी

तुम्हारी आवाज़ का तिलिस्म

जैसे जंगल में ठहरी हुयी हवा

थोड़ा शोर, थोड़ी खामोशी

जैसे सागर की लहरों का किनारे आना

और पैरों को छूकर चले जाना

जैसे भीड़ में

अचानक मिल जाए कोई पुराना दोस्त

या छत पर आ गिरे

पड़ोसी की काटी हुयी पतंग

कुछ छोटी छोटी खुशियाँ

जिनमें जिन्दगी का लुत्फ़ मिलता है

जैसे जब तुम मेरा नाम लेते हो...

4 comments:

  1. जिनमें जिन्दगी का लुत्फ़ मिलता है

    जैसे जब तुम मेरा नाम लेते हो...

    --बहुत सुन्दर.

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  2. बहुत ख़ूब. वाह !

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  3. बहुत ही बढिया प्रस्तुति..
    आपके पिछले पोस्ट पर भी गया था, मगर कहने को कोई शब्द नहीं मिले थे.. आपकी उदासी में उदास हो चला था..

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  4. या छत पर आ गिरे

    पड़ोसी की काटी हुयी पतंग


    कुछ छोटी छोटी खुशियाँ

    जिनमें जिन्दगी का लुत्फ़ मिलता है

    जैसे जब तुम मेरा नाम लेते हो...


    वाह पूजा .....ऐसे ही लिखती रहो....

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